प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २०५. ईश्वर से हमारे क्या क्या सम्बन्ध हैं ? उत्तर : ईश्वर हमारा माता, पिता, गुरु, राजा, स्वामी, उपास्य आदि है। और हम उसके पुत्र, शिष्य, प्रजा, सेवक, उपासक आदि हैं। @vaidic_gyan
प्र. २०६. ईश्वर जीवों से क्या चाहता है ?
उत्तर : ईश्वर चाहता है कि जीव उसकी आज्ञा का पालन करके संसार में सुखी रहें व मुक्तिपद को प्राप्त करें ।
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उत्तर : ईश्वर चाहता है कि जीव उसकी आज्ञा का पालन करके संसार में सुखी रहें व मुक्तिपद को प्राप्त करें ।
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प्र. २०६. ईश्वर जीवों से क्या चाहता है ? उत्तर : ईश्वर चाहता है कि जीव उसकी आज्ञा का पालन करके संसार में सुखी रहें व मुक्तिपद को प्राप्त करें । @vaidic_gyan
प्र. २०७. ईश्वर की आज्ञा क्या है, यह कैसे पता चलता है ?
उत्तर : वेदों के पढ़ने से और ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभावों को जानने से उसकी आज्ञाओं का पता लगा सकते हैं ।
@vaidic_gyan
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प्र. २०७. ईश्वर की आज्ञा क्या है, यह कैसे पता चलता है ? उत्तर : वेदों के पढ़ने से और ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभावों को जानने से उसकी आज्ञाओं का पता लगा सकते हैं । @vaidic_gyan
प्र. २०८. ईश्वर और आत्मा में क्या समानता है ?
उत्तर : ईश्वर और आत्मा में यह समानता है कि दोनों ही चेतन, पवित्र, अविनाशी, अनादि, निराकार हैं।
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उत्तर : ईश्वर और आत्मा में यह समानता है कि दोनों ही चेतन, पवित्र, अविनाशी, अनादि, निराकार हैं।
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Forwarded from ब्रह्मचर्य
[सतीत्व की रक्षा के साधन]:-
स्त्री लोगों के छः दूषण हैं। उनको स्त्री लोग छोड़ दें -
यह भगवान मनु का श्लोक है। इसका यह अभिप्राय है कि (पानं) मद्य और भंगादि का नशा करना, (दुर्जनसंसर्गः) दुष्ट पुरुषों का संग होना, (पत्या विरह) पति और स्त्री का वियोग, अर्थात् स्त्री अन्य देश में और पुरुष अन्य देश में रहे, (अटन) पति को छोड़कर जहाॅं-तहाॅं स्त्री भ्रमण करे ,जैसे कि नाना प्रकार के मन्दिरों में तथा तीर्थों में स्नान के वास्ते और बहुत से पाखण्डियों के दर्शन के वास्ते स्त्री का भ्रमण करना, (स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च) अत्यन्त निद्रा, अन्य के घर में स्त्री का सोना, अन्य के घर में पति के बिना वास करे और अन्य पुरुषों के संग का होना यह अत्यन्त दूषण स्त्रियों के भ्रष्ट होने के कारण हैं, इन छः कर्मों ही से स्त्री अवश्य भ्रष्ट हो जाएगी इसमें कुछ सन्देह नहीं।
और पुरुषों के वास्ते भी ऐसे बहुत दूषण हैं:-
माता, (स्वसा) भगिनी और (दुहिता) कन्या, इनके साथ भी एकान्त में निवास कभी न करे और अत्यन्त संभाषण भी न करे और नेत्र से उनका स्वरूप और चेष्टा न देखे; जो कुछ उनसे कहना वा सुनना होय सो नीचे दृष्टि करके कहे वा सुने। इससे क्या आया कि जितनी व्यभिचारिणी स्त्री वा वेश्या और जितने वेश्यागामी और परस्त्रीगामी पुरुष हैं उनमें प्रीति वा संभाषण अथवा उनका संग कभी न करे। इस प्रकार के दूषणों से ही पुरुष भ्रष्ट हो जाता है क्योंकि ये जो इन्द्रियग्राम अर्थात् मन और इन्द्रियाॅं हैं ये बड़े प्रबल हैं। जो कोई विद्वान् अथवा जितेन्द्रिय वा योगी हैं वे भी इस प्रकार के संगों से भ्रष्ट हो जाते हैं, तो साधारण जो गृहस्थ हैं वे तो अवश्य ही भ्रष्ट हो जाऍंगे।
इस वास्ते स्त्री व पुरुष सदा इन दुष्ट संगों से बचे रहें।
स्त्री लोगों के छः दूषण हैं। उनको स्त्री लोग छोड़ दें -
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च नारीसंदूषणानि षट्।।
मनु० ९|१३
यह भगवान मनु का श्लोक है। इसका यह अभिप्राय है कि (पानं) मद्य और भंगादि का नशा करना, (दुर्जनसंसर्गः) दुष्ट पुरुषों का संग होना, (पत्या विरह) पति और स्त्री का वियोग, अर्थात् स्त्री अन्य देश में और पुरुष अन्य देश में रहे, (अटन) पति को छोड़कर जहाॅं-तहाॅं स्त्री भ्रमण करे ,जैसे कि नाना प्रकार के मन्दिरों में तथा तीर्थों में स्नान के वास्ते और बहुत से पाखण्डियों के दर्शन के वास्ते स्त्री का भ्रमण करना, (स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च) अत्यन्त निद्रा, अन्य के घर में स्त्री का सोना, अन्य के घर में पति के बिना वास करे और अन्य पुरुषों के संग का होना यह अत्यन्त दूषण स्त्रियों के भ्रष्ट होने के कारण हैं, इन छः कर्मों ही से स्त्री अवश्य भ्रष्ट हो जाएगी इसमें कुछ सन्देह नहीं।
और पुरुषों के वास्ते भी ऐसे बहुत दूषण हैं:-
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामों विद्वांसमपि कर्षति।।
मनु० २|२१५
माता, (स्वसा) भगिनी और (दुहिता) कन्या, इनके साथ भी एकान्त में निवास कभी न करे और अत्यन्त संभाषण भी न करे और नेत्र से उनका स्वरूप और चेष्टा न देखे; जो कुछ उनसे कहना वा सुनना होय सो नीचे दृष्टि करके कहे वा सुने। इससे क्या आया कि जितनी व्यभिचारिणी स्त्री वा वेश्या और जितने वेश्यागामी और परस्त्रीगामी पुरुष हैं उनमें प्रीति वा संभाषण अथवा उनका संग कभी न करे। इस प्रकार के दूषणों से ही पुरुष भ्रष्ट हो जाता है क्योंकि ये जो इन्द्रियग्राम अर्थात् मन और इन्द्रियाॅं हैं ये बड़े प्रबल हैं। जो कोई विद्वान् अथवा जितेन्द्रिय वा योगी हैं वे भी इस प्रकार के संगों से भ्रष्ट हो जाते हैं, तो साधारण जो गृहस्थ हैं वे तो अवश्य ही भ्रष्ट हो जाऍंगे।
इस वास्ते स्त्री व पुरुष सदा इन दुष्ट संगों से बचे रहें।
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प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २०८. ईश्वर और आत्मा में क्या समानता है ? उत्तर : ईश्वर और आत्मा में यह समानता है कि दोनों ही चेतन, पवित्र, अविनाशी, अनादि, निराकार हैं। @vaidic_gyan
प्र. २०९. ईश्वर और आत्मा में क्या भेद है ?
उत्तर : ईश्वर सर्वज्ञ है, आत्मा अल्पज्ञ हैं। ईश्वर के पास अपना उत्कृष्ट सुख है आत्मा के पास सुख नहीं है वह सुख लेने के लिए ईश्वर के पास या संसार के पदार्थों में जाता है।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर सर्वज्ञ है, आत्मा अल्पज्ञ हैं। ईश्वर के पास अपना उत्कृष्ट सुख है आत्मा के पास सुख नहीं है वह सुख लेने के लिए ईश्वर के पास या संसार के पदार्थों में जाता है।
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प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २०९. ईश्वर और आत्मा में क्या भेद है ? उत्तर : ईश्वर सर्वज्ञ है, आत्मा अल्पज्ञ हैं। ईश्वर के पास अपना उत्कृष्ट सुख है आत्मा के पास सुख नहीं है वह सुख लेने के लिए ईश्वर के पास या संसार के पदार्थों में जाता है। @vaidic_gyan
प्र. २१०. ईश्वर का मुख्य व निज नाम क्या है ?
उत्तर : 'ओ३म्' यह परमात्मा का प्रधान निज नाम है। जैसे वेद में भी आया है "ओ३म् क्रतो स्मर" ।
@vaidic_gyan
उत्तर : 'ओ३म्' यह परमात्मा का प्रधान निज नाम है। जैसे वेद में भी आया है "ओ३म् क्रतो स्मर" ।
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दुखों से मुक्ति पूरी तरह चाहते हो
और 31 नील 10 खरब, 40 अरब वर्षो तक 100% महासुख चाहते हो
तो मोक्ष के लिए परिश्रम करो , यही मनुष्य जन्म का मुख्य लक्ष्य है।
मोक्ष के लिए 3 काम करना होगा
1) अष्टांग योग का पालन करके ईश्वर साक्षात्कार करना
2) निष्काम पुण्य करना
3) शुद्ध ज्ञान, अर्थात - वेद और आर्ष ग्रंथों का विद्वान बनना होगा ।
और 31 नील 10 खरब, 40 अरब वर्षो तक 100% महासुख चाहते हो
तो मोक्ष के लिए परिश्रम करो , यही मनुष्य जन्म का मुख्य लक्ष्य है।
मोक्ष के लिए 3 काम करना होगा
1) अष्टांग योग का पालन करके ईश्वर साक्षात्कार करना
2) निष्काम पुण्य करना
3) शुद्ध ज्ञान, अर्थात - वेद और आर्ष ग्रंथों का विद्वान बनना होगा ।
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सूक्ष्म विद्या -
भारतीय वैदिक वांग्मय और गौतम ऋषि के न्यायदर्शन( तर्क शास्त्र ) के अनुसार ऐसा माना गया है, कि "एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है तब तक जब तक मोक्ष न मिल जाये । ईश्वर, आत्मा के कर्मों के आधार पर उसे अगला जन्म देता है।"दूसरा सिद्धांत है कि बिना दंड के और दंड के भय से कोई सुधरता नहीं है।
जब कोई मनुष्य सेवा, दान , यज्ञ ,वेद प्रचार, पशु -पक्षियों पर्यावरण की रक्षा , निर्धन दुखिया , रोगी की सहायता, वेद प्रचार आदि अच्छे काम करता है, तो वह इस जीवन में भी सुखी रहता है( भले ही दुष्ट लोग उसे परेशान करें पर भीतर से ईश्वर उसे आनन्द देता है) और उसका अगला जन्म भी अच्छा सुखदायक होता है अर्थात उसे उत्तम मनुष्य का जन्म मिलता है।"
"और यदि कोई व्यक्ति झूठ बोलना, छल कपट, चोरी, ठगी, मांसाहार, अन्याय, पक्षपात, निर्दोष जीवों की हत्या इत्यादि बुरे काम करता है, तो ईश्वर उसे मरने के बाद पशु पक्षी , कीड़े,विकलांग,गरीब, मूर्ख, समलैंगिक, किन्नर योनियों में जन्म देता है, जहां पर वह दंड स्वरूप अनेक प्रकार के दुखों को भोगता है, ये दंड पाप की मात्रा के अनुसार सैकड़ों हजारों जन्मों तक भी चलता रह सकता है। और वह इस जन्म में भी अंदर से दुःखी रहता है भले ही कितना धनिक हो ।इस प्रकार से वैदिक शास्त्रों के अनुसार अनेक जन्मों की व्यवस्था कर्मफल के आधार पर चलती रहती है।
"तो इस जन्म और अगले जन्म में थोड़ा ही अंतर है, "एक सांस का।" यदि आपकी सांस चल रही है, तो आप "यहां" हैं, अर्थात इस जन्म में हैं।और यदि सांस बंद हो गई, तो आप "वहां" हैं, अर्थात अगले जन्म में। अतः इस जन्म में अच्छे काम करें, और बुराइयों से बचें, ताकि आपको अगला जन्म भी अच्छा ही मिले।"
--- सौजन्य से : आर्य विद्वान गण
भारतीय वैदिक वांग्मय और गौतम ऋषि के न्यायदर्शन( तर्क शास्त्र ) के अनुसार ऐसा माना गया है, कि "एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है तब तक जब तक मोक्ष न मिल जाये । ईश्वर, आत्मा के कर्मों के आधार पर उसे अगला जन्म देता है।"दूसरा सिद्धांत है कि बिना दंड के और दंड के भय से कोई सुधरता नहीं है।
जब कोई मनुष्य सेवा, दान , यज्ञ ,वेद प्रचार, पशु -पक्षियों पर्यावरण की रक्षा , निर्धन दुखिया , रोगी की सहायता, वेद प्रचार आदि अच्छे काम करता है, तो वह इस जीवन में भी सुखी रहता है( भले ही दुष्ट लोग उसे परेशान करें पर भीतर से ईश्वर उसे आनन्द देता है) और उसका अगला जन्म भी अच्छा सुखदायक होता है अर्थात उसे उत्तम मनुष्य का जन्म मिलता है।"
"और यदि कोई व्यक्ति झूठ बोलना, छल कपट, चोरी, ठगी, मांसाहार, अन्याय, पक्षपात, निर्दोष जीवों की हत्या इत्यादि बुरे काम करता है, तो ईश्वर उसे मरने के बाद पशु पक्षी , कीड़े,विकलांग,गरीब, मूर्ख, समलैंगिक, किन्नर योनियों में जन्म देता है, जहां पर वह दंड स्वरूप अनेक प्रकार के दुखों को भोगता है, ये दंड पाप की मात्रा के अनुसार सैकड़ों हजारों जन्मों तक भी चलता रह सकता है। और वह इस जन्म में भी अंदर से दुःखी रहता है भले ही कितना धनिक हो ।इस प्रकार से वैदिक शास्त्रों के अनुसार अनेक जन्मों की व्यवस्था कर्मफल के आधार पर चलती रहती है।
"तो इस जन्म और अगले जन्म में थोड़ा ही अंतर है, "एक सांस का।" यदि आपकी सांस चल रही है, तो आप "यहां" हैं, अर्थात इस जन्म में हैं।और यदि सांस बंद हो गई, तो आप "वहां" हैं, अर्थात अगले जन्म में। अतः इस जन्म में अच्छे काम करें, और बुराइयों से बचें, ताकि आपको अगला जन्म भी अच्छा ही मिले।"
--- सौजन्य से : आर्य विद्वान गण
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प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २१०. ईश्वर का मुख्य व निज नाम क्या है ? उत्तर : 'ओ३म्' यह परमात्मा का प्रधान निज नाम है। जैसे वेद में भी आया है "ओ३म् क्रतो स्मर" । @vaidic_gyan
प्र. २११. ईश्वर के मुख्य कार्य कौन कौन से हैं ?
उत्तर : ईश्वर के मुख्य रुप से ५ कार्य हैं : (१) सृष्टि को बनाना,
(२) पालन करना,
(३) संहार करना,
(४) जीवों के कर्मों का फल देना,
(५) वेदों का ज्ञान देना ।
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उत्तर : ईश्वर के मुख्य रुप से ५ कार्य हैं : (१) सृष्टि को बनाना,
(२) पालन करना,
(३) संहार करना,
(४) जीवों के कर्मों का फल देना,
(५) वेदों का ज्ञान देना ।
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