प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २०८. ईश्वर और आत्मा में क्या समानता है ? उत्तर : ईश्वर और आत्मा में यह समानता है कि दोनों ही चेतन, पवित्र, अविनाशी, अनादि, निराकार हैं। @vaidic_gyan
प्र. २०९. ईश्वर और आत्मा में क्या भेद है ?
उत्तर : ईश्वर सर्वज्ञ है, आत्मा अल्पज्ञ हैं। ईश्वर के पास अपना उत्कृष्ट सुख है आत्मा के पास सुख नहीं है वह सुख लेने के लिए ईश्वर के पास या संसार के पदार्थों में जाता है।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर सर्वज्ञ है, आत्मा अल्पज्ञ हैं। ईश्वर के पास अपना उत्कृष्ट सुख है आत्मा के पास सुख नहीं है वह सुख लेने के लिए ईश्वर के पास या संसार के पदार्थों में जाता है।
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प्र. २०९. ईश्वर और आत्मा में क्या भेद है ? उत्तर : ईश्वर सर्वज्ञ है, आत्मा अल्पज्ञ हैं। ईश्वर के पास अपना उत्कृष्ट सुख है आत्मा के पास सुख नहीं है वह सुख लेने के लिए ईश्वर के पास या संसार के पदार्थों में जाता है। @vaidic_gyan
प्र. २१०. ईश्वर का मुख्य व निज नाम क्या है ?
उत्तर : 'ओ३म्' यह परमात्मा का प्रधान निज नाम है। जैसे वेद में भी आया है "ओ३म् क्रतो स्मर" ।
@vaidic_gyan
उत्तर : 'ओ३म्' यह परमात्मा का प्रधान निज नाम है। जैसे वेद में भी आया है "ओ३म् क्रतो स्मर" ।
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दुखों से मुक्ति पूरी तरह चाहते हो
और 31 नील 10 खरब, 40 अरब वर्षो तक 100% महासुख चाहते हो
तो मोक्ष के लिए परिश्रम करो , यही मनुष्य जन्म का मुख्य लक्ष्य है।
मोक्ष के लिए 3 काम करना होगा
1) अष्टांग योग का पालन करके ईश्वर साक्षात्कार करना
2) निष्काम पुण्य करना
3) शुद्ध ज्ञान, अर्थात - वेद और आर्ष ग्रंथों का विद्वान बनना होगा ।
और 31 नील 10 खरब, 40 अरब वर्षो तक 100% महासुख चाहते हो
तो मोक्ष के लिए परिश्रम करो , यही मनुष्य जन्म का मुख्य लक्ष्य है।
मोक्ष के लिए 3 काम करना होगा
1) अष्टांग योग का पालन करके ईश्वर साक्षात्कार करना
2) निष्काम पुण्य करना
3) शुद्ध ज्ञान, अर्थात - वेद और आर्ष ग्रंथों का विद्वान बनना होगा ।
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सूक्ष्म विद्या -
भारतीय वैदिक वांग्मय और गौतम ऋषि के न्यायदर्शन( तर्क शास्त्र ) के अनुसार ऐसा माना गया है, कि "एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है तब तक जब तक मोक्ष न मिल जाये । ईश्वर, आत्मा के कर्मों के आधार पर उसे अगला जन्म देता है।"दूसरा सिद्धांत है कि बिना दंड के और दंड के भय से कोई सुधरता नहीं है।
जब कोई मनुष्य सेवा, दान , यज्ञ ,वेद प्रचार, पशु -पक्षियों पर्यावरण की रक्षा , निर्धन दुखिया , रोगी की सहायता, वेद प्रचार आदि अच्छे काम करता है, तो वह इस जीवन में भी सुखी रहता है( भले ही दुष्ट लोग उसे परेशान करें पर भीतर से ईश्वर उसे आनन्द देता है) और उसका अगला जन्म भी अच्छा सुखदायक होता है अर्थात उसे उत्तम मनुष्य का जन्म मिलता है।"
"और यदि कोई व्यक्ति झूठ बोलना, छल कपट, चोरी, ठगी, मांसाहार, अन्याय, पक्षपात, निर्दोष जीवों की हत्या इत्यादि बुरे काम करता है, तो ईश्वर उसे मरने के बाद पशु पक्षी , कीड़े,विकलांग,गरीब, मूर्ख, समलैंगिक, किन्नर योनियों में जन्म देता है, जहां पर वह दंड स्वरूप अनेक प्रकार के दुखों को भोगता है, ये दंड पाप की मात्रा के अनुसार सैकड़ों हजारों जन्मों तक भी चलता रह सकता है। और वह इस जन्म में भी अंदर से दुःखी रहता है भले ही कितना धनिक हो ।इस प्रकार से वैदिक शास्त्रों के अनुसार अनेक जन्मों की व्यवस्था कर्मफल के आधार पर चलती रहती है।
"तो इस जन्म और अगले जन्म में थोड़ा ही अंतर है, "एक सांस का।" यदि आपकी सांस चल रही है, तो आप "यहां" हैं, अर्थात इस जन्म में हैं।और यदि सांस बंद हो गई, तो आप "वहां" हैं, अर्थात अगले जन्म में। अतः इस जन्म में अच्छे काम करें, और बुराइयों से बचें, ताकि आपको अगला जन्म भी अच्छा ही मिले।"
--- सौजन्य से : आर्य विद्वान गण
भारतीय वैदिक वांग्मय और गौतम ऋषि के न्यायदर्शन( तर्क शास्त्र ) के अनुसार ऐसा माना गया है, कि "एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है तब तक जब तक मोक्ष न मिल जाये । ईश्वर, आत्मा के कर्मों के आधार पर उसे अगला जन्म देता है।"दूसरा सिद्धांत है कि बिना दंड के और दंड के भय से कोई सुधरता नहीं है।
जब कोई मनुष्य सेवा, दान , यज्ञ ,वेद प्रचार, पशु -पक्षियों पर्यावरण की रक्षा , निर्धन दुखिया , रोगी की सहायता, वेद प्रचार आदि अच्छे काम करता है, तो वह इस जीवन में भी सुखी रहता है( भले ही दुष्ट लोग उसे परेशान करें पर भीतर से ईश्वर उसे आनन्द देता है) और उसका अगला जन्म भी अच्छा सुखदायक होता है अर्थात उसे उत्तम मनुष्य का जन्म मिलता है।"
"और यदि कोई व्यक्ति झूठ बोलना, छल कपट, चोरी, ठगी, मांसाहार, अन्याय, पक्षपात, निर्दोष जीवों की हत्या इत्यादि बुरे काम करता है, तो ईश्वर उसे मरने के बाद पशु पक्षी , कीड़े,विकलांग,गरीब, मूर्ख, समलैंगिक, किन्नर योनियों में जन्म देता है, जहां पर वह दंड स्वरूप अनेक प्रकार के दुखों को भोगता है, ये दंड पाप की मात्रा के अनुसार सैकड़ों हजारों जन्मों तक भी चलता रह सकता है। और वह इस जन्म में भी अंदर से दुःखी रहता है भले ही कितना धनिक हो ।इस प्रकार से वैदिक शास्त्रों के अनुसार अनेक जन्मों की व्यवस्था कर्मफल के आधार पर चलती रहती है।
"तो इस जन्म और अगले जन्म में थोड़ा ही अंतर है, "एक सांस का।" यदि आपकी सांस चल रही है, तो आप "यहां" हैं, अर्थात इस जन्म में हैं।और यदि सांस बंद हो गई, तो आप "वहां" हैं, अर्थात अगले जन्म में। अतः इस जन्म में अच्छे काम करें, और बुराइयों से बचें, ताकि आपको अगला जन्म भी अच्छा ही मिले।"
--- सौजन्य से : आर्य विद्वान गण
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प्र. २१०. ईश्वर का मुख्य व निज नाम क्या है ? उत्तर : 'ओ३म्' यह परमात्मा का प्रधान निज नाम है। जैसे वेद में भी आया है "ओ३म् क्रतो स्मर" । @vaidic_gyan
प्र. २११. ईश्वर के मुख्य कार्य कौन कौन से हैं ?
उत्तर : ईश्वर के मुख्य रुप से ५ कार्य हैं : (१) सृष्टि को बनाना,
(२) पालन करना,
(३) संहार करना,
(४) जीवों के कर्मों का फल देना,
(५) वेदों का ज्ञान देना ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर के मुख्य रुप से ५ कार्य हैं : (१) सृष्टि को बनाना,
(२) पालन करना,
(३) संहार करना,
(४) जीवों के कर्मों का फल देना,
(५) वेदों का ज्ञान देना ।
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प्र. २११. ईश्वर के मुख्य कार्य कौन कौन से हैं ? उत्तर : ईश्वर के मुख्य रुप से ५ कार्य हैं : (१) सृष्टि को बनाना, (२) पालन करना, (३) संहार करना, (४) जीवों के कर्मों का फल देना, (५) वेदों का ज्ञान देना । @vaidic_gyan
प्र. २१२. प्रलय में ईश्वर कुछ करता है या सो जाता है ?
उत्तर : प्रलय समय में ईश्वर मुक्तात्माओं को आनन्द भुगाता है।
@vaidic_gyan
उत्तर : प्रलय समय में ईश्वर मुक्तात्माओं को आनन्द भुगाता है।
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प्र. २१२. प्रलय में ईश्वर कुछ करता है या सो जाता है ? उत्तर : प्रलय समय में ईश्वर मुक्तात्माओं को आनन्द भुगाता है। @vaidic_gyan
प्र. २१३. ईश्वर का ज्ञान सदा एक सा रहता है या घटता बढ़ता है ?
उत्तर : ईश्वर का ज्ञान सदा एकरस रहता है अर्थात् घटता बढ़ता नहीं है तथा वह असत्य भी नहीं होता ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर का ज्ञान सदा एकरस रहता है अर्थात् घटता बढ़ता नहीं है तथा वह असत्य भी नहीं होता ।
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प्र. २१३. ईश्वर का ज्ञान सदा एक सा रहता है या घटता बढ़ता है ? उत्तर : ईश्वर का ज्ञान सदा एकरस रहता है अर्थात् घटता बढ़ता नहीं है तथा वह असत्य भी नहीं होता । @vaidic_gyan
प्र. २१४. संसार को किसने धारण किया हुआ है ?
उत्तर : ईश्वर ने अपने सामर्थ्य से सब लोक-लोकान्तरों को (संसार को) धारण कर रखा है।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर ने अपने सामर्थ्य से सब लोक-लोकान्तरों को (संसार को) धारण कर रखा है।
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प्र. २१४. संसार को किसने धारण किया हुआ है ? उत्तर : ईश्वर ने अपने सामर्थ्य से सब लोक-लोकान्तरों को (संसार को) धारण कर रखा है। @vaidic_gyan
प्र. २१५. ईश्वर के सुख व सांसारिक पदार्थों के सुख में कोई अन्तर है या नहीं ?
उत्तर : ईश्वर के सुख व सांसारिक पदार्थों के सुख में अन्तर है। ईश्वर का आनन्द स्थायी व पूर्ण तृप्ति देने वाला है जबकि सांसारिक पदार्थों का सुख क्षणिक व दुःखमिश्रित है ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर के सुख व सांसारिक पदार्थों के सुख में अन्तर है। ईश्वर का आनन्द स्थायी व पूर्ण तृप्ति देने वाला है जबकि सांसारिक पदार्थों का सुख क्षणिक व दुःखमिश्रित है ।
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प्र. २१५. ईश्वर के सुख व सांसारिक पदार्थों के सुख में कोई अन्तर है या नहीं ? उत्तर : ईश्वर के सुख व सांसारिक पदार्थों के सुख में अन्तर है। ईश्वर का आनन्द स्थायी व पूर्ण तृप्ति देने वाला है जबकि सांसारिक पदार्थों का सुख क्षणिक व दुःखमिश्रित है । @vaidic_gyan
प्र. २१६. ईश्वर व जीवों के बीच कोई दूरी है या नहीं ?
उत्तर : काल व स्थान की दृष्टि से जीव, ईश्वर से दूर नहीं हैं। ईश्वर हर समय, हर स्थान पर उनके साथ रहता है। परन्तु ज्ञान की दृष्टि से जीव ईश्वर से दूर हो जाते हैं। जो ईश्वर को नहीं जानते, मानते, व उसकी भक्ति नहीं करते वे जीव, ईश्वर से दूर हैं ।
@vaidic_gyan
उत्तर : काल व स्थान की दृष्टि से जीव, ईश्वर से दूर नहीं हैं। ईश्वर हर समय, हर स्थान पर उनके साथ रहता है। परन्तु ज्ञान की दृष्टि से जीव ईश्वर से दूर हो जाते हैं। जो ईश्वर को नहीं जानते, मानते, व उसकी भक्ति नहीं करते वे जीव, ईश्वर से दूर हैं ।
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