प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २१६. ईश्वर व जीवों के बीच कोई दूरी है या नहीं ? उत्तर : काल व स्थान की दृष्टि से जीव, ईश्वर से दूर नहीं हैं। ईश्वर हर समय, हर स्थान पर उनके साथ रहता है। परन्तु ज्ञान की दृष्टि से जीव ईश्वर से दूर हो जाते हैं। जो ईश्वर को नहीं जानते, मानते, व उसकी भक्ति…
प्र. २१७. ईश्वर की क्या विशेषता है ?
उत्तर : ईश्वर सदा अपने आनन्द में मग्न रहता है। ईश्वर में कोई न्यूनता, कोई दोष नहीं है। उसे किसी भौतिक पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर सदा अपने आनन्द में मग्न रहता है। ईश्वर में कोई न्यूनता, कोई दोष नहीं है। उसे किसी भौतिक पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती ।
@vaidic_gyan
👍2👏2❤1
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २१७. ईश्वर की क्या विशेषता है ? उत्तर : ईश्वर सदा अपने आनन्द में मग्न रहता है। ईश्वर में कोई न्यूनता, कोई दोष नहीं है। उसे किसी भौतिक पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती । @vaidic_gyan
प्र. २१८. ईश्वर किस किस का स्वामी है ?
उत्तर : ईश्वर प्रकृति, जीवों, संसार व मोक्ष का स्वामी है ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर प्रकृति, जीवों, संसार व मोक्ष का स्वामी है ।
@vaidic_gyan
❤7👍3
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २१८. ईश्वर किस किस का स्वामी है ? उत्तर : ईश्वर प्रकृति, जीवों, संसार व मोक्ष का स्वामी है । @vaidic_gyan
प्र. २१९. क्या जीव अपने कर्मों का फल पूर्ण रूप से स्वयं ले सकते हैं ?
उत्तर : नहीं, कर्मों का फल ईश्वर के अधीन है। वह अपनी व्यवस्था से कर्मफल देता है।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, कर्मों का फल ईश्वर के अधीन है। वह अपनी व्यवस्था से कर्मफल देता है।
@vaidic_gyan
👍5🔥1
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २१९. क्या जीव अपने कर्मों का फल पूर्ण रूप से स्वयं ले सकते हैं ? उत्तर : नहीं, कर्मों का फल ईश्वर के अधीन है। वह अपनी व्यवस्था से कर्मफल देता है। @vaidic_gyan
प्र. २२०. क्या भक्त अपने सामर्थ्य से ईश्वर का दर्शन (अनुभूति) कर सकता है ?
उत्तर : नहीं, जब तक ईश्वर से विशेष ज्ञान विज्ञान न मिले व ईश्वर की कृपा न हो तब तक भक्त उसका दर्शन (अनुभूति) नहीं कर सकता ।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, जब तक ईश्वर से विशेष ज्ञान विज्ञान न मिले व ईश्वर की कृपा न हो तब तक भक्त उसका दर्शन (अनुभूति) नहीं कर सकता ।
@vaidic_gyan
🙏5👍1
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २२०. क्या भक्त अपने सामर्थ्य से ईश्वर का दर्शन (अनुभूति) कर सकता है ? उत्तर : नहीं, जब तक ईश्वर से विशेष ज्ञान विज्ञान न मिले व ईश्वर की कृपा न हो तब तक भक्त उसका दर्शन (अनुभूति) नहीं कर सकता । @vaidic_gyan
प्र. २२१. जब परमेश्वर जन्म नहीं लेता तब निर्गुण व जब जन्म लेता है तब सगुण कहलाता है। क्या यह बात ठीक है ?
उत्तर : नहीं, सगुण व निर्गुण का अर्थ भिन्न ही है। सर्वज्ञता, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों से सहित होने से उसे सगुण व जड़त्व, मूर्खत्व, राग-द्वेष आदि गुणों से रहित होने से ईश्वर को निर्गुण कहते हैं ।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, सगुण व निर्गुण का अर्थ भिन्न ही है। सर्वज्ञता, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों से सहित होने से उसे सगुण व जड़त्व, मूर्खत्व, राग-द्वेष आदि गुणों से रहित होने से ईश्वर को निर्गुण कहते हैं ।
@vaidic_gyan
👍5
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २२१. जब परमेश्वर जन्म नहीं लेता तब निर्गुण व जब जन्म लेता है तब सगुण कहलाता है। क्या यह बात ठीक है ? उत्तर : नहीं, सगुण व निर्गुण का अर्थ भिन्न ही है। सर्वज्ञता, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों से सहित होने से उसे सगुण व जड़त्व, मूर्खत्व, राग-द्वेष आदि गुणों…
प्र. २२२. ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को क्या अनुभूति होती है ?
उत्तर : ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को यह अनुभूति होती है कि जो जानना था सो जान लिया, जो पाना था सो पा लिया, अब कुछ भी जानना या प्राप्त करना बाकी नहीं रहा ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को यह अनुभूति होती है कि जो जानना था सो जान लिया, जो पाना था सो पा लिया, अब कुछ भी जानना या प्राप्त करना बाकी नहीं रहा ।
@vaidic_gyan
❤6
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
यह नववर्ष हमें स्वीकार नहीं
- राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर
- राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर
👍7🙏3❤1🔥1👏1🎉1
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २२२. ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को क्या अनुभूति होती है ? उत्तर : ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को यह अनुभूति होती है कि जो जानना था सो जान लिया, जो पाना था सो पा लिया, अब कुछ भी जानना या प्राप्त करना बाकी नहीं रहा । @vaidic_gyan
प्र. २२३. मनुष्य जन्म पाकर करने योग्य सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कौन सा है ?
उत्तर : ईश्वर को समझना व उसकी अनूभूति करना (प्रत्यक्ष करना) सबसे महत्वपूर्ण कार्य है ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर को समझना व उसकी अनूभूति करना (प्रत्यक्ष करना) सबसे महत्वपूर्ण कार्य है ।
@vaidic_gyan
💯8👍2
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २२३. मनुष्य जन्म पाकर करने योग्य सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कौन सा है ? उत्तर : ईश्वर को समझना व उसकी अनूभूति करना (प्रत्यक्ष करना) सबसे महत्वपूर्ण कार्य है । @vaidic_gyan
प्र. २२४. क्या ईश्वर विरक्त है ?
उत्तर : नहीं, जो प्राप्त हुए पदार्थ को छोड़ दे उसे विरक्त कहते हैं ईश्वर सर्वव्यापक होने से किसी पदार्थ को नहीं छोड़ता इस दृष्टि से वह विरक्त नहीं हैं।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, जो प्राप्त हुए पदार्थ को छोड़ दे उसे विरक्त कहते हैं ईश्वर सर्वव्यापक होने से किसी पदार्थ को नहीं छोड़ता इस दृष्टि से वह विरक्त नहीं हैं।
@vaidic_gyan
👍8