प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २२०. क्या भक्त अपने सामर्थ्य से ईश्वर का दर्शन (अनुभूति) कर सकता है ? उत्तर : नहीं, जब तक ईश्वर से विशेष ज्ञान विज्ञान न मिले व ईश्वर की कृपा न हो तब तक भक्त उसका दर्शन (अनुभूति) नहीं कर सकता । @vaidic_gyan
प्र. २२१. जब परमेश्वर जन्म नहीं लेता तब निर्गुण व जब जन्म लेता है तब सगुण कहलाता है। क्या यह बात ठीक है ?
उत्तर : नहीं, सगुण व निर्गुण का अर्थ भिन्न ही है। सर्वज्ञता, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों से सहित होने से उसे सगुण व जड़त्व, मूर्खत्व, राग-द्वेष आदि गुणों से रहित होने से ईश्वर को निर्गुण कहते हैं ।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, सगुण व निर्गुण का अर्थ भिन्न ही है। सर्वज्ञता, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों से सहित होने से उसे सगुण व जड़त्व, मूर्खत्व, राग-द्वेष आदि गुणों से रहित होने से ईश्वर को निर्गुण कहते हैं ।
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प्र. २२१. जब परमेश्वर जन्म नहीं लेता तब निर्गुण व जब जन्म लेता है तब सगुण कहलाता है। क्या यह बात ठीक है ? उत्तर : नहीं, सगुण व निर्गुण का अर्थ भिन्न ही है। सर्वज्ञता, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों से सहित होने से उसे सगुण व जड़त्व, मूर्खत्व, राग-द्वेष आदि गुणों…
प्र. २२२. ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को क्या अनुभूति होती है ?
उत्तर : ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को यह अनुभूति होती है कि जो जानना था सो जान लिया, जो पाना था सो पा लिया, अब कुछ भी जानना या प्राप्त करना बाकी नहीं रहा ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को यह अनुभूति होती है कि जो जानना था सो जान लिया, जो पाना था सो पा लिया, अब कुछ भी जानना या प्राप्त करना बाकी नहीं रहा ।
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यह नववर्ष हमें स्वीकार नहीं
- राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर
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प्र. २२२. ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को क्या अनुभूति होती है ? उत्तर : ईश्वर को जानने के पश्चात् योगी को यह अनुभूति होती है कि जो जानना था सो जान लिया, जो पाना था सो पा लिया, अब कुछ भी जानना या प्राप्त करना बाकी नहीं रहा । @vaidic_gyan
प्र. २२३. मनुष्य जन्म पाकर करने योग्य सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कौन सा है ?
उत्तर : ईश्वर को समझना व उसकी अनूभूति करना (प्रत्यक्ष करना) सबसे महत्वपूर्ण कार्य है ।
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उत्तर : ईश्वर को समझना व उसकी अनूभूति करना (प्रत्यक्ष करना) सबसे महत्वपूर्ण कार्य है ।
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प्र. २२३. मनुष्य जन्म पाकर करने योग्य सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कौन सा है ? उत्तर : ईश्वर को समझना व उसकी अनूभूति करना (प्रत्यक्ष करना) सबसे महत्वपूर्ण कार्य है । @vaidic_gyan
प्र. २२४. क्या ईश्वर विरक्त है ?
उत्तर : नहीं, जो प्राप्त हुए पदार्थ को छोड़ दे उसे विरक्त कहते हैं ईश्वर सर्वव्यापक होने से किसी पदार्थ को नहीं छोड़ता इस दृष्टि से वह विरक्त नहीं हैं।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, जो प्राप्त हुए पदार्थ को छोड़ दे उसे विरक्त कहते हैं ईश्वर सर्वव्यापक होने से किसी पदार्थ को नहीं छोड़ता इस दृष्टि से वह विरक्त नहीं हैं।
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प्र. २२४. क्या ईश्वर विरक्त है ? उत्तर : नहीं, जो प्राप्त हुए पदार्थ को छोड़ दे उसे विरक्त कहते हैं ईश्वर सर्वव्यापक होने से किसी पदार्थ को नहीं छोड़ता इस दृष्टि से वह विरक्त नहीं हैं। @vaidic_gyan
प्र. २२५. क्या ईश्वर जीवों में या सांसारिक पदार्थों में राग रखता है ?
उत्तर : नहीं, राग अपने से भिन्न उत्तम पदार्थ में होता है। ईश्वर से कोई भी जीव या सांसारिक पदार्थ उत्तम नहीं हैं। अतः ईश्वर किसी से भी राग नहीं रखता है।
@vaidic_gyan
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प्र. २२५. क्या ईश्वर जीवों में या सांसारिक पदार्थों में राग रखता है ? उत्तर : नहीं, राग अपने से भिन्न उत्तम पदार्थ में होता है। ईश्वर से कोई भी जीव या सांसारिक पदार्थ उत्तम नहीं हैं। अतः ईश्वर किसी से भी राग नहीं रखता है। @vaidic_gyan
प्र. २२६. क्या ईश्वर इस संसार के बाहर भी है ?
उत्तर : हाँ, है। अपितु ईश्वर इतना महान् है कि यह सारी सृष्टि तो उसके सामने परमाणु के तुल्य भी नहीं है।
@vaidic_gyan
उत्तर : हाँ, है। अपितु ईश्वर इतना महान् है कि यह सारी सृष्टि तो उसके सामने परमाणु के तुल्य भी नहीं है।
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प्र. २२६. क्या ईश्वर इस संसार के बाहर भी है ? उत्तर : हाँ, है। अपितु ईश्वर इतना महान् है कि यह सारी सृष्टि तो उसके सामने परमाणु के तुल्य भी नहीं है। @vaidic_gyan
प्र. २२७. क्या ईश्वर हमें प्रतिदिन शिक्षा देता है ?
उत्तर : जी, हाँ। जीव जब बुरे या अच्छे काम करने की इच्छा करता है तो अन्दर से भय, लज्जा, शंका या आनन्द, उत्साह, निर्भयता प्राप्त होते हैं। यह अन्तर्यामी ईश्वर की शिक्षा है जिससे जीव बुरे व अच्छे कर्मों को जान सकता है ।
@vaidic_gyan
उत्तर : जी, हाँ। जीव जब बुरे या अच्छे काम करने की इच्छा करता है तो अन्दर से भय, लज्जा, शंका या आनन्द, उत्साह, निर्भयता प्राप्त होते हैं। यह अन्तर्यामी ईश्वर की शिक्षा है जिससे जीव बुरे व अच्छे कर्मों को जान सकता है ।
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प्र. २२७. क्या ईश्वर हमें प्रतिदिन शिक्षा देता है ? उत्तर : जी, हाँ। जीव जब बुरे या अच्छे काम करने की इच्छा करता है तो अन्दर से भय, लज्जा, शंका या आनन्द, उत्साह, निर्भयता प्राप्त होते हैं। यह अन्तर्यामी ईश्वर की शिक्षा है जिससे जीव बुरे व अच्छे कर्मों को…
प्र. २२८. क्या संसार में कभी ईश्वर का अभाव होता है ?
उत्तर : नहीं, संसार का तो प्रलय में अभाव हो जाता है परन्तु उस समय भी ईश्वर व जीव व प्रकृति रहते हैं उनका तीनों कालों में अस्तित्व रहता है।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, संसार का तो प्रलय में अभाव हो जाता है परन्तु उस समय भी ईश्वर व जीव व प्रकृति रहते हैं उनका तीनों कालों में अस्तित्व रहता है।
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