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प्र. २७३. ईश्वर शरीर धारण नहीं करता, इसमें वेद का क्या प्रमाण है ? उत्तर : यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के आठवें मन्त्र में ईश्वर को 'अकायम्' अर्थात् शरीर रहित कहा है। @vaidic_gyan
प्र. २७४. कहते हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि को उत्पन्न किया, विष्णु सृष्टि का पालन कर रहे हैं व महेश सृष्टि का संहार करते हैं। क्या यह बात ठीक है ?
उत्तर : नहीं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ईश्वर के नाम हैं और वही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार करते हैं।
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उत्तर : नहीं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ईश्वर के नाम हैं और वही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार करते हैं।
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प्र. २७४. कहते हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि को उत्पन्न किया, विष्णु सृष्टि का पालन कर रहे हैं व महेश सृष्टि का संहार करते हैं। क्या यह बात ठीक है ? उत्तर : नहीं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ईश्वर के नाम हैं और वही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार करते हैं। @vaidic_gyan
प्र. २७५. संसार में वैर, विरोध का सबसे बड़ा कारण क्या है ?
उत्तर : अनेक मत, सम्प्रदाय आदि का होना संसार में वैर, विरोध का सबसे बड़ा कारण है। जिन्होंने ईश्वर के वास्तविक स्वरूप के स्थान पर मिथ्या स्वरूपों की कल्पना कर रखी है।
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उत्तर : अनेक मत, सम्प्रदाय आदि का होना संसार में वैर, विरोध का सबसे बड़ा कारण है। जिन्होंने ईश्वर के वास्तविक स्वरूप के स्थान पर मिथ्या स्वरूपों की कल्पना कर रखी है।
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प्र. २७५. संसार में वैर, विरोध का सबसे बड़ा कारण क्या है ? उत्तर : अनेक मत, सम्प्रदाय आदि का होना संसार में वैर, विरोध का सबसे बड़ा कारण है। जिन्होंने ईश्वर के वास्तविक स्वरूप के स्थान पर मिथ्या स्वरूपों की कल्पना कर रखी है। @vaidic_gyan
प्र. २७६. निराकार ईश्वर का प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) करना क्या है ?
उत्तर : निराकार ईश्वर के ज्ञान, आनन्द आदि गुणों की अनुभूति करना ही उसका प्रत्यक्ष या साक्षात्कार करना है ।
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उत्तर : निराकार ईश्वर के ज्ञान, आनन्द आदि गुणों की अनुभूति करना ही उसका प्रत्यक्ष या साक्षात्कार करना है ।
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प्र. २७६. निराकार ईश्वर का प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) करना क्या है ? उत्तर : निराकार ईश्वर के ज्ञान, आनन्द आदि गुणों की अनुभूति करना ही उसका प्रत्यक्ष या साक्षात्कार करना है । @vaidic_gyan
प्र. २७७. ईश्वर को प्राप्त करने के रास्ते अलग-अलग हैं किंतु मंजिल सबकी एक हैं, क्या यह मान्यता ठीक है ?
उत्तर : जी नहीं, यह मान्यता ठीक नहीं है क्योंकि । आज अनेक प्रकार की पूजा-पद्धति, कर्मकाण्ड, धार्मिक ग्रंथ प्रचलित हैं अर्थात् ईश्वर को प्राप्त करने के अलग-अलग रास्ते, अलग-अलग उपाय बताये जा रहे हैं तथा इनकी मंजिल भी अलग अलग हैं। जैसे किसी की मंजिल सातवाँ आसमान, किसी की चौथा आसमान, तो किसी की मंजिल परम धाम तो किसी की अक्षरधाम, तो किसी की गोलोक, वैकुण्ठ लोक या कैलाश है। तो सबकी मंजिल एक कहाँ हुई ?
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उत्तर : जी नहीं, यह मान्यता ठीक नहीं है क्योंकि । आज अनेक प्रकार की पूजा-पद्धति, कर्मकाण्ड, धार्मिक ग्रंथ प्रचलित हैं अर्थात् ईश्वर को प्राप्त करने के अलग-अलग रास्ते, अलग-अलग उपाय बताये जा रहे हैं तथा इनकी मंजिल भी अलग अलग हैं। जैसे किसी की मंजिल सातवाँ आसमान, किसी की चौथा आसमान, तो किसी की मंजिल परम धाम तो किसी की अक्षरधाम, तो किसी की गोलोक, वैकुण्ठ लोक या कैलाश है। तो सबकी मंजिल एक कहाँ हुई ?
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प्र. २७७. ईश्वर को प्राप्त करने के रास्ते अलग-अलग हैं किंतु मंजिल सबकी एक हैं, क्या यह मान्यता ठीक है ? उत्तर : जी नहीं, यह मान्यता ठीक नहीं है क्योंकि । आज अनेक प्रकार की पूजा-पद्धति, कर्मकाण्ड, धार्मिक ग्रंथ प्रचलित हैं अर्थात् ईश्वर को प्राप्त करने के…
प्र. २७८. व्यक्ति सच्चा और पूर्ण आस्तिक कब बनता है ?
उत्तर : सत्य का पालन, चोरी का त्याग, धैर्य, प्रेम पूर्वक व्यवहार, निष्पक्षता, दया, क्षमा, संयम, निष्कामता आदि उत्तम गुणों को धारण करने से व्यक्ति सच्चा व पूर्ण आस्तिक बनता है।
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उत्तर : सत्य का पालन, चोरी का त्याग, धैर्य, प्रेम पूर्वक व्यवहार, निष्पक्षता, दया, क्षमा, संयम, निष्कामता आदि उत्तम गुणों को धारण करने से व्यक्ति सच्चा व पूर्ण आस्तिक बनता है।
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प्र. २७८. व्यक्ति सच्चा और पूर्ण आस्तिक कब बनता है ? उत्तर : सत्य का पालन, चोरी का त्याग, धैर्य, प्रेम पूर्वक व्यवहार, निष्पक्षता, दया, क्षमा, संयम, निष्कामता आदि उत्तम गुणों को धारण करने से व्यक्ति सच्चा व पूर्ण आस्तिक बनता है। @vaidic_gyan
प्र. २७९. यज्ञ किसे कहते हैं ? यज्ञ की परिभाषा क्या है ?
उत्तर : यज्ञ का सामान्य अर्थ है दान देना, त्याग करना तथा वस्तुओं का ठीक ठीक उपयोग लेना ।
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प्र. २७९. यज्ञ किसे कहते हैं ? यज्ञ की परिभाषा क्या है ? उत्तर : यज्ञ का सामान्य अर्थ है दान देना, त्याग करना तथा वस्तुओं का ठीक ठीक उपयोग लेना । @vaidic_gyan
प्र. २८०. यज्ञ कुण्ड विशेष आकार का ही क्यों बनाया जाता हैं, किसी भी पात्र में यज्ञ क्यों नहीं होता ?
उत्तर : विशेष प्रकार के यज्ञ कुण्ड में अग्नि का तापमान अधिक बनता है तथा घी और सामग्री शीघ्रता से जलते हैं और अति सूक्ष्म आकार लेते हैं ।
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उत्तर : विशेष प्रकार के यज्ञ कुण्ड में अग्नि का तापमान अधिक बनता है तथा घी और सामग्री शीघ्रता से जलते हैं और अति सूक्ष्म आकार लेते हैं ।
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प्र. २८०. यज्ञ कुण्ड विशेष आकार का ही क्यों बनाया जाता हैं, किसी भी पात्र में यज्ञ क्यों नहीं होता ? उत्तर : विशेष प्रकार के यज्ञ कुण्ड में अग्नि का तापमान अधिक बनता है तथा घी और सामग्री शीघ्रता से जलते हैं और अति सूक्ष्म आकार लेते हैं । @vaidic_gyan
प्र. २८१. यज्ञ के लिए समिधायें (लकड़ी) पीपल, बरगद, आम, गूलर आदि कुछ विशेष वृक्षों की ही क्यों प्रयोग की जाती हैं ? किसी भी वृक्ष की लकड़ी से यज्ञ करने में क्या हानि है ?
उत्तर : पीपल, आम आदि विशेष समिधाओं के जलाने से कार्बन डाई ऑक्साइड आदि हानिकारक गैसें बहुत कम बनती हैं और कोयले व राख भी कम बनते हैं।
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उत्तर : पीपल, आम आदि विशेष समिधाओं के जलाने से कार्बन डाई ऑक्साइड आदि हानिकारक गैसें बहुत कम बनती हैं और कोयले व राख भी कम बनते हैं।
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प्र. २८१. यज्ञ के लिए समिधायें (लकड़ी) पीपल, बरगद, आम, गूलर आदि कुछ विशेष वृक्षों की ही क्यों प्रयोग की जाती हैं ? किसी भी वृक्ष की लकड़ी से यज्ञ करने में क्या हानि है ? उत्तर : पीपल, आम आदि विशेष समिधाओं के जलाने से कार्बन डाई ऑक्साइड आदि हानिकारक गैसें…
प्र. २८२. यज्ञ में गाय के घी का ही प्रयोग क्यों होता है ? भैंस, बकरी, ऊंटनी का या वनस्पति घी या तेल का प्रयोग क्यों नहीं होता ?
उत्तर : क्योंकि गाय के घी को जलाने से विशेष गैसें बनती हैं जो आकाश में स्थित प्रदूषण को शीघ्र ही अधिक मात्रा में नष्ट कर देती हैं। अन्य किसी घी या तेल में यह शक्ति नहीं होती हैं।
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