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श्रीकृष्ण…

1. श्रीकृष्ण का जन्म 5252 वर्ष पूर्व हुआ।


2. जन्म तिथि : 18 जुलाई, 3228 ई.पू.


3. माह : श्रावण


4. तिथि : अष्टमी


5. नक्षत्र : रोहिणी


6. वार : बुधवार


7. समय : रात 12:00 बजे


8. श्रीकृष्ण ने 125 वर्ष, 8 माह और 7 दिन तक जीवन जिया।


9. मृत्यु तिथि : 18 फरवरी, 3102 ई.पू.


10. जब कृष्ण 89 वर्ष के थे, तब महाभारत का महायुद्ध (कुरुक्षेत्र युद्ध) हुआ।


11. वे कुरुक्षेत्र युद्ध के 36 वर्ष बाद स्वर्गवासी हुए।


12. कुरुक्षेत्र युद्ध मृगशीर्ष शुक्ल एकादशी, 8 दिसम्बर 3139 ई.पू. को आरम्भ हुआ और 25 दिसम्बर 3139 ई.पू. को समाप्त हुआ।


13. 21 दिसम्बर 3139 ई.पू. को दोपहर 3 से 5 बजे के बीच सूर्य ग्रहण हुआ — यही जयद्रथ की मृत्यु का कारण बना।


14. भीष्म पितामह की मृत्यु 2 फरवरी 3138 ई.पू. (उत्तरायण की प्रथम एकादशी) को हुई।


15. कृष्ण की पूजा विभिन्न रूपों में की जाती है :
(a) कृष्ण कन्हैया : मथुरा
(b) जगन्नाथ : ओडिशा
(c) विठोबा : महाराष्ट्र
(d) श्रीनाथ : राजस्थान
(e) द्वारकाधीश : गुजरात
(f) रंचोड़ : गुजरात
(g) कृष्ण : उडुपी (कर्नाटक)
(h) गुरुवायूरप्पन : केरल


16. जैविक पिता : वसुदेव


17. जैविक माता : देवकी


18. पालक पिता : नंद


19. पालक माता : यशोदा


20. बड़े भाई : बलराम


21. बहन : सुभद्रा


22. जन्मस्थान : मथुरा


23. पत्नियाँ : रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविंदा, नाग्नजिति, भद्रा, लक्ष्मणा


24. श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में केवल 4 लोगों का वध किया —
(i) चाणूर (मल्ल योद्धा)
(ii) कंस (मामा)
(iii) एवं (iv) शिशुपाल और दंतवक्र (चचेरे भाई)


25. उनका जीवन आसान नहीं था। माता उग्रवंश की और पिता यादववंश के — एक अंतर्जातीय विवाह।


26. वे श्यामवर्ण के थे। उनका जीवनभर कोई औपचारिक नामकरण नहीं हुआ। गोकुलवासी उन्हें कन्हा (काला) कहकर पुकारते थे। बचपन में उन्हें काले रंग, छोटे कद और पालक पुत्र होने के कारण चिढ़ाया जाता था।


27. बचपन में कई बार प्राणघातक संकट झेलने पड़े।


28. सूखा और जंगली भेड़ियों का भय होने के कारण 9 वर्ष की उम्र में गोकुल से वृंदावन चले गए।


29. वृंदावन में 10 वर्ष 8 माह तक रहे। उसी आयु में मथुरा जाकर मामा कंस का वध किया और अपने जैविक माता-पिता को मुक्त कराया।


30. फिर वे कभी वृंदावन नहीं लौटे।


31. सिंधु देश के राजा कालयवन के भय से मथुरा से द्वारका जाना पड़ा।


32. गौमन्तक पर्वत (वर्तमान गोवा) पर वैिनतेय जनजाति की सहायता से जरासंध को हराया।


33. द्वारका का पुनर्निर्माण किया।


34. 16 से 18 वर्ष की आयु में उज्जैन स्थित सन्दीपन आश्रम में शिक्षा लेने गए।


35. शिक्षा के दौरान अफ्रीका के समुद्री डाकुओं से युद्ध कर अपने गुरु के पुत्र पुनर्दत्त को बचाया, जिसे प्रभास (गुजरात का समुद्री बंदरगाह) के पास अपहरण कर लिया गया था।


36. शिक्षा पूर्ण कर उन्हें अपने चचेरे भाइयों (पांडवों) के वनवास का समाचार मिला। उन्होंने उन्हें लाक्षागृह से बचाया और बाद में द्रौपदी का विवाह कराया।


37. पांडवों को इन्द्रप्रस्थ और राज्य स्थापित करने में सहयोग दिया।


38. द्रौपदी को अपमान से बचाया।


39. पांडवों के वनवास में साथ रहे।


40. कुरुक्षेत्र युद्ध में पांडवों की विजय सुनिश्चित की।


41. अपने प्रिय नगर द्वारका को समुद्र में डूबते देखा।


42. वन में शिकारी जरा के बाण से उनकी मृत्यु हुई।


43. उन्होंने कभी कोई चमत्कार नहीं किया। उनका जीवन आसान नहीं था — हर कदम पर संघर्ष और चुनौतियाँ रहीं।


44. फिर भी उन्होंने हर परिस्थिति में जिम्मेदारी से कार्य किया और आसक्त नहीं हुए।


45. वे अतीत और भविष्य दोनों जानते थे, फिर भी हमेशा वर्तमान में जीते थे।


46. उनका जीवन हर मनुष्य के लिए जीवन का आदर्श है। 🌷🙏🏻
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