(8) संज्ञा के पुंलिंग अथवा स्त्रीलिंग रूपों में 'गण' 'वर्ग' 'जन' 'लोग' 'वृन्द' 'दल'आदि शब्द जोड़कर भी शब्दों का बहुवचन बना देते हैं। जैसे-
एकवचन...................बहुवचन
स्त्री.................... स्त्रीजन 
नारी................... नारीवृन्द 
अधिकारी.............. अधिकारीवर्ग 
पाठक................. पाठकगण 
अध्यापक.............. अध्यापकवृंद 
विद्यार्थी............... विद्यार्थीगण 
आप.................. आपलोग
श्रोता .................श्रोताजन 
मित्र.................. मित्रवर्ग
सेना.................. सेनादल
गुरु ..................गुरुजन
गरीब.................गरीब लोग

(9)कुछ शब्दों में गुण,वर्ण ,भाव आदि शब्द लगाकर बहुवचन बनाया जाता है। जैसे-
एकवचन..............बहुवचन
व्यापारी ..............व्यापारीगण
मित्र ................मित्रवर्ग
सुधी ............... सुधिजन

नोट - 

कुछ शब्द दोनों वचनों में एक जैसे रहते है। जैसे -पिता,योद्धा,चाचा ,मित्र, फल, बाज़ार, अध्यापक, फूल, छात्र, दादा, राजा, विद्यार्थी आदि।
विभक्तिसहित संज्ञाओं के बहुवचन बनाने के नियम-
विभक्तियों से युक्त होने पर शब्दों के बहुवचन का रूप बनाने में लिंग के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता।  

इसके कुछ सामान्य नियम निम्नलिखित है-

(1) अकारान्त, आकारान्त (संस्कृत-शब्दों को छोड़कर) तथा एकारान्त संज्ञाओं में अन्तिम 'अ', 'आ' या 'ए' के स्थान पर बहुवचन बनाने में 'अों' कर दिया जाता है। जैसे- 
एकवचन.............. बहुवचन
लडका.............. लडकों 
घर................ घरों 
गधा................ गधों 
घोड़ा............... घोड़ों 
चोर............... . चोरों 

(2) संस्कृत की आकारान्त तथा संस्कृत-हिन्दी की सभी उकारान्त, ऊकारान्त, अकारान्त, औकारान्त संज्ञाओं को बहुवचन का रूप देने के लिए अन्त में 'अों' जोड़ना पड़ता है। उकारान्त शब्दों में 'अों' जोड़ने के पूर्व 'ऊ' को 'उ' कर दिया जाता है। 
एकवचन............. बहुवचन
लता.............. लताओं 
साधु.............. साधुओं 
वधू............... वधुओं 
घर............... घरों 
जौ............... जौअों 

(3) सभी इकारान्त और ईकारान्त संज्ञाओं का बहुवचन बनाने के लिए अन्त में 'यों'जोड़ा जाता है।'इकारान्त' शब्दों में 'यों' जोड़ने के पहले 'ई' का इ' कर दिया जाता है। जैसे-
एकवचन............. बहुवचन
मुनि............... मुनियों 
गली .............. गलियों 
नदी............... नदियों 
साड़ी.............. साड़ियों 
श्रीमती............ श्रीमतियों 

वचन सम्बन्धी विशेष निर्देश 

(1) 'प्रत्येक' तथा 'हरएक' का प्रयोग सदा एकवचन में होता है। जैसे- प्रत्येक व्यक्ति यही कहेगा; 
हरएक कुआँ मीठे जल का नहीं होता।
(2) दूसरी भाषाओँ के तत्सम या तदभव शब्दों का प्रयोग हिन्दी व्याकरण के अनुसार होना चाहिए। 
उदाहरणार्थ, अँगरेजी के 'फुट'(foot) का बहुवचन 'फीट' (feet) होता है किन्तु हिन्दी में इसका प्रयोग इस प्रकार होगा- दो फुट लम्बी दीवार है; न कि 'दो फीट लम्बी दीवार है'।
(3) प्राण, लोग, दर्शन, आँसू, ओठ, दाम, अक्षत इत्यादि शब्दों का प्रयोग हिन्दी में बहुवचन में होता है। 
जैसे आपके ओठ खुले कि प्राण तृप्त हुए। आपलोग आये, आर्शीवाद के अक्षत बरसे, दर्शन हुए।
(4) द्रव्यवाचक संज्ञाओं का प्रयोग एकवचन में होता है। जैसे- उनके पास बहुत सोना है ; उनका बहुत-सा धन बरबाद हुआ; न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। किन्तु, यदि द्रव्य के भित्र-भित्र प्रकारों का बोध हों, तो द्रव्यवाचक संज्ञा बहुवचन में प्रयुक्त होगी। जैसे- यहाँ बहुत तरह के लोहे मिलते है। चमेली, गुलाब, तिल इत्यादि के तेल अच्छे होते है।
क्रिया


जिन शब्दों से किसी काम के करने या होने का ज्ञान हो उसे क्रिया कहते है।
दूसरे शब्दों में- जिस शब्द से किसी काम का करना या होना समझा जाय, उसे क्रिया कहते है। 
जैसे- पढ़ना, खाना, पीना, जाना इत्यादि।

क्रिया के भेद 

प्रयोग की दृष्टि से क्रिया के प्रकार
(1)प्रेरणार्थक क्रिया (Causative Verb)
(2)यौगिक क्रिया
(3)द्विकर्मक क्रिया(Double Transitive Verb)
(4)संयुक्त क्रिया (Compound Verb)
(5) सहायक क्रिया(Helping Verb)
(6) नामबोधक क्रिया(Nominal Verb)
(7) पूर्वकालिक क्रिया(Absolutive Verb)

(1)प्रेरणार्थक क्रिया (Causative Verb)-

जिन क्रियाओ से इस बात का बोध हो कि कर्ता स्वयं कार्य न कर किसी दूसरे को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, वे प्रेरणार्थक क्रिया कहलाती है। 
जैसे काटना से कटवाना, करना से कराना।
एक अन्य उदाहरण इस प्रकार है- 
मोहन मुझसे किताब लिखाता है।
इस वाक्य में मोहन (कर्ता) स्वयं किताब न लिखकर 'मुझे' दूसरे व्यक्ति को लिखने की प्रेरणा देता है।
प्रेरणार्थक क्रियाओं के दो रूप हैं। जैसे- 'गिरना' से 'गिराना' और 'गिरवाना' । दोनों क्रियाएँ एक के बाद दूसरी प्रेरणा में हैं। याद रखने वाली बात यह है कि अकर्मक क्रिया प्रेरणार्थक होने पर सकर्मक (कर्म लेनेवाली) हो जाती है। जैसे-
राम लजाता है। 
वह राम को लजवाता है।
प्रेरणार्थक क्रियाएँ सकर्मक और अकर्मक दोनों क्रियाओं से बनती हैं। ऐसी क्रियाएँ हर स्थिति में सकर्मक ही रहती हैं। जैसे- मैंने उसे हँसाया; मैंने उससे किताब लिखवायी। पहले में कर्ता अन्य (कर्म) को हँसाता है और दूसरे में कर्ता दूसरे को किताब लिखने को प्रेरित करता है। इस प्रकार हिन्दी में प्रेरणार्थक क्रियाओं के दो रूप चलते हैं। प्रथम में 'ना' का और द्वितीय में 'वाना' का प्रयोग होता है- हँसाना- हँसवाना।
मूल
उठना
उड़ना
चलना
देना
जीना
लिखना
जगना
सोना
पीना
देना

(2)यौगिक क्रिया- 

दो या दो से अधिक धातुअों और दूसरे शब्दों के संयोग से या धातुअों में प्रत्यय लगाने से जो क्रिया बनती है, उसे यौगिक क्रिया कहा जाता है। 
जैसे- चलना-चलाना, हँसना-हँसाना।

(3)द्विकर्मक क्रिया (Double Transitive Verb)- 

जिस क्रिया के दो कर्म होते है उसे द्विकर्मक क्रिया कहते है। 
कुछ क्रियाएँ एक कर्मवाली और दो कर्मवाली होती है। जैसे- राम ने रोटी खायी। इस वाक्य में कर्म एक ही है-
'रोटी' । किन्तु 'मैं लड़के को वेद पढ़ाता हूँ' इस वाक्य में दो कर्म हैं- 'लड़के को' और 'वेद' ।

(4)संयुक्त क्रिया (Compound Verb)- 

जो क्रिया दो या दो से अधिक धातुओं के मेल से बनती है, उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं।
जैसे- घनश्याम रो चुका, किशोर रोने लगा, वह घर पहुँच गया। 
इन वाक्यों में 'रो चुका', 'रोने लगा' और 'पहुँच गया' संयुक्त क्रियाएँ हैं।
विधि और आज्ञा को छोड़कर सभी क्रियापद दो या अधिक क्रियाओं के योग से बनते हैं, किन्तु संयुक्त क्रियाएँ इनसे भित्र है, क्योंकि जहाँ एक ओर साधारण क्रियापद 'हो', 'रो', 'सो', 'खा' इत्यादि धातुओं से बनते है, वहाँ दूसरी ओर संयुक्त क्रियाएँ 'होना', 'आना', 'जाना', 'रहना', 'रखना', 'उठाना', 'लेना', 'पाना', 'पड़ना', 'डालना', 'सकना', 'चुकना', 'लगना', 'करना', 'भेजना', 'चाहना' इत्यादि क्रियाओं के योग से बनती हैं।
इसके अतिरिक्त, सकर्मक तथा अकर्मक दोनों प्रकार की संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं। जैसे-
अकर्मक क्रिया से- लेट जाना, गिर पड़ना। 
सकर्मक क्रिया से- बेच लेना, काम करना, बुला लेना, मार देना। 
संयुक्त क्रिया की एक विशेषता यह है कि उसकी पहली क्रिया प्रायः प्रधान होती है और दूसरी उसके अर्थ में विशेषता उत्पत्र करती है। जैसे- मैं पढ़ सकता हूँ। इसमें 'सकना' क्रिया 'पढ़ना' क्रिया के अर्थ में विशेषता उत्पत्र करती है। हिन्दी में संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग अधिक होता है।

संयुक्त क्रिया के भेद
अर्थ के अनुसार संयुक्त क्रिया के ११ मुख्य भेद है-

(i) आरम्भबोधक- जिस संयुक्त क्रिया से क्रिया के आरम्भ होने का बोध होता है, उसे 'आरम्भबोधक संयुक्त क्रिया' कहते हैं।
जैसे- वह पढ़ने लगा, पानी बरसने लगा, राम खेलने लगा।

(ii) समाप्तिबोधक- जिस संयुक्त क्रिया से मुख्य क्रिया की पूर्णता, व्यापार की समाप्ति का बोध हो, वह 'समाप्तिबोधक संयुक्त क्रिया' है।
जैसे- वह खा चुका है; वह पढ़ चुका है। धातु के आगे 'चुकना' जोड़ने से समाप्तिबोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं।

(iii) अवकाशबोधक- जिससे क्रिया को निष्पत्र करने के लिए अवकाश का बोध हो, वह 'अवकाशबोधक संयुक्त क्रिया' है।
जैसे- वह मुश्किल से सोने पाया; जाने न पाया।

(iv) अनुमतिबोधक- जिससे कार्य करने की अनुमति दिए जाने का बोध हो, वह 'अनुमतिबोधक संयुक्त क्रिया' है। 
जैसे- मुझे जाने दो; मुझे बोलने दो। यह क्रिया 'देना' धातु के योग से बनती है।
(v) नित्यताबोधक- जिससे कार्य की नित्यता, उसके बन्द न होने का भाव प्रकट हो, वह 'नित्यताबोधक संयुक्त क्रिया' है।
जैसे- हवा चल रही है; पेड़ बढ़ता गया; तोता पढ़ता रहा। मुख्य क्रिया के आगे 'जाना' या 'रहना' जोड़ने से नित्यताबोधक संयुक्त क्रिया बनती है।

(vi) आवश्यकताबोधक- जिससे कार्य की आवश्यकता या कर्तव्य का बोध हो, वह 'आवश्यकताबोधक संयुक्त क्रिया' है।
जैसे- यह काम मुझे करना पड़ता है; तुम्हें यह काम करना चाहिए। साधारण क्रिया के साथ 'पड़ना' 'होना' या 'चाहिए' क्रियाओं को जोड़ने से आवश्यकताबोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं।

(vii) निश्र्चयबोधक- जिस संयुक्त क्रिया से मुख्य क्रिया के व्यापार की निश्र्चयता का बोध हो, उसे 'निश्र्चयबोधक संयुक्त क्रिया' कहते हैं। 
जैसे- वह बीच ही में बोल उठा; उसने कहा- मैं मार बैठूँगा, वह गिर पड़ा; अब दे ही डालो। इस प्रकार की क्रियाओं में पूर्णता और नित्यता का भाव वर्तमान है।

(viii) इच्छाबोधक- इससे क्रिया के करने की इच्छा प्रकट होती है। 
जैसे- वह घर आना चाहता है; मैं खाना चाहता हूँ। क्रिया के साधारण रूप में 'चाहना' क्रिया जोड़ने से इच्छाबोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं।

(ix) अभ्यासबोधक- इससे क्रिया के करने के अभ्यास का बोध होता है। सामान्य भूतकाल की क्रिया में 'करना' क्रिया लगाने से अभ्यासबोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं।
जैसे- यह पढ़ा करता है; तुम लिखा करते हो; मैं खेला करता हूँ।

(x) शक्तिबोधक- इससे कार्य करने की शक्ति का बोध होता है। 
जैसे- मैं चल सकता हूँ, वह बोल सकता है। इसमें 'सकना' क्रिया जोड़ी जाती है।

(xi) पुनरुक्त संयुक्त क्रिया- जब दो समानार्थक अथवा समान ध्वनिवाली क्रियाओं का संयोग होता है, तब उन्हें 'पुनरुक्त संयुक्त क्रिया' कहते हैं।
जैसे- वह पढ़ा-लिखा करता है; वह यहाँ प्रायः आया-जाया करता है; पड़ोसियों से बराबर मिलते-जुलते रहो।

(5) सहायक क्रिया (Helping Verb)-

 सहायक क्रियाएँ मुख्य क्रिया के साथ प्रयुक्त होकर अर्थ को स्पष्ट एवं पूर्ण करने में सहायक करती है। जैसे-
(i) मैं घर जाता हूँ। (यहाँ 'जाना' मुख्य क्रिया है और 'हूँ' सहायक क्रिया है)
(ii) वे हँस रहे थे। (यहाँ 'हँसना' मुख्य क्रिया है और 'रहे थे' सहायक क्रिया है)

(6) नामबोधक क्रिया (Nominal Verb)- 

संज्ञा अथवा विशेषण के साथ क्रिया जोड़ने से जो संयुक्त क्रिया बनती है, उसे 'नामबोधक क्रिया' कहते हैं। 
जैसे-

संज्ञा
लाठी
रक्त

विशेषण
दुःखी
पीला
द्रष्टव्य- नामबोधक क्रियाएँ संयुक्त क्रियाएँ नहीं हैं। संयुक्त क्रियाएँ दो क्रियाओं के योग से बनती है और नामबोधक क्रियाएँ संज्ञा अथवा विशेषण के मेल से बनती है। दोनों में यही अन्तर है।

(7) पूर्वकालिक क्रिया (Absolutive Verb)- 

जब कर्ता एक क्रिया समाप्त कर उसी क्षण दूसरी क्रिया में प्रवृत्त होता है तब पहली क्रिया 'पूर्वकालिक' कहलाती है।
जैसे- उसने नहाकर भोजन किया। इसमें 'नहाकर' पूर्वकालिक क्रिया है; क्योंकि इससे 'नहाने' की क्रिया की समाप्ति के साथ ही भोजन करने की क्रिया का बोध होता है।
रचना की दृष्टि से क्रिया के दो भेद है- 

(1)सकमर्क क्रिया(Transitive Verb) (2 )अकर्मक क्रिया(Intransitive Verb)

(1)सकमर्क क्रिया :-

वाक्य में जिस क्रिया के साथ कर्म भी हो, तो उसे सकमर्क क्रिया कहते है।
इसे हम ऐसे भी कह सकते है- 'सकर्मक क्रिया' उसे कहते है, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की सम्भावना हो, अर्थात जिस क्रिया के व्यापार का संचालन तो कर्ता से हो, पर जिसका फल या प्रभाव किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु, अर्थात कर्म पर पड़े।
दूसरे शब्दों में-जिस क्रिया का फल कर्म पर पड़े उसे सकमर्क क्रिया कहते है।
जैसे- बकरी घास खाती है, पिताजी अख़बार पढ़ते है।
उपयुक्त वाक्यों में 'खाती है' 'पढ़ते है' सकमर्क क्रियाये है। इनका फल 'घास' और 'अख़बार' पर पड़ रहा है जो कि कर्म है।
कभी-कभी सकर्मक क्रिया का कर्म छिपा रहता है। जैसे- वह गाता है; वह पढ़ता है। यहाँ 'गीत' और 'पुस्तक' जैसे कर्म छिपे हैं।
पहचान- क्रिया के साथ 'क्या' अथवा 'किसको' लगाने पर जो उत्तर आये वही 'कर्म' होता है
सकमर्क क्रिया दो प्रकार की होती है 

(i) एककर्मक क्रिया (ii) द्विकर्मक क्रिया
(i) एककमर्क क्रिया :-
जिस क्रिया का केवल एक ही कर्म होता है।
जैसे- विजय सेव खाया। (कर्म- सेव)
तुम स्कूल जाते हो। (कर्म- स्कूल )
(ii) द्विकर्मक क्रिया :- 
जिस सकमर्क क्रिया के दो कर्म होते है, उसे द्विकर्मक क्रिया कहते है।
जैसे- अध्यापक 'बच्चों' को व्याकरण पढ़ा रहे है।
गाय 'बछड़े' को 'दूध' पिलाती है।

(2)अकर्मक क्रिया :-
वाक्य में जब क्रिया के साथ कर्म नही होता तो उस क्रिया को अकर्मक क्रिया कहते है।
दूसरे शब्दों में- जिन क्रियाओं का व्यापार और फल कर्ता पर हो, वे 'अकर्मक' कहलाती हैं।
अकर्मक क्रियाओं का 'कर्म' नहीं होता, क्रिया का व्यापार और फल दूसरे पर न पकड़कर कर्ता पर पड़ता है। 
उदाहरण के लिए -
श्याम सोता है। इसमें 'सोना' क्रिया अकर्मक है। 'श्याम' कर्ता है, 'सोने' की क्रिया उसी के द्वारा पूरी होती है। अतः, सोने का फल भी उसी पर पड़ता है। इसलिए 'सोना' क्रिया अकर्मक है।
सकर्मक और अकर्मक क्रियाओं की पहचान
सकर्मक और अकर्मक क्रियाओं की पहचान 'क्या', 'किसे' या 'किसको' आदि पश्र करने से होती है। यदि कुछ उत्तर मिले, तो समझना चाहिए कि क्रिया सकर्मक है और यदि न मिले तो अकर्मक होगी।
जैसे-
(i) 'राम फल खाता हैै।' 
प्रश्न करने पर कि राम क्या खाता है, उत्तर मिलेगा फल। अतः 'खाना' क्रिया सकर्मक है।
(ii) 'सीमा रोती है।'
इसमें प्रश्न पूछा जाये कि 'क्या रोती है ?' तो कुछ भी उत्तर नहीं मिला। अतः इस वाक्य में रोना क्रिया अकर्मक है।
उदाहरणार्थ- मारना, पढ़ना, खाना- इन क्रियाओं में 'क्या' 'किसे' लगाकर पश्र किए जाएँ तो इनके उत्तर इस प्रकार होंगे-
पश्र- किसे मारा ?
उत्तर- किशोर को मारा। 
पश्र- क्या खाया ?
उत्तर- खाना खाया। 
पश्र- क्या पढ़ता है। 
उत्तर- किताब पढ़ता है। 
इन सब उदाहरणों में क्रियाएँ सकर्मक है।
कुछ क्रियाएँ अकर्मक और सकर्मक दोनों होती है और प्रसंग अथवा अर्थ के अनुसार इनके भेद का निर्णय किया जाता है। जैसे-
मूल
अकर्मक
उसका सिर खुजलाता है।
बूँद-बूँद से घड़ा भरता है।
तुम्हारा जी ललचाता है।
जी घबराता है।
वह लजा रही है।
विशेषण :- 

जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता (गुण,दोष ,अवस्था,परिमाण या संख्या) का बोध कराते है, उन्हें विशेषण कहते है। जैसे - १.टोकरी में मीठे संतरे है। २.रीता सुंदर है। इन वाक्यों में मीठे से संतरे की,सुंदर से रीता की विशेषता प्रकट होती है। यहाँ मीठे और सुंदर शब्द विशेषण है,क्योंकि संज्ञा मीठे और सुंदर की विशेषता बताते है।

विशेषण के भेद:- इसके छः भेद होते है|
१.गुणवाचक विशेषण :- 

जो विशेषण शब्द रंग,रूप ,आकार,अच्छाई ,बुराई,स्वाद आदि सम्बन्धी विशेषण बताते है,वे गुणवाचक विशेषण कहलाते है। जैसे - लंबा पेड़,लाल कार,सफ़ेद कमीज आदि।

नोट:- "किस प्रकार' का प्रश्न करने पर उत्तर में आनेवाला शब्द गुणवाचक विशेषण होगा।

२.परिमाणवाचक विशेषण :- 

माप या तौल- परिमाण सम्बन्धी विशेषता बताने वाले शब्द परिमाणवाचक विशेषण कहलाते है। जैसे -चार किलो चावल,थोड़ा आटा,बहुत पानी ,कम तेल ।
इसके भी दो भेद होते है :-
१.निश्चित परिमाणवाचक :- 

जिस विशेषण शब्द से निश्चित परिमाण का बोध हो,उसे निश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते है। जैसे - चार किलो चावल ।

२.अनिश्चित परिमाणवाचक :- 

जिस विशेषण शब्द से किसी निश्चित परिमाण का बोध न हो पाये ,तो उसे अनिश्चित परिणामवाचक विशेषण कहते है। जैसे - थोड़ा पानी,कुछ दाल।

नोट :- "कितना "प्रश्न करने पर उत्तर में आने वाला शब्द परिमाणवाचक विशेषण कहते है।

३.संख्यावाचक विशेषण :- 

जिस विशेषण शब्द से संज्ञा की संख्या का ज्ञान होता है, उसे संख्यावाचक विशेषण कहते है। जैसे - पाँच केले,चार वृक्ष ,कुछ पतंगे ,दो गायें ।
संख्यावाचक विशेषण दो प्रकार के होते है - 

१.निश्चय संख्यावाचक :- जिससे निश्चित संख्या का बोध होता है। जैसे - पाँच केले ,चार वृक्ष ,तीन कलम ।
२.अनिश्चयवाचक संख्यावाचक :- इससे संख्या का निश्चित ज्ञान नही होता । जैसे - कुछ पतंगे ,कई दर्शक ।

नोट :- संज्ञा के पहले "कितना" लगाने पर जो उत्तर प्राप्त होता है,वह संकेतवाचक विशेषण होता है।

४.सार्वनामिक विशेषण :- 

जिस सर्वनाम शब्दों का प्रयोग विशेषण के रूप में होता है,उसे सार्वनामिक विशेषण कहते है। जैसे - वह बालक ,वह पुस्तक ।

नोट :- संज्ञा के पहले कौन सा लगाने से जो उत्तर प्राप्त होता है, वह सार्वनामिक विशेषण होता है।

५.व्यक्तिवाचक विशेषण :- 

जो शब्द संज्ञा की विशेषता बतलाते है, और व्यक्तिवाचक संज्ञा से बने होते है,उन्हें व्यक्तिवाचक विशेषण कहते है।

६.प्रश्नवाचक विशेषण :- 

जिन शब्दों से किसी संज्ञा या सर्वनाम के विषय में जानना या प्रश्न पूछना प्रकट हो,उसे प्रश्नवाचक विशेषण कहते है। जैसे - कौन सी पुस्तक है, कौन व्यक्ति आया था ? ।
समास :-

 जब दो या दो से अधिक पद बीच की विभक्ति को छोड़कर मिलते है,तो पदों के इस मेल को समास कहते है।

समास के भेद :- 

समास के मुख्य सात भेद है :-

1. द्वन्द समास 2. द्विगु समास 3. तत्पुरुष समास 4. कर्मधारय समास 5. बहुव्रीहि समास 6. अव्ययीभाव समास 7. नत्र समास

1. द्वंद समास :-

 इस समास में दोनों पद प्रधान होते है,लेकिन दोनों के बीच 'और' शब्द का लोप होता है। जैसे - हार-जीत,पाप-पुण्य ,वेद-पुराण,लेन-देन ।

2. द्विगु समास :-

 जिस समास में पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है,उसे द्विगु समास कहते है। जैसे - त्रिभुवन ,त्रिफला ,चौमासा ,दशमुख

3. तत्पुरुष समास :- 

जिस समास में उत्तर पद प्रधान होता है। इनके निर्माण में दो पदों के बीच कारक चिन्हों का लोप हो जाता है। जैसे - राजपुत्र -राजा का पुत्र । इसमे पिछले पद का मुख्य अर्थ लिखा गया है। गुणहीन ,सिरदर्द ,आपबीती,रामभक्त ।

4. कर्मधारय समास :- 

जो समास विशेषण -विशेश्य और उपमेय -उपमान से मिलकर बनते है,उन्हें कर्मधारय समास कहते है। जैसे -
1. चरणकमल -कमल के समानचरण ।
2. कमलनयन -कमल के समान नयन ।
3. नीलगगन -नीला है जो गगन ।

5. बहुव्रीहि समास :-

 जिस समास में शाब्दिक अर्थ को छोड़ कर अन्य विशेष का बोध होता है,उसे बहुव्रीहि समास कहते है। जैसे -
घनश्याम -घन के समान श्याम है जो -कृष्ण
दशानन -दस मुहवाला -रावण

6. अव्ययीभाव समास :-

 जिस समास का प्रथम पद अव्यय हो,और उसी का अर्थ प्रधान हो,उसे अव्ययीभाव समास कहते है। जैसे - यथाशक्ति = (यथा +शक्ति ) यहाँ यथा अव्यय का मुख्य अर्थ लिखा गया है,अर्थात यथा जितनी शक्ति । इसी प्रकार - रातों रात ,आजन्म ,यथोचित ,बेशक,प्रतिवर्ष ।

7. नत्र समास :-

 इसमे नही का बोध होता है। जैसे - अनपढ़,अनजान ,अज्ञान ।
कारक

कारक (Case) की परिभाषा

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) सम्बन्ध सूचित हो, उसे (उस रूप को) 'कारक' कहते हैं। 
अथवा- संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) क्रिया से सम्बन्ध सूचित हो, उसे (उस रूप को) 'कारक' कहते हैं।

इन दो 'परिभाषाओं' का अर्थ यह हुआ कि संज्ञा या सर्वनाम के आगे जब 'ने', 'को', 'से' आदि विभक्तियाँ लगती हैं, तब उनका रूप ही 'कारक' कहलाता हैं।
तभी वे वाक्य के अन्य शब्दों से सम्बन्ध रखने योग्य 'पद' होते है और 'पद' की अवस्था में ही वे वाक्य के दूसरे शब्दों से या क्रिया से कोई लगाव रख पाते हैं। 'ने', 'को', 'से' आदि विभित्र विभक्तियाँ विभित्र कारकों की है। इनके लगने पर ही कोई शब्द 'कारकपद' बन पाता है और वाक्य में आने योग्य होता है। 'कारकपद' या 'क्रियापद' बने बिना कोई शब्द वाक्य में बैठने योग्य नहीं होता।

जैसे- ''रामचन्द्रजी ने खारे जल के समुद्र पर बन्दरों से पुल बँधवा दिया।'' 
इस वाक्य में 'रामचन्द्रजी ने', 'समुद्र पर', 'बन्दरों से' और 'पुल' संज्ञाओं के रूपान्तर है, जिनके द्वारा इन संज्ञाओं का सम्बन्ध 'बँधवा दिया' क्रिया के साथ सूचित होता है। 

दूसरा उदाहरण- 
श्रीराम ने रावण को बाण से मारा
इस वाक्य में प्रत्येक शब्द एक-दूसरे से बँधा है और प्रत्येक शब्द का सम्बन्ध किसी न किसी रूप में क्रिया के साथ है। 
यहाँ 'ने' 'को' 'से' शब्दों ने वाक्य में आये अनेक शब्दों का सम्बन्ध क्रिया से जोड़ दिया है। यदि ये शब्द न हो तो शब्दों का क्रिया के साथ तथा आपस में कोई सम्बन्ध नहीं होगा। संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया के साथ सम्बन्ध स्थापित करने वाला रूप कारक होता है।

कारक के भेद-

हिन्दी में कारको की संख्या आठ है-
(1 )कर्ता कारक (Nominative case)
(2)कर्म कारक (Accusative case)
(3)करण कारक (Instrument case)
(4)सम्प्रदान कारक(Dative case)
(5)अपादान कारक(Ablative case)
(6)सम्बन्ध कारक (Gentive case)
(7)अधिकरण कारक (Locative case)
(8)संबोधन कारक(Vocative case)

कारक के विभक्ति चिन्ह
कारकों की पहचान के चिह्न व लक्षण निम्न प्रकार हैं-
 
(1)कारक - कर्ता
लक्षण   - जो काम करें -  
चिह्न -ने 
विभक्तियाँ - प्रथमा

(2)कारक - कर्म
लक्षण   -जिस पर क्रिया का फल पड़े
चिह्न -को
विभक्तियाँ - द्वितीया

(3)कारक - करण
लक्षण   -काम करने (क्रिया) का साधन
चिह्न -से, के द्वारा
विभक्तियाँ - तृतीया

(4)कारक - सम्प्रदान
लक्षण   -जिसके लिए किया की जाए
चिह्न -को,के लिए
विभक्तियाँ - चतुर्थी

(5)कारक - अपादान
लक्षण   -जिससे कोई वस्तु अलग हो
चिह्न -से (अलग के अर्थ में)
विभक्तियाँ - पंचमी

(6) कारक - सम्बन्ध
लक्षण   -जो एक शब्द का दूसरे से सम्बन्ध जोड़े
चिह्न -का, की, के, रा, री, रे
विभक्तियाँ - षष्ठी

(7)कारक - अधिकरण
लक्षण   -जो क्रिया का आधार हो
चिह्न -में,पर
विभक्तियाँ - सप्तमी

(8)कारक - सम्बोधन
लक्षण   -जिससे किसी को पुकारा जाये
चिह्न -हे! अरे! हो!
विभक्तियाँ - सम्बोधन

विभक्तियाँ- 
सभी कारकों की स्पष्टता के लिए संज्ञा या सर्वनाम के आगे जो प्रत्यय लगाये जाते हैं, उन्हें व्याकरण में 'विभक्तियाँ' अथवा 'परसर्ग' कहते हैं।
विभक्ति से बने शब्द-रूप को 'पद' कहते हैं। शब्द (संज्ञा और क्रिया) बिना पद बने वाक्य में नहीं चल सकते। ऊपर सभी कारकों के विभक्त-चिह्न दे दिये गये हैं।
अलंकार

जो किसी वस्तु को अलंकृत करे वह अलंकार कहलाता है।
दूसरे अर्थ में- काव्य अथवा भाषा को शोभा बनाने वाले मनोरंजक ढंग को अलंकार कहते है।
संकीर्ण अर्थ में- काव्यशरीर, अर्थात् भाषा को शब्दार्थ से सुसज्जित तथा सुन्दर बनानेवाले चमत्कारपूर्ण मनोरंजक ढंग को अलंकार कहते है।
अलंकार का शाब्दिक अर्थ है 'आभूषण'। मानव समाज सौन्दर्योपासक है, उसकी इसी प्रवृत्ति ने अलंकारों को जन्म दिया है।
जिस प्रकार सुवर्ण आदि के आभूषणों से शरीर की शोभा बढ़ती है उसी प्रकार काव्य-अलंकारों से काव्य की।
संस्कृत के अलंकार संप्रदाय के प्रतिष्ठापक आचार्य दण्डी के शब्दों में- 'काव्य शोभाकरान् धर्मान अलंकारान् प्रचक्षते'- काव्य के शोभाकारक धर्म (गुण) अलंकार कहलाते हैं।
रस की तरह अलंकार का भी ठीक-ठीक लक्षण बतलाना कठिन है। फिर भी, व्यापक और संकीर्ण अर्थों में इसकी परिभाषा निश्र्चित करने की चेष्टा की गयी है। 
जिस प्रकार आभूषण स्वर्ण से बनते है, उसी प्रकार अलंकार भी सुवर्ण (सुन्दर वर्णों) से बनते है। काव्यशास्त्र के प्रारम्भिक काल में 'अलंकार' शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में हुआ है। इसके अतिरिक्त, प्राचीन काल में इस शब्द का एक और अर्थ लिया जाता था। संस्कृत में, 'अलंकार' शब्द का व्यवहार साहित्य के शास्त्रपक्ष में हुआ है। पहले अलंकारशास्त्र कहने से रस, अलंकार, रीति, पिंगल इत्यादि समस्त काव्यांगों का बोध होता था। हिन्दी में संस्कृत के ही अनुसरण पर महाकवि केशवदास ने 'अलंकार' शब्द का प्रयोग अपनी 'कविप्रिया' में इसी व्यापक अर्थ में किया है।

अलंकार के भेद :-
अलंकार के तीन भेद होते है
(1)शब्दालंकार
(2)अर्थालंकार
(3)उभयालंकार

(1)शब्दालंकार :- 
जिस अलंकार में शब्दों के प्रयोग के कारण कोई चमत्कार उत्पत्र हो जाता है वे 'शब्दालंकार' कहलाते है।
शब्दालंकार दो शब्द से मिलकर बना है। शब्द +अलंकार
शब्द के दो रूप है- ध्वनि और अर्थ। ध्वनि के आधार पर शब्दालंकार की सृष्टी होती है। इस अलंकार में वर्ण या शब्दों की लयात्मकता या संगीतात्मकता होती है, अर्थ का चमत्कार नहीं।
शब्दालंकार (i) कुछ वर्णगत, (ii) कुछ शब्दगत और (iii) कुछ वाक्यगत होते हैं। अनुप्रयास, यमक आदि अलंकार वर्णगत और शब्दगत है, तो लाटानुप्रयास वाक्यगत।

शब्दालंकार के प्रमुख भेद है - 
(i)अनुप्रास (ii)यमक (iii)श्लेष (iv) वक्रोक्ति आदि ।

(i)अनुप्रास अलंकार :- वर्णों की आवृत्ति को अनुप्रास कहते है। आवृत्ति का अर्थ किसी वर्ण का एक से अधिक बार आना है।
अनुप्रास शब्द 'अनु' तथा 'प्रास' शब्दों के योग से बना है। 'अनु' का अर्थ है :- बार-बार तथा 'प्रास' का अर्थ है -वर्ण। जहाँ स्वर की समानता के बिना भी वर्णों की बार -बार आवृत्ति होती है ,वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है ।
इस अलंकार में एक ही वर्ण का बार -बार प्रयोग किया जाता है । जैसे -जन रंजन मंजन दनुज मनुज रूप सुर भूप ।
जैसे- मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्र बुलाए।
यहाँ पहले पद में 'म' वर्ण की आवृत्ति और दूसरे में 'स' वर्ण की आवृत्ति हुई है। इस आवृत्ति से संगीतमयता आ गयी है।

अनुप्रास के प्रकार

अनुप्रास के कई प्रकार है- (क)छेकानुप्रास (ख) वृत्यनुप्रास (ग) लाटानुप्रास

(क)छेकानुप्रास- जहाँ स्वरूप और क्रम से अनेक व्यंजनों की आवृत्ति एक बार हो, वहाँ छेकानुप्रास होता है।
इसमें व्यंजनवर्णों का उसी क्रम में प्रयोग होता है। 'रस' और 'सर' में छेकानुप्रास नहीं है। 'सर'-'सर' में वर्णों की आवृत्ति उसी क्रम और स्वरूप में हुई है, अतएव यहाँ छेकानुप्रास है। महाकवि देव ने इसका एक सुन्दर उदाहरण इस प्रकार दिया है-
रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै 
साँसैं भरि आँसू भरि कहत दई दई।
यहाँ 'रीझि रीझ', 'रहसि-रहसि', 'हँसि-हँसि' और 'दई-दई' में छेकानुप्रास है, क्योंकि व्यंजनवर्णों की आवृत्ति उसी क्रम और स्वरूप में हुई है।
दूसरा उदाहरण इस प्रकार है-
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा,
सुरुचि सुवास सरस अनुरागा। 
यहाँ 'पद' और 'पदुम' में 'प' और 'द' की एकाकार आवृत्ति स्वरूपतः अर्थात् 'प' और 'प', 'द' और 'द' की आवृत्ति एक ही क्रम में, एक ही बार हुई है; क्योंकि 'पद' के 'प' के बाद 'द' की आवृत्ति 'पदुम' में भी 'प' के बाद 'द' के रूप में हुई है। 'छेक' का अर्थ चतुर है। चतुर व्यक्तियों को यह अलंकार विशेष प्रिय है।

(ख)वृत्यनुप्रास- वृत्यनुप्रास जहाँ एक व्यंजन की आवृत्ति एक या अनेक बार हो, वहाँ वृत्यनुप्रास होता है। रसानुकूल वर्णों की योजना को वृत्ति कहते हैं।
उदाहरण इस प्रकार है-
(i) सपने सुनहले मन भाये। 
यहाँ 'स' वर्ण की आवृत्ति एक बार हुई है। 
(ii) सेस महेस गनेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं। 
यहाँ 'स' वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है। 
छेकानुप्रास और वृत्यनुप्रास का अन्तर- छेकानुप्रास में अनेक व्यंजनों की एक बार स्वरूपतः और क्रमतः आवृत्ति होती है। इसके विपरीत, वृत्यनुप्रास में अनेक व्यंजनों की आवृत्ति एक बार केवल स्वरूपतः होती है, क्रमतः नहीं। यदि अनेक व्यंजनों की आवृत्ति स्वरूपतः और क्रमतः होती भी है, तो एक बार नहीं, अनेक बार भी हो सकती है। उदाहरण ऊपर दिये गये हैं।

(ग) लाटानुप्रास- जब एक शब्द या वाक्यखण्ड की आवृत्ति उसी अर्थ में हो, पर तात्पर्य या अन्वय में भेद हो, तो वहाँ 'लाटानुप्रास' होता है। 
यह यमक का ठीक उलटा है। इसमें मात्र शब्दों की आवृत्ति न होकर तात्पर्यमात्र के भेद से शब्द और अर्थ दोनों की आवृत्ति होती है।उदाहरण-
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी के पात्र समर्थ,
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी थी जिनके अर्थ। 
इन दो पंक्तियो में शब्द प्रायः एक-से हैं और अर्थ भी एक ही हैं। 
प्रथम पंक्ति के 'के पात्र समर्थ' का स्थान दूसरी पंक्ति में 'थी जिनके अर्थ' शब्दों ने ले लिया है। शेष शब्द ज्यों-के-त्यों हैं। 
दोनों पंक्तियों में तेगबहादुर के चरित्र में गुरुपदवी की उपयुक्तता बतायी गयी है। यहाँ शब्दों की आवृत्ति के साथ-साथ अर्थ की भी आवृत्ति हुई है।
दूसरा उदाहरण इस प्रकार है-
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। 
इसमें 'मनुष्य' शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है। दोनों का अर्थ 'आदमी' है। पर तात्पर्य या अन्वय में भेद है। पहला मनुष्य कर्ता है और दूसरा सम्प्रदान।

(ii) यमक अलंकार :-जहाँ एक ही शब्द अधिक बार प्रयुक्त हो, लेकिन उसके अर्थ अलग अलग हो वहाँ यमक अलंकार होता है। उदाहरण-
कनक कनक ते सौगुनी ,मादकता अधिकाय।
वा खाये बौराय नर ,वा पाये बौराय।।
यहाँ कनक शब्द की दो बार आवृत्ति हुई है जिसमे एक कनक का अर्थ है - धतूरा और दूसरे का स्वर्ण है।

(iii)श्लेष अलंकार:-श्लिष्ट पदों से अनेक अर्थों के कथन को 'श्लेष' कहते है। 
इनमें दो बातें आवश्यक है-(क ) एक शब्द के एक से अधिक अर्थ हो, (ख )एक से अधिक अर्थ प्रकरण में अपेक्षित हों। उदाहरण-
माया महाठगिनि हम जानी।
तिरगुन फाँस लिए कर डोलै ,बोलै मधुरी बानी।
यहाँ 'तिरगुन' शब्द में शब्द श्लेष की योजना हुई है। इसके दो अर्थ है- तीन गुण-सत्त्व, रजस्, तमस्। दूसरा अर्थ है- तीन धागोंवाली रस्सी।
ये दोनों अर्थ प्रकरण के अनुसार ठीक बैठते है, क्योंकि इनकी अर्थसंगति 'महाठगिनि माया' से बैठायी गयी है।
दूसरा उदाहरण-
चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गँभीर। 
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर। 
यहाँ 'वृषभानुजा' और 'हलधर' श्लिष्ट शब्द हैं, जिनसे बिना आवृत्ति के ही भित्र-भित्र अर्थ निकलते हैं। 'वृषभानुजा' से 'वृषभानु की बेटी' (राधा) और 'वृषभ की बहन' (गाय) का तथा 'हलधर के बीर' से कृष्ण (बलदेव के भाई) और साँड़ (बैल के भाई) का अर्थ निकलता है। 
अर्थ और शब्द दोनों पक्षों पर 'श्लेष' के लागू होने के कारण आचार्यो में विवाद है कि इसे शब्दलंकार में रखा जाय या अर्थालंकार में।

(iv) वक्रोक्ति- किसी अन्य अभिप्राय से कहे हुए वाक्य का दूसरे व्यक्ति द्वारा श्लेष अथवा काकु-उक्ति से अन्य अर्थ कल्पित किया जाना। 
जयदेव ने इसे अर्थालंकार में स्थान दिया है- यह श्लेष तथा काकु से वाच्यार्थ बदलने की कल्पना है। 'काकु' और 'श्लेष' शब्दशक्ति के ही अंग हैं। अतः इस अलंकार को अधिकतर आचार्यो ने शब्दालंकार में ही रखा है।
भामह ने वक्र शब्द और अर्थ की उक्ति को काम्य अलंकार मानकर और कुन्तक ने वक्रोक्ति को काव्य का जीवन मानकर इस अलंकार को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। 'शब्द' और 'अर्थ' दोनों में 'वक्रोक्ति होने के कारण 'श्लेष' की तरह यहाँ भी विवाद है कि यह शब्दालंकार में परिगणित हो या अर्थालंकार में।
रुद्रट ने इसे शब्दालंकार के रूप में स्वीकार कर इसके दो भेद किये है- (1) श्लेषवक्रोक्ति (2) काकुवक्रोक्ति 
श्लेषवक्रोक्ति दो प्रकार के होते है- (i) भंगपद श्लेषवक्रोक्ति (ii) अभंगपद श्लेषवक्रोक्ति

(i) भंगपद श्लेषवक्रोक्ति का उदाहरण इस प्रकार है- 
पश्र- अयि गौरवशालिनी, मानिनि, आज 
सुधास्मित क्यों बरसाती नहीं ?
उत्तर- निज कामिनी को प्रिय, गौ, अवशा,
अलिनी भी कभी कहि जाती कहीं ?
यहाँ नायिका को नायक ने 'गौरवशालिनी' कहकर मनाना चाहा है। नायिका नायक से इतनी तंग और चिढ़ी थी कि अपने प्रति इस 'गौरवशालिनी' सम्बोधन से चिढ़ गयी; क्योंकि नायक ने उसे एक नायिका का 'गौरव' देने के बजाय 'गौ' (सीधी-सादी गाय,जिसे जब चाहो चुमकारकर मतलब गाँठ लो), 'अवशा' (लाचार), 'अलिनी' (यों ही मँडरानेवाली मधुपी) समझकर लगातार तिरस्कृत किया था। नायिका ने नायक के प्रश्र का उत्तर न देकर प्रकारान्तर से वक्रोक्ति या टेढ़े ढंग की उक्ति से यह कहा, ''हाँ, तुम तो मुझे 'गौरवशालिनी' ही समझते हो !'' अर्थात, 'गौः+अवशा+अलिनी=गौरवशालिनी' । ''जब यही समझते
हो, तो तुम्हारा मुझे 'गौरवशालिनी' कहकर पुकारना मेरे लिए कोई अर्थ नहीं रखता''- नायिका के उत्तर में यही दूसरा अर्थ वक्रता से छिपा हुआ है, जिसे नायक को अवश्य समझना पड़ा होगा। कहा कुछ जाय और समझनेवाले उसका अर्थ कुछ ग्रहण करें- इस नाते यह वक्रोक्ति है। इस वक्रोक्ति को प्रकट करनेवाले पद 'गौरवशालिनी' में दो अर्थ (एक 'हे गौरवशालिनी' और दूसरा 'गौः, अवशा, अलिनी') श्लिष्ट होने के कारण यह श्लेषवक्रोक्ति है। और, इस 'गौरवशालिनी' पद को 'गौः+अवशा+अलिनी' में तोड़कर दूसरा श्लिष्ट अर्थ लेने के कारण यहाँ भंगपद श्लेषवक्रोक्ति अलंकार है।

(ii) अभंगपद श्लेषवक्रोक्ति का उदाहरण इस प्रकार है-
एक कबूतर देख हाथ में पूछा, कहाँ अपर है ?
उसने कहा, 'अपर' कैसा ?वह उड़ गया, सपर है।
यहाँ जहाँगीर ने नूरजहाँ से पूछा: एक ही कबूतर तुम्हारे पास है, अपर (दूसरा) कहाँ गया ! नूरजहाँ ने दूसरे कबूतर को भी उड़ाते हुए कहा: अपर (बे-पर) कैसा, वह तो इसी कबूतर की तरह सपर (पर वाला) था, सो उड़ गया।
अपने प्यारे कबूतर के उड़ जाने पर जहाँगीर की चिन्ता का मख़ौल नूरजहाँ ने उसके 'अपर' (दूसरे) कबूतर को 'अपर' (बे-पर) के बजाय 'सपर' (परवाला) सिद्ध कर वक्रोक्ति के द्वारा उड़ाया। यहाँ 'अपर' शब्द को बिना तोड़े ही 'दूसरा' और 'बेपरवाला' दो अर्थ लगने से अभंगश्लेष हुआ।

(2)काकुवक्रोक्ति- कण्ठध्वनि की विशेषता से अन्य अर्थ कल्पित हो जाना ही काकुवक्रोक्ति है। यहाँ अर्थपरिवर्तन मात्र कण्ठध्वनि के कारण होता है, शब्द के कारण नहीं। अतः यह अर्थालंकार है। किन्तु मम्मट ने इसे कथन-शौली के कारण शब्दालंकार माना है।
काकुवक्रोक्ति का उदाहरण है-
लिखन बैठि जाकी सबिहि, गहि गहि गरब गरूर। 
भए न केते जगत के चतुर चितेरे कूर।।
यहाँ उच्चारण के ढंग अर्थात काकु के कारण 'भए न केते' (कितने न हुए) का अर्थ 'सभी हो गए' हो जाता है। 

इस प्रकार वक्रोक्ति में चार बातें होनी आवश्यक हैं- 
(क) वक्ता की उक्ति। 
(ख) उक्ति का अभिप्रेत अर्थ। 
(ग़) श्रोता द्वारा उसका अन्य अर्थ लगाया जाना। 
(घ) श्रोता द्वारा लगाए अर्थ का प्रकट भी होना।
वक्रोक्ति और श्लेष में भेद- दोनों में अर्थचमत्कार दिखाया जाता है। श्लेष में चमत्कार का आधार एक शब्द के दो अर्थ है; 
वक्रोक्ति में यह चमत्कार कथन के तोड़मरोड़ या उक्ति ध्वन्यर्थ द्वारा प्रकट होता है। मुख्य अन्तर इतना ही है।


(2) अर्थालंकार:-

जिस अलंकार में अर्थ के प्रयोग करने से कोई चमत्कार उत्पत्र होता है वे अर्थालंकार कहलाते है।
दूसरे अर्थ में- अर्थ को चमत्कृत या अलंकृत करनेवाले अलंकार अर्थालंकार है।
जिस शब्द से जो अर्थालंकार सधता है, उस शब्द के स्थान पर दूसरा पर्याय रख देने पर भी वही अलंकार सधेगा, क्योंकि इस जाति के अलंकारों का सम्बन्ध शब्द से न होकर अर्थ से होता है। केशव (९६०० ई०) ने 'कविप्रिया' में दण्डी (७०० ई०)के आदर्श पर ३५ अर्थलंकार गिनाये हैं। जसवन्तसिंह (९६४३ ई०) ने 'भाषाभूषण' में ९०९अर्थलंकारों की चर्चा की है। दूल्ह (९७४३ ई०) के 'कविकुलकण्ठाभरण' जयदेव (९३ वीं शताब्दी) के 'चन्द्रालोक' और अप्पय दीक्षित (९७वीं शताब्दी) के 'कुवलयानन्द' में ९९५ अर्थलंकारों का विवेचन है।

अर्थालंकार के भेद
इसके प्रमुख भेद है-(i)उपमा (ii)रूपक (iii)उत्प्रेक्षा (iv) अतिशयोक्ति (v) दृष्टान्त (vi)उपमेयोपमा (vii)प्रतिवस्तूपमा (viii)अर्थान्तरन्यास (ix)काव्यलिंग (x)उल्लेख (xi)विरोधाभास (xii) स्वभावोक्ति अलंकार

(i)उपमा अलंकार :- दो वस्तुअों में समानधर्म के प्रतिपादन को 'उपमा' कहते है। 
उपमा का अर्थ है -समता, तुलना, या बराबरी। उपमा के लिए चार बातें आवश्यक है-
(क )उपमेय -जिसकी उपमा दी जाय,अर्थात जिसका वर्णन हो रहा हो; (ख)उपमान -जिससे उपमा दी जाय; (ग)समानतावाचक पद -जैसे -ज्यों, सम, सा, सी, तुल्य, नाई इत्यादि; (घ)समानधर्म -उपमेय और उपमान के समानधर्मको व्यक्त करनेवाला शब्द।
उदाहरणार्थ- नवल सुन्दर श्याम -शरीर की,
सजल नीरद -सी कल कान्ति थी।
इस उदाहरण का विश्लेषण इस प्रकार होगा -
कान्ति -उपमेय; 
नीरद -उपमान,
सी -समानतावाचक पद;
कल-समान धर्म।

(ii) रूपक अलंकार :- उपमेय पर उपमान का आरोप या उपमान और उपमेय का अभेद ही 'रूपक' है। 
इसके लिए तीन बातों का होना आवश्यक है -(क)उपमेय को उपमान का रूप देना; (ख)वाचक पद का लोप; (ग)उपमेय का भी साथ -साथ वर्णन।
उदाहरणार्थ- बीती विभावरी जाग री,
अम्बर -पनघट में डुबो रही तारा -घट उषा -नागरी। -प्रसाद 
यहाँ अम्बर, तारा और ऊषा (जो उपमेय है ) पर क्रमशः पनघट, घट और नागरी (जो उपमान है ) का आरोप हुआ है। वाचक पद नहीं आये है और उपमेय (प्रस्तुत)तथा उपमान (अप्रस्तुत) दोनों का साथ -साथ वर्णन हुआ है।
(iii) उत्प्रेक्षा अलंकार :- उपमेय (प्रस्तुत) में कल्पित उपमान (अप्रस्तुत) की सम्भावना को 'उत्प्रेक्षा' कहते है। 
उत्प्रेक्षा का अर्थ है, किसी वस्तु को सम्भावित रूप में देखना। 
दूसरे अर्थ में- उपमेय में उपमान को प्रबल रूप में कल्पना की आँखों से देखने की प्रक्रिया को उत्प्रेक्षा कहते है। इसमें वाचक पदों का प्रयोग होता है। 
सम्भावना सन्देह से कुछ ऊपर और निश्र्चय से कुछ निचे होती है। इसमें न तो पूरा सन्देह होता है और न पूरा निश्र्चय। उसमें कवि की कल्पना साधारण कोटि की न होकर विलक्षण होती है। अर्थ में चमत्कार लाने के लिए ऐसा किया जाता है। इसमें वाचक पदों का प्रयोग होता है।
उदाहरणार्थ- फूले कास सकल महि छाई। 
जनु बरसा रितु प्रकट बुढ़ाई।।
यहाँ वर्षाऋतु के बाद शरद् के आगमन का वर्णन हुआ है। शरद् में कास के खिले हुए फूल ऐसे मालूम होते है जैसे वर्षाऋतु का बुढ़ापा प्रकट हो गया हो। यहाँ 'कास के फूल' (उपमेय) में 'वर्षाऋतु के बुढ़ापे' (उपमान ) की सम्भावित कल्पना की गयी है। इस कल्पना से अर्थ का चमत्कार प्रकट होता है। वस्तुतः अन्त में वर्षाऋतु की गति और शक्ति बुढ़ापे की तरह शिथिल पड़ जाती है। 
उपमा में जहाँ 'सा' 'तरह' आदि वाचक पद रहते है, वहाँ उत्प्रेक्षा में 'मानों' 'जानो' आदि शब्दों द्वारा सम्भावना पर जोर दिया जाता है। जैसे- 'आकाश मानो अंजन बरसा रहा है' (उत्प्रेक्षा) 'अंजन -सा अँधेरा' (उपमा) से अधिक जोरदार है।

(iv)अतिशयोक्ति अलंकार:-जहाँ किसी का वर्णन इतना बढ़ा-चढ़ाकर किया जाये कि सीमा या मर्यादा का उल्लंघन हो जाय, वहाँ 'अतिशयोक्ति अलंकार' होता है।
दूसरे शब्दों में- उपमेय को उपमान जहाँ बिलकुल ग्रस ले, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। 
अतिशयोक्ति का अर्थ होता है, उक्ति में अतिशयता का समावेश। यहाँ उपमेय और उपमान का समान कथन न होकर सिर्फ उपमान का वर्णन होता है।
उदाहरण -
बाँधा था विधु को किसने, इन काली जंजीरों से,
मणिवाले फणियों का मुख, क्यों भरा हुआ हीरों से।
यहाँ मोतियों से भरी हुई प्रिया की माँग का कवि ने वर्णन किया है। विधु या चन्द्र-से मुख का, काली जंजीरों से केश और मणिवाले फणियों से मोती भरी माँग का बोध होता है।

(v)दृष्टान्त अलंकार:-जहाँ उपमेय और उपमान तथा उनके साधारण धर्मों में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव हो, वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है।
जैसे- सुख-दुख के मधुर मिलन से यह जीवन हो परिपूरन।
फिर धन में अोझल हो शशि, फिर शशि में अोझल हो धन। 
यहाँ सुख-दुख और शशि तथा धन में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव है

(vi)उपमेयोपमा अलंकार:-उपमेय और उपमान को परस्पर उपमान और उपमेय बनाने की प्रक्रिया को 'उपमेयोपमा' कहते है।
इसमें दो तरह की भित्र उपमाएँ होती है।
उदाहरणार्थ- राम के समान शम्भु सम राम है। 
यहाँ दो उपमाएँ एक साथ आयी है, पर दोनों उपमाओं के उपमेय और उपमान क्रमशः उपमान और उपमेय में परिवर्तित हो गये है।

(vii)प्रतिवस्तूपमाा अलंकार:-जहाँ उपमेय और उपमान के पृथक-पृथक वाक्यों में एक ही समानधर्म दो भित्र-भित्र शब्दों द्वारा कहा जाय, वहाँ 'प्रतिवस्तूपमा अलंकार' होता है।
उदाहरणार्थ- सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी ?
क्या परनर का हाथ कुलस्त्री कभी धरेगी ?
यहाँ दोनों वाक्यों में पूर्वार्द्ध (उपमानवाक्य) का धर्म 'प्यार करना' उत्तरार्द्ध (उपमेय-वाक्य) में 'हाथ धरना' के रूप में कथित है। वस्तुतः दोनों का अर्थ एक ही है। एक ही समानधर्म सिर्फ शब्दभेद से दो बार कहा गया है।

प्रतिवस्तूपमा और दृष्टान्त में भेद- मुख्य भेद इस प्रकार है-

(क) प्रतिवस्तूपमा में समान धर्म एक ही रहता है, जिसे दो भित्र शब्दों के प्रयोग से कहा जाता है; किन्तु दृष्टान्त में समानधर्म दो होते है, जो दो शब्दों के प्रयोग से कहे जाते है। 

(ख) प्रतिवस्तूपमा के दोनों वाक्यों में एक ही बात रहती है, जिसे दो वाक्यों द्वारा कहा जाता है। दृष्टान्त में एक वाक्य का धर्म दूसरे में एक समान नहीं होता। 
इन दो अलंकारों में इतनी समानता है कि पण्डितराज जगत्राथ ने इन्हें एक ही अलंकार का भेद माना है।

(viii)अर्थान्तरन्यास अलंकार :-जब किसी सामान्य कथन से विशेष कथन का अथवा विशेष कथन से सामान्य कथन का समर्थन किया जाय, तो 'अर्थान्तरन्यास अलंकार' होता है।
उदाहरणार्थ- बड़े न हूजे गुनन बिनु, बिरद बड़ाई पाय। 
कहत धतूरे सों कनक, गहनो गढ़ो न जाय। 
यहाँ सामान्य कथन का समर्थन विशेष बात से किया गया है। पूर्वार्द्ध में सामान्य बात कही गयी है और उसका समर्थन विशेष बात कहकर किया गया है।

(ix)काव्यलिंग अलंकार :-किसी युक्ति से समर्थित की गयी बात को 'काव्यलिंग अलंकार' कहते है। 
यहाँ किसी बात के समर्थन में कोई-न कोई युक्ति या कारण अवश्य दिया जाता है। बिना ऐसा किये वाक्य की बातें अधूरी रह जायेंगी।
एक उदाहरण - कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय। 
उहि खाए बौरात नर, इहि पाए बौराय। 
धतूरा खाने से नशा होता है, पर सुवर्ण पाने से ही नशा होता है। यह एक अजीब बात है।
यहाँ इसी बात का समर्थन किया गया है कि सुवर्ण में धतूरे से अधिक मादकता है। दोहे के उत्तरार्द्ध में इस कथन की युक्ति पुष्टि हुई है। धतूरा खाने से नशा चढ़ता है, किन्तु सुवर्ण पाने से ही मद की वृद्धि होती है, यह कारण देकर पूर्वार्द्ध की समर्थनीय बात की पुष्टि की गयी है।

(x)उल्लेख अलंकार :-जहाँ एक वस्तु का वर्णन अनेक प्रकार से किया जाये, वहाँ 'उल्लेख अलंकार' होता है।
जैसे- तू रूप है किरण में, सौन्दर्य है सुमन में, 
तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में।

(xi)विरोधाभास अलंकार :-जहाँ विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास दिया जाय, वहाँ 'विरोधाभास अलंकार' होता है।
जैसे- बैन सुन्या जबतें मधुर, तबतें सुनत न बैन। 
यहाँ 'बैन सुन्यों' और 'सुनत न बैन' में विरोध दिखाई पड़ता है। सच तो यह है कि दोनों में वास्तविक विरोध नहीं है। यह विरोध तो प्रेम की तन्मयता का सूचक है।

(xii) स्वभावोक्ति अलंकार :- किसी वस्तु के स्वाभाविक वर्णन को ' स्वभावोक्ति अलंकार' कहते है। यहाँ सादगी में चमत्कार रहता हैं।
उदाहरण- चितवनि भोरे भाय की, गोरे मुख मुसकानि। 
लगनि लटकि आली गरे, चित खटकति नित आनि।।
नायक नायिका की सखी से कहता है कि उस नायिका की वह भोलेपन की चितवन, वह गोरे मुख की हँसी और वह लटक-लटककर सखी के गले लिपटना- ये चेष्टाएँ नित्य मेरे चित्त में खटका करती हैं। यहाँ नायिका के जिन आंगिक व्यापारों का चित्रण हुआ है, वे सभी स्वाभाविक हैं। कहीं भी अतिशयोक्ति से काम नहीं लिया गया। इसमें वस्तु, दृश्य अथवा व्यक्ति की अवस्थाओं या स्थितियों का यथार्थ अंकन हुआ है।


(3)उभयालंकार:-

 जो अलंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित रहकर दोनों को चमत्कृत करते है, वे 'उभयालंकार' कहलाते है। 
उदाहरण -'कजरारी अंखियन में कजरारी न लखाय।'
इस अलंकार में शब्द और अर्थ दोनों है।
रस

रस का शाब्दिक अर्थ है 'आनंद' । काव्य को पढ़ने या सुनने से जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसे 'रस' कहा जाता है।
काव्यप्रकाश के रचयिता मम्मटभट्ट ने कहा है कि आलम्बनविभाव से उदबुद्ध, उद्यीप्त, व्यभिचारी भावों से परिपुष्ट तथा अनुभाव द्वारा व्यक्त हृदय का 'स्थायी भाव' ही रस-दशा को प्राप्त होता है।
पाठक या श्रोता के हृदय में स्थित स्थायी भाव ही विभावादि से संयुक्त होकर रस रूप में परिणित हो जाता है।
रस को 'काव्य की आत्मा/ प्राण तत्व' माना जाता है।

उदाहरण-
 राम पुष्पवाटिका में घूम रहे हैं। एक ओर से जानकीजी आती हैं। एकान्त है और प्रातःकालीन वायु। पुष्पों की छटा मन में मोह पैदा करती हैं। राम इस दशा में जानकीजी पर मुग्ध होकर उनकी ओर आकृष्ट होते है। राम को जानकीजी की ओर देखने की इच्छा और फिर लज्जा से हर्ष और रोमांच आदि होते हैं। इस सारे वर्णन को सुन-पढ़कर पाठक या श्रोता के मन में 'रति' जागरित होती है। यहाँ जानकीजी 'आलम्बनविभाव', एकान्त तथा प्रातःकालीन वाटिका का दृश्य 'उद्यीपनविभाव', सीता और राम में कटाक्ष-हर्ष-लज्जा-रोमांच आदि 'व्यभिचारी भाव' हैं, जो सब मिलकर 'स्थायी भाव' 'रति' को उत्पत्र कर 'शृंगार रस' का संचार करते हैं। भरत मुनि ने 'रसनिष्पत्ति' के लिए नाना भावों का 'उपगत' होना कहा है, जिसका अर्थ है कि विभाव, अनुभाव और संचारी भाव यहाँ स्थायी भाव के समीप आकर अनुकूलता ग्रहण करते हैं।
आचार्यों ने अपने-अपने ढंग के 'रस' को परिभाषा की परिधि में रखने का प्रयत्न किया है। सबसे प्रचलित परिभाषा भरत मुनि की है, जिन्होंने सर्वप्रथम 'रस' का उल्लेख अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' में ईसा की पहली शताब्दी के आसपास किया था। उनके अनुसार 'रस' की परिभाषा इस प्रकार है-
'विभावानुभावव्यभिचारीसंयोगाद्रसनिष्पत्ति:'- नाट्यशास्त्र,
अर्थात, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

रस के अंग :-
रस के चार अंग है
(1) विभाव
(2) अनुभाव
(3) व्यभिचारी भाव
(4) स्थायी भाव।

(1) विभाव :- 
जो व्यक्ति, पदार्थ अथवा ब्राह्य विकार अन्य व्यक्ति के हृदय में भावोद्रेक करता है, उन कारणों को 'विभाव' कहा जाता है।
दूसरे शब्दों में- स्थायी भावों के उदबोधक कारण को 'विभाव' कहते हैं।

विभाव के भेद
विभाव के दो भेद हैं- (क) आलंबन विभाव (ख) उद्यीपन विभाव।

(क)आलंबन विभाव- जिसका आलंबन या सहारा पाकर स्थायी भाव जगते है, आलंबन विभाव कहलाता है।
जैसे नायक-नायिका।

आलंबन विभाव के दो पक्ष होते है- आश्रयालंबन व विषयालंबन।
जिसके मन में भाव जगे वह आश्रयालंबन कहलाता है। जिसके प्रति या जिसके कारण मन में भाव जगे वह विषयालंबन कहलाता है।
उदाहरण- यदि राम के मन में सीता के प्रति रति का भाव जगता है तो राम आश्रय होंगे और सीता विषय।

(ख) उद्यीपन विभाव-जिन वस्तुओं या परिस्थितियों को देखकर स्थायी भाव उद्यीप्त होने लगता है, उद्यीपन विभाव कहलाता है।
जैसे- चाँदनी, कोकिल, कूजन, एकांत स्थल, रमणीक उद्यान, नायक या नायिका की शारीरिक चेष्टाएँ आदि।

(2) अनुभाव :- 
आलम्बन और उद्यीपन विभावों के कारण उत्पत्र भावों को बाहर प्रकाशित करनेवाले कार्य 'अनुभाव' कहलाते है।
दूसरे शब्दों में- मनोगत भाव को व्यक्त करनेवाले शरीर-विकार अनुभाव कहलाते है।
अनुभावों की संख्या 8 मानी गई है-
(1) स्तंभ (2) स्वेद (3) रोमांच (4) स्वर-भंग (5 )कम्प (6) विवर्णता (रंगहीनता) (7) अश्रु (8) प्रलय (संज्ञाहीनता/निश्चेष्टता) ।
अनुभाव के भेद
अतः अनुभाव के चार भेद है-
(क) कायिक (ख) मानसिक, (ग़) वाचिक और (घ) आहार्य।
यों इसके अन्य भेद भी है।

(3) व्यभिचारी या संचारी भाव :- 
मन में संचरण करनेवाले (आने-जाने वाले) भावों को 'संचारी' या 'व्यभिचारी' भाव कहते है।
व्यभिचारी या संचारी भाव 'स्थायी भावों' के सहायक है, जो अनुकुल परिस्थितियों में घटते-बढ़ते हैं।
आचार्य भरत ने इन भावों के वर्गीकरण के चार सिद्धान्त माने हैं- (i) देश, काल और अवस्था (ii) उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृति के लोग, (iii) आश्रय की अपनी प्रकृति या अन्य व्यक्तियों की उत्तेजना के कारण अथवा वातावरण के प्रभाव (iv) स्त्री और पुरुष के अपने स्वभाव के भेद।
जैसे- निर्वेद, शंका और आलस्य आदि स्त्रियों या नीच पुरुषों के संचारी भाव है; गर्व आत्मगत संचारी है; अमर्ष परगत संचारी; आवेग या त्रास कालानुसार संचारी हैं। भरत के अनुसार और अन्य आचार्यों के भी मत से पानी में उठनेवाले और आप-ही-आप विलीन होनेवाले बुदबुदों- जैसे ये संचारी या व्यभिचारी भाव स्थायी भावों के भेदों के अन्दर अलग-अलग भी हो सकते हैं और एक स्थायी भाव के संचारी दूसरे में भी आ सकते हैं। जैसे- गर्व 'शृंगार' (स्थायी भाव 'रति' का रस') में भी हो सकता है और 'वीर' में भी।
संचारी भावों की संख्या
संचारी भावों की कुल संख्या 33 मानी गई है-
(1) हर्ष (2) विषाद (3) त्रास (भय/व्यग्रता) (4) लज्जा (ब्रीड़ा) (5) ग्लानि (6) चिंता (7) शंका (8) असूया (दूसरे के उत्कर्ष के प्रति असहिष्णुता) (9) अमर्ष (विरोधी का अपकार करने की अक्षमता से उत्पत्र दुःख) (10) मोह (11) गर्व (12) उत्सुकता (13) उग्रता (14) चपलता (15) दीनता (16) जड़ता (17) आवेग (18) निर्वेद (अपने को कोसना या धिक्कारना) (19) घृति (इच्छाओं की पूर्ति, चित्त की चंचलता का अभाव) (20) मति (21) बिबोध (चैतन्य लाभ) (22) वितर्क (23) श्रम (24) आलस्य (25) निद्रा (26) स्वप्न (27) स्मृति (28) मद (29) उन्माद (30) अवहित्था (हर्ष आदि भावों को छिपाना) (31) अपस्मार (मूर्च्छा) (32) व्याधि (रोग) (33) मरण

(4) स्थायी भाव :- 
मन का विकार 'भाव' है। भरत मुनि ने अपने 'नाट्यशास्त्र' में भावों की संख्या उनचास कही है, जिनमें तैतीस संचारी या व्यभिचारी, आठ सात्विक और शेष आठ 'स्थायी भाव' है। भरत के अनुसार 'स्थायी भाव' ये है- (i) रति, (ii) ह्रास (iii) शोक (iv) क्रोध (v) उत्साह (vi) भय (vii ) जुगुप्सा/घृणा (viii) विस्मय/आश्चर्य (ix)शम/निर्वेद (वैराग्य/वीतराग) (x)वात्सल्य रति (xi)भगवद विषयक रति/अनुराग
भरत ने बाद में शम या निर्वेद या शान्त को भी नवम 'स्थायी भाव' माना। बाद के आचार्यों ने भक्ति और वात्सल्य को भी 'स्थायी भाव' माना है। भाव का स्थायित्व वहीं होता है, जहाँ (i) आस्वाद्यत्व, अर्थात व्यावहारिक जीवन में स्पष्ट अनुरंजकता (ii) उत्कटत्व, अर्थात इतनी तीव्रता कि अन्य किसी सजातीय या विजातीय भावों में न दब या सिमट पाना (iii) सर्वजनसुलभत्व अर्थात संस्कार-रूप में हर मनुष्य में वर्तमान होना (iv) पुरुषार्थोपयोगिता, अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थो की सिद्धि की योग्यता और (v) औचित्य, अर्थात भाव के विषय में आलम्बन आदि विषय की अनुकूलता हो। इन पाँच आधारों पर प्रथम नौ भाव ही 'स्थायी भाव' हो सकते है।
अतः मन के विकार को भाव कहते है और जो भाव आस्वाद, उत्कटता, सर्वजन-सुलभता, चार पुरुषार्थो की उपयोगिता और औचित्य के नाते हृदय में बराबर बना रहे, वह 'स्थायी भाव' है। ''वास्तविक 'स्थायी भाव' के उदाहरण तो रस की परिपक्व अवस्था में ही मिल सकते है, अन्यत्र नही। '' ''जो भाव चिरकाल तक चित्त में स्थिर रहता है, जिसे विरुद्ध या अविरुद्ध भाव दबा नहीं सकते और जो विभावादि से सम्बद्ध होने पर रस रूप में व्यक्त होता है, उस आनन्द के मूलभूत भाव को 'स्थायी भाव' कहते है।''

रस के प्रकार :-
रस के ग्यारह भेद होते है- (1) शृंगार रस (2) हास्य रस (3) करूण रस (4) रौद्र रस (5) वीर रस (6) भयानक रस (7) बीभत्स रस (8) अदभुत रस (9) शान्त रस (10) वत्सल रस (11) भक्ति रस ।

(1) रस : शृंगार रस
स्थायी भाव : रति/प्रेम
उदाहरण :
(i) संयोग शृंगार : बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
(संभोग श्रृंगार): सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी)
उदाहरण :
(ii) वियोग श्रृंगार : निसिदिन बरसत नयन हमारे
(विप्रलंभ श्रृंगार): सदा रहित पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे।।(सूरदास)

(2) रस : हास्य रस
स्थायी भाव : हास
उदाहरण :
तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप,
साज मिले पंद्रह मिनट, घंटा भर आलाप।
घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता,
धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी)

(3) रस : करुण रस
स्थायी भाव : शोक
उदाहरण :
सोक बिकल सब रोवहिं रानी।
रूपु सीलु बलु तेजु बखानी।।
करहिं विलाप अनेक प्रकारा।।
परिहिं भूमि तल बारहिं बारा।। (तुलसीदास)

(4) रस : वीर रस
स्थायी भाव : उत्साह
उदाहरण :
वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।
सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो।
तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं।। (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

(5) रस : रौद्र रस
स्थायी भाव : क्रोध
उदाहरण :
श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे।
सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे।
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े।। (मैथिली शरण गुप्त)

(6) रस : भयानक रस
स्थायी भाव : भय
उदाहरण :
उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी।
चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों-सी।। (जयशंकर प्रसाद)

(7) रस : बीभत्स रस
स्थायी भाव : जुगुप्सा/घृणा
उदाहरण :
सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत।।
गीध जांघि को खोदि-खोदि कै मांस उपारत।
स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।। (भारतेन्दु)

(8) रस : अदभुत रस
स्थायी भाव : विस्मय/आश्चर्य
उदाहरण :
आखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु।
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु।। (सेनापति)

(9) रस : शांत रस
स्थायी भाव : शम/निर्वेद
उदाहरण :
मन रे तन कागद का पुतला।
(वैराग्य/वीतराग)
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।। (कबीर)
(10) रस : वत्सल रस
स्थायी भाव : वात्सल्य रति
उदाहरण :
किलकत कान्ह घुटरुवन आवत।
मनिमय कनक नंद के आंगन बिम्ब पकरिवे घावत।। (सूरदास)

(11) रस : भक्ति रस
स्थायी भाव : भगवद विषयक
उदाहरण :
राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे।
रति/अनुराग घोर भव नीर-निधि, नाम निज नाव रे।। (तुलसीदास)

नोट:
(1) शृंगार रस को 'रसराज/ रसपति' कहा जाता है।
(2) नाटक में 8 ही रस माने जाते है क्योंकि वहां शांत को रस में नहीं गिना जाता। भरत मुनि ने रसों की संख्या 8 माना है।
(3) भरत मुनि ने केवल 8 रसों की चर्चा की है, पर आचार्य अभिन्नगुप्त (950-1020 ई०) ने 'नवमोऽपि शान्तो रसः कहकर 9 रसों को काव्य में स्वीकार किया है।
(4) श्रृंगार रस के व्यापक दायरे में वत्सल रस व भक्ति रस आ जाते हैं इसलिए रसों की संख्या 9 ही मानना ज्यादा उपयुक्त है।

रस संबंधी विविध तथ्य
भरतमुनि (1 वी सदी) को 'काव्यशास्त्र का प्रथम आचार्य' माना जाता है। सर्वप्रथम आचार्य भरत मुनि ने अपने ग्रंथ 'नाट्य शास्त्र' में रस का विवेचन किया। उन्हें रस संप्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है।

भरत मुनि के कुछ प्रमुख सूत्र
(1) 'विभावानुभाव व्यभिचारिसंयोगाद् रस निष्पतिः'- विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी (संचारी) के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
(2) 'नाना भावोपगमाद् रस निष्पतिः। नाना भावोपहिता अपि स्थायिनो भावा रसत्वमाप्नुवन्ति।'- नाना (अनेक) भावों के उपागम (निकट आने/ मिलने) से रस की निष्पत्ति होती है। नाना (अनेक) भावों से युक्त स्थायी भाव रसावस्था को प्राप्त होते हैं।
(3) 'विभावानुभाव व्यभिचारि परिवृतः स्थायी भावो रस नाम लभते नरेन्द्रवत्' ।- विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी से घिरे रहने वाले स्थायी भाव की स्थिति राजा के समान हैं। दूसरे शब्दों में, विभाव, अनुभाव व व्यभिचारी (संचारी) भाव को परिधीय स्थिति और स्थायी भाव को केन्द्रीय स्थिति प्राप्त है।
(4) रस-संप्रदाय के प्रतिष्ठापक आचार्य, मम्मट (11 वी० सदी) ने काव्यानंद को 'ब्रह्मानंद सहोदर' (ब्रह्मानंद- योगी द्वारा अनुभूत आनंद) कहा है। वस्तुतः रस के संबंध में ब्रह्मानंद की कल्पना का मूल स्रोत तैत्तरीय उपनिषद है जिसमें कहा गया है 'रसो वै सः'- आनंद ही ब्रह्म है।
(5)रस-संप्रदाय के एक अन्य आचार्य, आचार्य विश्वनाथ (14 वी० सदी) ने रस को काव्य की कसौटी माना है। उनका कथन है 'वाक्य रसात्मकं काव्यम्'- रसात्मक वाक्य ही काव्य है।
(6) हिन्दी में रसवादी आलोचक हैं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल डॉ० नगेन्द्र आदि। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने संस्कृत के रसवादी आचार्यों की तरह रस को अलौकिक न मानकर लौकिक माना है और उसकी लौकिक व्याख्या की है। वे रस की स्थिति को 'ह्रदय की मुक्तावस्था' के रूप में मानते हैं। उनके शब्द हैं : 'लोक-हृदय में व्यक्ति-हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस-दशा है'।
Channel name was changed to «UPSI Hindi»