•👉शरीर में संक्रमण से हमारी रक्षा करता है- डब्ल्यू. बी. सी.
👉लाल रक्त कणिकाएं मुख्यतया बनती हैं- अस्थि मज्जा में
👉रक्त होता है- एक संयोजी ऊतक
👉 रक्त समूहों की खोज की कार्ल लैंडस्टीनर ने
👉वर्ग AB रक्त वाला व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति का रक्त ले सकता है जिसका रक्त वर्ग हो- कोई भी वर्ग
👉सफेद रक्त कण (W.B.C.) का मुख्य कार्य है- रोग प्रतिरोधक क्षमता धारण करना
👉 प्रतिरक्षा (असंक्राम्यता) का सर्वाधिक संबंध है- लिम्फोसाइट्स
👉स्वस्थ मनुष्य का रक्तचाप (सिस्टॉलिक व डाइस्टॉलिक) होता है- 120 मिमी. व 80 मिमी.
👉 मानव हृदय का प्रथम शल्य प्रत्यारोपण किया गया था- क्रिश्चियन बर्नार्ड द्वारा
👉रक्त का थक्का बनने में फाइब्रिनोजिन को फाइब्रिन के परिवर्तन में भाग लेने वाला एंजाइम है- थ्रॉम्बिन
👉जब रक्त में ऑक्सीजन की सांद्रता में कमी आती है तो श्वास की गति- बढ़ जाती है
👉 हृदय की धड़कन नियंत्रित करने के लिए जो खनिज आवश्यक है, वह है- पोटैशियम
👉डी.एन.ए. अंगुलिछापन और नैदानिक शोध केंद्र अवस्थित है- हैदराबाद में
👉मानव रक्त की श्यानता का कारण है- प्लाज्मा में बिम्बाणु
👉मानव शरीर में हीमोग्लोबिन का कार्य है- ऑक्सीजन का परिवहन करना
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👍1
👉ब्रिटिश काल में भू राजस्व नीतियां
👉1793 ई. में लॉर्ड कार्नवालिस ने भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त प्रणाली को प्रारंभ किया।
👉इसे इस्तमरारी, जागीरदारी, मालगुजारी एवं बीसवेदारी आदि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है।
👉यह व्यवस्था बंगाल, बिहार उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक के क्षेत्र में लागू थी।
✍️ इसके अंतर्गत समूचे ब्रिटिश भारत के क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।
✍️इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों के एक नए वर्ग को भू-स्वामी घोषित कर दिया गया, जिसे भूमि के लगान का 10/11 भाग कंपनी को देना था तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था।
✍️ स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार छोटे पूंजीपति (भद्र नवाब) थे।
✍️ दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था
✍️इस व्यवस्था के जन्मदाता टॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे तथा सर्वप्रथम इसे तमिलनाडु के बारामहल जिले में लागू किया गया।
✍️ तत्पश्चात यह व्यवस्था मद्रास, बंबई के कुछ हिस्से, पूर्वी बंगाल, असम तथा कुर्ग (आधुनिक कर्नाटक का एक भाग) में लागू की गई।
👉इस प्रथा के अंतर्गत रैयतों को भूमि के मालिकाना और कब्जादारी अधिकार दिए गए थे और प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तथा व्यक्तिगत रूप से वे स्वयं सरकार को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी थे।
✍️ इस व्यवस्था ने कृषक भू-स्वामित्व की स्थापना की। इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 51 प्रतिशत हिस्सा शामिल था। इस व्यवस्था के अंतर्गत लगान की वसूली कठोरता से की जाती थी तथा लगान की दर भी काफी ऊंची थी।
✍️महालवाड़ी पद्धति
👉 भू-राजस्व व्यवस्था कृषक के साथ नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्राम अथवा महाल (जागीर का एक भाग) के साथ स्थापित की जाती थी।
✍️ इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था।
✍️ यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।
👉यह पद्धति उ.प्र., मध्य प्रांत तथा पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई, जिसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 30 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।
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उच्च न्यायालय
✍️भारतीय संविधान के तहत राज्यों के न्यायिक प्रशासन में उच्च न्यायालय की स्थिति शीर्ष पर होती है।
✍️ भारतीय संविधान में राज्यों के लिए उच्च न्यायालय हेतु भाग 6 के अध्याय 5 के तहत अनुच्छेद 214 से 231 तक में प्रावधान किया गया है।
✍️प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा संसद को अनुच्छेद 231 के तहत यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा दो या दो से अधिक राज्यों के लिए अथवा दो या अधिक राज्यों और किसी संघ राज्यक्षेत्र के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है।
✍️अनुच्छेद 230 के तहत संसद विधि द्वारा किसी - संघ राज्यक्षेत्र पर किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार कर सकेगी या किसी संघ राज्यक्षेत्र से किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन कर सकेगी।
✍️अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
✍️ अनुच्छेद 215 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा।
✍️ अभिलेख न्यायालय होने का तात्पर्य है कि उच्च न्यायालय के निर्णय, आदेश आदि अधीनस्थ न्यायालय के लिए बाध्यकर होंगे तथा उसको अपने अवमान के लिए दंड देने सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी।
✍️अनु. 216 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायमूर्ति और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा, जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।
✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं।
✍️ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रपति को अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकते हैं।
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पर्यायवाची शब्द पढ़ो वहीं जो परीक्षा में आए
👉अभिमान- अस्मिता, अहं, अहंकार, अहंभाव, अहम्मन्यता, आत्मश्लाघा, गर्व, घमंड, दर्प, दंभ, मद, मान, मिथ्याभिमान।
👉अरण्य- जंगल, वन, कानन, अटवी, कान्तार, विपिन।
अनी- कटक, दल, सेना, फौज, चमू, अनीकिनी।
👉अनादर- अपमान, अवज्ञा, अवहेलना, अवमानना, परिभव, तिरस्कार।
👉अंकुश- नियंत्रण, पाबंदी, रोक, अंकुसी, दबाव, गजांकुश, हाथी को नियंत्रित करने की कील, नियंत्रित करने या रोकने का तरीका।
👉अंजाम- नतीजा, परिणाम, फल।
अंत- समाप्ति, अवसान, इति, इतिश्री, समापन।
#RO-AROमहत्त्वपूर्ण
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#vpo
✍️प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध 1767-69 ई. में हुआ। इस युद्ध में हैदर अली विजयी हुआ।
✍️ इस दौरान अंग्रेज गवर्नर वेरेल्स्ट था।
✍️युद्ध 4 अप्रैल, 1769 को मद्रास की संधि द्वारा समाप्त हुआ।
✍️द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84 ई.) के दौरान, हैदर अली ने निजाम तथा मराठों के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक मोर्चा बनाया।
✍️जुलाई, 1780 में हैदर अली ने कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया तथा कर्नल बेली (Col. Baillie) के अधीन अंग्रेजी सेना को हराकर अर्काट पर अधिकार कर लिया। इसी दौरान टीपू ने हेक्टर मुनरो की सेना को पोल्लीलुर नामक स्थान पर हरा दिया।
✍️1781 ई. में हैदर अली का सामना अंग्रेज जनरल आयरकूट से हुआ, जिसने पोर्टो नोवो (1 जुलाई, 1781), पोल्लीलुर तथा शोलिंगुर में हैदर अली को परास्त किया। दिसंबर, 1782 ई. में हैदर अली की मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा तथा अंततः मंगलौर की संधि (1784 ई.) से द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का समापन हुआ।
✍️टीपू सुल्तान ने श्रीरंगपट्टनम को अपनी राजधानी बनाया एवं यहां जैकोबिन क्लब की स्थापना की और उसका सदस्य बना, साथ ही उसने अपनी राजधानी में फ्रांस और मैसूर की मैत्री का प्रतीक स्वतंत्रता का वृक्ष रोपा।
✍️टीपू सुल्तान ने अपने समकालीन विदेशी राज्यों से मैत्री संबंध बनाने तथा अंग्रेजों के विरुद्ध उनकी सहायता प्राप्त करने के लिए ईरान, कुस्तुंतुनिया /(आधुनिक इस्तांबुल), अफगानिस्तान और फ्रांस आदि को दूतमंडल भेजे और आधुनिक रीति पर दूतावासों की स्थापना की।
✍️तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92 ई.)
का अवसान श्रीरंगपट्टनम की संधि (मार्च, 1792) द्वारा हुआ।
✍️ इस संधि में अंग्रेजों की ओर से कार्नवालिस तथा मैसूर से टीपू सुल्तान शामिल थे।
✍️ टीपू सुल्तान चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799 ई.) के दौरान अंग्रेजों से लड़ते हुए मारे गये।
✍️ इसके कुल के सदस्यों को वेल्लौर में कैद कर दिया गया। इस युद्ध के समय अंग्रेजी सेना को वेलेजली और स्टुअर्ट ने अपना नेतृत्व प्रदान किया।
✍️मैसूर को जीतने की खुशी में आयरलैंड के लॉर्ड समाज ने वेलेजली को 'मार्विवस' की उपाधि प्रदान की।
✍️युद्ध के बाद अंग्रेजों ने मैसूर की गद्दी पर पुनः अड्यार वंश के एक बालक कृष्णराज को बिठा दिया तथा कनारा, कोयंबटूर और श्रीरंगपट्टनम को अपने राज्य में मिला लिया।
✍️बेगम समरु (1750-1836 ई.) ने एक अति प्रसिद्ध चर्च का निर्माण मेरठ के निकट सरधना में कराया था।
✍️बेगम समरु के पति एक यूरोपीय वाल्टर रेनहार्ट साम्ब्रे थे, जिन्होंने कई रियासतों को सैन्य सेवाएं प्रदान की थी।
✍️साम्ब्रे को बंगाल के नवाब नजब खां ने सहारनपुर के रूहेला सरदार जाब्ता खां को हराने में प्रमुख भूमिका के कारण सरधना की जागीर प्रदान की थी। अपने पति की मृत्यु के बाद बेगम समरु सरधना की शासिका बनी थीं।
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📕ब्रिटिश काल में भू राजस्व नीतियां
📕 दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था
📕महालवाड़ी पद्धति
👉 भू-राजस्व व्यवस्था कृषक के साथ नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्राम अथवा महाल (जागीर का एक भाग) के साथ स्थापित की जाती थी।
✍️ इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था।
✍️ यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।
👉यह पद्धति उ.प्र., मध्य प्रांत तथा पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई, जिसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 30 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।
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👉1793 ई. में लॉर्ड कार्नवालिस ने भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त प्रणाली को प्रारंभ किया।
👉इसे इस्तमरारी, जागीरदारी, मालगुजारी एवं बीसवेदारी आदि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है।
👉यह व्यवस्था बंगाल, बिहार उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक के क्षेत्र में लागू थी।
✍️ इसके अंतर्गत समूचे ब्रिटिश भारत के क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।
✍️इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों के एक नए वर्ग को भू-स्वामी घोषित कर दिया गया, जिसे भूमि के लगान का 10/11 भाग कंपनी को देना था तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था।
✍️ स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार छोटे पूंजीपति (भद्र नवाब) थे।
📕 दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था
✍️इस व्यवस्था के जन्मदाता टॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे तथा सर्वप्रथम इसे तमिलनाडु के बारामहल जिले में लागू किया गया।
✍️ तत्पश्चात यह व्यवस्था मद्रास, बंबई के कुछ हिस्से, पूर्वी बंगाल, असम तथा कुर्ग (आधुनिक कर्नाटक का एक भाग) में लागू की गई।
👉इस प्रथा के अंतर्गत रैयतों को भूमि के मालिकाना और कब्जादारी अधिकार दिए गए थे और प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तथा व्यक्तिगत रूप से वे स्वयं सरकार को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी थे।
✍️ इस व्यवस्था ने कृषक भू-स्वामित्व की स्थापना की। इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 51 प्रतिशत हिस्सा शामिल था। इस व्यवस्था के अंतर्गत लगान की वसूली कठोरता से की जाती थी तथा लगान की दर भी काफी ऊंची थी।
📕महालवाड़ी पद्धति
👉 भू-राजस्व व्यवस्था कृषक के साथ नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्राम अथवा महाल (जागीर का एक भाग) के साथ स्थापित की जाती थी।
✍️ इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था।
✍️ यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।
👉यह पद्धति उ.प्र., मध्य प्रांत तथा पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई, जिसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 30 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।
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उच्च न्यायालय
✍️भारतीय संविधान के तहत राज्यों के न्यायिक प्रशासन में उच्च न्यायालय की स्थिति शीर्ष पर होती है।
✍️ भारतीय संविधान में राज्यों के लिए उच्च न्यायालय हेतु भाग 6 के अध्याय 5 के तहत अनुच्छेद 214 से 231 तक में प्रावधान किया गया है।
✍️प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा संसद को अनुच्छेद 231 के तहत यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा दो या दो से अधिक राज्यों के लिए अथवा दो या अधिक राज्यों और किसी संघ राज्यक्षेत्र के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है।
✍️अनुच्छेद 230 के तहत संसद विधि द्वारा किसी - संघ राज्यक्षेत्र पर किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार कर सकेगी या किसी संघ राज्यक्षेत्र से किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन कर सकेगी।
✍️अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
✍️ अनुच्छेद 215 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा।
✍️ अभिलेख न्यायालय होने का तात्पर्य है कि उच्च न्यायालय के निर्णय, आदेश आदि अधीनस्थ न्यायालय के लिए बाध्यकर होंगे तथा उसको अपने अवमान के लिए दंड देने सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी।
✍️अनु. 216 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायमूर्ति और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा, जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।
✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं।
✍️ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रपति को अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकते हैं।
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👉ब्रिटिश काल में भू राजस्व नीतियां
👉1793 ई. में लॉर्ड कार्नवालिस ने भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त प्रणाली को प्रारंभ किया।
👉इसे इस्तमरारी, जागीरदारी, मालगुजारी एवं बीसवेदारी आदि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है।
👉यह व्यवस्था बंगाल, बिहार उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक के क्षेत्र में लागू थी।
✍️ इसके अंतर्गत समूचे ब्रिटिश भारत के क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।
✍️इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों के एक नए वर्ग को भू-स्वामी घोषित कर दिया गया, जिसे भूमि के लगान का 10/11 भाग कंपनी को देना था तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था।
✍️ स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार छोटे पूंजीपति (भद्र नवाब) थे।
✍️ दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था
✍️इस व्यवस्था के जन्मदाता टॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे तथा सर्वप्रथम इसे तमिलनाडु के बारामहल जिले में लागू किया गया।
✍️ तत्पश्चात यह व्यवस्था मद्रास, बंबई के कुछ हिस्से, पूर्वी बंगाल, असम तथा कुर्ग (आधुनिक कर्नाटक का एक भाग) में लागू की गई।
👉इस प्रथा के अंतर्गत रैयतों को भूमि के मालिकाना और कब्जादारी अधिकार दिए गए थे और प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तथा व्यक्तिगत रूप से वे स्वयं सरकार को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी थे।
✍️ इस व्यवस्था ने कृषक भू-स्वामित्व की स्थापना की। इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 51 प्रतिशत हिस्सा शामिल था। इस व्यवस्था के अंतर्गत लगान की वसूली कठोरता से की जाती थी तथा लगान की दर भी काफी ऊंची थी।
✍️महालवाड़ी पद्धति
👉 भू-राजस्व व्यवस्था कृषक के साथ नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्राम अथवा महाल (जागीर का एक भाग) के साथ स्थापित की जाती थी।
✍️ इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था।
✍️ यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।
👉यह पद्धति उ.प्र., मध्य प्रांत तथा पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई, जिसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 30 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।
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👉उपराष्ट्रपति।
✍️'भारत में उपराष्ट्रपति का पद अमेरिका के उपराष्ट्रपति की तर्ज पर बनाया
✍️ अनुच्छेद 63 _ भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।
✍️ अनुच्छेद 64 _उपराष्ट्रपति राज्य सभा का 'पदेन सभापति' होता है।
✍️ अनु. 65 _राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस दौरान वह राज्य सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा तथा अनु. 97 के अधीन सभापति को संदेय वेतन-भत्ते का हकदार नहीं होगा।
✍️भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित औरमनोनीत दोनों सदस्यों द्वारा किया जाता है।
✍️अनु. 66(1) _उपराष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है तथा ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होता है।
✍️भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा के सभापति पद के लिए वर्तमान में 4 लाख रुपये प्रतिमाह वेतन
✍️उपराष्ट्रपति को, उपराष्ट्रपति पद के लिए वेतन नहीं प्राप्त होता है, बल्कि राज्य सभा के सभापति के रूप में प्राप्त होता है।
✍️अनुच्छेद 66(3) _ उपराष्ट्रपति पद के लिए योग्यता
✍️अनुच्छेद 67_ उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष तक है।
✍️अनुच्छेद 67 (क) _ उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग कर सकता है।
✍️अनुच्छेद 67 (ख) _उपराष्ट्रपति राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा, जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया है और जिससे लोक सभा सहमत है।
✍️उपराष्ट्रपति अनु. 69 में वर्णित प्रारूप में राष्ट्रपति या राष्ट्रपति के द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष पद की शपथ लेता है।
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