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📕प्रमुख संविधान संशोधन

52वाँ संशोधन (1985):

संसद और विधान मंडलों के सदस्यों को दल-बदल के आधार पर वर्गीकरण की व्यवस्था दी गई और इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए एक नई अनुसूची (दसवीं अनुसूची) को जोड़ा गया।

👉61वाँ संशोधन (1988)

विपक्ष और राज्य विधान सभा के चुनाव में मतदान की आयु 21 वर्ष से 18 वर्ष कर दी गई।

👉73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992):

73वाँ संशोधन अधिनियम:
इस संशोधन के माध्यम से अलौकिक राज संस्था को संवैधानिक बनाया गया।

👉इस अधिनियम में भारत के संविधान का एक नया भाग-IX जोड़ा गया है तथा इसमें 243 से 243O तक के जुलूस शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त अधिनियम में संविधान द्वारा एक नई 11वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया है और इसमें परियोजना के 29 संरचनात्मक विषयों को शामिल किया गया है।

👉74वाँ संशोधन अधिनियम:

👉शहरी स्थानीय संस्था 1992 में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान 74वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से इसे संवैधानिक बनाया गया था। यह 1 जून, 1993 को लागू हुआ।
इसमें भाग IX-A को जोड़ा गया है और इसमें 243-पी से 243-जेडजी तक के प्रॉजेक्ट को शामिल किया गया है।

👉इसके अलावा इस अधिनियम द्वारा संविधान में 12वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया । नगर पालिकाओं के 18 कार्यात्मक मद शामिल हैं।


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🔰संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

👉संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 में संसद को संविधान एवं इसकी व्यवस्था में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है।

यह प्रावधान करता है कि संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के किसी उपबंध कापरिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन कर सकती है।

👉हलाकि संसद उन व्यवस्थाओ को संशोधित नही कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे की संरचना से सम्बद्ध हो यह व्यवस्था उच्चतम न्यायलय द्वारा केशवानंद भारती मामले (1973) में की।

👉अनुछेद 368 के अंतर्गत यह निम्नलिखित तरीके से हो सकती है-

👉 संविधान के संशोधन का आरम्भ संसद के किसी भी सदन में किया जा सकता है किन्तु राज्य विधान मंडल में नही।

👉 विधेयक को मंत्री या गैर सरकारी सदस्यों द्वारा पुर्स्थापित किया जा सकता है।

👉विधेयक को दोनो सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है।

👉दोनों ही सदनों में विधेयक अलग अलग पारित होना चाहिए और असहमति या गतिरोध की की स्थिति में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नही है।

👉 विधेयक के संघीय व्यवस्था से सम्बंधित होने पर उसे आधे राज्यों के विधानमंडल से भी सामान्य बहुमत से पारित होना चाहिए।

👉 राष्ट्रपति विधेयक को सहमती देंगे क्यूंकि वे विधेयक को न तो अपने पास रख सकते है और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिये भेज सकते है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद विधेयक अधिनियम बन जाता है।

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📕दोस्तों सफलता के केवल तीन मूल स्तंभ होते है

1 - धैर्य

2- निरंतरता

3- विश्वास
आप चाहे जिस क्षेत्र में सफल होना चाहते है, इन तीनों को अपने चरित्र में समाहित कर लीजिए ,

धैर्य - आपको विपरीत परिस्थितियों में भी जीना सिखाता है

निरंतरता - से आपके साहस में वृद्धि होती है

विश्वास - से आप अपने लक्ष्य के प्रति सकारात्म होते है


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