✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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अंगुलियों में राशियां-
1. पहली अंगुली तर्जनी का प्रथम पोर मेष, दूसरा वृषभ और तीसरा मिथुन राशि का होता है।
2. बीच की अंगुली का प्रथम पोर मकर, दूसरा पोर कुंभ और तीसरा पोर मीन राशि का माना जाता है।
3. तीसरी अंगुली अनामिका में प्रथम पोर कर्क, दूसरा पोर सिंह और तीसरा पोर कन्या राशि का माना जाता है।
4. चौथी अंगुली का प्रथम पोर तुला, दूसरा पोर वृश्चिक और तीसरा पोर धनु राशि का माना जाता है।

अंगुलियों के पोरों के शंख-
जिस अंगुली के नीचे के पर्वत गहरे और स्पष्ट हैं, साथ ही अपनी जगह से हटे हुए या किसी अन्य पर्वत की ओर झुके हुए नहीं है तो माना जाता है कि उस अंगुली से संबंधित ग्रह भी मजबूत होता है। पर्वत में चक्र या शंख होता है। अंगुलियों के पोरों में भी चक्र या शंख होते हैं। एक अंगुली में शंख है तो उच्च शिक्षा प्राप्त कर उच्च पद पद पर आसीन होगा। दो है तो जीवन संघर्षपूर्ण होगा। तीन है तो लग्जरी लाइफ जिएंगे। चार है तो राजयोग या अपार धनयोग समझें और पांच है तो अत्यंत प्रतिभावान, ख्यातिप्राप्त होगा और समाज को बदलने वाला होगा। छह है तो वैज्ञानिक, उपदेशक, संत या अद्भुत मस्तिष्क क्षमता का धनी होगा। सात है तो गरीब या दुखी होगा। आठ है तो मेहनत के बल पर ऊंचाइयां छुएगा। नौ है तो महिलाओं के गुण होंगे और उसे महिलाओं का सहयोग खूब मिलेगा। दस है तो बहुत ही सम्माननीय व्यक्ति होगा। हथेली पर शंख है तो व्यक्ति देश-विदेश की यात्रा करेगा।

अंगुलियों के पोरों के चक्र-
चक्र गोल पूर्ण घेरे से युक्त स्पष्ट अभंग होना चाहिए, नहीं तो टूटा हुआ चक्र व्यक्ति को अनेक मानसिक चिंताओं से ग्रस्त कर देता है। तर्जनी में चक्र होगा तो जातक अनेक मित्रों से युक्त होकर लोगों का नेतृत्व करेगा, महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ धन का भी लाभ होगा। मध्यमा में चक्र होगा तो जातक धनवान और धार्मिक प्रवृत्ति का होगा और उस पर शनि की कृपा रहेगी। हो सकता है कि वह उत्तम ज्योतिषी, तांत्रिक या मठाधीश हो।

अनामिका अंगुली पर चक्र होना भाग्यशाली होने की निशानी है। ऐसे जातक उत्तम व्यापारी, धनवान, उद्योग-धंधों में सफल, प्रतिष्ठित लेखक, यशस्वी, ऐश्वर्यवान, राजनीतिज्ञ, कुशल प्रशासनिक अधिकारी भी हो सकते हैं। सबसे छोटी अंगुली यानी कनिष्ठिका पर चक्र का होना सफल व्यापारी होने की निशानी होती है। ऐसे जातक सफल लेखक और प्रकाशक भी होते हैं व संपादन के क्षेत्र में भी सफलता पा सकते हैं।

यदि अंगूठे पोरे पर चक्र बना है तो जातक जीवन में कई उपलब्धियां प्राप्त करता है। वह जीवन में कई उल्लेखनीय कार्य भी करता है। ऐसा जातक भाग्यशाली व धनवान होता है। ऐसा जातक ऐश्वर्यवान, प्रभावशाली, दिमागी कार्य में निपुण, उत्तम गुणयुक्त, पिता का सहयोग व धन पाने वाला होता है।

हाथों के निशान-
1. हथेली में सूर्य का निशान सूर्य के समान दिखाई देता है।
2. चंद्र का निशान चंद्र तारे की तरह नजर आता है।
3. शुभ मंगल का निशान चौकोर चतुर्भुज के समान होता है।
4. अशुभ मंगल का निशान त्रिकोण या त्रिभुज के रूप में होता है।
5. बुध का निशान गोलाकार समान होता है।
6. गुरु का निशान किसी ध्वज की, तरह होता है।
7. शुक्र का निशान समांतर में बनी 2 लहराती हुई रेखाओं सा होता है।
8. शनि का निशान धनु के आकार का होता है।
9. राहु का निशान आड़ी-तिरछी रेखाओं से बना जाल सा होता है।
10. केतु का निशान लंबी रेखा के नीचे एक अर्द्धवृत सा होता है।
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_ * प्रेम की सुगंध *

बल के प्रयोग से आप किसी व्यक्ति को तो जीत पाते हैं लेकिन उसके हृदय को नहीं जीत सकते हैं। अपनी बात मनवाने के लिए अपने अधिकार या बल का प्रयोग करना कदापि उचित नहीं है। प्रेम ही वो शस्त्र है जिसके प्रयोग से सारी दुनिया को जीता जा सकता है। लेकिन प्रेम की विजय की शुरुआत पूर्ण समर्पण से ही संभव है इसलिए निसंदेह प्रेम की विजय ही सच्ची विजय है। प्रयास करें कि किसी काम को करवाने के लिए आपको क्रोध का आश्रय न लेना पड़े।
इसी पर हॉलीवुड में एक फिल्म (हैकसॉ रिज 2016) का निर्माण हुआ है जिसमें एक सैनिक बिना हथियार उठाए कैसे एक युद्ध में सहायता कर सकता है इसका खूबसूरती से चित्रित किया गया है।
हमारे ग्रंथों में भी प्रेम या शांति को पहले स्थान दिया गया है राम, कृष्ण हों या कबीर हों सबने प्रेम को ही सर्वोपरी माना है
जब जो कोई काम धीरे बोलकर, मुस्कुराकर और प्रेम से बोलकर कराया जा सकता है उसे क्रोधित होकर करवाना भी उचित नहीं है। आज प्रत्येक घर में परस्पर द्वेष, संघर्ष, दुःख और अशांति का एक ही कारण है और वह है प्रेम का अभाव। आग को आग नहीं बुझाती पानी बुझाता है और क्रोध को क्रोध शांत नहीं करता अपितु प्रेम ही शांत करता हूँ। पशु -पक्षी भी प्रेम की भाषा समझते हैं। प्रेम वो इत्र है जिसकी सुगंध आपके पूरे जीवन को प्रसन्नता की सुगंध से भर देती है।

🙏 *जय श्री राधे कृष्ण* 🙏
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दुष्कर्मों के और कुविचारों के जो कुसंस्कार मन पर जमते हैं वे एक प्रकार से विषैली पर्तों के रूप में चेतन मस्तिष्क और अचेतन चित्त पर जमते रहते हैं। ये मन की चंचलता, उद्विग्नता, अस्थिरता, आवेग, विक्षोभ आदि के रूप में फूटते हैं और व्यक्ति को अर्ध पागल जैसा बना देते हैं। वह किसी काम को एकाग्रचित होकर नहीं कर पाता और हर घडी उधेडबुन में ही लगा रहता है। फलस्वरूप पग-पग पर उसे असफलता मिलती है और ठोकरें लगती हैं। असंतुलित व्यवहार से वह रूष्ट और असंतुष्ट होकर असहयोगी, विरोधी और अपराधी बन जाता है। परिवार और समाज में सभी से कलह करने का अभ्यस्त व्यक्ति हर घडी विक्षुब्ध बना रहता है। न तो मस्तिष्क ठीक प्रकार से सोच पाता है, न कोई सही रास्ता मिलता है। शरीर से रूग्न और मन से विक्षुब्ध व्यक्ति जीवित रहते स्वयं नरक भोगता है और सामाजिक वातावरण को भी दूषित करता है।

व्यसन और मृत्यु में व्यसन अधिक कष्टदायक होता है। व्यसनों में अलिप्त व्यक्ति मरकर भी सुख प्राप्त करता है पर दुर्व्यसनों में फंसा हुआ व्यक्ति प्रति पल मरता रहता है। और अधोगति को प्राप्त होता है। निर्व्यसनता मनुष्य की शोभा का कारण होती है। जो व्यक्ति मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करता उसे निश्चित रूप से नशा करने वालों से अच्छा समझा जाएगा। मांसाहार न करने वाला व्यक्ति मांसा हारी की अपेक्षा श्रेष्ठ समझा जाएगा। जुआरी की अपेक्षा जुआ न खेलने वाला ही सम्मान व प्रतिष्ठा पाता है।

दुराचारों, दुष्कर्मों और दुर्व्यसनों में उलझा हुआ व्यक्ति अपने पतन का कारण तो बनता ही है, समाज के प्रति भी घोर अपराध करता है। उसके कारण समाज में अराजकता और अशांति फैलती है और न जाने कितने लोगों के जीवन पर भी उसका दुष्प्रभाव पडता है। व्यभिचार और बलात्कार से पीडित व्यक्ति को आजीवन मानसिक यातना भुगतनी पडती है।

जहां ये सब दुर्व्यसन समाज के प्रति अपराध हैं वहां मांसाहार जीव जगत के प्रति अपराध है। यह मनुष्य को जंगली और अशिष्ट बनाता है और बुद्धि को मलिन करता है। मांसाहार से मनुष्य के हृदय से दया का भाव दूर हो जाता है। यह उसकी शारीरिक, मानसिक, आत्मिक तथा बौद्धिक उन्नति को रोककर अवनति की ओर ले जाता है अतः इसे वर्जित समझना चाहिए। संसार भर में जितने भी महापुरूष हुए हैं वे सभी शाकाहारी रहे हैं और उन्होने मांसाहार की भरपूर निंदा की है। मांसाहार अहिंसा को त्याग कर ही किया जा सकता है। हमारे ऋषियों ने सदैव ही अहिंसा की महिमा का बखान किया है। महाभारत ( आदि पर्व ) में ऋषि ने स्पष्ट कहा है 'अहिंसा परमोधर्मः सर्वप्राणभूतां वर।' किसी भी प्राणी को न मारना ही परम धर्म है। अहिंसा से बढकर दूसरा कोई धर्म नहीं है।

समाज एवं जीव जगत के इन अपराधियों को, मानवता के विरोधियों को उचित दंड अवश्य मिलना चाहिए। ऐसी दुष्प्रवृत्तियों को जड से उखाड फेंकने के उपक्रम हम सभी को करने चाहिए तभी हम सामाजिक उत्तरदायित्व को भली प्रकार निभा सकेंगे।
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*सत्य का मार्ग मत छोड़ना, चाहे मन कितना ही क्यों न छटपटाये!*

*इन्द्रियाँ तो व्यर्थ ही इधर-उधर भागने वाली हैं।*
*ये आपको किसी भी खड्डे में गिरा सकती हैं।*
*इन्द्रियों को वश में कर लो तो तुम विजयी कहलाओगे।*
*इन्द्रियाँ चोर की तरह वह अवसर ताकती हैं, जब वे तुम्हें नर्क में पटक दें, पतन करा दें।*

*यदि इन चोरों को अवसर मिलेगा, तो ये सारा संचित धर्म नष्ट कर देंगी।*
*मन के संयम से उत्थान का मार्ग थोड़ा सरल हो जाता है।*
*अनियंत्रित इन्द्रियों का विद्रोह ही नर्क है।*
*उत्तम स्वास्थ्य, दिव्य बुद्धि और सांसारिक सम्पदाएँ उसी को प्राप्त होती है,*
*जिसने अपने मन और इन्द्रियों पर काबू पा लिया है।*

*जिन व्यक्तियों के हृदय पवित्र हैं, मन काबू में है, वे धन्य हैं, क्योंकि वे पृथ्वी पर ही स्वर्ग का सुख प्राप्त करेंगे।*

*धर्म वही है, होता जिससे सदा-सर्वदा पर-उपकार।*
*उससे ही होता निश्चय अपना भी सहज सत्य उपकार॥*

*वह अधर्म है, जिससे होता तनिक दूसरेका अपकार।*
*उससे अपना भी निश्चय ही होता सहज अमित अपकार॥*

*बुद्धिमान जन इसीलिये नित करते रहते पर-उपकार।*
*क्योंकि उसीसे ही होता है उनका भी अपना उपकार॥*
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अनावश्यक भय ठीक नहीं मित्र

👉 *"संकट" भयंकर तब तक लगता है जब तक उसके साथ मुठभेड़ नहीं होती।* जब उसके साथ गुथ जाया जाता है और मानसिक संतुलन बिगडने नहीं दिया जाता, तो प्रतीत होता है कि जितना सोचा गया था- उससे आधी-चौथाई भी उसकी वास्तविक भयानकता नहीं थी। *"संकटों" के साथ गुथने का जैसे-जैसे अभ्यास होता जाता है, वैसे-वैसे वे स्वाभाविक दैनिक कार्यों की तरह सरल प्रतीत होने लगते हैं।*
👉 अपने लिये साँप और शेर बहुत भयंकर होते हैं, पर बहुत से लोगों का धंधा ही उन्हें पकड़ना-मारना है। *सपेरे रोज ही काले विशाल "नाग" पकड़ते हैं, शिकारी आये दिन शेर-बाघ का शिकार करते हैं। उन्हें वे जरा भी डरावने नहीं लगते वरन् उन्हें ढूँढ़ते रहते हैं और मिल जाने पर प्रसन्न होते हैं।* जबकि अजनबी व्यक्ति को साँप, शेर की तस्वीर देखने और चर्चा सुनने भर से पसीना छूटता है।
👉 *"अँधेरे" में घुसने में डर लगता है। "सुनसान" में प्रवेश करते हुए पैर काँपते हैं। मन में तरह-तरह की आशंकाएँ उठती है कि उस अँधेरे-सुनसान में न जाने क्या विपत्ति होगी?* शेर, साँप, बिच्छू, भूत आदि की कितनी आशंकाएँ सामने आती हैं और दिल धड़कने लगता है। पर जब उसमें निधड़क प्रवेश किया जाता है- दीपक लेकर देखा जाता है तो प्रतीत होता है कि वहाँ डरने जैसा कुछ भी नहीं था। *मन की दुर्बलता ही है, जो जरा-सा आधार मिलते ही तिल का ताड बनाती है। काल्पनिक भय गढ़ कर उन्हें इस तरह चित्रित करती है मानो प्राणघाती-सर्वनाशी संकट आ गया।* अब बचना कठिन है। जबकि वस्तुतः जरा-सा कारण ही वहाँ रहा होता है और वह भी इतना छोटा कि उसके साथ आसानी से निपटा जा सके।
👉 *दुनिया में लाखों करोड़ों लोग अँधेरे में रहते और आते-जाते हैं।* वन्य प्रदेशों में यदा-कदा ही दीपक का प्रयोग होता है। किसान खेतों पर सोते हैं और रात को रखवाली करते हैं। *छोटी झोंपड़ियाँ बनाकर सघन जंगलों में लोग परिवारों समेत रहते हैं।* धनी लोग सघन बस्ती से हटकर खुले बंगलों में रहते हैं। चोर, डाकू, साँप, बिच्छू, शेर, बाघ, भूत-पलीत कहाँ, किसको खाते है ? *यदा-कदा तो दुर्घटनाएँ दिन दहाड़े बीच बाजार में भी हो सकती है। संकट के वास्तविक अवसर कम ही आते हैं।* अधिकतर तो लोग काल्पनिक संकट गढ़ते हैं और अपने बनाये उस खिलौने को देख-देखकर डरते-मरते रहते हैं।
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सतत् सुमिरन

एक ऋषि लोटा रोज मांजते थे,एक शिष्य ने उनसे कहा कि गुरुवर लोटे को रोज माँजने की क्या जरूरत है सप्ताह में एक बार माँज लिया करें..
ऋषि ने कहा बात तो सही है और फिर उसके बाद उन्होंने उसे नहीं माँजा उस लोटे की चमक फीकी पड़ने लगी सप्ताह बाद ऋषि ने शिष्य से कहा कि लोटे को साफ कर दो शिष्य लोटे को काफी देर माँजने के बाद भी पहले वाली चमक नही ला सका तब और काफी देर माँजा तब वह कुछ चमका
ऋषि ने कहा- लोटे से सीखो.....
"जब तक इसे रोज माँजा जाता रहा यह रोज चमकता रहा इसी तरह भक्त होता है यदि वह रोज सुमिरन न करे तो सांसारिक विकारों से अपनी चमक खो देता है ,इसलिए भक्त को रोज अपने प्रभु को सुमिरन करना होता है अगर एक दिन भी सिमरन छूटा तो भक्ति की चमक फीकी पड़ जाएगी..🙏🏻
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कहानी का समय

*सलाह के तीन टुकड़े*

आदमी अपने भीतर के रडार, जो कि उसका दिल है, के माध्यम से चीजों को चुनता या अपने निर्णय लेता है।

एक बार एक युवा नवविवाहित दंपत्ति दूर एक छोटे से खेत में रहते थे। वे गरीब थे और उन दोनों के पास अपनी आजीविका कमाने का कोई साधन नहीं था।

एक दिन उस नवविवाहित पुरुष ने उस खेत को छोड़ कर कहीं दूर जाकर नौकरी खोजने की सोची।

उसने अपनी पत्नी से कहा- "प्रिय, मैं पैसे कमाने के लिए कहीं दूर जाना चाहता हूँ और मैं वादा करता हूँ कि वहाँ से बहुत सारा पैसा कमा के लौटूंगा, ताकि हम उन सभी सुख-सुविधाओं के साथ रह सकें, जिनके हम हकदार हैं। मुझे नहीं पता कि मैं कब तक आऊँगा, लेकिन कृपया मेरी प्रतीक्षा करना और मेरे प्रति वफादार रहना और मैं भी आपके प्रति वफादार रहूँगा।"

अब, वह युवक काम की तलाश में दूर-दूर के कई गाँवों और शहरों में जाता है। तब एक गाँव में उसे एक सेठ मिलता है जो काम के लिए एक मेहनती व्यक्ति की तलाश में था। वह युवा उस सेठ के साथ काम करने की इच्छा ज़ाहिर करता है और वह सेठ भी आसानी से उसे अपने पास काम करने के लिए रख लेता है। हालाँकि, अपना काम शुरू करने से पहले, वह युवा अपनी कुछ शर्तें रखता है, "जब तक मैं चाहूँगा, तभी तक मैं काम करूँगा और जब भी मुझे लगेगा कि मुझे घर जाना है, तो कृपया मुझे मेरे कर्तव्यों से मुक्त कर दें। मैं अपने काम के समय के दौरान कोई वेतन नहीं लूँगा। जब तक मैं आपके पास काम करता हूँ, मेरे वेतन को आप अपने पास सम्भाल कर रखें। जिस दिन मैं जाऊँगा, कृपया उस दिन आप मेरे सारे पैसे मुझे सौंप देना।”

सेठ उस युवक की सभी शर्तों से सहमत हो गया। युवक ने लगन से काम करना शुरू कर दिया। बीस वर्षों के लंबे समय के बाद, एक दिन वही युवक अपने सेठ के पास आया और कहा, “श्रीमान, मैं अब यहाँ से जाना चाहता हूँ। मुझे अब घर लौटना है। क्या मुझे मेरी मजदूरी मिल सकती है?"

सेठ ने उत्तर दिया, "बिल्कुल, लेकिन तुम्हारे जाने से पहले मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। मैं या तो तुम्हें जितने साल तुमने काम किया है, उतने सालों की मजदूरी दे कर तुम्हें भेज सकता हूँ, या फिर तुम्हें तुम्हारे जीवन के लिए तीन सलाह दे कर बिना पैसे के तुम्हें भेज सकता हूँ। इनमें से तुम्हें क्या चाहिए ये चुनाव तुम्हें करना है।"

उस व्यक्ति ने सोचने के लिए कुछ समय मांगा। उसने दो दिनों तक बहुत विचार किया और अपने वेतन की जगह तीन सलाहों को चुना।

सेठ ने उसे याद दिलाया कि अगर वह सलाह मांगेगा तो उसे कोई पैसा नहीं मिलेगा।

आदमी ने जवाब दिया- “मैंने आपके साथ बहुत समय तक काम किया है। आपके साथ काम करते हुए मैंने बहुत कुछ सीखा है और नई-नई चीजों में कौशलता हासिल की है। यह अनुभव मुझे जीवन में आगे ले जाएगा और इसलिए मुझे केवल तीन सलाह चाहिए।"

तब सेठ ने उसे तीन सलाहें दीं :
1. अपने जीवन में कभी भी अनुचित रास्ता या शोर्ट्कट न अपनाएँ। ऐसे रास्ते आपकी जान भी ले सकते हैं।

2. कभी भी किसी वस्तु के लिए ज्यादा व्याकुल या अधीर न हों, क्योंकि बुरी चीजों के प्रति ऐसी अधीरता घातक हो सकती है।

3. क्रोध या दर्द के क्षणों में कभी भी निर्णय न लें क्योंकि यह आपको ग़लत निर्णय की ओर ले जा सकता है और फिर अपनी गलती पर पश्चाताप करना पड़ सकता है।"

इसके बाद मालिक ने उसे तीन रोटियाँ थमा दीं और कहा- “तुम्हारे पास तीन रोटियाँ हैं। तुम अपनी यात्रा के दौरान इनमें से दो का सेवन कर सकते हो और आखरी रोटी को घर पहुँचने तक अपने पास रखना और अपनी पत्नी के साथ साझा कर के खाना।"

उस व्यक्ति ने अपने सेठ को धन्यवाद दिया और बहुत सालों के बाद अपनी पत्नी से मिलने के लिए अपनी यात्रा शुरू की।

अपनी यात्रा के पहले दिन, वह एक बूढ़े व्यक्ति से मिलता है जो उसका अभिवादन करता है और पूछता है, "तुम कहाँ जा रहे हो?" जिस पर वह व्यक्ति जवाब देता है, "मैं जहाँ जा रहा हूँ वहाँ पहुँचने के लिए 20 दिनों तक चलने की जरूरत है।" इसके लिए बूढ़ा व्यक्ति उस व्यक्ति को एक छोटा रास्ता अपनाने की सलाह देता है और कहता है, "ये रास्ता अपनाने से तुम अपनी मंजिल तक सिर्फ पाँच दिनों में ही पहुँच जाओगे।"

वह व्यक्ति जल्द से जल्द अपने घर पहुँचना चाहता था इसलिए वह छोटा रास्ता अपनाने के बारे में सोचने लगा, लेकिन तभी उसे अपने सेठ की पहली सलाह याद आ गई। उसने सेठ की सलाह का पालन करते हुए लंबे रास्ते पर चल कर घर पहुँचना चुना।

कुछ दिनों बाद उसे पता चला कि लुटेरे लोगों को छोटा रास्ता अपनाने के लिए बरगलाया करते हैं और जब यात्री छोटा रास्ता अपना कर आगे बढ़ता है तो उन पर घात लगाकर हमला करते हैं और उनका सारा सामान लूट लेते हैं।
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उस व्यक्ति ने सोचा कि सेठ की पहली सलाह ने उसे एक विपत्ति से बचा लिया। कुछ और दिन इसी तरह से यात्रा करने के बाद, वह सड़क के किनारे एक सराय में रुक गया और अंधेरा होने के कारण उसने पूरी रात वहीं आराम करने के बारे में सोचा। वह हाथ पैर धोकर बिस्तर पर सोने के लिए चला गया। लेकिन कुछ ही समय के बाद वह एक भयानक चीख सुन कर जाग गया। वह दरवाजा खोल कर बाहर जाने ही वाला था, तभी उसे सेठ की सलाह का दूसरा भाग याद आया और वह वापस अपने बिस्तर पर जाकर सो गया।

अगले दिन सुबह उसने सराय के मालिक को इस घटना के बारे में बताया तो उसने बहुत ही चौंकाने वाला जवाब दिया। सराय के मालिक ने कहा, "आप भाग्यशाली हैं कि आप ने अन्य मेहमानों की तरह उत्सुकता में आकर दरवाज़ा नहीं खोला। और इसलिए आप जीवित भी हैं। हमने सुना है कि रात के समय एक राक्षस राहगीरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए चिल्लाता है और जब जिज्ञासु मेहमान बाहर आकर देखते हैं तो वह उन्हें खींच कर, जंगल में ले जा कर मार डालता है।"

उस व्यक्ति ने भगवान को धन्यवाद दिया और सोचा कि सेठ की दूसरी सलाह के कारण आज मैं जिंदा हूँ।

उस व्यक्ति ने अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए फिर से अपनी यात्रा प्रारंभ कर दी। कुछ दिनों तक चलने के बाद आखिरकार अब वह अपने घर के बहुत करीब पहुँच गया था। जैसे ही वह अपने घर के पास आया उसने खिड़की से देखा कि उसकी पत्नी अकेली नहीं थी और उसके साथ एक आदमी था जिसके बालों को वह धीरे से सहला रही थी। उस व्यक्ति का हृदय क्रोध और बदले की भावना से भर गया और उस के मन में उन दोनों को मारने के विचार आने लगे।

लेकिन तभी उसको अपने सेठ की दी हुई तीसरी और अंतिम सलाह याद आती है और वह एक गहरी सांस के साथ खुद को सांत्वना देता है, और सोचता है कि वह इस घटना पर शान्ति से बैठ कर विचार करेगा। वह उस रात पास की झाड़ी में ही सो जाता है।

सुबह होने पर जब वह शांत मन से उस घटना पर विचार करता, तो इस निर्णय पर पहुँचता है कि वह अपनी पत्नी और उसके प्रेमी को नहीं मारेगा। वह वापस अपने सेठ के पास चला जाएगा और जीवन भर वहीं काम करेगा। उसने सोचा कि जाने से पहले उसे एक बार अपनी पत्नी से मिलकर उसे बताना चाहिए कि इतने सालों में वह उसके प्रति कितना वफादार रहा है।

उस व्यक्ति ने दरवाज़े पर पहुँच कर दस्तक दी। जब पत्नी ने दरवाज़ा खोला तो अपने पति को सामने देखकर बहुत उत्साहित हो गई और खुशी से उसकी आँखों से आंसु बहने लगे। जब उसकी पत्नी उसे खुशी से गले लगाती है तो वह व्यक्ति उसे दूर धकेल देता है और उस व्यक्ति की आँखें आसुओं से भर जाती हैं। वह पूछता है, "वह आदमी कौन है जिसके साथ तुम कल रात थीं ?" वह जवाब देती है- "वह आपका बेटा है। जब आप चले गए थे, तब मुझे पता चला कि मैं गर्भवती हूँ। अब आपका बेटा बीस साल का हो गया है।"

यह सुनकर वह व्यक्ति रोने लगा और उसने अपने सेठ को सही सलाह देने के लिए मन ही मन अपने हृदय से धन्यवाद दिया। फिर उस व्यक्ति ने अपने बेटे को गले लगा लिया।

उन सब ने बैठ कर बहुत सारी बातें कीं, अपने अनुभवों को एक दूसरे के साथ साझा किया। अंत में उस व्यक्ति ने अपने सेठ की तीन सलाह के बारे में भी बताया। फिर उसने आखरी रोटी को मेज पर रख दिया और कहा, "यह सब मैंने पिछले बीस वर्षों में कमाया है।"

फिर रात के खाने के समय सबने मिलकर ईश्वर से प्रार्थना की और तीनों मिलकर उस आखिरी रोटी को खाने लगे। पत्नी ने जैसे ही रोटी का आखरी टुकड़ा तोड़ा तो पाया कि उसमें सोने के सिक्के थे जो उसकी बीस साल की कमाई से कहीं अधिक थे। यह सब उस व्यक्ति की सच्चाई, ईश्वर में विश्वास, व कड़ी मेहनत का ही फल था।

दिल की सुनें और इसे अपना आंतरिक मार्गदर्शक बनने दें। दिल हमेशा सच बताएगा और सही मार्गदर्शन करेगा।

*" हृदय एक पवित्र स्थान है, और यह हमें विशाल आंतरिक ब्रह्मांड का द्वार, आश्चर्य और ज्ञान का रास्ता दिखाता है। हृदय के ज्ञान के माध्यम से, हम सरलता और आनंद से जी सकते हैं।"
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'सबहि मानप्रद आपु अमानी'

अर्थात् संत सभीको मान देनेवाले और स्वयं अमानी—मान पानेकी इच्छासे रहित होते हैं। इसी तरह साधकको भी मानीपन दूर करनेके लिये सदा दूसरोंको मान, आदर, सत्कार, बड़ाई आदि देनेका स्वभाव बनाना चाहिये। ऐसा स्वभाव तभी बन सकता है, जब वह दूसरोंको किसी-न-किसी दृष्टिसे अपनेसे श्रेष्ठ माने। यह नियम है कि प्रत्येक मनुष्य भिन्न-भिन्न स्थितिवाला होते हुए भी कोई-न-कोई विशेषता रखता ही है। यह विशेषता वर्ण, आश्रम, गुण, विद्या, बुद्धि, योग्यता, पद, अधिकार आदि किसी भी कारण से हो सकती है। अत: साधकको चाहिये कि वह दूसरोंकी विशेषताकी तरफ दृष्टि रखकर उनका सदा सम्मान करे। इस प्रकार दूसरोंको मान देनेका भीतरसे स्वभाव बन जानेसे स्वयं मान पानेकी इच्छाका स्वत: अभाव होता चला जाता है। हाँ, दूसरोंको मान देते समय साधकका उद्देश्य अपनेमें मानीपन मिटानेका होना चाहिये, बदलेमें दूसरोंसे मान पानेका नहीं।
।। श्रीहनुमद्गीतम् ।।

विनुतदैवते विश्वसद्गुरो
हनुमदाख्य भो हन्त ते नमः।
मनुजतां गते प्रेमतः सदा
जनुरलङ्कलं जायतां ध्रुवम्।।

विमलगौतमीवारिमज्जनैः
सुमतिभिः सदा सेवितं भजे।
विमलचेतसा वायुनन्दनं
कमललोचनं कामितार्थदम्।।

रघुपतिप्रियं राक्षसाप्रियं
त्वघविदारकं स्वाङ्घ्रिसेविनाम्।
जगदधीश्वरं जानकीहितं
नगवराहरं नौमि सादरम्।।

वटतरोरधोऽवस्थितं हरिं
कटकपूर्वकाकल्पभूषणम्।
शठकुठारकं शङ्करं सतां
भटतमं हरिं भावयाम्यहम्।।

कविवरेण सत्कृष्टनामिना
सुतपसाञ्जना स्थापितं किल।
क्षितिसुधाशिनां क्षेमदं सदा
गतिसुतं स्तुवे गेयचर्यकम्।।

वनधिलङ्घनावाप्तसद्यशाः
कनकदीधिते कामिते दिशाम्।
सुनयने सुरेशार्चकादृशे
हनुमदाख्य मे हे मरुत्सुतम्।।

कपिगणाधिपं कल्पपादपं
स्वपदसेविनां सन्ततं सताम्।
विपणिभूतपैर्वन्दितं सुराधि-
पतिभिर्भजे धीकृतेऽनिलम्।।

भीम मध्व मे भो त्वदागमे
रमणमञ्जसा रामतुष्टिदम्।
श्रमनिवारकं शान्तिदायकं
त्वमनुसेवितुस्त्वां दिशेरज।।

सोन्नमित्यभिधोपेतग्रामसंस्थहनूमतः।
इमां साङ्कर्षिणीं गीतां पठन् कामितमाप्नुयात्।।

।। श्रीहनुमते नमः ।।
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संकष्ट चतुर्थी, तिलकुटा चतुर्थी

साल भर में 12 संकष्टी चतुर्थी व्रत आते हैं। इनमें से कुछ चतुर्थी साल की सबसे बड़ी चौथ में से एक हैं, उनमें से एक है सकट चौथ व्रत। सकट चौथ भगवान गणेश के सबसे महत्वपूर्ण पर्व में से एक है। हर साल माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन सकट चौथ का त्योहार मनाया जाता है।
सकट चौथ व्रत की महिमा से संतान की सभी चिंताएं दूर हो जाएंगी। भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। सकट चौथ वर्ष की शुरुआत में पड़ता है, इसलिए जो लोग इस दिन व्रत रखते हैं। उन्हें पूरे वर्ष अनंत सुख, धन, सफलता और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

संकष्ट चतुर्थी की तिथि

17 जनवरी 2025, शुक्रवार को सकट चौथ है। इसे संकष्टी चतुर्थी, सकट चौथ, तिलकुट चौथ, माघी चौथ, लंबोदर संकष्टी, तिलकुट चतुर्थी और संकटा चौथ आदि नामों से भी जाना जाता है।

माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आरंभ: 17 जनवरी 2025, प्रातः 4 बजकर 06 मिनट पर
माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि समाप्त: 18 जनवरी 2025, प्रातः 5 बजकर 30 मिनट पर

संकष्टी चतुर्थी का महत्व

संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन की पूजा से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, और घर में सुख-शांति का वातावरण बनता है। इस व्रत को रखने से न केवल संकटों से मुक्ति मिलती है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन को सुख, शांति और समृद्धि से भर देता है।

चंद्रोदय और अर्घ्य देने का समय
आज चंद्रोदय का समय 8 बजकर 48 मिनट पर है (हृषिकेश पंचांग के अनुसार) अर्थात् इसके बाद अर्घ्य दे सकते हैं

संकष्ट चौथ व्रत क्यों किया जाता है?

सकट चौथ का दिन भगवान गणेश और सकट माता को समर्पित है। इस दिन माताएं अपने पुत्रों के कल्याण की कामना से व्रत रखती हैं। सकट चौथ के दिन भगवान गणेश की पूरे विधि विधान से पूजा की जाती है। इस पूरे दिन व्रत रखा जाता है।
रात्रि में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। यही कारण है कि सकट चौथ पर चंद्रमा दर्शन और पूजन का विशेष महत्व होता है। इस दिन गणपति जी को पूजा में तिल के लड्डू या मिठाई अर्पित करते हैं, साथ में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत पारण करते हैं।


संकष्ट चौथ की पूजा विधि

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत हो जाएं।
इसके बाद सकट चौथ व्रत रखने का संकल्प करें।
एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी और सकट माता की प्रतिमा की स्थापना करें।
सिंदूर का तिलक लगाएं। घी का दीपक जलाएं।
भगवान गणेश की प्रतिमा पर फूल, फल और मिठाइयां अर्पित करें।
पूजा में तिलकुट का भोग जरूर शामिल करें।
गणेश चालीसा का पाठ करें। अंत में बप्पा की आरती करें।
शंखनाद से पूजा पूर्ण करें।
प्रसाद खाकर अपने व्रत का पारण करें।
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अक्सर दूसरे की पतंग काटने के चक्कर में ही अपनी पतंग कट जाती है। मनुष्य का जीवन भी पतंग के समान ही है। वह भी दूसरे का बुरा करने में अपना बुरा कर लेता है। और जब कभी वह आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ छूने लगता है, तो मोह, अहंकार, लालच और अतृप्तिरूपी पतंगें उसे काटने लग जाती है। इन बुरी पतंगों से अपने-आपको बचाना बड़ा कठिन है। जितनी ऊँचाई बढ़ जाती है, उतना यह खतरा बढ़ जाता है। कई पतंगें ऊँचाई तो प्राप्त कर लेती है, पर उस ऊँचाई पर रह नहीं पाती और किसी अन्य, दोषरूपी पतंग से अपने-आपको कटवा लेती हैं
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कहानी का समय

*जीवन कहानी*

एक बड़ा सुन्दर शहर था, उसका राजा बड़ा उदार और धर्मात्मा था। प्रजा को प्राणों के समान प्यार करता और उनकी भलाई के लिए बड़ी बड़ी सुन्दर राज व्यवस्थाएं करता। उसने एक कानून प्रचलित किया कि अमुक अपराध करने पर देश निकाले की सजा मिलेगी। कानून तोड़ने वाले अनेक दुष्टात्मा राज्य से निकाल बाहर किये गये, राज्य में सर्वत्र सुख शान्ति का साम्राज्य था।

एक बार किसी प्रकार वही जुर्म राजा से बन पड़ा। बुराई करते तो कर गया पर पीछे उसे बहुत दुःख हुआ। राजा था सच्चा, अपने पाप को वह छिपा भी सकता था पर उसने ऐसा किया नहीं।

दूसरे दिन बहुत दुखी होता हुआ वह राज दरबार में उपस्थित हुआ और सबके सामने अपना अपराध कह सुनाया। साथ ही यह भी कहा मैं अपराधी हूँ इसलिए मुझे दण्ड मिलना चाहिए। दरबार के सभासद ऐसे धर्मात्मा राजा को अलग होने देना नहीं चाहते थे फिर भी राजा अपनी बात पर दृढ़ रहा उसने कड़े शब्दों में कहा राज्य के कानून को मैं ही नहीं मानूँगा तो प्रजा उसे किस प्रकार पालन करेगी? मुझे देश निकाला होना ही चाहिये।

निदान यह तय करना पड़ा कि राजा को निर्वासित किया जाय। अब प्रश्न उपस्थित हुआ कि नया राजा कौन हो? उस देश में प्रजा में से ही किसी व्यक्ति को राजा बनाने की प्रथा थी। जब तक नया राजा न चुन लिया जाय तब तक उसी पुराने राजा को कार्य भार सँभाले रहने के लिए विवश किया गया। उसे यह बात माननी पड़ी।

उस जमाने में आज की तरह वोट पड़कर चुनाव नहीं होते थे। तब वे लोग इस बात को जानते ही न हों सो बात न थी। वे अच्छी तरह जानते थे कि यह प्रथा उपहासास्पद है। लालच, धौंस, और झूठे प्रचार के बल पर कोई नालायक भी चुना जा सकता है। इसलिए उपयुक्त व्यक्ति की कसौटी उनके सद्गुण थे। जो अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करता था वही अधिकारी समझा जाता था।

उस देश का राजा जैसा धर्मात्मा था वैसा ही प्रधान मन्त्री बुद्धिमान था। उसने नया राजा चुनने की तिथि नियुक्त की। और घोषणा की कि अमुक तिथि को दिन के दस बजे जो सबसे पहले राजमहल में जाकर महाराज से भेंट करेगा वही राजा बना दिया जायेगा। राजमहल एक पथरीली पहाड़ी पर शहर से जरा एकाध मील हठ कर जरूर था पर उसके सब दरवाजे खोल दिये गये थे भीतर जाने की कोई रोक टोक न थी। राजा के बैठने की जगह भी खुले आम थी और वह मुनादी करके सबको बता दी गई थी।

राजा के चुनाव से एक दो दिन पहले प्रधान मन्त्री ने शहर खाली करवाया और उसे बड़ी अच्छी तरह सजाया। सभी सुखोपभोग की सामग्री जगह जगह उपस्थिति कर दी। उन्हें लेने की सबको छुट्टी थी किसी से कोई कीमत नहीं ली जाती। कहीं मेवे मिठाइयों के भण्डार खुले हुए थे तो कहीं खेल, तमाशे हो रहे थे कहीं आराम के लिए मुलायम पलंग बिछे हुए थे तो कहीं सुन्दर वस्त्र, आभूषण मुफ्त मिल रहे थे। कोमलाँगी तरुणियाँ सेवा सुश्रूषा के लिए मौजूद थीं जगह -जगह नौकर दूध और शर्बत के गिलास लिये हुए खड़े थे। इत्रों के छिड़काव और चन्दन के पंखे बहार दे रहे थे। शहर का हर एक गली कूचा ऐसा सज रहा था मानो कोई राजमहल हो।

चुनाव के दिन सबेरे से ही राजमहल खोल दिया गया और उस सजे हुए शहर में प्रवेश करने की आज्ञा दे दी गई। नगर से बाहर खड़े हुए प्रजाजन भीतर घुसे तो वे हक्के-बक्के रह गये। मुफ्त का चन्दन सब कोई घिसने लगा। किसी ने मिठाई के भण्डार पर आसन बिछाया तो कोई सिनेमा की कुर्सियों पर जम बैठा, कोई बढ़िया बढ़िया कपड़े पहनने लगा तो किसी ने गहने पसन्द करने शुरू किये। कई तो सुन्दरियों के गले में हाथ डालकर नाचने लगे सब लोग अपनी अपनी रुचि के अनुसार सुख सामग्री का उपयोग करने लगे।

एक दिन पहले ही सब प्रजाजनों को बता दिया गया था कि राजा से मिलने का ठीक समय 10 बजे है। इसके बाद पहुँचने वाला राज का अधिकारी न हो सकेगा। शहर सजावट चन्द रोजा है, वह कल समय बाद हटा दी जायेगी एक भी आदमी ऐसा नहीं बचा था जिसे यह बातें दुहरा दुहरा कर सुना न दी गई हों, सबने कान खोलकर सुन लिया था।

शहर की सस्ती सुख सामग्री ने सब का मन ललचा लिया उसे छोड़ने को किसी का जी नहीं चाहता था। राज मिलने की बात को लोग उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे। कोई सोचता था दूसरों को चलने दो मैं उनसे आगे दौड़ जाऊँगा, कोई ऊंघ रहे थे अभी तो काफी वक्त पड़ा है, किसी का ख्याल था सामने की चीजों को ले लो, राज न मिला तो यह भी हाथ से जाएंगी, कोई तो राज मिलने की बात का मजाक उड़ाने लगे कि यह गप्प तो इसलिये उड़ाई गई है कि हम लोग सामने वाले सुखों को न भोग सकें। एक दो ने हिम्मत बाँधी और राजमहल की ओर चले भी पर थोड़ा ही आगे बढ़ने पर महल का पथरीला रास्ता और शहर के मनोहर दृश्य उनके स्वयं बाधक बन गये बेचारे उल्टे पाँव जहाँ के तहाँ लौट आये। सारा नगर उस मौज बहार में व्यस्त हो रहा था।
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दस बज गये पर हजारों लाखों प्रजाजनों में से कोई वहाँ न पहुँचा। बेचारा राजा दरबार लगाये एक अकेला बैठा हुआ था। प्रधान मन्त्री मन ही मन खुश हो रहा था कि उसकी चाल कैसी सफल हुई। जब कोई न आया तो लाचार उसी राजा को पुनः राज भार सँभालना पड़ा।

यह कहानी काल्पनिक है *परन्तु मनुष्य जीवन में यह बिल्कुल सच उतरती है। ईश्वर को प्राप्त करने पर हम राज्य मुक्ति अक्षय आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। उसके पाने की अवधि भी नियत हैं मनुष्य जन्म समाप्त होने पर यह अवसर हाथ से चला जाता है। संसार के मौज तमाशे थोड़े समय के हैं यह कुछ काल बाद छिन जाते हैं। सब किसी ने यह घोषणा सुन रखी है कि संसार के भोग नश्वर हैं, ईश्वर की प्राप्ति में सच्चा सुख है, प्रभु की प्राप्ति का अवसर मनुष्य जन्म में रहने तक ही है। परन्तु हममें से कितने हैं जो इस घोषणा को याद रख कर नश्वर माया के लालच में नहीं डूबे रहते?*

*अवसर चला जा रहा है। हम माया के भुलावे में फँस कर तुच्छ वस्तुओं को समेट रहे हैं और अक्षय सुख की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते। हमारे इस व्यवहार को देखकर प्रधान मन्त्री शैतान मन ही मन खुश हो रहा है कि मेरी चाल कैसी सफल हो रही है। यह कहानी हमारे जीवन का एक कथा चित्र है।

*सर्वे भवन्तु सुखिनः*
*सर्वे सन्तु निरामयाः।*
*सर्वे भद्राणि पश्यन्तु*
*मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत।।*
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कहानी का समय

सन्तों की शरण

एक गाँव में एक ठाकुर थे। उनके कुटुम्ब में कोई आदमी नहीं बचा, केवल एक लड़का रह गया। वह एक ठाकुर के घर काम करने लग गया। रोजाना सुबह वह बछड़े चराने जाता था और लौटकर आता तो रोटी खा लेता था। ऐसे समय बीतता गया। एक दिन दोपहर के समय वह बछड़े चराकर आया तो ठाकुर की नौकरानी ने उसको ठण्डी रोटी खाने के लिये दे दी। उसने कहा कि थोड़ी-सी छाछ या राबड़ी मिल जाय तो ठीक है। नौकरानी ने कहा कि जा-जा, तेरे लिये बनायी है राबड़ी! जा, ऐसे ही खा ले, नहीं तो तेरी मरजी ! उस लड़के के मन में गुस्सा आया कि मैं धूप में बछड़े चराकर आया हूँ, भूखा हूँ, पर मेरे को बाजरे की रूखी रोटी दे दी, राबड़ी माँगी तो तिरस्कार कर दिया! वह भूखा ही वहाँ से चला गया। गाँव के पास में एक शहर था। उस शहर में सन्तों की एक मण्डली आयी हुई थी। वह लड़का वहाँ चला गया। सन्तों ने उसको भोजन कराया और पूछा कि तेरे परिवार में कौन है ? उसने कहा कि कोई नहीं है तो सन्तों ने कहा कि तू साधु बन जा। लड़का साधु बन गया। फिर वह पढ़ने के लिये काशी चला गया। वहाँ पढ़कर वह विद्वान् हो गया। फिर समय पाकर वह मण्डलेश्वर (महन्त) बन गया। मण्डलेश्वर बनने के बाद एक दिन उनको उसी शहर में आने का निमन्त्रण मिला। वे अपनी मण्डली को लेकर वहाँ आये। जिनके यहाँ वे बचपन में काम करते थे, वे ठाकुर बूढ़े हो गये थे। ठाकुर उनके पास गये, उनका सत्संग किया और प्रार्थना की कि महाराज! एक बार हमारी कुटिया में पधारो, जिससे हमारी कुटिया पवित्र हो जाय ! मण्डलेश्वरजी ने उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया! मण्डलेश्वरजी अपनी मण्डली के साथ ठाकुर के घर पधारे। भोजन के लिये पंक्ति बैठी। गीता के पन्द्रहवें अध्याय का पाठ हुआ। फिर सबने भोजन करना आरम्भ किया। महाराज के सामने तख्ता लगा हुआ था और उस पर तरह-तरह के भोजन के पदार्थ रखे हुए थे। अब ठाकुर महाराज के पास आये। साथ में नौकर था, जिसके हाथ में हलवे का पात्र था। ठाकुर प्रार्थना करने लगे कि 'महाराज! कृपा करके थोड़ा सा हलवा मेरे हाथ से ले लो!' महाराज को हँसी आ गयी। ठाकुर ने पूछा कि 'आप हँसे कैसे ?' महाराज बोले कि 'मेरे को पुरानी बात याद आ गयी, इसलिये हँसा।' ठाकुर बोले कि 'बताओ, वह बात क्या है ?' महाराज ने सब सन्तों से कहा कि 'भाई, थोड़ा ठहर जाओ, बैठे रहो, ठाकुर बात पूछते हैं तो बताता हूँ।' महाराज ने ठाकुर से पूछा कि आपके कुटुम्ब में वह परिवार रहता था, उस परिवार में अब कोई है क्या ? ठाकुर बोले कि केवल एक लड़का था। उसने कई दिन बछड़े चराये, फिर न जाने कहाँ चला गया! बहुत दिन हो गये, फिर कभी उसको देखा नहीं। महाराज बोले कि वही मैं हूँ! पास में सन्त-मण्डली ठहरी हुई थी, मैं वहाँ चला गया। पीछे काशी चला गया, वहाँ पढ़ाई की और फिर मण्डलेश्वर बन गया। यही वह आँगन है, जहाँ आपकी नौकरानी ने मेरे को थोड़ी-सी राबड़ी देने से भी मना कर दिया था। अब मैं भी वही हूँ, आँगन भी वही है और आप भी वही हैं, पर अब आप अपने हाथ से मोहनभोग दे रहे हो कि महाराज, कृपा करके थोड़ा मेरे हाथ से ले लो!
माँगे मिले न राबड़ी, करूँ कहाँ लगि वरण।
मोहनभोग गले में अटक्या, आ सन्तों की शरण ॥
सन्तों की शरण लेनेमात्र से इतना हो गया कि जहाँ राबड़ी नहीं मिलती थी, वहाँ मोहनभोग भी गले में अटक रहा है! अगर कोई भगवान की शरण ले ले तो वह सन्तों का भी आदरणीय हो जाय। लखपति- करोड़पति बनने में सब स्वतन्त्र नहीं हैं, पर भगवान्‌ के शरण होने में, भगवान्‌ का भक्त बनने में सब-के-सब स्वतन्त्र हैं और ऐसा मौका इस मनुष्यजन्म में ही है।
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*।श्रीनारायण का ध्यान ।*
*ॐ श्री विष्णुवै नंमः*

*ॐ सत्यरूपं सत्यसन्धं,* *सत्यनारायणम् हरिम्।*
*यत्सत्यत्वेन जगतस्तं सत्यं त्वां नमाम्यहम्।।*

*भावार्थ:-हे सत्य स्वरूप, सत्य के अनुसंधान से प्राप्त होने वाले सत्य नारायण, हरि, मैं आपको नमस्कार करता हूं, जो जगत का प्रथम और अंतिम सत्य हैं,,!*
*ॐ सशंखचक्रं सकिरीट कुंडलं,*
*सपीतवस्त्रम् सरसीरूहे रक्षणम्।*
*सहारवक्ष:स्थल कौस्तुभम् श्रियम्*
*नमामि विष्णु शिरसा चतुर्भुजम्।।*
*अर्थात:-जो शंख चक्र धारण किए हैं। सुन्दर मुकुट कुण्डल पीले वस्त्र धारण किए हैं जिनके कमल जैसे सुन्दर नेत्र हैं। जिनके वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि और भगवती श्रीदेवी लक्ष्मी जिनके ह्रदय कमल में है। उन भगवान विष्णु को हम नमस्कार करते हैं..!!*

ॐ श्री विष्णुवै नंमः.!

*प्रभु समरथ सर्बग्य सिव,*
*सकल कला गुन धाम,।*
*जोग ग्यान बैराग्य निधि,*
*प्रनत कलपतरु नाम,,।।*

*भावार्थ -: हे प्रभो,,आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं, सब कलाओं और गुणों के निधान हैं, और योग, ज्ञान तथा वैराग्य के भंडार हैं, आपका नाम शरणागतों के लिए कल्पवृक्ष है,मै आपको शाश्वत प्रणांम करता हूँ..!!*

*श्री नरायण हरि,!!*
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मौनी अमावस्या (29/01/25)

*क्या है महत्व*

माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहते हैं। इस दिन को माघ अमावस्या और दर्श अमावस्या के नाम से भी बुलाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार मौनी अमावस्या पर संगम पर देवताओं का आगमन होता है इसलिए इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस मास को भी कार्तिक माह के समान पुण्य मास कहा गया है। इसी महात्म्य के चलते गंगा तट पर भक्त जन एक मास तक कुटी बनाकर कल्पवास करते हैं।

इस तिथि को मौनी अमावस्या के नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि ये मौन अमवस्या है और इस व्रत को करने वाले को पूरे दिन मौन व्रत का पालन करना होता है। इसलिए यह योग पर आधारित व्रत कहलाता है। शास्त्रों में वर्णित भी है कि होंठों से ईश्वर का जाप करने से जितना पुण्य मिलता है, उससे कई गुणा अधिक पुण्य मन का मनका फेरकर हरि का नाम लेने से मिलता है। इसी तिथि को संतों की भांति चुप रहें तो उत्तम है। अगर संभव नहीं हो तो अपने मुख से कोई भी कटु शब्द न निकालें।

मौनी अमावस्या तिथि
माघ अमावस्या तिथि आरंभ: 28 जनवरी, सायंकाल 07:10 से 
माघ अमावस्या तिथि समाप्त: 29 जनवरी, सायंकाल 06: 28 पर 
उदयातिथि के अनुसार  29 जनवरी को माघी या मौनी अमावस्या मानी जाएगी। 

*क्यों है संगम स्नान का महत्व..........*

संगम में स्नान के महत्व को बताते हुए एक प्राचीन कथा का उल्लेख किया जाता है। ये कथा सागर मंथन से जुड़ी है। इसके अनुसार जब सागर मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए उस समय देवताओं एवं असुरों में अमृत कलश के लिए खींचा-तानी शुरू हो गयी।

इस छीना छपटी में अमृत कलश से कुछ बूंदें छलक गईं और प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में जा कर गिरी। यही कारण है कि ऐसा विश्वास किया जाता है कि इन स्थानों की नदियों में स्नान करने पर अमृत स्नान का पुण्य प्राप्त होता है।

प्रयाग में जब भी कुंभ होता है तो पूरी दुनिया से ही नहीं बल्कि समस्त लोकों से लोग संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाने आते हैं। इनमें देवता ही नहीं ब्रह्मा, विष्णु व महेश यानि त्रिदेव भी शामिल हैं। ये सभी रूप बदल कर इस स्थान पर आते हैं। त्रिदेवों के बारे में प्रसिद्ध है कि वे पक्षी रूप में प्रयाग आते हैं। इसलिए इस दिन पक्षियों को चुग्गा विशेष रूप से दिया जाता है।

शास्त्रों में कहा गया है सतयुग में जो पुण्य तप से मिलता है, द्वापर में हरि भक्ति से, त्रेता में ज्ञान से, कलियुग में दान से, लेकिन माघ मास में संगम स्नान हर युग में अनंत पुण्यदायी होगा। इस तिथि को स्नान के पश्चात अपने सामर्थ्य अनुसार अन्न, वस्त्र, धन, गौ, भूमि, तथा स्वर्ण जो भी आपकी इच्छा हो दान देना चाहिए, उसमें भी इस दिन तिल दान को सर्वोत्तम कहा गया है।
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इस तिथि को भगवान विष्णु और शिव जी दोनों की पूजा का विधान है। इस दिन पीपल में अर्घ्य देकर परिक्रमा करें और दीप दान दें। इस दिन जिनके लिए व्रत करना संभव नहीं हो वह मीठा भोजन करें।
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*मंगलवार व्रत*

*भगवान हनुमान का आशीर्वाद पाने के लिए अगर आप मंगलवार का व्रत करने के बारे में सोच रहे हैं तो आपको इन नियमों के बारे में जान लेना चाहिए।*

*हिंदू धर्म में मंगलवार के दिन का विशेष महत्व होता है। ये दिन भगवान हनुमान जी को समर्पित किया गया है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति मंगलवार के दिन भगवान हनुमान का व्रत कर उनकी पूजा अर्चना करता है उस पर भगवान अपनी कृपा सदैव बनाए रखते हैं और उसके सभी दुख-परेशानियों का नाश करते हैं।*

*ऐसे में अगर आप भी मंगलवार का व्रत करने के बारे में सोच रहे हैं तो आपको इस व्रत को शुरू करने से पहले इससे जुड़े कुछ जरूरी नियमों के बारे में जान लेना चाहिए। इन नियमों को जानने के बाद इन्हें अपनाकर ही आपको हनुमान जी का व्रत शुरू करना चाहिए। ऐसे में चलिए जान लेते हैं कि मंगलवार के व्रत के लिए आपको किन-किन नियमों का पालन करना होगा।*

*मंगलवार व्रत के नियम*

* मंगलवार का व्रत करते समय शरीर की शुद्धि करने से पहले मन को शुद्ध करें, क्योंकि ये व्रत पूरी तरह से ब्रह्मचर्य होना चाहिए। इसलिए मन में किसी प्रकार की द्वेष या हीन भावना उत्पन्न न होने दें।

* इस दिन मंदिर में जाकर हनुमान जी की पूजा-अर्चना शुरू करें और उन्हें चोला अर्पित करें।

* हिंदू धर्म में बंदर को भगवान हनुमान का रूप माना जाता है, इसलिए मंगलवार के व्रत में बंदर को कुछ न कुछ जरूर खिलाएं। इससे हनुमानजी जल्दी प्रसन्न होंगे।

* मंगलवार के दिन हनुमान जी के नाम का जाप करने से पहले श्री राम के नाम का जाप करें। ऐसा माना जाता है कि जहां राम होते हैं वहां हनुमान जरूर होते हैं। इसलिए अगर आप मंगलवार व्रत के दौरान रामजी का नाम लेते हैं तो भगवान हनुमान भी इससे प्रसन्न होकर आप पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखेंगे।

* मंगलवार के व्रत में दिन में केवल एक बार भोजन करना चाहिए। इसमें भी आपको नमक, मिर्च मसाले, मांस आदि का सेवन नहीं करना है।

* मंगलवार का व्रत करते समय भगवा रंग के वस्त्र जरूर पहनें। हनुमान जी को ये रंग अति प्रिय है।

* इस व्रत में हनुमान चालीसा का पाठ करना बिल्कुल न भूलें।

* हनुमान जी के व्रत में बूंदी का प्रसाद अवश्य चढ़ाएं।

*मंगलवार को करें इन मंत्रों का जाप*

* ॐ तेजसे नम:।

* ॐ रूवीर्य समुद्भवाय नम:।

* ॐ प्रसन्नात्मने नम:।

* ॐ शूराय नम:।

* ॐ शान्ताय नम:।

* ॐ मारुतात्मजाय नमः।
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*गाठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह।*
*आगे हाथ न बानियां, लेना होय सो लेह।*

*अर्थ:* जो गांठ में बांध रखा है, उसे हाथ में ला, और जो हाथ में हो उसे परोपकार में लगा।नर शरीर के पश्चात इत्तर खानियों में बाजार _ व्यापारी कोई नहीं है, लेना है सो यहीं ले_लो।
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कहानी का समय

इंसानियत

एक सज्जन रेलवे स्टेशन पर बैठे गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का आकर बोला~ ‘‘साहब! बूट पॉलिश ?’’

उसकी दयनीय सूरत देखकर उन्होंने अपने जूते आगे बढ़ा दिये, बोले- ‘‘लो, पर ठीक से चमकाना।’’

लड़के ने काम तो शुरू किया परंतु अन्य पॉलिशवालों की तरह उसमें स्फूर्ति नहीं थी।

वे बोले~ ‘‘कैसे ढीले-ढीले काम करते हो? जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ !’’

वह लड़का मौन रहा।

इतने में दूसरा लड़का आया। उसने इस लड़के को तुरंत अलग कर दिया और स्वयं फटाफट काम में जुट गया। पहले वाला गूँगे की तरह एक ओर खड़ा रहा। दूसरे ने जूते चमका दिये।

‘पैसे किसे देने हैं?’ इस पर विचार करते हुए उन्होंने जेब में हाथ डाला। उन्हें लगा कि ‘अब इन दोनों में पैसों के लिए झगड़ा या मारपीट होगी।’

फिर उन्होंने सोचा, ‘जिसने काम किया, उसे ही दाम मिलना चाहिए।’ इसलिए उन्होंने बाद में आनेवाले लड़के को पैसे दे दिये।

उसने पैसे ले तो लिये परंतु पहले वाले लड़के की हथेली पर रख दिये। प्रेम से उसकी पीठ थपथपायी और चल दिया।

वह आदमी विस्मित नेत्रों से देखता रहा। उसने लड़के को तुरंत वापस बुलाया और पूछा~ ‘‘यह क्या चक्कर है?’’

लड़का बोला~ ‘‘साहब! यह तीन महीने पहले चलती ट्रेन से गिर गया था। हाथ-पैर में बहुत चोटें आयी थीं। ईश्वर की कृपा से बेचारा बच गया नहीं तो इसकी वृद्धा माँ और बहनों का क्या होता,बहुत स्वाभिमानी है... भीख नहीं मांग सकता....!’’

फिर थोड़ा रुककर वह बोला ~ ‘‘साहब! यहाँ जूते पॉलिश करनेवालों का हमारा समूह है और उसमें एक देवता जैसे हम सबके प्यारे चाचाजी हैं जिन्हें सब ‘सत्संगी चाचाजी’ कहकर पुकारते हैं।

वे सत्संग में जाते हैं और हमें भी सत्संग की बातें बताते रहते हैं। उन्होंने ही ये सुझाव रखा कि ‘साथियो! अब यह पहले की तरह स्फूर्ति से काम नहीं कर सकता तो क्या हुआ?

ईश्वर ने हम सबको अपने साथी के प्रति सक्रिय हित, त्याग-भावना, स्नेह, सहानुभूति और एकत्व का भाव प्रकट करने का एक अवसर दिया है।

जैसे पीठ, पेट, चेहरा, हाथ, पैर भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी हैं एक ही शरीर के अंग, ऐसे ही हम सभी शरीर से भिन्न-भिन्न दिखाई देते हुए भी हैं एक ही आत्मा! हम सब एक हैं।

स्टेशन पर रहने वाले हम सब साथियों ने मिलकर तय किया कि हम अपनी एक जोड़ी जूते पॉलिश करने की आय प्रतिदिन इसे दिया करेंगे और जरूरत पड़ने पर इसके काम में सहायता भी करेंगे।’’

जूते पॉलिश करनेवालों के दल में आपसी प्रेम, सहयोग, एकता तथा मानवता की ऐसी ऊँचाई देखकर वे सज्जन चकित रह गये औऱ खुशी से उसकी पीठ थपथपाई...औऱ सोंचने लगे शायद इंसानियत अभी तक जिंदा है.....!!
*।। जय सियाराम जी।।*
*।। ॐ नमः शिवाय।।*
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