॥ शिव मृत्युञ्जय स्तोत्र ॥*रत्नसानुशरासनं रजताद्रिश्रृंगनिकेतनं
शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम्।
क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवंदितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥1॥
पंचपादपपुष्पगन्धिपदाम्बुजद्वयशोभितं
भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम्।
भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशिनं भवमव्ययं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥2॥
मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं
पंकजासनपद्मलोचनपूजितांगघ्रिसरोरुहम्।
देवसिद्धतरंगिणी करसिक्तशीतजटाधरं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥3॥
कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वरकुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम्।
अंधकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥4॥
यक्षराजसखं भगाक्षिहरं भुजंगविभूषणं
शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम्।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥5॥
भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञविनाशिनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम्।
भुक्तिमुक्तिफलप्रदं निखिलाघसंघनिबर्हणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥6॥
भक्तवत्सलमर्चतां निधिमक्षयं हरिदम्बरं
सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनूपमम्।
भूमिवारिनभोहुताशनसोमपालितस्वाकृतिं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥7॥
विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमथ प्रपंचमशेषलोकनिवासिनम्।
क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमाव्रतं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥8॥
रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥9॥
कालकण्ठं कलामूर्तिं कालाग्निं कालनाशनम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥10॥
नीलकण्ठं विरुपाक्षं निर्मलं निरूपद्रवम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥11॥
वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥12॥
देवदेवं जगन्नाथं देवेशमृषभध्वजम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥13॥
अनन्तमव्ययं शान्तमक्षमालाधरं हरम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥14॥
आनन्दं परमं नित्यं कैवल्यपदकारणम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥15॥
स्वर्गापवर्गदातारं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥16॥
*
॥ इति श्रीपद्मपुराणान्तर्गत उत्तरखण्डे श्रीमृत्युञ्जयस्तोत्रं सम्पूर्णम्। ॥**शिव जी के मंत्र*
*शिव मूल मंत्र-* *
ॐ नमः शिवाय॥**भगवान शिव का गायत्री मंत्र-* *
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥**महामृत्युंजय मंत्र-* *
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् | उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ||**शिव जी का ध्यान मंत्र-* *
करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा। श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधं। विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व। जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥**रुद्र मंत्र-* *
ॐ नमो भगवते रुद्राये।।*👍6
असली शराब
हम उस परमात्मा को नमस्कार करते हैं जो नितान्त शान्त है तथा कुछ भी प्राप्त करने का प्रयास नहीं करता, जो पूर्णतया स्वतन्त्र है तथा अपने में सम्पूर्ण है, जो मायोत्पन्न गुणात्मक जगत के कार्यों में आसक्त नहीं होता। वे परमात्मा संसार में अपनी लीला करने में वायु की तरह गतिशील हैं।
संस्कृत शब्द है- शराब। शृ (हिंसार्थे) + अच्= शर, मारक वस्तु वा पदार्थ। अप् शब्द जल वाचक + जस्= अपः नीचे की ओर जाने वाला सबके भीतर प्रवेश करने वाला, रिक्त स्थान की पूर्ति करने वाला द्रव विशेष, पानी।
【शर+ अपः =शरापः= शराब (प्→ब्,
१→३ सूत्र से)】
शराब का अर्थ है, वह जल जो किसी को मारे, नष्ट करे, खण्ड-खण्ड करे, नष्ट करे। शराब के भीतर जो गुण वा वस्तु अन्तर्निहित है, उसका नाम है-नशा नश् (नश्यति / नाशयति क्विप् ,क + टाप् = नशा, जो नाश वा नष्ट करता है, अन्तर्धान वा लुप्त करता है तथा स्वयं उड़ जाता है अदृश्य रहता है, उसे नशा नाम दिया गया है। शराब में नशा होती है। जिसमें नशा हो, वह सब शराब है। हर वस्तु में नशा प्रच्छन्न रूप में रहती है। व्यापक होने से यह विष्णु है। अस्मै विष्णवे नमः ।
अन्न ब्रह्म है। अन्न में नशा है। अन्न को सड़ाकर शराब बनायी जाती है। अन्न के विकिण्वन से बनी हुई शराब मद उत्पन्न करने से मदिरा कही जाती है। जो खाया जाय वह अन्न है। फल भी अन्न है। अंगूर/ द्राक्षादि फलों से शराब बनती है। जातक भी शराब है। यौवन प्राप्त होने पर इसमें नशा का प्रादुर्भाव होता है। तरुण, तरुणी के देह की शराब पीता है तो युवती, युवक के शरीर की नशा में धुत्त रहती है। इस प्रकार सर्वत्र नशा का साम्राज्य है। शब्द की नशा कान से स्पर्श की नशा त्वचा से रूप की नशा आँख से, रस की नशा जिहा से, गन्ध की नशा नाक से ग्राह्य है। किन्तु इन पाँचों की नशा एक साथ मन से ग्राह्य है। मन तो कभी अशक्त होता ही नहीं, ज्ञानेन्द्रियाँ अशक्त होती हैं। अतएव यह मन सदैव नशा करता रहता है। मन से स्त्री और पुरुष एक दूसरे को पीते हैं, चाहते हैं। दोनों एक दूसरे के लिये शराब हैं। शराब ही शराबी को पीती है, शराबी तो शराब को पीता ही है।
शराब के शुभ और अशुभ दो प्रभाव हैं। जिस शराब के पीने से विवेक का नाश हो, वह त्याज्य है। जिसके पीने से कुविचारों का नाश हो, वह ग्राह्य है। पार्थिव शराब में ये दोनों गुण हैं। अल्पमात्रा में यह शुभ तथा अधिक मात्रा में पीने से अशुभ प्रभाववाली कही गई है। जो अपार्थिव शराब है, उसका प्रभाव शुभ ही शुभ है। जितना अधिक पिया जाय, उतना ही शुभ है। राम नाम ही यह दिव्य शराब है। प्रारंभ में इसे कान एवं जिहा से पिया जाता है। आगे चलकर इसे मन से पीते रहना चाहिये।
हम उस परमात्मा को नमस्कार करते हैं जो नितान्त शान्त है तथा कुछ भी प्राप्त करने का प्रयास नहीं करता, जो पूर्णतया स्वतन्त्र है तथा अपने में सम्पूर्ण है, जो मायोत्पन्न गुणात्मक जगत के कार्यों में आसक्त नहीं होता। वे परमात्मा संसार में अपनी लीला करने में वायु की तरह गतिशील हैं।
संस्कृत शब्द है- शराब। शृ (हिंसार्थे) + अच्= शर, मारक वस्तु वा पदार्थ। अप् शब्द जल वाचक + जस्= अपः नीचे की ओर जाने वाला सबके भीतर प्रवेश करने वाला, रिक्त स्थान की पूर्ति करने वाला द्रव विशेष, पानी।
【शर+ अपः =शरापः= शराब (प्→ब्,
१→३ सूत्र से)】
शराब का अर्थ है, वह जल जो किसी को मारे, नष्ट करे, खण्ड-खण्ड करे, नष्ट करे। शराब के भीतर जो गुण वा वस्तु अन्तर्निहित है, उसका नाम है-नशा नश् (नश्यति / नाशयति क्विप् ,क + टाप् = नशा, जो नाश वा नष्ट करता है, अन्तर्धान वा लुप्त करता है तथा स्वयं उड़ जाता है अदृश्य रहता है, उसे नशा नाम दिया गया है। शराब में नशा होती है। जिसमें नशा हो, वह सब शराब है। हर वस्तु में नशा प्रच्छन्न रूप में रहती है। व्यापक होने से यह विष्णु है। अस्मै विष्णवे नमः ।
अन्न ब्रह्म है। अन्न में नशा है। अन्न को सड़ाकर शराब बनायी जाती है। अन्न के विकिण्वन से बनी हुई शराब मद उत्पन्न करने से मदिरा कही जाती है। जो खाया जाय वह अन्न है। फल भी अन्न है। अंगूर/ द्राक्षादि फलों से शराब बनती है। जातक भी शराब है। यौवन प्राप्त होने पर इसमें नशा का प्रादुर्भाव होता है। तरुण, तरुणी के देह की शराब पीता है तो युवती, युवक के शरीर की नशा में धुत्त रहती है। इस प्रकार सर्वत्र नशा का साम्राज्य है। शब्द की नशा कान से स्पर्श की नशा त्वचा से रूप की नशा आँख से, रस की नशा जिहा से, गन्ध की नशा नाक से ग्राह्य है। किन्तु इन पाँचों की नशा एक साथ मन से ग्राह्य है। मन तो कभी अशक्त होता ही नहीं, ज्ञानेन्द्रियाँ अशक्त होती हैं। अतएव यह मन सदैव नशा करता रहता है। मन से स्त्री और पुरुष एक दूसरे को पीते हैं, चाहते हैं। दोनों एक दूसरे के लिये शराब हैं। शराब ही शराबी को पीती है, शराबी तो शराब को पीता ही है।
शराब के शुभ और अशुभ दो प्रभाव हैं। जिस शराब के पीने से विवेक का नाश हो, वह त्याज्य है। जिसके पीने से कुविचारों का नाश हो, वह ग्राह्य है। पार्थिव शराब में ये दोनों गुण हैं। अल्पमात्रा में यह शुभ तथा अधिक मात्रा में पीने से अशुभ प्रभाववाली कही गई है। जो अपार्थिव शराब है, उसका प्रभाव शुभ ही शुभ है। जितना अधिक पिया जाय, उतना ही शुभ है। राम नाम ही यह दिव्य शराब है। प्रारंभ में इसे कान एवं जिहा से पिया जाता है। आगे चलकर इसे मन से पीते रहना चाहिये।
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|| जगज्ज्येष्ठं श्रेष्ठं सुरपतिकनिष्ठं क्रतुपतिं
बलिष्ठं भूयिष्ठं त्रिभुवनवरिष्ठं वरवहम् |
स्वनिष्ठं धर्मिष्ठं गुरुगुणगरिष्ठं गुरुवरं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकन्दं भजत रे ||
जो संसारमें सबसे बड़ा है, श्रेष्ठ है, सुरराज इन्द्रका अनुज {वामन} है, यज्ञपति है, बलिष्ठ है, भूयिष्ठ है, त्रिभुवनमें सर्वश्रेष्ठ है, वरदायक है, आत्मनिष्ठ है, धर्मिष्ठ है, महान् गुणोंसे गौरवयुक्त है, गुरुवर है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर |
हरिःशरणम् ! हरिःशरणम् !
बलिष्ठं भूयिष्ठं त्रिभुवनवरिष्ठं वरवहम् |
स्वनिष्ठं धर्मिष्ठं गुरुगुणगरिष्ठं गुरुवरं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकन्दं भजत रे ||
जो संसारमें सबसे बड़ा है, श्रेष्ठ है, सुरराज इन्द्रका अनुज {वामन} है, यज्ञपति है, बलिष्ठ है, भूयिष्ठ है, त्रिभुवनमें सर्वश्रेष्ठ है, वरदायक है, आत्मनिष्ठ है, धर्मिष्ठ है, महान् गुणोंसे गौरवयुक्त है, गुरुवर है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर |
हरिःशरणम् ! हरिःशरणम् !
❤4
*कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय।*
*तब कुल काको लाजि है, चारीपांव का होय।*
*अर्थ:* कुल की मर्यादा के मोह में पड़कर जीव पतित हो गया अन्यथा यह तो हंस स्वरूप था, किन्तु उसे भूलकर अधोगति में पड़ गया। उस समय का तनिक ध्यान करो जब चार पैरों वाला पशु बनकर आना होगा। तब कुल की मान मर्यादा क्या होगी?
*।। ॐ नमः शिवाय।।*
*तब कुल काको लाजि है, चारीपांव का होय।*
*अर्थ:* कुल की मर्यादा के मोह में पड़कर जीव पतित हो गया अन्यथा यह तो हंस स्वरूप था, किन्तु उसे भूलकर अधोगति में पड़ गया। उस समय का तनिक ध्यान करो जब चार पैरों वाला पशु बनकर आना होगा। तब कुल की मान मर्यादा क्या होगी?
*।। ॐ नमः शिवाय।।*
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🕉️"चित्त का स्तर"
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प्रत्येक साधक की कुछ दिन ध्यान साधना करने के बाद यह जानने की इच्छा होती हैं की मेरी कुछ ‘आध्यात्मिक प्रगति’ हुई या नही क्या मैं साधना के नाम पर "भुस में लठ" तो नहीं मार रहा, इस बात से प्रेरित हो कर आप को इस पोस्ट के माध्यम से अवगत करने की कोशिश कर रहा हूँ! ‘आध्यात्मिक प्रगति’ को नापने का मापदंड है , आपका अपना चित्त ! आपका अपना चित्त कितना शुद्ध और पवित्र हुआ है , वही आपकी आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता हैं ! अब आपको भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति जानने की इच्छा हैं, तो आप भी इन निम्नलिखित चित्त के स्तर से अपनी स्वयं की आध्यात्मिक स्थिति को जान सकते हैं | बस अपने ‘चित्त का प्रामाणिकता’ के साथ ही ‘अवलोकन’ करें यह अत्यंत आवश्यक हैं !
(1) दूषित चित्त👉 चित्त का सबसे निचला स्तर हैं , दूषित चित्त ! इस स्तर पर साधक सभी के दोष ही खोजते रहता हैं ! दूसरा , सदैव सबका बुरा कैसे किया जाए सदैव इसी का विचार करते रहता है ! दूसरों की प्रगति से सदैव ‘ईर्ष्या’ करते रहता हैं ! नित्य नए-नए उपाय खोजते रहता हैं की किस उपाय से हम दुसरे को नुकसान पहुँचा सकते हैं ! सदैव नकारात्मक बातों से , नकारात्मक घटनाओं से , नकारात्मक व्यक्तिओं से यह ‘चित्त’ सदैव भरा ही रहता हैं !
(2) भूतकाल में खोया चित्त👉 एक चित्त एसा होता हैं , वः सदैव भूतकाल में ही खोया हुआ होता हैं ! वह सदैव भूतकाल के व्यक्ति और भूतकाल की घटनाओं में ही लिप्त रहता हैं ! जो भूतकाल की घटनाओं में रहने का इतना आधी हो जाता हैं की उसे भूतकाल में रहने में आनंद का अनुभव होता हैं !
(3) नकारात्मक चित्त👉 इस प्रकार का चित्त सदैव बुरी संभावनाओं से ही भरा रहता हैं ! सदैव कुछ-न-कुछ बुरा ही होगा यह वह चित्त चित्तवाला मनुष्य सोचते रहता हैं ! यह अति भूतकाल में रहने के कारण होता हैं क्योंकि अति भूतकाल में रहने से वर्त्तमान काल खराब हो जाता हैं !
(4) सामान्य चित्त👉 यह चित्त एक सामान्य प्रकृत्ति का होता हैं ! इस चित्त में अच्छे , बुरे , दोनों ही प्रकार के विचार आते हैं ! यह जब अच्छी संगत में होता हैं , तो इसे अच्छे विचार आते हैं और जब यह बुरी संगत में रहता हैं तब उसे बुरे विचार आते हैं ! यानी इस चित्त के अपने कोई विचार नहीं होते ! जैसी अन्य चित्त की संगत मिलती हैं , वैसे ही उसे विचार आते हैं ! वास्तव में वैचारिक प्रदुषण के कारण नकारात्मक विचारों के प्रभाव में ही यह ‘सामान्य चित्त’ आता हैं !
(5) निर्विचार चित्त👉 साधक जब कुछ ‘साल’ तक ध्यान साधना करता हैं , तब यह निर्विचार चित्त की स्थिति साधक को प्राप्त होती है ! यानी उसे अच्छे भी विचार नहीं आते और बुरे भी विचार नहीं आते ! उसे कोई भी विचार ही नहीं आते ! वर्त्तमान की किसी परिस्थितिवश अगर चित्त कहीं गया तो भी वह क्षणिकभर ही होता हैं ! जिस प्रकार से बरसात के दिनों में एक पानी का बबुला एक क्षण ही रहता हैं , बाद में फुट जाता हैं , वैसे ही इनका चित्त कहीं भी गया तो एक क्षण के लिए जाता हैं , बाद में फिर अपने स्थान पर आ जाता हैं ! यह आध्यात्मिक स्थिति की ‘प्रथम पादान’ हैं होती हैं क्योकि फिर कुछ साल तक अगर इसी स्थिति में रहता हैं तो चित्त का सशक्तिकरण होना प्रारंभ हो जाता हैं और साधक एक सशक्त चित्त का धनि हो जाता हैं !
(6) दुर्भावनारहित चित्त👉 चित्त के सशक्तिकरण के साथ-साथ चित्त में निर्मलता आ जाती हैं ! और बाद में चित्त इतना निर्मल और पवित्र हो जाता हैं कि चित्त में किसी के भी प्रति बुरा भाव ही नहीं आता हैं , चाहे सामनेवाला का व्यवहार उसके प्रति कैसा भी हो ! यह चित्त की एक अच्छी दशा होती हैं !
(7) सद्भावना भरा चित्त👉 ऐसा चित्त बहुत ही कम लोगों को प्राप्त होता हैं ! इनके चित्त में सदैव विश्व के सभी प्राणिमात्र के लिए सदैव सद्भावना ही भरी रहती हैं ! ऐसे चित्तवाले मनुष्य ‘संत प्रकृत्ति’ के होते हैं वे सदैव सभी के लिए अच्छा , भला ही सोचते हैं ! ये सदैव अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं ! इनका चित्त कहीं भी जाता ही नहीं हैं ! ये साधना में लीन रहते हैं !
(8) शून्य चित्त👉 यह चित्त की सर्वोत्तम दशा हैं ! इस स्थिति में चित्त को एक शून्यता प्राप्त हो जाती हैं ! यह चित्त एक पाइप जैसा होता हैं , जिसमें साक्षात परमात्मा का ‘चैतन्य’ सदैव बहते ही रहता हैं ! परमात्मा की ‘करूणा की शक्ति’ सदैव ऐसे शून्य चित्त से बहते ही रहती हैं ! यह चित्त कल्याणकारी होता हैं !यह चित्त किसी भी कारण से किसी के भी ऊपर आ जाए तो भी उसका कल्याण हो जाता हैं ! इसीलिए ऐसे चित्त को कल्याणकारी चित्त कहते हैं ! ऐसे चित्त से कल्याणकारी शक्तियाँ सदैव बहते ही रहती हैं | यह चित्त जो भी संकल्प करता हैं , वह पूर्ण हो जाता हैं ! यह सदैव सबके मंगल के ही कामनाएँ करता हैं ! मंगलमय प्रकाश ऐसे चित्त से सदैव निरंतर निकलते ही रहता हैं !
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प्रत्येक साधक की कुछ दिन ध्यान साधना करने के बाद यह जानने की इच्छा होती हैं की मेरी कुछ ‘आध्यात्मिक प्रगति’ हुई या नही क्या मैं साधना के नाम पर "भुस में लठ" तो नहीं मार रहा, इस बात से प्रेरित हो कर आप को इस पोस्ट के माध्यम से अवगत करने की कोशिश कर रहा हूँ! ‘आध्यात्मिक प्रगति’ को नापने का मापदंड है , आपका अपना चित्त ! आपका अपना चित्त कितना शुद्ध और पवित्र हुआ है , वही आपकी आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता हैं ! अब आपको भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति जानने की इच्छा हैं, तो आप भी इन निम्नलिखित चित्त के स्तर से अपनी स्वयं की आध्यात्मिक स्थिति को जान सकते हैं | बस अपने ‘चित्त का प्रामाणिकता’ के साथ ही ‘अवलोकन’ करें यह अत्यंत आवश्यक हैं !
(1) दूषित चित्त👉 चित्त का सबसे निचला स्तर हैं , दूषित चित्त ! इस स्तर पर साधक सभी के दोष ही खोजते रहता हैं ! दूसरा , सदैव सबका बुरा कैसे किया जाए सदैव इसी का विचार करते रहता है ! दूसरों की प्रगति से सदैव ‘ईर्ष्या’ करते रहता हैं ! नित्य नए-नए उपाय खोजते रहता हैं की किस उपाय से हम दुसरे को नुकसान पहुँचा सकते हैं ! सदैव नकारात्मक बातों से , नकारात्मक घटनाओं से , नकारात्मक व्यक्तिओं से यह ‘चित्त’ सदैव भरा ही रहता हैं !
(2) भूतकाल में खोया चित्त👉 एक चित्त एसा होता हैं , वः सदैव भूतकाल में ही खोया हुआ होता हैं ! वह सदैव भूतकाल के व्यक्ति और भूतकाल की घटनाओं में ही लिप्त रहता हैं ! जो भूतकाल की घटनाओं में रहने का इतना आधी हो जाता हैं की उसे भूतकाल में रहने में आनंद का अनुभव होता हैं !
(3) नकारात्मक चित्त👉 इस प्रकार का चित्त सदैव बुरी संभावनाओं से ही भरा रहता हैं ! सदैव कुछ-न-कुछ बुरा ही होगा यह वह चित्त चित्तवाला मनुष्य सोचते रहता हैं ! यह अति भूतकाल में रहने के कारण होता हैं क्योंकि अति भूतकाल में रहने से वर्त्तमान काल खराब हो जाता हैं !
(4) सामान्य चित्त👉 यह चित्त एक सामान्य प्रकृत्ति का होता हैं ! इस चित्त में अच्छे , बुरे , दोनों ही प्रकार के विचार आते हैं ! यह जब अच्छी संगत में होता हैं , तो इसे अच्छे विचार आते हैं और जब यह बुरी संगत में रहता हैं तब उसे बुरे विचार आते हैं ! यानी इस चित्त के अपने कोई विचार नहीं होते ! जैसी अन्य चित्त की संगत मिलती हैं , वैसे ही उसे विचार आते हैं ! वास्तव में वैचारिक प्रदुषण के कारण नकारात्मक विचारों के प्रभाव में ही यह ‘सामान्य चित्त’ आता हैं !
(5) निर्विचार चित्त👉 साधक जब कुछ ‘साल’ तक ध्यान साधना करता हैं , तब यह निर्विचार चित्त की स्थिति साधक को प्राप्त होती है ! यानी उसे अच्छे भी विचार नहीं आते और बुरे भी विचार नहीं आते ! उसे कोई भी विचार ही नहीं आते ! वर्त्तमान की किसी परिस्थितिवश अगर चित्त कहीं गया तो भी वह क्षणिकभर ही होता हैं ! जिस प्रकार से बरसात के दिनों में एक पानी का बबुला एक क्षण ही रहता हैं , बाद में फुट जाता हैं , वैसे ही इनका चित्त कहीं भी गया तो एक क्षण के लिए जाता हैं , बाद में फिर अपने स्थान पर आ जाता हैं ! यह आध्यात्मिक स्थिति की ‘प्रथम पादान’ हैं होती हैं क्योकि फिर कुछ साल तक अगर इसी स्थिति में रहता हैं तो चित्त का सशक्तिकरण होना प्रारंभ हो जाता हैं और साधक एक सशक्त चित्त का धनि हो जाता हैं !
(6) दुर्भावनारहित चित्त👉 चित्त के सशक्तिकरण के साथ-साथ चित्त में निर्मलता आ जाती हैं ! और बाद में चित्त इतना निर्मल और पवित्र हो जाता हैं कि चित्त में किसी के भी प्रति बुरा भाव ही नहीं आता हैं , चाहे सामनेवाला का व्यवहार उसके प्रति कैसा भी हो ! यह चित्त की एक अच्छी दशा होती हैं !
(7) सद्भावना भरा चित्त👉 ऐसा चित्त बहुत ही कम लोगों को प्राप्त होता हैं ! इनके चित्त में सदैव विश्व के सभी प्राणिमात्र के लिए सदैव सद्भावना ही भरी रहती हैं ! ऐसे चित्तवाले मनुष्य ‘संत प्रकृत्ति’ के होते हैं वे सदैव सभी के लिए अच्छा , भला ही सोचते हैं ! ये सदैव अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं ! इनका चित्त कहीं भी जाता ही नहीं हैं ! ये साधना में लीन रहते हैं !
(8) शून्य चित्त👉 यह चित्त की सर्वोत्तम दशा हैं ! इस स्थिति में चित्त को एक शून्यता प्राप्त हो जाती हैं ! यह चित्त एक पाइप जैसा होता हैं , जिसमें साक्षात परमात्मा का ‘चैतन्य’ सदैव बहते ही रहता हैं ! परमात्मा की ‘करूणा की शक्ति’ सदैव ऐसे शून्य चित्त से बहते ही रहती हैं ! यह चित्त कल्याणकारी होता हैं !यह चित्त किसी भी कारण से किसी के भी ऊपर आ जाए तो भी उसका कल्याण हो जाता हैं ! इसीलिए ऐसे चित्त को कल्याणकारी चित्त कहते हैं ! ऐसे चित्त से कल्याणकारी शक्तियाँ सदैव बहते ही रहती हैं | यह चित्त जो भी संकल्प करता हैं , वह पूर्ण हो जाता हैं ! यह सदैव सबके मंगल के ही कामनाएँ करता हैं ! मंगलमय प्रकाश ऐसे चित्त से सदैव निरंतर निकलते ही रहता हैं !
अब आप अपना स्वयं का ‘अवलोकन’ करें और जानें की आपकी आध्यात्मिक स्थिति कैसी हैं ! आत्मा की पवित्रता का और चित्त हा बड़ा ही निकट का संबंध होता हैं ! अब तो यह समझ लो की ‘चित्तरूपी धन’ लेकर हम जन्मे हैं और जीवनभर हमारे आसपास सभी ‘चित्तचोर’ जो चित्त को दूषित करने वाले ही रहते हैं , उनके बीच रहकर भी हमें अपने चित्तरूपी धन को संभालना हैं ! अब कैसे , वह आप ही जाने !!!
इसी तरह अनेक श्रेष्ठजनों हमारे चित्त का अवकलन करके इसे अलग अलग अवस्थाओं में बाटा है जैसे कृष्ण ने भक्तो और योगिजनो की अलग अलग अवस्थाए बताई है उसी तरह महावीर ने श्रमणजनो के 14 गुणस्थान और अलग अलग चित्त के प्रकार भी बताए हैं और ऐसे ही बुद्ध ने भी ध्यानियों के चित्त के अवस्था के अनुसार उनके प्रकार को बताया है
इन सब के बारे में विस्तार से जानने के लिये आप अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें और उसके अनुसार स्वयं का सही अवकलन करें.।
इसी तरह अनेक श्रेष्ठजनों हमारे चित्त का अवकलन करके इसे अलग अलग अवस्थाओं में बाटा है जैसे कृष्ण ने भक्तो और योगिजनो की अलग अलग अवस्थाए बताई है उसी तरह महावीर ने श्रमणजनो के 14 गुणस्थान और अलग अलग चित्त के प्रकार भी बताए हैं और ऐसे ही बुद्ध ने भी ध्यानियों के चित्त के अवस्था के अनुसार उनके प्रकार को बताया है
इन सब के बारे में विस्तार से जानने के लिये आप अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें और उसके अनुसार स्वयं का सही अवकलन करें.।
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मानव जीवन के चार पुरुषार्थ <-
1 धर्म -
सात प्रकार की शुद्धि होने पर धर्म की सिद्धि होती है - देशशुद्धि , कालशुद्धि , मन्त्रशुद्धि . देहशुद्धि ,
विचार शुद्धि , इन्द्रियशुद्धि , द्रव्यशुद्धि।
2. अर्थ -
पाँच साधनो से अर्थ की प्राप्ति होती है - माता पिता के आशीर्वाद, गुरुकृपा, उद्यम, प्रारब्ध, प्रभुकृपा ।
3. काम -
काम इन्द्रियों में बसता है अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ , पाँच
कर्मेन्द्रियाँ एवं मन, इन ग्यारह ठिकानों में काम बसा हुआ है, काम जीव मात्र को रुलाता है, काम मन में से जाता नहीं है, यही विघ्नरुप है, काम मन में आँखों से प्रवेश
करता है इसलिए आँखों से भगवान की दिव्य झाँकी का दर्शन करना चाहिए--
"हमारे ध्यान में आओ, प्रभु आँखों में बस जाओ।
अँधेरे दिल में आकर के, प्रभु ज्योति जगा देना।।
4.मोक्ष --
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतियं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और व्यवहार - ये आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।
इन प्रकृतियों को जो बस में कर लेता है उसे मोक्ष मिलता है, जो अष्टधा प्रकृति के बंधन से मुक्त होता है वह कृतार्थ होता है ।
प्रकृति का अर्थ है -- "स्वभाव" अनेक जन्मों के संस्कार मन में संचित रहते हैं बडे़ बडे़ ऋषि भी प्रकृति (स्वभाव )
को बस मे नहीं रख सके, अतः बन्धन में पड़े हैं।
इन अष्टधा प्रकृतियों के बस में जो वह जीव , जो इन्हें
बस में कर ले वह ईश्वर, श्रवण, कीर्तन आदि भक्ति जिसकी सिद्ध हो गयी वह ईश्वर का हो जाता है।
1 धर्म -
सात प्रकार की शुद्धि होने पर धर्म की सिद्धि होती है - देशशुद्धि , कालशुद्धि , मन्त्रशुद्धि . देहशुद्धि ,
विचार शुद्धि , इन्द्रियशुद्धि , द्रव्यशुद्धि।
2. अर्थ -
पाँच साधनो से अर्थ की प्राप्ति होती है - माता पिता के आशीर्वाद, गुरुकृपा, उद्यम, प्रारब्ध, प्रभुकृपा ।
3. काम -
काम इन्द्रियों में बसता है अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ , पाँच
कर्मेन्द्रियाँ एवं मन, इन ग्यारह ठिकानों में काम बसा हुआ है, काम जीव मात्र को रुलाता है, काम मन में से जाता नहीं है, यही विघ्नरुप है, काम मन में आँखों से प्रवेश
करता है इसलिए आँखों से भगवान की दिव्य झाँकी का दर्शन करना चाहिए--
"हमारे ध्यान में आओ, प्रभु आँखों में बस जाओ।
अँधेरे दिल में आकर के, प्रभु ज्योति जगा देना।।
4.मोक्ष --
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतियं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और व्यवहार - ये आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।
इन प्रकृतियों को जो बस में कर लेता है उसे मोक्ष मिलता है, जो अष्टधा प्रकृति के बंधन से मुक्त होता है वह कृतार्थ होता है ।
प्रकृति का अर्थ है -- "स्वभाव" अनेक जन्मों के संस्कार मन में संचित रहते हैं बडे़ बडे़ ऋषि भी प्रकृति (स्वभाव )
को बस मे नहीं रख सके, अतः बन्धन में पड़े हैं।
इन अष्टधा प्रकृतियों के बस में जो वह जीव , जो इन्हें
बस में कर ले वह ईश्वर, श्रवण, कीर्तन आदि भक्ति जिसकी सिद्ध हो गयी वह ईश्वर का हो जाता है।
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साधु-समागम अर्थात् सत्संगकी महिमा निम्न श्लोक में कहते हैं -
गंगा पापं शशी तापं दैन्यं कल्पतरुस्तथा।
पापं तापं दैन्यं च हरेत साधुसमागमः।।
अर्थात् - गंगा स्नान से गंगा पापों का हरण कर लेती है, चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से वाह्य ताप को दूर कर देता है और इच्छित सुखोपभोग प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष दैन्य को मिटा देता है। किन्तु साधु-समागम से पाप, ताप और दैन्य तीनों ही नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार गंगा, चन्द्रमा और कल्पवृक्ष से भी अधिक महिमा साधु-समागम की कही गई है। इसलिये मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह मरण पर्यन्त साधु-सत्संग करता रहे। क्योंकि -
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।।
बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी।।
हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी।।
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा।।
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा।।
अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।।
सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई।।
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।।
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना।।
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।।
गंगा पापं शशी तापं दैन्यं कल्पतरुस्तथा।
पापं तापं दैन्यं च हरेत साधुसमागमः।।
अर्थात् - गंगा स्नान से गंगा पापों का हरण कर लेती है, चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से वाह्य ताप को दूर कर देता है और इच्छित सुखोपभोग प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष दैन्य को मिटा देता है। किन्तु साधु-समागम से पाप, ताप और दैन्य तीनों ही नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार गंगा, चन्द्रमा और कल्पवृक्ष से भी अधिक महिमा साधु-समागम की कही गई है। इसलिये मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह मरण पर्यन्त साधु-सत्संग करता रहे। क्योंकि -
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।।
बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी।।
हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी।।
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा।।
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा।।
अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।।
सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई।।
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।।
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना।।
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।।
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भी कहते है। ईसाई 1680 (सम्बत 1589) की श्रावण शुक्ल सप्तमी शनिवार को अस्सीघाट पर "श्री राम जय राम जय जय राम" जापते हुए सन्त गोस्वामी तुलसी दास जी ने अपनी देहलीला संग कर 'साकेत' धाम को लौट गए थे; यथा--
"इशाई सोलह सो असी,
अस्सी गंग के तिर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी
तुलसी तज्यो शरीर।।
"तुलसी या संसार में
भांति भांति के लोग।
सबसे हिलमिल चालियो
जैसे नदी नाव संयोग।।"
"इशाई सोलह सो असी,
अस्सी गंग के तिर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी
तुलसी तज्यो शरीर।।
"तुलसी या संसार में
भांति भांति के लोग।
सबसे हिलमिल चालियो
जैसे नदी नाव संयोग।।"
गोस्वामी तुलसी दास जी का अंतिम सफर
पृथ्वी पर बहुत ही तीर्थ स्थान हैं किन्तु सब तीर्थों की यात्रा मनुष्य नहीं कर सकता। ऐसे ही संपूर्ण नदियों में जाकर मनुष्य स्नान नहीं कर सकता, मगर जहां हरि- कीर्तन होता है, हरि की कथा होती है, सत्संग होता है, वहां संपूर्ण तीर्थ विद्यमान होते हैं। इसीलिए आर्ष वाणी है-- अन्न का कण और सत्संग का क्षण, कभी नहीं गंवाना चाहिए। जहां से मिले, जब मिले, कभी छोड़ना नहीं चाहिए; क्योंकि यथा--
"गुरु पितु मातु बंधु पति देवा,
सब मोहि कहँ जानै दृढ़सेवा।
मम गुन गावत पुलक शरीरा,
गदगद गिरा नयन बह नीरा।
काम आदि मद दंभ न जाके,
तात निरंतर बस मैं ताके।
बचन कर्म मन मोरि गति,
भजनु करहिं निः काम।
तिन्ह के ह्रदय कमल महुँ,
कराऊँ सदा बिश्राम।।''
(रामचरित मानस/ अरण्य कांड : दोहा 15/ 10, 11, 12, 16)
भावार्थ है-- "जो मेरा (ईश्वर का) भक्त मुझे (ईश्वर को) ही अपना गुरु, पिता, माता, भाई, मित्र, स्वामी और ईश्वर-- सब कुछ मानकर अपने अंतःकरण में शुद्ध श्रद्धा और भक्ति भाव से मेरी सेवा में दृढ़ हो जाता है, प्रसन्न मन से गदगद वाणी से मेरा कीर्त्तन- भजन और नाम- गुण गाता हुआ, काम- क्रोध- मोह- लोभ- दम्भ- पाखण्ड आदि से विरत हो, मन- बचन और कर्म से निष्काम और निःस्वार्थ तथा समर्पण भाव से मेरा भजन करता है, मैं (ईश्वर) सदा ऐसे अपने भक्त के ह्रदय- कमल में विश्राम करता हूँ।।"
एकदा तुलसी दास जी से किसी ने पूछा-- "कभी- कभी भक्ति करने का मन नहीं करता, फिर भी 'नाम' जपने के लिये बैठ जाते है। तो क्या इसी से कोई फल मिलता है ?" -- तुलसी दास जी ने मुस्करा कर कहा था--
"तुलसी मेरे राम को
रीझ भजो या खीज।
भौम पड़ा जाने सभी
उल्टा सीधा बीज॥"
भावार्थ है-- "भूमि में जब बीज बोये जाते है, तो यह नही देखा जाता कि बीज उल्टे है या सीधे; पर फिर भी कालांतर में फसल बन जाती है। इसी प्रकार नाम सुमिरन कैसे भी किया जाये, फल अवश्य मिलता है।।"
"नाम की मौज़ रहे जीवन में
पलपल सिमरन करो ओंठो पर।
फल की चिंता कभी ना करो
नाम जपते रहो जीवन भर।।"
परन्तु बदलती हुई समय को दृष्टि में रखकर घोर अवसोस- जर्जरित एक भक्त के मुख से इस मार्मिक दोहा निकली थी; यथा--
"क्षत्रिय थे वे रामचंद्र जिन ने
फूंक दई क्षण में लंका।
डरे न दोनों भाई अकेले
बन में फिरे वह रणबंका।।
दिलीप रघु अजबेन आदि का
बजा सकल जग में डन्का।
द्वापर में था कृष्ण निराला
योगी भी अपने ढंग का।
जो धर्नूवेद के जानन
हारे थे सबके सिरताजा।।
हमारी गति उल्टी हे
कैसी भाई आज !
अब रहे नहीं गुण कर्म रामके
जग रावण भारत लंका।
इनमें ऐसा रिवाज रात दिन
बजे रंडियों का डंका।
शेरों से तो थरथर काम्पे
करते भेड़ों का पंखा।।
चोरी लूट के अभ्यासी पूरे
डूब गई सब लाज।
हमारी गति उल्टी है
कैसी भाई आज।।"
अंतिम यात्रा पर गोस्वामी जी :
-------------------------------------
ऐसे गोस्वामी जी की जीवनव्यापी उच्छर्गीकृत "राम- सेवा" ढलती उम्र में भी हार नहीं मानी थी। "रामकथा" प्रचार- प्रसार और इसकी लोकभाषा में कुल ग्यारह अध्यात्म ग्रन्थ (और एक 'तुलसी दोहा शतक' को जोड़ने से बारह संख्यक) भी लोकप्रिय होकर सैकड़ों प्रतिलिपि- पोथी लोगों के हाथ को आ गया था। बहुत पहले हनुमान चालिसा रचना के समय बादशाह अकबर भी उनको मान गए थे। चलती समय आगे बढ़ जाता है। आयुष भी समय के साथ ताल देकर, आगे बढ़ते हुए वार्धक्य को अपना लेता है। देहधारियों के लिए समय को टालना भी नामुमकिन है।।
एकदा रात को मूर्त रूप धारण कर गोस्वामी जी के पास कलि यम आ गया और उन्हे विविध त्रास देने लगा। तब तुलसी दास जी ने प्रभु राम जी, बजरंगबली जी, श्रीविश्वनाथ जी का ध्यान किया। नियति की विधान से देवदूत बनकर खोद संकट मोचक श्रीहनुमान जी प्रकट होकर उन्हें अंतिम दोहावली "विनय पत्रिका" रचना करने की आज्ञा देकर चले गए, तो आशुकवि गोस्वामी जी ने तुरन्त 'विनय पत्रिका' की रचना करके भगवान के श्रीचरणों पर समर्पित कर दिया। प्रभु श्रीराम ने उस अंतिम पोथी पर अपने आशीर्वाद रूपी हस्ताक्षर कर उनको निर्भय बना दिया। तब गोस्वामी जी निर्भय होकर कलि यम को स्वागत करने के लिए प्रस्तुत हो गए।।
गोस्वामी जी पर भक्तों के सामने ऐसे अनेक किवदंती लोकमुख से आए हैं। उस से यह स्पष्ट है की उच्च कोटि के अनन्य भक्त और विद्वान थे गोस्वामी जी। उनके बारे में जितना भी लिखा जाए, कम पड़ जायेगा। कारण, उन्होंने जीवन में कच्चे सुख 'कामभोग' को त्याग कर, सच्चे सुख 'रामसेवा' के प्रति अपने आप को समर्पित कर दिया था। अपनी कई महान कृतियों के कारण तुलसी दास जी को विद्वानों ने 'कवि शिरोमणि' और 'वाल्मीकि- अवतार'
पृथ्वी पर बहुत ही तीर्थ स्थान हैं किन्तु सब तीर्थों की यात्रा मनुष्य नहीं कर सकता। ऐसे ही संपूर्ण नदियों में जाकर मनुष्य स्नान नहीं कर सकता, मगर जहां हरि- कीर्तन होता है, हरि की कथा होती है, सत्संग होता है, वहां संपूर्ण तीर्थ विद्यमान होते हैं। इसीलिए आर्ष वाणी है-- अन्न का कण और सत्संग का क्षण, कभी नहीं गंवाना चाहिए। जहां से मिले, जब मिले, कभी छोड़ना नहीं चाहिए; क्योंकि यथा--
"गुरु पितु मातु बंधु पति देवा,
सब मोहि कहँ जानै दृढ़सेवा।
मम गुन गावत पुलक शरीरा,
गदगद गिरा नयन बह नीरा।
काम आदि मद दंभ न जाके,
तात निरंतर बस मैं ताके।
बचन कर्म मन मोरि गति,
भजनु करहिं निः काम।
तिन्ह के ह्रदय कमल महुँ,
कराऊँ सदा बिश्राम।।''
(रामचरित मानस/ अरण्य कांड : दोहा 15/ 10, 11, 12, 16)
भावार्थ है-- "जो मेरा (ईश्वर का) भक्त मुझे (ईश्वर को) ही अपना गुरु, पिता, माता, भाई, मित्र, स्वामी और ईश्वर-- सब कुछ मानकर अपने अंतःकरण में शुद्ध श्रद्धा और भक्ति भाव से मेरी सेवा में दृढ़ हो जाता है, प्रसन्न मन से गदगद वाणी से मेरा कीर्त्तन- भजन और नाम- गुण गाता हुआ, काम- क्रोध- मोह- लोभ- दम्भ- पाखण्ड आदि से विरत हो, मन- बचन और कर्म से निष्काम और निःस्वार्थ तथा समर्पण भाव से मेरा भजन करता है, मैं (ईश्वर) सदा ऐसे अपने भक्त के ह्रदय- कमल में विश्राम करता हूँ।।"
एकदा तुलसी दास जी से किसी ने पूछा-- "कभी- कभी भक्ति करने का मन नहीं करता, फिर भी 'नाम' जपने के लिये बैठ जाते है। तो क्या इसी से कोई फल मिलता है ?" -- तुलसी दास जी ने मुस्करा कर कहा था--
"तुलसी मेरे राम को
रीझ भजो या खीज।
भौम पड़ा जाने सभी
उल्टा सीधा बीज॥"
भावार्थ है-- "भूमि में जब बीज बोये जाते है, तो यह नही देखा जाता कि बीज उल्टे है या सीधे; पर फिर भी कालांतर में फसल बन जाती है। इसी प्रकार नाम सुमिरन कैसे भी किया जाये, फल अवश्य मिलता है।।"
"नाम की मौज़ रहे जीवन में
पलपल सिमरन करो ओंठो पर।
फल की चिंता कभी ना करो
नाम जपते रहो जीवन भर।।"
परन्तु बदलती हुई समय को दृष्टि में रखकर घोर अवसोस- जर्जरित एक भक्त के मुख से इस मार्मिक दोहा निकली थी; यथा--
"क्षत्रिय थे वे रामचंद्र जिन ने
फूंक दई क्षण में लंका।
डरे न दोनों भाई अकेले
बन में फिरे वह रणबंका।।
दिलीप रघु अजबेन आदि का
बजा सकल जग में डन्का।
द्वापर में था कृष्ण निराला
योगी भी अपने ढंग का।
जो धर्नूवेद के जानन
हारे थे सबके सिरताजा।।
हमारी गति उल्टी हे
कैसी भाई आज !
अब रहे नहीं गुण कर्म रामके
जग रावण भारत लंका।
इनमें ऐसा रिवाज रात दिन
बजे रंडियों का डंका।
शेरों से तो थरथर काम्पे
करते भेड़ों का पंखा।।
चोरी लूट के अभ्यासी पूरे
डूब गई सब लाज।
हमारी गति उल्टी है
कैसी भाई आज।।"
अंतिम यात्रा पर गोस्वामी जी :
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ऐसे गोस्वामी जी की जीवनव्यापी उच्छर्गीकृत "राम- सेवा" ढलती उम्र में भी हार नहीं मानी थी। "रामकथा" प्रचार- प्रसार और इसकी लोकभाषा में कुल ग्यारह अध्यात्म ग्रन्थ (और एक 'तुलसी दोहा शतक' को जोड़ने से बारह संख्यक) भी लोकप्रिय होकर सैकड़ों प्रतिलिपि- पोथी लोगों के हाथ को आ गया था। बहुत पहले हनुमान चालिसा रचना के समय बादशाह अकबर भी उनको मान गए थे। चलती समय आगे बढ़ जाता है। आयुष भी समय के साथ ताल देकर, आगे बढ़ते हुए वार्धक्य को अपना लेता है। देहधारियों के लिए समय को टालना भी नामुमकिन है।।
एकदा रात को मूर्त रूप धारण कर गोस्वामी जी के पास कलि यम आ गया और उन्हे विविध त्रास देने लगा। तब तुलसी दास जी ने प्रभु राम जी, बजरंगबली जी, श्रीविश्वनाथ जी का ध्यान किया। नियति की विधान से देवदूत बनकर खोद संकट मोचक श्रीहनुमान जी प्रकट होकर उन्हें अंतिम दोहावली "विनय पत्रिका" रचना करने की आज्ञा देकर चले गए, तो आशुकवि गोस्वामी जी ने तुरन्त 'विनय पत्रिका' की रचना करके भगवान के श्रीचरणों पर समर्पित कर दिया। प्रभु श्रीराम ने उस अंतिम पोथी पर अपने आशीर्वाद रूपी हस्ताक्षर कर उनको निर्भय बना दिया। तब गोस्वामी जी निर्भय होकर कलि यम को स्वागत करने के लिए प्रस्तुत हो गए।।
गोस्वामी जी पर भक्तों के सामने ऐसे अनेक किवदंती लोकमुख से आए हैं। उस से यह स्पष्ट है की उच्च कोटि के अनन्य भक्त और विद्वान थे गोस्वामी जी। उनके बारे में जितना भी लिखा जाए, कम पड़ जायेगा। कारण, उन्होंने जीवन में कच्चे सुख 'कामभोग' को त्याग कर, सच्चे सुख 'रामसेवा' के प्रति अपने आप को समर्पित कर दिया था। अपनी कई महान कृतियों के कारण तुलसी दास जी को विद्वानों ने 'कवि शिरोमणि' और 'वाल्मीकि- अवतार'
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मुखिया बनने के अहंकार का परिणाम
एक दिन जंगल में सियारों की सभा एकत्रित हुई, उन्होंने विचार-विमर्श किया कि अपनी समाज का भी कोई एक मुखिया होना चाहिये, सभी ने इस विचार का समर्थन किया, और सोचा कि मुखिया किसे बनाया जाये, सभी के विचार-विमर्शों से एक बुद्धिमान सियार को मुखिया चुना गया, सभी सियार एक जैसे होने से उन्होंने सोचा कि मुखिया की पहचान के लिये मुखिया की पूछ में एक लाठी बांध दी जाये, जिससे कि मुखिया की पहचान हो सके।
यह सब सोच-विचार कर मुखिया की पूछ में लाठी बांध दी गयी, इतने में ही वहाँ दहाड़ता हुआ सिंह आ धमका, सिंह की दहाड़ से सभी भयभीत सियार एक छोटी सी गुफा के अन्दर प्रवेश कर गये, उनके पीछे-पीछे भागते हुए मुखिया ने भी उसी गुफा में प्रवेश करने की कोशिश की, लेकिन उस समय उस मुखिया की पूछ में बांधी गई वह लाठी तिरछी हो गई, सभी सियारों ने कहा कि मुखिया जी आप भी जल्दी से अन्दर आ जाओ, तब वह मुखिया बोला मैं कैसे अन्दर आ जाऊं यह मुखियाई तो मेरे पीछे पड़ी हुई है और अन्त में वह बना हुआ मुखिया सियार सिंह का शिकार बन गया।
ऐसे ही आज भी अपनी विद्वता के अहंकार से मिली प्रशंसा अथवा पदरूप लाठी उनकी पूछ में बंधी हुई होनेसे बने हुए मुखियाओं के पीछे बंधी हुई है जिसके कारण वे यथार्थ ज्ञान-रूप गुफा में सुरक्षित नहीं हो पा रहे हैं।।
एक दिन जंगल में सियारों की सभा एकत्रित हुई, उन्होंने विचार-विमर्श किया कि अपनी समाज का भी कोई एक मुखिया होना चाहिये, सभी ने इस विचार का समर्थन किया, और सोचा कि मुखिया किसे बनाया जाये, सभी के विचार-विमर्शों से एक बुद्धिमान सियार को मुखिया चुना गया, सभी सियार एक जैसे होने से उन्होंने सोचा कि मुखिया की पहचान के लिये मुखिया की पूछ में एक लाठी बांध दी जाये, जिससे कि मुखिया की पहचान हो सके।
यह सब सोच-विचार कर मुखिया की पूछ में लाठी बांध दी गयी, इतने में ही वहाँ दहाड़ता हुआ सिंह आ धमका, सिंह की दहाड़ से सभी भयभीत सियार एक छोटी सी गुफा के अन्दर प्रवेश कर गये, उनके पीछे-पीछे भागते हुए मुखिया ने भी उसी गुफा में प्रवेश करने की कोशिश की, लेकिन उस समय उस मुखिया की पूछ में बांधी गई वह लाठी तिरछी हो गई, सभी सियारों ने कहा कि मुखिया जी आप भी जल्दी से अन्दर आ जाओ, तब वह मुखिया बोला मैं कैसे अन्दर आ जाऊं यह मुखियाई तो मेरे पीछे पड़ी हुई है और अन्त में वह बना हुआ मुखिया सियार सिंह का शिकार बन गया।
ऐसे ही आज भी अपनी विद्वता के अहंकार से मिली प्रशंसा अथवा पदरूप लाठी उनकी पूछ में बंधी हुई होनेसे बने हुए मुखियाओं के पीछे बंधी हुई है जिसके कारण वे यथार्थ ज्ञान-रूप गुफा में सुरक्षित नहीं हो पा रहे हैं।।
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कहानी का समय
सास-बहु
आज कांति जी बहुत खुश थीं, पूरे 6 महीने बाद बेटा बहू से मिलने जा रही थी।नई नवेली बहू निर्मला नौकरी के चक्कर में 4 दिन भी सास के साथ न रह सकी थी।शादी के तुरन्त बाद चली आई थी पति धीमेश के साथ उज्जैन।
कांति जी ने ट्रेन से उतरते ही टैक्सी ली और पँहुच गई बेटे के आशियाने।
किन्तु यह क्या??दरवाज़े पर बड़ा सा ताला लटक रहा था।कांति जी की खुशी पल भर में काफ़ूर हो गई।
पर्स में से फोन निकाला ही था कि पड़ौसन की आवाज़ सुनाई पड़ी...
आप आ गईं? आईए! आईये!!
निर्मला ऑफिस जाते समय चाबियाँ दे गई थी,सुबह ही बताया था उसने मम्मी जी आ रहीं हैं। आईये, हमारे साथ भी चाय पी लीजिए।
कांति जी का मन तो क्षुब्ध हो गया था,लेकिन अभी 4 ही बजे थे। बहू पता नही कब तक लौटे। बेटा धीमेश भी टूर पर गया हुआ था सो मन मार कर बैग उठाया और चल दी पड़ौसन के साथ।
कुछ इधर उधर की बाते की चाय पी और चाबी लेकर आ गईं वापस बेटे के घर में।शाम के सात बजे तक कांति का मन अत्यंत क्षुब्ध हो गया। बेटा तो टूर पर गया हुआ था लेकिन बहू को तो पता था कि वह आज आने वाली है। ऑफिस से छुट्टी तो ली नहीं उल्टे समय से घर पर भी नहीं आई। चाबी पड़ोस में रख गई और फोन भी नहीं किया।
वह तो भला हो पड़ोसियों का, चाबी का भी बताया और चाय नाश्ता भी करवा दिया, वरना चार बजे पहुंचते ही चाय भी खुद ही बनाकर पीनी पड़ती।
ऑफिस में उन्हें हाल ही में प्रमोशन मिला था तो ज्वाइन कर के उन्होंने आठ दिन की छुट्टी ले ली थी, सोचा चलकर कुछ दिन नई बहू के पास रहूंगी तो सास बहू जरा एक दूसरे को जान समझ लेंगी।लेकिन यहां तो आते ही बहू के निराले रंग दिखने लगे।
अपमान से वह एक दम क्षुब्ध सी हो गई। मन में पूर्वाग्रहों के कुछ नाग फन उठाने लगे। जरूर... जान बूझ कर ऐसा कर रही होगी ताकि मैं यहां से जल्दी चली जाऊं। पूर्णिमा की बहू ने भी ऐसा ही किया था, और करुणा की बहू तो ऑफिस का टूर है कह कर मायके ही जाकर बैठ गई थी।
मेरी बहू भी वैसी ही निकली, दुःख से उसकी आंखें भीग गईं । सोचने लगी यही सब होना था तो मैं आती ही नहीं।
बेटे के आते ही टिकट करा कर वापस चली जाऊंगी, लेकिन तब तक जाने और कैसी कैसी कड़वाहट, बेइज्जती सहनी पड़ेगी। इन्हीं विचारों में जाने कब उसकी हल्की आँख लग गई।
7:30 बजे आखिर बहू आ ही गई। दरवाजा खुलते ही...
सॉरी माँ!, बहुत शर्मिंदा हूँ, देर हो गई मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई तो ऑफिस से निकलने के बाद फोन भी नहीं कर पाई।
ये कहते हुए उसने एक बुके सास को बड़े प्यार से थमा दिया ।
ताजे फूलों की खुशबू बिखेरता खूबसूरत बुके कांति जी के हाथ में था और बहू उन्हें प्रणाम करने के लिए झुकी हुई थी।
कांति जी का हाथ अनायास बहू के सर पर पहुंच गया,जिसे उन्होने प्यार से सहला भी दिया। अप्रत्याश्चित सुख का एक झौंका सास बहु को प्रेम से भर गया।
और यह देखो मैं आपके लिए साड़ी लाई हूं, इसलिए देर हो गई। मुझे कोई साड़ी पसंद ही नहीं आ रही थी, आखिर बड़ा ढूंढने के बाद जाकर यह साड़ी पसंद आई।
बताओ ना मां,आपको पसंद आई कि नहीं। बहू ने हाथ में पकड़े पैकेट से एक खूबसूरत सिल्क की साड़ी निकाल कर विमला के कंधे पर फैला दी।
भीगी आंखों और खुशी से रुंधें गले से उन्होंने कहा,बहुत सुंदर है,बेटा!
सच में माँजी? बहु का चेहरा खिल गया।
सारे काम आज पूरे कर के ऑफिस से आठ दिन की छुट्टी ले ली है मैंने।अब मैं पूरा समय आपके ही साथ रहूंगी,जाने कितनी बातें करनी है आपसे, जाने कितना कुछ सीखना है।चलिए! अब तो सबसे पहले मैं आपकी पसंद का खाना बनाने रसोईघर में जाती हूं। पहले चाय बनाके लाती हूँ, आप बैठो। बस पांच मिनट।
नन्ही बच्ची की तरह वह उनके गले में बाहें डाल कर झूल गई।
उसकी पीठ पर स्नेह से हाथ फेरकर कांति को लगा वो अपनी बेटी के यहां आई है।
वो भी साथ साथ रसोई घर की तरफ चल दी। मन के सारे पूर्वाग्रह खुशी के आसुओं के साथ धुलते जा रहे थे।
सास-बहु
आज कांति जी बहुत खुश थीं, पूरे 6 महीने बाद बेटा बहू से मिलने जा रही थी।नई नवेली बहू निर्मला नौकरी के चक्कर में 4 दिन भी सास के साथ न रह सकी थी।शादी के तुरन्त बाद चली आई थी पति धीमेश के साथ उज्जैन।
कांति जी ने ट्रेन से उतरते ही टैक्सी ली और पँहुच गई बेटे के आशियाने।
किन्तु यह क्या??दरवाज़े पर बड़ा सा ताला लटक रहा था।कांति जी की खुशी पल भर में काफ़ूर हो गई।
पर्स में से फोन निकाला ही था कि पड़ौसन की आवाज़ सुनाई पड़ी...
आप आ गईं? आईए! आईये!!
निर्मला ऑफिस जाते समय चाबियाँ दे गई थी,सुबह ही बताया था उसने मम्मी जी आ रहीं हैं। आईये, हमारे साथ भी चाय पी लीजिए।
कांति जी का मन तो क्षुब्ध हो गया था,लेकिन अभी 4 ही बजे थे। बहू पता नही कब तक लौटे। बेटा धीमेश भी टूर पर गया हुआ था सो मन मार कर बैग उठाया और चल दी पड़ौसन के साथ।
कुछ इधर उधर की बाते की चाय पी और चाबी लेकर आ गईं वापस बेटे के घर में।शाम के सात बजे तक कांति का मन अत्यंत क्षुब्ध हो गया। बेटा तो टूर पर गया हुआ था लेकिन बहू को तो पता था कि वह आज आने वाली है। ऑफिस से छुट्टी तो ली नहीं उल्टे समय से घर पर भी नहीं आई। चाबी पड़ोस में रख गई और फोन भी नहीं किया।
वह तो भला हो पड़ोसियों का, चाबी का भी बताया और चाय नाश्ता भी करवा दिया, वरना चार बजे पहुंचते ही चाय भी खुद ही बनाकर पीनी पड़ती।
ऑफिस में उन्हें हाल ही में प्रमोशन मिला था तो ज्वाइन कर के उन्होंने आठ दिन की छुट्टी ले ली थी, सोचा चलकर कुछ दिन नई बहू के पास रहूंगी तो सास बहू जरा एक दूसरे को जान समझ लेंगी।लेकिन यहां तो आते ही बहू के निराले रंग दिखने लगे।
अपमान से वह एक दम क्षुब्ध सी हो गई। मन में पूर्वाग्रहों के कुछ नाग फन उठाने लगे। जरूर... जान बूझ कर ऐसा कर रही होगी ताकि मैं यहां से जल्दी चली जाऊं। पूर्णिमा की बहू ने भी ऐसा ही किया था, और करुणा की बहू तो ऑफिस का टूर है कह कर मायके ही जाकर बैठ गई थी।
मेरी बहू भी वैसी ही निकली, दुःख से उसकी आंखें भीग गईं । सोचने लगी यही सब होना था तो मैं आती ही नहीं।
बेटे के आते ही टिकट करा कर वापस चली जाऊंगी, लेकिन तब तक जाने और कैसी कैसी कड़वाहट, बेइज्जती सहनी पड़ेगी। इन्हीं विचारों में जाने कब उसकी हल्की आँख लग गई।
7:30 बजे आखिर बहू आ ही गई। दरवाजा खुलते ही...
सॉरी माँ!, बहुत शर्मिंदा हूँ, देर हो गई मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई तो ऑफिस से निकलने के बाद फोन भी नहीं कर पाई।
ये कहते हुए उसने एक बुके सास को बड़े प्यार से थमा दिया ।
ताजे फूलों की खुशबू बिखेरता खूबसूरत बुके कांति जी के हाथ में था और बहू उन्हें प्रणाम करने के लिए झुकी हुई थी।
कांति जी का हाथ अनायास बहू के सर पर पहुंच गया,जिसे उन्होने प्यार से सहला भी दिया। अप्रत्याश्चित सुख का एक झौंका सास बहु को प्रेम से भर गया।
और यह देखो मैं आपके लिए साड़ी लाई हूं, इसलिए देर हो गई। मुझे कोई साड़ी पसंद ही नहीं आ रही थी, आखिर बड़ा ढूंढने के बाद जाकर यह साड़ी पसंद आई।
बताओ ना मां,आपको पसंद आई कि नहीं। बहू ने हाथ में पकड़े पैकेट से एक खूबसूरत सिल्क की साड़ी निकाल कर विमला के कंधे पर फैला दी।
भीगी आंखों और खुशी से रुंधें गले से उन्होंने कहा,बहुत सुंदर है,बेटा!
सच में माँजी? बहु का चेहरा खिल गया।
सारे काम आज पूरे कर के ऑफिस से आठ दिन की छुट्टी ले ली है मैंने।अब मैं पूरा समय आपके ही साथ रहूंगी,जाने कितनी बातें करनी है आपसे, जाने कितना कुछ सीखना है।चलिए! अब तो सबसे पहले मैं आपकी पसंद का खाना बनाने रसोईघर में जाती हूं। पहले चाय बनाके लाती हूँ, आप बैठो। बस पांच मिनट।
नन्ही बच्ची की तरह वह उनके गले में बाहें डाल कर झूल गई।
उसकी पीठ पर स्नेह से हाथ फेरकर कांति को लगा वो अपनी बेटी के यहां आई है।
वो भी साथ साथ रसोई घर की तरफ चल दी। मन के सारे पूर्वाग्रह खुशी के आसुओं के साथ धुलते जा रहे थे।
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*खेलो, परन्तु फँसो मत*
परंतु खेल तो यही है कि तुमने इस खेलघरको असली घर मान लिया है और इसमें इतने फँस गये हो कि असली घरको भूल ही गये! मान लेनेमात्रसे यह घर और इसके रहनेवाले तुम्हारे ही-जैसे खेलनेको आये हुए लोग, जिनसे तुमने नाना प्रकारके नाते जोड़ लिये हैं, तुम्हारे होते भी नहीं; इन्हें अपना समझकर इनसे चिपटे हो, परंतु बार-बार जबरदस्ती अलग किये जानेसे तुम्हें रोना-चिल्लाना पड़ता है। तुम्हारा स्वभाव ही हो गया है, हर एक खेलके संगी-साथियोंसे इसी प्रकार चिपटे रहना, दो घड़ीके लिये जहाँ भी जाते हो वहीं ममता फैलाकर बैठ जाते हो। इसीसे हर एक खेलमें तुम्हें रोना ही पड़ता है। न मालूम कितने लंबे समयसे तुम इसी प्रकार रो रहे हो और न समझोगे तो न जाने कबतक रोते रहोगे। अच्छा हो यदि समझ जाओ और इस रोने-चिल्लानेसे—इस सदाकी साँसतसे तुम्हारा पीछा छूट जाय।
परंतु खेल तो यही है कि तुमने इस खेलघरको असली घर मान लिया है और इसमें इतने फँस गये हो कि असली घरको भूल ही गये! मान लेनेमात्रसे यह घर और इसके रहनेवाले तुम्हारे ही-जैसे खेलनेको आये हुए लोग, जिनसे तुमने नाना प्रकारके नाते जोड़ लिये हैं, तुम्हारे होते भी नहीं; इन्हें अपना समझकर इनसे चिपटे हो, परंतु बार-बार जबरदस्ती अलग किये जानेसे तुम्हें रोना-चिल्लाना पड़ता है। तुम्हारा स्वभाव ही हो गया है, हर एक खेलके संगी-साथियोंसे इसी प्रकार चिपटे रहना, दो घड़ीके लिये जहाँ भी जाते हो वहीं ममता फैलाकर बैठ जाते हो। इसीसे हर एक खेलमें तुम्हें रोना ही पड़ता है। न मालूम कितने लंबे समयसे तुम इसी प्रकार रो रहे हो और न समझोगे तो न जाने कबतक रोते रहोगे। अच्छा हो यदि समझ जाओ और इस रोने-चिल्लानेसे—इस सदाकी साँसतसे तुम्हारा पीछा छूट जाय।
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साधु-संतों की शब्दवाली
*साधु-संतों की शब्दावली आम लोगों को समझना थोड़ा कठिन होता है. साधु-संत अपने दैनिक उपयोग के चीजों का नाम भी अजीबोगरीब तरीके से रखते हैं. इनके खान-पान की बात की जाए तो सभी खाद्य सामाग्री का नाम राम से ही शुरू होता है. कुछ तो शब्द ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर आप हंस पड़ेंगे. ये शब्दावली काफी रोचक भी होती हैं.*
*साधु-संतों की शब्दावली आम लोगों की शब्दावली से काफी अलग होती है. हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली अधिकतर वस्तुओं के नाम यहां अलग- तरीके से रखे गए हैं. कुछ तो शब्द ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर आप हंस पड़ेंगे. ये शब्दावली काफी रोचक भी होती है. जब आप साधु-संतो के बीच होंगे, ऐसे शब्द या वाक्य सुनने को अक्सर मिल जाएंगे कि लंका की चटनी बनेगी, सब्जी में रामरस मिलाया जाएगा और दाल में रंग बदल डाला जाएगा या महाप्रसाद के साथ भंडारा जताया जाएगा.*
*इन बातों को समझने में दिक्कत हो, तो इस खबर के जरिए विस्तार से समझ सकते हैं. साधु-संतों की इस रोचक शब्दावली को जानने के लिए कुचायकोट प्रखंड के सेमरा बाजार में स्थित अतिप्राचीन राम जानकी मठ में साधु-संतों से शब्दावली की जानकारी ली गयी. इस दौरान काफी रोचक बातें सामने आई.*
*रसोईघर के सभी सामग्रियों के नाम अजीबोगरीब*
साधु-संत रसोई में प्रयोग होने वाले सभी चीजों को अलग नाम से पुकारते हैं. यहां मिर्चा को लंका कहा जाता है. हल्दी को रंग बदल के नाम से पुकारा जाता है.जबकि नमक को रामरस, भात को महाप्रसाद तथा रोटी को टिकर कहते हैं. यहां भोजन को भंडारा कहा जाता है और खाना बनाने को भंडारा चेतना कहा जाता है. इसके अलावा भोजन करने को प्रसाद पाना कहा जाता है.
*राम नाम से जुड़े होते हैं अधिकतर शब्द*
साधु-संतों की शब्दावली में अधिकतर शब्द राम नाम से जुड़े हुए होते हैं. राम जानकी मठ सेमरा के महंथ अवधबिहारी दास बताते हैं कि मिर्च कड़वा होता है, इसलिए इसे लंका कहा जाता है. कुछ साधु-संत राम झनाका भी कहते हैं. नमक को रामरस कहा जाता है. ऐसे ही कई शब्द हैं, जिनके नाम राम और अध्यात्म से जुड़े हुए रखे गए हैं.
*यहां संक्षेप में समझिये संत भाषा में कुछ वस्तुओं के नाम*
मिर्चा- लंका
नमक- रामरस
हल्दी- रंगबदल
भात- महाप्रसाद
दाल- दालप्रसाद
रोटी- टिकर
भोजन- भंडारा
भोजन बनाने वाला- भंडारी
खाना बनाना- भंडारा चेताना
भोजन करना- प्रसाद पाना
*साधु-संतों की शब्दावली आम लोगों को समझना थोड़ा कठिन होता है. साधु-संत अपने दैनिक उपयोग के चीजों का नाम भी अजीबोगरीब तरीके से रखते हैं. इनके खान-पान की बात की जाए तो सभी खाद्य सामाग्री का नाम राम से ही शुरू होता है. कुछ तो शब्द ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर आप हंस पड़ेंगे. ये शब्दावली काफी रोचक भी होती हैं.*
*साधु-संतों की शब्दावली आम लोगों की शब्दावली से काफी अलग होती है. हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली अधिकतर वस्तुओं के नाम यहां अलग- तरीके से रखे गए हैं. कुछ तो शब्द ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर आप हंस पड़ेंगे. ये शब्दावली काफी रोचक भी होती है. जब आप साधु-संतो के बीच होंगे, ऐसे शब्द या वाक्य सुनने को अक्सर मिल जाएंगे कि लंका की चटनी बनेगी, सब्जी में रामरस मिलाया जाएगा और दाल में रंग बदल डाला जाएगा या महाप्रसाद के साथ भंडारा जताया जाएगा.*
*इन बातों को समझने में दिक्कत हो, तो इस खबर के जरिए विस्तार से समझ सकते हैं. साधु-संतों की इस रोचक शब्दावली को जानने के लिए कुचायकोट प्रखंड के सेमरा बाजार में स्थित अतिप्राचीन राम जानकी मठ में साधु-संतों से शब्दावली की जानकारी ली गयी. इस दौरान काफी रोचक बातें सामने आई.*
*रसोईघर के सभी सामग्रियों के नाम अजीबोगरीब*
साधु-संत रसोई में प्रयोग होने वाले सभी चीजों को अलग नाम से पुकारते हैं. यहां मिर्चा को लंका कहा जाता है. हल्दी को रंग बदल के नाम से पुकारा जाता है.जबकि नमक को रामरस, भात को महाप्रसाद तथा रोटी को टिकर कहते हैं. यहां भोजन को भंडारा कहा जाता है और खाना बनाने को भंडारा चेतना कहा जाता है. इसके अलावा भोजन करने को प्रसाद पाना कहा जाता है.
*राम नाम से जुड़े होते हैं अधिकतर शब्द*
साधु-संतों की शब्दावली में अधिकतर शब्द राम नाम से जुड़े हुए होते हैं. राम जानकी मठ सेमरा के महंथ अवधबिहारी दास बताते हैं कि मिर्च कड़वा होता है, इसलिए इसे लंका कहा जाता है. कुछ साधु-संत राम झनाका भी कहते हैं. नमक को रामरस कहा जाता है. ऐसे ही कई शब्द हैं, जिनके नाम राम और अध्यात्म से जुड़े हुए रखे गए हैं.
*यहां संक्षेप में समझिये संत भाषा में कुछ वस्तुओं के नाम*
मिर्चा- लंका
नमक- रामरस
हल्दी- रंगबदल
भात- महाप्रसाद
दाल- दालप्रसाद
रोटी- टिकर
भोजन- भंडारा
भोजन बनाने वाला- भंडारी
खाना बनाना- भंडारा चेताना
भोजन करना- प्रसाद पाना
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कहानी का समय
_दो सगे भाई
" भैया, परसों नये मकान पे हवन है। छुट्टी (रविवार) का दिन है। आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।" छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई भरत से मोबाईल पर बात करते हुए कहा।
" क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो ?"
" नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं ।" अपना मकान", भरपूर आश्चर्य के साथ भरत के मुँह से निकला।"छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।"" बस भैया ", कहते हुए लक्ष्मण ने फोन काट दिया।"अपना मकान" , " बस भैया " ये शब्द भरत के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रहे थे।
भरत और लक्ष्मण दो सगे भाई और उन दोनों में उम्र का अंतर था करीब पन्द्रह साल। लक्ष्मण जब करीब सात साल का था तभी उनके माँ-बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। अब लक्ष्मण के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी भरत पर थी। इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली कि जिससे लक्ष्मण की देख-रेख ठीक से हो जाये।
प्राईवेट कम्पनी में क्लर्क का काम करते भरत की तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराये के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई व रहन-सहन में खर्च हो जाता। इस चक्कर में शादी के कई साल बाद तक भी भरत ने बच्चे पैदा नहीं किये। जितना बड़ा परिवार उतना ज्यादा खर्चा।
पढ़ाई पूरी होते ही लक्ष्मण की नौकरी एक अच्छी कम्पनी में लग गयी और फिर जल्द शादी भी हो गयी। बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराये का मकान ले लिया। वैसे भी अब भरत के पास भी दो बच्चे थे, लड़की बड़ी और लड़का छोटा।
मकान लेने की बात जब भरत ने अपनी बीबी को बताई तो उसकी आँखों में आँसू आ गये। वो बोली, " देवर जी के लिये हमने क्या नहीं किया। कभी अपने बच्चों को बढ़िया नहीं पहनाया। कभी घर में महँगी सब्जी या महँगे फल नहीं आये। दुःख इस बात का नहीं कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुःख इस बात का है कि ये बात उन्होंने हम से छिपा के रखी।"
रविवार की सुबह लक्ष्मण द्वारा भेजी गाड़ी, भरत के परिवार को लेकर एक सुन्दर से मकान के आगे खड़ी हो गयी। मकान को देखकर भरत के मन में एक हूक सी उठी। मकान बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर उससे भी ज्यादा सुन्दर। हर तरह की सुख-सुविधा का पूरा इन्तजाम। उस मकान के दो एक जैसे हिस्से देखकर भरत ने मन ही मन कहा, " देखो छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिन्ता है। दोनों के लिये अभी से एक जैसे दो हिस्से (portion) तैयार कराये हैं। पूरा मकान सवा-डेढ़ करोड़ रूपयों से कम नहीं होगा। और एक मैं हूँ, जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिये लाख-दो लाख रूपयों का इन्तजाम भी नहीं है।"
मकान देखते समय भरत की आँखों में आँसू थे जिन्हें उन्होंने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका।
तभी पण्डित जी ने आवाज लगाई, " हवन का समय हो रहा है, मकान के स्वामी हवन के लिये अग्नि-कुण्ड के सामने बैठें।"
लक्ष्मण के दोस्तों ने कहा, " पण्डित जी तुम्हें बुला रहे हैं।"
यह सुन लक्ष्मण बोले, " इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं, मेरे बड़े भाई भरत भी हैं। आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ इनकी बदौलत। इस मकान के दो हिस्से हैं, एक उनका और एक मेरा।"
हवन कुण्ड के सामने बैठते समय लक्ष्मण ने भरत के कान में फुसफुसाते हुए कहा, " भैया, बिटिया की शादी की चिन्ता बिल्कुल न करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे ।"
इतना सुनते ही भरत आत्मग्लानि से भर गया
भरत ने नज़र उठाकर एक क्षण के लिए लक्ष्मण को देखा तुरन्त ही उसने आंखें झुका ली
उसका मन द्रवित हो गया उसे एक पल को लगा जैसे उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा है वह गिरने को हुआ लेकिन उसके भाई ने उसे पकड़ लिया
छोटा भाई, क्या हुआ भईया,
भरत ने एक समय के लिये अपनी पत्नी को देखा शायद वह इसका जवाब अपनी पत्नी के
आंखों में देखना चाह रहा था।
भरत को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या बोले भरत ने किसी तरह खुद को संभाला और हवन पर बैठ गया
पूरे हवन के दौरान भरत अपनी आँखों से बहते पानी को पोंछ रहे थे।
_दो सगे भाई
" भैया, परसों नये मकान पे हवन है। छुट्टी (रविवार) का दिन है। आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।" छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई भरत से मोबाईल पर बात करते हुए कहा।
" क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो ?"
" नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं ।" अपना मकान", भरपूर आश्चर्य के साथ भरत के मुँह से निकला।"छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।"" बस भैया ", कहते हुए लक्ष्मण ने फोन काट दिया।"अपना मकान" , " बस भैया " ये शब्द भरत के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रहे थे।
भरत और लक्ष्मण दो सगे भाई और उन दोनों में उम्र का अंतर था करीब पन्द्रह साल। लक्ष्मण जब करीब सात साल का था तभी उनके माँ-बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। अब लक्ष्मण के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी भरत पर थी। इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली कि जिससे लक्ष्मण की देख-रेख ठीक से हो जाये।
प्राईवेट कम्पनी में क्लर्क का काम करते भरत की तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराये के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई व रहन-सहन में खर्च हो जाता। इस चक्कर में शादी के कई साल बाद तक भी भरत ने बच्चे पैदा नहीं किये। जितना बड़ा परिवार उतना ज्यादा खर्चा।
पढ़ाई पूरी होते ही लक्ष्मण की नौकरी एक अच्छी कम्पनी में लग गयी और फिर जल्द शादी भी हो गयी। बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराये का मकान ले लिया। वैसे भी अब भरत के पास भी दो बच्चे थे, लड़की बड़ी और लड़का छोटा।
मकान लेने की बात जब भरत ने अपनी बीबी को बताई तो उसकी आँखों में आँसू आ गये। वो बोली, " देवर जी के लिये हमने क्या नहीं किया। कभी अपने बच्चों को बढ़िया नहीं पहनाया। कभी घर में महँगी सब्जी या महँगे फल नहीं आये। दुःख इस बात का नहीं कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुःख इस बात का है कि ये बात उन्होंने हम से छिपा के रखी।"
रविवार की सुबह लक्ष्मण द्वारा भेजी गाड़ी, भरत के परिवार को लेकर एक सुन्दर से मकान के आगे खड़ी हो गयी। मकान को देखकर भरत के मन में एक हूक सी उठी। मकान बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर उससे भी ज्यादा सुन्दर। हर तरह की सुख-सुविधा का पूरा इन्तजाम। उस मकान के दो एक जैसे हिस्से देखकर भरत ने मन ही मन कहा, " देखो छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिन्ता है। दोनों के लिये अभी से एक जैसे दो हिस्से (portion) तैयार कराये हैं। पूरा मकान सवा-डेढ़ करोड़ रूपयों से कम नहीं होगा। और एक मैं हूँ, जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिये लाख-दो लाख रूपयों का इन्तजाम भी नहीं है।"
मकान देखते समय भरत की आँखों में आँसू थे जिन्हें उन्होंने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका।
तभी पण्डित जी ने आवाज लगाई, " हवन का समय हो रहा है, मकान के स्वामी हवन के लिये अग्नि-कुण्ड के सामने बैठें।"
लक्ष्मण के दोस्तों ने कहा, " पण्डित जी तुम्हें बुला रहे हैं।"
यह सुन लक्ष्मण बोले, " इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं, मेरे बड़े भाई भरत भी हैं। आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ इनकी बदौलत। इस मकान के दो हिस्से हैं, एक उनका और एक मेरा।"
हवन कुण्ड के सामने बैठते समय लक्ष्मण ने भरत के कान में फुसफुसाते हुए कहा, " भैया, बिटिया की शादी की चिन्ता बिल्कुल न करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे ।"
इतना सुनते ही भरत आत्मग्लानि से भर गया
भरत ने नज़र उठाकर एक क्षण के लिए लक्ष्मण को देखा तुरन्त ही उसने आंखें झुका ली
उसका मन द्रवित हो गया उसे एक पल को लगा जैसे उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा है वह गिरने को हुआ लेकिन उसके भाई ने उसे पकड़ लिया
छोटा भाई, क्या हुआ भईया,
भरत ने एक समय के लिये अपनी पत्नी को देखा शायद वह इसका जवाब अपनी पत्नी के
आंखों में देखना चाह रहा था।
भरत को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या बोले भरत ने किसी तरह खुद को संभाला और हवन पर बैठ गया
पूरे हवन के दौरान भरत अपनी आँखों से बहते पानी को पोंछ रहे थे।
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सामुद्रिक शास्त्र क्या है?
प्राचीन सामुद्रिक शास्त्र, शरीर की विशेषताओं के ज्ञान से जुड़ा है. यह ज्योतिष, हस्तरेखा विज्ञान, मस्तिष्क विज्ञान, और चेहरा पढ़ने से जुड़ा है. सामुद्रिक शास्त्र के मुताबिक, शरीर के अंगों की संरचना और तिलों से व्यक्ति के व्यक्तित्व का पता चलता है.
सामुद्रिक शास्त्र से जुड़ी कुछ खास बातेंः
सामुद्रिक शास्त्र, प्राचीन हिंदू ग्रंथ गरुड़ पुराण में शामिल विषयों में से एक है.
सामुद्रिक शास्त्र में मानव तत्वों के पांच मुख्य प्रकार हैं: अग्नि, वायु, जल, आकाश, और पृथ्वी.
सामुद्रिक शास्त्र में मस्तक रेखा, हस्तरेखाओं, और रोमावली का अध्ययन किया जाता है.
सामुद्रिक शास्त्र को सीखने के लिए, गुरु से सिखना ज़रूरी है.
सामुद्रिक शास्त्र को सीखने के बाद, व्यक्ति भविष्यवाणी कर सकता है.
सामुद्रिक शास्त्र, हिंदू, बौद्ध, और जैन धर्मों में साझा किया जाता है.
सामुद्रिक शास्त्र से जुड़े कुछ सिद्धांत, फ्रेनोलॉजी और फ़ेस रीडिंग में भी देखे जा सकते हैं.
दूसरे शब्दों में सामुद्रिक शास्त्र एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें मानव शरीर के चिन्हों के द्वारा स्त्री और पुरुष के लक्षणों के उपर प्रकाश डाला गया है . इस ग्रंथ को लक्षण शास्त्र भी कहा जाता है। कहते हैं इस ग्रंथ की रचना भगवान कार्तिकेय ने की थी . शिवजी के द्वारा इस ग्रन्थ को सामुद्रिक शास्त्र कहा गया।
कैसे पड़ा सामुद्रिक शास्त्र नाम
सामुद्रिक शास्त्र का नामकरण समुद्र ऋषि द्वारा इस ग्रन्थ को प्रचारित करने के कारण किया गया है। ऐसा माना जाता है कि समुद्र ऋषि का भविष्य कथन इतना सटीक निकलता था कि उनके उपरान्त विद्वानों में समुद्र के वचन की साक्षी दी जाने लगी। अतः ज्योतिष आदि के ग्रंथों में श्लोकों के अंत में अपनी बात पर जोर देने हेतु ' समुद्रस्य वचनं यथा 'जैसे वाक्य प्राप्त होते हैं। दुर्भाग्यवश आज समुद्र ऋषि प्रणीत यह ग्रन्थ अपने अविकल रूप में प्राप्त नहीं है। वराह मिहिर आदि आचार्यों ने समुद्र के नाम का उल्लेख यत्र तत्र किया है।
वर्तमान समय में 'सामुद्रिक तिलक' , भविष्य पुराण का स्त्री पुरुष लक्षण वर्णन इत्यादि सामुद्रिक शास्त्र से सम्बंधित ग्रन्थ उपलब्ध हैं।
सामुद्रिक शास्त्र एक संस्कृत शब्द है जिसका अनुवाद मोटे तौर पर "शरीर की विशेषताओं का ज्ञान" के रूप में किया जाता है। सामुद्रिक शास्त्र कई बार वैदिक ज्योतिष में भी उपयोग किया जाता है, क्योंकि यह ज्योतिष और हस्तरेखा से संबंधित है, साथ ही साथ फ्रेनोलॉजी (कपाल-समुद्री) और चेहरा पढ़ने [मुख-समुद्री] से भी संबंधित है। गरुड पुराण में भी सामुद्रिक शास्त्र का वर्णन कई जगह किया गया है।
रहस्यमयी विद्या है सामुद्रिक शास्त्र
यह एक रहस्यमयी शास्त्र है जो व्यक्ति के संपूर्ण चरित्र और भविष्य को खोलकर रख देता है।
सामुद्रिक शास्त्र मुख, मुखमण्डल तथा सम्पूर्ण शरीर के अध्ययन की विद्या है। भारत में यह यह वैदिक काल से ही प्रचलित है। गरुड़ पुराण में सामुद्रिक शास्त्र का वर्णन है। हस्तरेखा विज्ञान तो सामुद्रिक विद्या की वह शाखा मात्र है।
सामुद्रिक शास्त्र का ज्ञान प्राचीनकाल से ही भारत में प्रचलित रहा है। मूलत: यह ज्ञान दक्षिण भारत में ज्यादा प्रचलित रहा। इसके जानकार दक्षिण भारत में ज्यादा पाए जाते हैं। इस विज्ञान का उल्लेख प्राचीनकालीन ज्योतिष शास्त्र में भी मिलता है।
ज्योतिष शास्त्र की भांति सामुद्रिक शास्त्र का उद्भव भी 5000 वर्ष पूर्व भारत में ही हुआ था। पराशर, व्यास, सूर्य, भारद्वाज, भृगु, कश्यप, बृहस्पति, कात्यायन आदि महर्षियों ने इस विद्या की खोज की।
इस शास्त्र का उल्लेख वेदों और स्कंद पुराण, बाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों के साथ-साथ जैन तथा बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है। इसका प्रचार प्रसार सर्वप्रथम ऋषि समुद्र ने किया इसलिए उन्हीं के नाम पर सामुद्रिक शास्त्र हो गया। भारत से यह विद्या चीन, यूनान, रोम और इसराइल तक पहुंची और आगे चलकर यह संपूर्ण योरप में फैल गई।
कहते हैं कि ईसा पूर्व 423 में यूनानी विद्वान अनेक्सागोरस यह शास्त्र पढ़ाया करते थे। इतिहासकारों अनुसार हिपांजस को हर्गल की वेदी पर सुनहरे अक्षरों में लिखी सामुद्रिक ज्ञान की एक पुस्तक मिली जो सिकंदर महान को भेंट की गई थी। प्लेटो, अरिस्टॉटल, मेगनस, अगस्टस, पैराक्लीज तथा यूनान के अन्य दार्शनिक भारत के ज्योतिष और सामुद्रिक ज्ञान से परिचित थे।
'समुद्रिका-तिलक'
1700 ई. में लिखी गई यह पुस्तक समुद्रिका-तिलक के बहुत करीब है। समुद्रिका, जिसे सामान्य शीर्षक समुद्रिका-शास्त्र या समुद्रिका-लक्षण के नाम से भी जाना जाता है, एक अनाम रचना है जिसके दो संस्करण हैं । पहला संस्करण पूरे भारत में पाया जाता है, और एक पांडुलिपि में मूल-देव को इसका मुख्य लेखक बताया गया है, साथ ही वाम-देव को बीस श्लोकों का लेखक बताया गया है।
प्राचीन सामुद्रिक शास्त्र, शरीर की विशेषताओं के ज्ञान से जुड़ा है. यह ज्योतिष, हस्तरेखा विज्ञान, मस्तिष्क विज्ञान, और चेहरा पढ़ने से जुड़ा है. सामुद्रिक शास्त्र के मुताबिक, शरीर के अंगों की संरचना और तिलों से व्यक्ति के व्यक्तित्व का पता चलता है.
सामुद्रिक शास्त्र से जुड़ी कुछ खास बातेंः
सामुद्रिक शास्त्र, प्राचीन हिंदू ग्रंथ गरुड़ पुराण में शामिल विषयों में से एक है.
सामुद्रिक शास्त्र में मानव तत्वों के पांच मुख्य प्रकार हैं: अग्नि, वायु, जल, आकाश, और पृथ्वी.
सामुद्रिक शास्त्र में मस्तक रेखा, हस्तरेखाओं, और रोमावली का अध्ययन किया जाता है.
सामुद्रिक शास्त्र को सीखने के लिए, गुरु से सिखना ज़रूरी है.
सामुद्रिक शास्त्र को सीखने के बाद, व्यक्ति भविष्यवाणी कर सकता है.
सामुद्रिक शास्त्र, हिंदू, बौद्ध, और जैन धर्मों में साझा किया जाता है.
सामुद्रिक शास्त्र से जुड़े कुछ सिद्धांत, फ्रेनोलॉजी और फ़ेस रीडिंग में भी देखे जा सकते हैं.
दूसरे शब्दों में सामुद्रिक शास्त्र एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें मानव शरीर के चिन्हों के द्वारा स्त्री और पुरुष के लक्षणों के उपर प्रकाश डाला गया है . इस ग्रंथ को लक्षण शास्त्र भी कहा जाता है। कहते हैं इस ग्रंथ की रचना भगवान कार्तिकेय ने की थी . शिवजी के द्वारा इस ग्रन्थ को सामुद्रिक शास्त्र कहा गया।
कैसे पड़ा सामुद्रिक शास्त्र नाम
सामुद्रिक शास्त्र का नामकरण समुद्र ऋषि द्वारा इस ग्रन्थ को प्रचारित करने के कारण किया गया है। ऐसा माना जाता है कि समुद्र ऋषि का भविष्य कथन इतना सटीक निकलता था कि उनके उपरान्त विद्वानों में समुद्र के वचन की साक्षी दी जाने लगी। अतः ज्योतिष आदि के ग्रंथों में श्लोकों के अंत में अपनी बात पर जोर देने हेतु ' समुद्रस्य वचनं यथा 'जैसे वाक्य प्राप्त होते हैं। दुर्भाग्यवश आज समुद्र ऋषि प्रणीत यह ग्रन्थ अपने अविकल रूप में प्राप्त नहीं है। वराह मिहिर आदि आचार्यों ने समुद्र के नाम का उल्लेख यत्र तत्र किया है।
वर्तमान समय में 'सामुद्रिक तिलक' , भविष्य पुराण का स्त्री पुरुष लक्षण वर्णन इत्यादि सामुद्रिक शास्त्र से सम्बंधित ग्रन्थ उपलब्ध हैं।
सामुद्रिक शास्त्र एक संस्कृत शब्द है जिसका अनुवाद मोटे तौर पर "शरीर की विशेषताओं का ज्ञान" के रूप में किया जाता है। सामुद्रिक शास्त्र कई बार वैदिक ज्योतिष में भी उपयोग किया जाता है, क्योंकि यह ज्योतिष और हस्तरेखा से संबंधित है, साथ ही साथ फ्रेनोलॉजी (कपाल-समुद्री) और चेहरा पढ़ने [मुख-समुद्री] से भी संबंधित है। गरुड पुराण में भी सामुद्रिक शास्त्र का वर्णन कई जगह किया गया है।
रहस्यमयी विद्या है सामुद्रिक शास्त्र
यह एक रहस्यमयी शास्त्र है जो व्यक्ति के संपूर्ण चरित्र और भविष्य को खोलकर रख देता है।
सामुद्रिक शास्त्र मुख, मुखमण्डल तथा सम्पूर्ण शरीर के अध्ययन की विद्या है। भारत में यह यह वैदिक काल से ही प्रचलित है। गरुड़ पुराण में सामुद्रिक शास्त्र का वर्णन है। हस्तरेखा विज्ञान तो सामुद्रिक विद्या की वह शाखा मात्र है।
सामुद्रिक शास्त्र का ज्ञान प्राचीनकाल से ही भारत में प्रचलित रहा है। मूलत: यह ज्ञान दक्षिण भारत में ज्यादा प्रचलित रहा। इसके जानकार दक्षिण भारत में ज्यादा पाए जाते हैं। इस विज्ञान का उल्लेख प्राचीनकालीन ज्योतिष शास्त्र में भी मिलता है।
ज्योतिष शास्त्र की भांति सामुद्रिक शास्त्र का उद्भव भी 5000 वर्ष पूर्व भारत में ही हुआ था। पराशर, व्यास, सूर्य, भारद्वाज, भृगु, कश्यप, बृहस्पति, कात्यायन आदि महर्षियों ने इस विद्या की खोज की।
इस शास्त्र का उल्लेख वेदों और स्कंद पुराण, बाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों के साथ-साथ जैन तथा बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है। इसका प्रचार प्रसार सर्वप्रथम ऋषि समुद्र ने किया इसलिए उन्हीं के नाम पर सामुद्रिक शास्त्र हो गया। भारत से यह विद्या चीन, यूनान, रोम और इसराइल तक पहुंची और आगे चलकर यह संपूर्ण योरप में फैल गई।
कहते हैं कि ईसा पूर्व 423 में यूनानी विद्वान अनेक्सागोरस यह शास्त्र पढ़ाया करते थे। इतिहासकारों अनुसार हिपांजस को हर्गल की वेदी पर सुनहरे अक्षरों में लिखी सामुद्रिक ज्ञान की एक पुस्तक मिली जो सिकंदर महान को भेंट की गई थी। प्लेटो, अरिस्टॉटल, मेगनस, अगस्टस, पैराक्लीज तथा यूनान के अन्य दार्शनिक भारत के ज्योतिष और सामुद्रिक ज्ञान से परिचित थे।
'समुद्रिका-तिलक'
1700 ई. में लिखी गई यह पुस्तक समुद्रिका-तिलक के बहुत करीब है। समुद्रिका, जिसे सामान्य शीर्षक समुद्रिका-शास्त्र या समुद्रिका-लक्षण के नाम से भी जाना जाता है, एक अनाम रचना है जिसके दो संस्करण हैं । पहला संस्करण पूरे भारत में पाया जाता है, और एक पांडुलिपि में मूल-देव को इसका मुख्य लेखक बताया गया है, साथ ही वाम-देव को बीस श्लोकों का लेखक बताया गया है।
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इस पुस्तक की उपयोगिता असंदिग्ध और निर्विवाद है । इसका अध्येता असाधारण क्षमता, अलौकिक दृष्टि, अद्भुत वाणी और अतर्क्य ज्ञान से संपन्न हो जाता है। इसका अध्येता किसी भी व्यक्ति को देखते ही उसके गुण , स्वभाव , शिक्षा , आर्थिक स्तर , आयु , परिवार एवं जीवन की भावी घटनाओं के संबंध में भविष्यवाणी कर सकता है ।
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सामुद्रिकशास्त्र
कैसे पुरुष होते हैं भाग्यशाली?
सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार पुरुषों के अंगों की कैसी बनावट उनके भाग्यशाली होने का संकेत देती है आइए इस बारे में जानें…
1. सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार जिन पुरुषों के पैरों के तलवे में चक्र, कुंडल अथवा अंकुश के निशान मौजूद होते हैं, वे लोग अच्छे कारोबारी या कोई बड़ा अधिकारी बनते हैं।
2. अगर किसी आदमी की हथेली की बीचों-बीच तिल होता है तो ऐसे लोगों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें वाहन सुख और समाज में खूब मांग मान-सम्मान प्राप्त होता है। साथ ही ऐसे लोगों के पास पैसों की भी कमी नहीं होती है।
3. अगर किसी पुरुष की छाती चौड़ी और नाक लंबी हो तो यह एक शुभ संकेत माना जाता है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार ऐसे लोग कम उम्र में ही काफी तरक्की पा लेते हैं। साथ ही इन्हें प्रॉपर्टी में निवेश करना अधिक पसंद होता है। वहीं ऐसे पुरुषों को धन लाभ भी अच्छा होता है।
4. सामुद्रिक शास्त्र कहता है कि जिन पुरुषों की छाती पर काफी बाल होते हैं उन्हें जीवन में खूब सुख और धन प्राप्त होता है। ऐसे लोग स्वभाव से काफी संतुष्ट होते हैं।
5. इसके अलावा पुरुषों के हाथ की 6 उंगलियां उनके भाग्यशाली और धनी होने का संकेत होती हैं। ये लोग स्वभाव से बहुत मेहनती होते हैं, जिसके कारण इनकी आर्थिक स्थिति भी काफी मजबूत रहती है।
6. जिन पुरुषों के पैर में कमल, रथ अथवा वाण जैसे चिन्ह मौजूद होते हैं, उन्हें जीवन में कभी भी सुख-सुविधाओं की कमी नहीं होती है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार माना जाता है कि ऐसे लोग शानो-शौकत से अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
कैसे पुरुष होते हैं भाग्यशाली?
सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार पुरुषों के अंगों की कैसी बनावट उनके भाग्यशाली होने का संकेत देती है आइए इस बारे में जानें…
1. सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार जिन पुरुषों के पैरों के तलवे में चक्र, कुंडल अथवा अंकुश के निशान मौजूद होते हैं, वे लोग अच्छे कारोबारी या कोई बड़ा अधिकारी बनते हैं।
2. अगर किसी आदमी की हथेली की बीचों-बीच तिल होता है तो ऐसे लोगों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें वाहन सुख और समाज में खूब मांग मान-सम्मान प्राप्त होता है। साथ ही ऐसे लोगों के पास पैसों की भी कमी नहीं होती है।
3. अगर किसी पुरुष की छाती चौड़ी और नाक लंबी हो तो यह एक शुभ संकेत माना जाता है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार ऐसे लोग कम उम्र में ही काफी तरक्की पा लेते हैं। साथ ही इन्हें प्रॉपर्टी में निवेश करना अधिक पसंद होता है। वहीं ऐसे पुरुषों को धन लाभ भी अच्छा होता है।
4. सामुद्रिक शास्त्र कहता है कि जिन पुरुषों की छाती पर काफी बाल होते हैं उन्हें जीवन में खूब सुख और धन प्राप्त होता है। ऐसे लोग स्वभाव से काफी संतुष्ट होते हैं।
5. इसके अलावा पुरुषों के हाथ की 6 उंगलियां उनके भाग्यशाली और धनी होने का संकेत होती हैं। ये लोग स्वभाव से बहुत मेहनती होते हैं, जिसके कारण इनकी आर्थिक स्थिति भी काफी मजबूत रहती है।
6. जिन पुरुषों के पैर में कमल, रथ अथवा वाण जैसे चिन्ह मौजूद होते हैं, उन्हें जीवन में कभी भी सुख-सुविधाओं की कमी नहीं होती है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार माना जाता है कि ऐसे लोग शानो-शौकत से अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
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क्या मोक्ष का हो सकता है पूर्वाभास
मोक्ष एक परम आकांक्षा है, परंतु उसके लिए पात्रता भी आवश्यक है। इस पात्रता की परिभाषा भी समझनी होगी। मोक्ष का वास्तविक अर्थ है जन्म और मृत्यु के आवागमन से मुक्ति और परमब्रह्म में विलीन होना। यह भी तथ्य है कि एक जैसे तत्व ही एक दूसरे में विलय हो सकते हैं। ईश्वर यानी ब्रह्म निर्गुण तथा सम स्थिति में है। इसका अर्थ है कि वह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से मुक्त है। यदि प्राणी भी उसमें विलीन होना चाहता है तो उसे भी इसी स्थिति में आना पड़ेगा। तभी वह मोक्ष का पात्र बनने में सक्षम हो सकेगा। इसीलिए प्रत्येक धर्म में यही शिक्षा दी गई है कि यदि ईश्वर की प्राप्ति करनी है तो पहले बुराइयों से मुक्ति पानी होगी।
सनातन धर्म में जीवन को व्यवस्थित करने के लिए उसे चार भागों में विभाजित किया गया है। ये हैं-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। वर्तमान में 60 वर्ष की आयु के बाद मनुष्य का एक प्रकार से वानप्रस्थ आरंभ हो जाता है। जीवन के इस पड़ाव पर उसे सांसारिक बुराइयों से दूर होने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए उसे पतंजलि के अष्टांग योग का सहारा लेना चाहिए। यदि वह इसके पहले दो कदम यानी यम-सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, असते और अपरिग्रह तथा नियम-ईश्वर की उपासना, स्वाध्याय, शौच, तप, संतोष और स्वाध्याय को ही अपना ले तो बहुत हितकारी होगा।
इसमें अपरिग्रह से तात्पर्य है आवश्यकता से अधिक भंडारण न करना। असते अर्थात् किसी प्रकार की चोरी न करना। इन दोनों कदमों से ही मनुष्य की मानसिकता बदल जाएगी और परम शांति तथा सम स्थिति का अनुभव होगा। ऐसी अवस्था जिसमें कोई कामना या भय नहीं रहेगा। यदि यह अवस्था स्थायी रूप से प्राप्त हो जाती है तो मनुष्य को यह आभास हो जाना चाहिए कि वह मोक्ष का पात्र बन गया है और अब उसे सर्वशक्तिमान स्वयं अपने में विलीन करके परम शांति प्रदान करेंगे। इसी को मोक्ष का आभास भी कहा जाता है।
मोक्ष एक परम आकांक्षा है, परंतु उसके लिए पात्रता भी आवश्यक है। इस पात्रता की परिभाषा भी समझनी होगी। मोक्ष का वास्तविक अर्थ है जन्म और मृत्यु के आवागमन से मुक्ति और परमब्रह्म में विलीन होना। यह भी तथ्य है कि एक जैसे तत्व ही एक दूसरे में विलय हो सकते हैं। ईश्वर यानी ब्रह्म निर्गुण तथा सम स्थिति में है। इसका अर्थ है कि वह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से मुक्त है। यदि प्राणी भी उसमें विलीन होना चाहता है तो उसे भी इसी स्थिति में आना पड़ेगा। तभी वह मोक्ष का पात्र बनने में सक्षम हो सकेगा। इसीलिए प्रत्येक धर्म में यही शिक्षा दी गई है कि यदि ईश्वर की प्राप्ति करनी है तो पहले बुराइयों से मुक्ति पानी होगी।
सनातन धर्म में जीवन को व्यवस्थित करने के लिए उसे चार भागों में विभाजित किया गया है। ये हैं-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। वर्तमान में 60 वर्ष की आयु के बाद मनुष्य का एक प्रकार से वानप्रस्थ आरंभ हो जाता है। जीवन के इस पड़ाव पर उसे सांसारिक बुराइयों से दूर होने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए उसे पतंजलि के अष्टांग योग का सहारा लेना चाहिए। यदि वह इसके पहले दो कदम यानी यम-सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, असते और अपरिग्रह तथा नियम-ईश्वर की उपासना, स्वाध्याय, शौच, तप, संतोष और स्वाध्याय को ही अपना ले तो बहुत हितकारी होगा।
इसमें अपरिग्रह से तात्पर्य है आवश्यकता से अधिक भंडारण न करना। असते अर्थात् किसी प्रकार की चोरी न करना। इन दोनों कदमों से ही मनुष्य की मानसिकता बदल जाएगी और परम शांति तथा सम स्थिति का अनुभव होगा। ऐसी अवस्था जिसमें कोई कामना या भय नहीं रहेगा। यदि यह अवस्था स्थायी रूप से प्राप्त हो जाती है तो मनुष्य को यह आभास हो जाना चाहिए कि वह मोक्ष का पात्र बन गया है और अब उसे सर्वशक्तिमान स्वयं अपने में विलीन करके परम शांति प्रदान करेंगे। इसी को मोक्ष का आभास भी कहा जाता है।
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हस्तरेखाशास्त्र
हाथों में कहां रहते हैं राशि, ग्रह, शंख और चक्र
यदि आप हस्तरेखा विशेषज्ञ नहीं भी बनना चाहते हैं तो भी आपको यह जानना चाहिए कि हाथों में ग्रह और राशि का स्थान कौन सा होता है और उसका प्रभाव कैसा रहता है? आओ जानते हैं इस संबंध में संक्षिप्त, सामान्य लेकिन रोचक जानकारी हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार जिसे जानकर आप अपना थोड़ा-बहुत भविष्य जान ही जाएंगे।
हाथ और हथेली में ग्रह और उनके पर्वत-
एक हाथ में 4 अंगुलियां और 1 अंगूठा होता है। अंगुलियों में 3 पोरे और अंगूठे में 2 पोरे होते हैं। हथेली में ढेर सारी रेखाएं होती हैं। पहली तर्जनी अंगुली गुरु की अंगुली है। दूसरी अंगुली मध्यमा शनि की अंगुली। तीसरी अनामिका अंगुली सूर्य की अंगुली और चौथी सबसे छोटी अंगुली बुध की अंगुली है।
तर्जनी अंगुली के नीचे के हिस्से को गुरु पर्वत कहते हैं। इसी तरह मध्यमा के नीचे शनि पर्वत, अनामिका के नीचे सूर्य, सबसे छोटी कनिष्ठा अंगुली के नीचे बुध का पर्वत होता है। बुध के पर्वत के नीचे उर्ध्व मंगल, सूर्य और शनि पर्वत के नीचे मध्यम मंगल और गुरु पर्वत के नीचे निम्न मंगल होता है। संपूर्ण अंगूठा ही शुक्र का होता है।
अंगूठे के नीचे शुक्र का स्थान है और उसके सामने हथेली के दूसरी ओर चंद्र का स्थान है। इसी तरह हथेली के बीचोबीच राहु और मणिबद्ध अर्थात कलाई में केतु का स्थान होता है जबकि लाल किताब के अनुसार कलाई में राहु और केतु दोनों होते हैं। जीवनरेखा की समाप्ति स्थान कलाई के ऊपर पर बना राहु पर्वत होता है।
बृहस्पति पर्वत पर चक्र का होना धनवान होने का संकेत है। शनि पर्वत पर चक्र होना अचानक धनलाभ करता है। सूर्य पर्वत पर चक्र होना व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा दिलाता है। बुध पर्वत पर चक्र होना सफल व्यापारी और वक्त बनाता है। चंद्र, मंगल और शुक्र पर्वत पर चक्र होना अशुभ है।
रेखाएं- बुध पर्वत से निकलकर गुरु पर्वत की ओर जाने वाली रेखा हृदयरेखा होती है। गुरु पर्वत के नीचे जीवनरेखा से निकलकर चंद्र पर्वत की ओर जाने वाली रेखा मस्तिष्क रेखा होती है। गुरु पर्वत और निम्न मंगल पर्वत के बीच से निकलकर कलाई की ओर जाने वाली रेखा जीवनरेखा होती है। राहु या केतु पर्वत से निकलकर शनि या गुरु पर्वत की ओर जाने वाली रेखा भाग्य रेखा होती है। केतु पर्वत के कुछ ऊपर से निकलकर बुध पर्वत की ओर जाने वाली रेखा स्वास्थ्य रेखा होती है।
सभी लोगों के हाथ में बुध पर्वत के पास और मस्तिष्क रेखा के ऊपर संतान और विवाह की छोटी-छोटी रेखाएं होती हैं। कुछ लोगों के हाथ में निम्न मंगल से ही मंगल रेखा निकलकर शुक्र पर्वत से होती हुए नीचे तक जाती है। कुछ लोगों के हाथ में चंद्र पर्वत पर यात्रा और प्रज्ञा रेखा होती है। जीवनरेखा से ही नीचे से निकलकर बुध की ओर एक बुध रेखा जाती है। सूर्य और शनि पर्वत के नीचे शुक्र वलय होता है। शनि के नीचे शनि और बुध के नीचे बुध वलय होता है। वलय चंद्राकार का होता है।
जीवनरेखा- ऐसा माना जाता है कि जीवनरेखा पूर्ण और पुष्ट है तो जीवन भी पूर्ण होगा। यदि यह रेखा अपूर्ण हो तो स्वास्थ्य संबंधी परेशानी झेलना पड़ती है। यदि यह रेखा गहरी हो तो जीवन आसान और रोचांचभरा होता है किंतु यह हल्की है तो जीवन में कोई आनंद या रोमांच नहीं होता है।
हृदय रेखा- हृदय रेखा लंबी और गहरी है तो व्यक्ति खुले और पुष्ट हृदय वाला होगा। लेकिन यह रेखा अधिक लंबी अर्थात हथेली के दोनों किनारों को टच कर रही है तो व्यक्ति जीवनसाथी पर निर्भर रहता है। यदि यह रेखा छोटी है तो व्यक्ति स्वार्थी और कृपण हो होगा, लेकिन यदि यह रेखा एकदम सीधी है तो व्यक्ति रोमांटिक होगा।
मस्तिष्क रेखा- मस्तिष्क रेखा यदि साधारण रूप से लंबी है तो व्यक्ति स्मृतिवान होगा, साथ ही वह किसी कार्य को सोच-समझकर करने वाला होगा। लेकिन यह रेखा अधिक लंबी है तो व्यक्ति सफल और साहसी होगा और यह रेखा यदि कर्व लिए हुए है तो व्यक्ति क्रिएटिव एवं आदर्शवादी होगा।
भाग्य रेखा- भाग्य रेखा यदि सरल और स्पष्ट है तो व्यक्ति का भाग्य साथ देगा लेकिन यह रेखा टूटी-फूटी और अस्पष्ट है तो कर्म पर ही निर्भर रहना होगा। यह भी मान्यता है कि यदि यह रेखा कलाई से निकलकर यदि गुरु पर्वत में मिल जाए तो व्यक्ति बहुत ही ज्यादा भाग्यशाली होता है लेकिन शनि पर्वत में मिल जाए तो भाग्य की कोई गारंटी नहीं।
विवाह रेखा- इसे प्रेम रेखा भी कहते हैं। यह एक अथवा एक से अधिक होती है। यदि यह रेखा गहरी और लंबी होती है तो व्यक्ति अपने रिश्तों को महत्व देता है और वह सचमुच में ही प्रेम करता है। किंतु यदि यह रेखा छोटी और हल्की है तो व्यक्ति को अपने रिश्तों की परवाह नहीं है, ऐसा माना जाता है। विवाह रेखा के ऊपर ही संतान की रेखा होती है।
हाथों में कहां रहते हैं राशि, ग्रह, शंख और चक्र
यदि आप हस्तरेखा विशेषज्ञ नहीं भी बनना चाहते हैं तो भी आपको यह जानना चाहिए कि हाथों में ग्रह और राशि का स्थान कौन सा होता है और उसका प्रभाव कैसा रहता है? आओ जानते हैं इस संबंध में संक्षिप्त, सामान्य लेकिन रोचक जानकारी हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार जिसे जानकर आप अपना थोड़ा-बहुत भविष्य जान ही जाएंगे।
हाथ और हथेली में ग्रह और उनके पर्वत-
एक हाथ में 4 अंगुलियां और 1 अंगूठा होता है। अंगुलियों में 3 पोरे और अंगूठे में 2 पोरे होते हैं। हथेली में ढेर सारी रेखाएं होती हैं। पहली तर्जनी अंगुली गुरु की अंगुली है। दूसरी अंगुली मध्यमा शनि की अंगुली। तीसरी अनामिका अंगुली सूर्य की अंगुली और चौथी सबसे छोटी अंगुली बुध की अंगुली है।
तर्जनी अंगुली के नीचे के हिस्से को गुरु पर्वत कहते हैं। इसी तरह मध्यमा के नीचे शनि पर्वत, अनामिका के नीचे सूर्य, सबसे छोटी कनिष्ठा अंगुली के नीचे बुध का पर्वत होता है। बुध के पर्वत के नीचे उर्ध्व मंगल, सूर्य और शनि पर्वत के नीचे मध्यम मंगल और गुरु पर्वत के नीचे निम्न मंगल होता है। संपूर्ण अंगूठा ही शुक्र का होता है।
अंगूठे के नीचे शुक्र का स्थान है और उसके सामने हथेली के दूसरी ओर चंद्र का स्थान है। इसी तरह हथेली के बीचोबीच राहु और मणिबद्ध अर्थात कलाई में केतु का स्थान होता है जबकि लाल किताब के अनुसार कलाई में राहु और केतु दोनों होते हैं। जीवनरेखा की समाप्ति स्थान कलाई के ऊपर पर बना राहु पर्वत होता है।
बृहस्पति पर्वत पर चक्र का होना धनवान होने का संकेत है। शनि पर्वत पर चक्र होना अचानक धनलाभ करता है। सूर्य पर्वत पर चक्र होना व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा दिलाता है। बुध पर्वत पर चक्र होना सफल व्यापारी और वक्त बनाता है। चंद्र, मंगल और शुक्र पर्वत पर चक्र होना अशुभ है।
रेखाएं- बुध पर्वत से निकलकर गुरु पर्वत की ओर जाने वाली रेखा हृदयरेखा होती है। गुरु पर्वत के नीचे जीवनरेखा से निकलकर चंद्र पर्वत की ओर जाने वाली रेखा मस्तिष्क रेखा होती है। गुरु पर्वत और निम्न मंगल पर्वत के बीच से निकलकर कलाई की ओर जाने वाली रेखा जीवनरेखा होती है। राहु या केतु पर्वत से निकलकर शनि या गुरु पर्वत की ओर जाने वाली रेखा भाग्य रेखा होती है। केतु पर्वत के कुछ ऊपर से निकलकर बुध पर्वत की ओर जाने वाली रेखा स्वास्थ्य रेखा होती है।
सभी लोगों के हाथ में बुध पर्वत के पास और मस्तिष्क रेखा के ऊपर संतान और विवाह की छोटी-छोटी रेखाएं होती हैं। कुछ लोगों के हाथ में निम्न मंगल से ही मंगल रेखा निकलकर शुक्र पर्वत से होती हुए नीचे तक जाती है। कुछ लोगों के हाथ में चंद्र पर्वत पर यात्रा और प्रज्ञा रेखा होती है। जीवनरेखा से ही नीचे से निकलकर बुध की ओर एक बुध रेखा जाती है। सूर्य और शनि पर्वत के नीचे शुक्र वलय होता है। शनि के नीचे शनि और बुध के नीचे बुध वलय होता है। वलय चंद्राकार का होता है।
जीवनरेखा- ऐसा माना जाता है कि जीवनरेखा पूर्ण और पुष्ट है तो जीवन भी पूर्ण होगा। यदि यह रेखा अपूर्ण हो तो स्वास्थ्य संबंधी परेशानी झेलना पड़ती है। यदि यह रेखा गहरी हो तो जीवन आसान और रोचांचभरा होता है किंतु यह हल्की है तो जीवन में कोई आनंद या रोमांच नहीं होता है।
हृदय रेखा- हृदय रेखा लंबी और गहरी है तो व्यक्ति खुले और पुष्ट हृदय वाला होगा। लेकिन यह रेखा अधिक लंबी अर्थात हथेली के दोनों किनारों को टच कर रही है तो व्यक्ति जीवनसाथी पर निर्भर रहता है। यदि यह रेखा छोटी है तो व्यक्ति स्वार्थी और कृपण हो होगा, लेकिन यदि यह रेखा एकदम सीधी है तो व्यक्ति रोमांटिक होगा।
मस्तिष्क रेखा- मस्तिष्क रेखा यदि साधारण रूप से लंबी है तो व्यक्ति स्मृतिवान होगा, साथ ही वह किसी कार्य को सोच-समझकर करने वाला होगा। लेकिन यह रेखा अधिक लंबी है तो व्यक्ति सफल और साहसी होगा और यह रेखा यदि कर्व लिए हुए है तो व्यक्ति क्रिएटिव एवं आदर्शवादी होगा।
भाग्य रेखा- भाग्य रेखा यदि सरल और स्पष्ट है तो व्यक्ति का भाग्य साथ देगा लेकिन यह रेखा टूटी-फूटी और अस्पष्ट है तो कर्म पर ही निर्भर रहना होगा। यह भी मान्यता है कि यदि यह रेखा कलाई से निकलकर यदि गुरु पर्वत में मिल जाए तो व्यक्ति बहुत ही ज्यादा भाग्यशाली होता है लेकिन शनि पर्वत में मिल जाए तो भाग्य की कोई गारंटी नहीं।
विवाह रेखा- इसे प्रेम रेखा भी कहते हैं। यह एक अथवा एक से अधिक होती है। यदि यह रेखा गहरी और लंबी होती है तो व्यक्ति अपने रिश्तों को महत्व देता है और वह सचमुच में ही प्रेम करता है। किंतु यदि यह रेखा छोटी और हल्की है तो व्यक्ति को अपने रिश्तों की परवाह नहीं है, ऐसा माना जाता है। विवाह रेखा के ऊपर ही संतान की रेखा होती है।
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