ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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हमारी संस्कृति हमारा अभिमान

*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

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Forwarded from The Narrative
बटेश्वर मंदिर समूह, मुरैना , ग्वालियर, मध्यप्रदेश 🛕

यह एक प्राचीन मन्दिरों का बड़ा समूह है जो कि भारत के मध्य प्रदेश राज्य में ग्वालियर के पास मुरैना शहर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

बटेश्वर मंदिर समूह लगभग 200 बलुआ पत्थर से बने छोटे और बडे मंदिरों का एक समूह है।

यह मंदिर अब खंडहर बन चुके है। यह मन्दिरों का समूह लगभग 25 एकड जमीन पर फैला हुआ है।

मध्यप्रदेश के पुरातत्व निदेशालय के अनुसार,
200 मंदिरों का यह समूह गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासनकाल के दौरान बनाया गया था।

ये सभी मंदिर भगवान शिव, विष्णु और मां शक्ति को समर्पित है। इन मंदिरों के समूह की दीवारों पर कई देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी देखा जा सकता है।

भारतीय मंदिर वास्तुकला के विशेषज्ञों द्वारा माना जाता है कि इन मंदिरों का निर्माण 8 वीं शताब्दी के आसपास किया गया था ।

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Forwarded from The Narrative
दशावतार मंदिर, देवगढ़ उत्तर प्रदेश 🛕

दशावतार मंदिर उत्तर प्रदेश के बेतवा नदी घाटी में, झांसी से 125 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर प्रदेश के देवगढ़ में स्थित 6 वीं शताब्दी का विष्णु हिंदू मंदिर है।

इसकी एक सरल, एक कोशिका वर्गाकार योजना है और यह सबसे पुराने हिंदू पत्थर मंदिरों में से एक है जहां आज भी पूजा अर्चना की जाती है ।

दशावतार मंदिर उत्तर भारत का सबसे पहला ज्ञात मंदिर है और यह भगवान विष्णु को समर्पित है। इसका निर्माण गुप्त काल के दौरान हुआ था।

मंदिर में भगवान विष्णु के दस अवतारों को दर्शाया गया है और इसमें कुछ रोचक विशेषताएं हैं, जैसे गंगा और यमुना नदी की नक्काशी, पवित्र गर्भगृह और वैष्णव पौराणिक कथाओं के नक्काशीदार पैनलों दर्शाई गयी है।

मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति भी है, जो नर नारायण तपस्या की स्थिति में है और एक अन्य जिसमे उन्हें शेषषाई मुद्रा में दर्शाया गया है।

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Forwarded from The Narrative
विजया विट्टला मंदिर , हम्पी , कर्नाटक 🛕

विजयनगर साम्राज्य के प्रतापी राजा देवराय ने यह मंदिर 15 वीं - 16 वीं सदी में बनवाया।भगवान विष्णु के इस मंदिर की वास्तुकला और विशेषताएं अद्वितीय हैं ।

इसका मुख्य हाल , आंतरिक प्रागण , मूर्तियां अद्भुत हैं । पत्थर रथ इस मंदिर का एक और बड़ा आकर्षण है , इसका सौंदर्य मंत्रमुग्ध कर देता है । इस पत्थर रथ को 50 रुपये के नोट में प्रिंट किया गया है ।भारत में तीन प्रसिद्ध पत्थर रथ हैं पहला यह ही , दूसरा कोणार्क ( ओडीशा ) , तीसरा महाबलीपुरम ( तमिलनाडु )

रंगा मंडप के संगीत स्तंभ इस मंदिर के प्रसिद्व केंद्र हैं , इन संगीत स्तंभों को सारेगामा स्तंभों के नाम से भी जाना जाता है । जब इन स्तंभों को धीरे धीरे हाथ से थपकी देते हैं तो संगीत की विभिन्न ध्वनियाँ यहां से निकलती हैं ।
अंग्रेजों ने इनमें से 2 संगीत स्तम्भों को काट दिया था ताकि वो संगीत के पीछे की रचना समझ सकें पर वो कुछ भी समझने में असफल रहे ।

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Forwarded from मंदिर • Temple (Alok Sanatan)
पद्मनाभस्वामी मंदिर भारत के केरल राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम में स्थित एक हिंदू मंदिर है। मलयालम में तिरुवनंतपुरम शहर का नाम "भगवान अनंत का शहर", (दिव्य सर्प का शहर) में अनुवाद किया गया है, जो पद्मनाभस्वामी मंदिर के देवता को संदर्भित करता है। मंदिर चेरा शैली और वास्तुकला की द्रविड़ शैली की एक जटिल संलयन में बनाया गया है, जिसमें ऊंची दीवारें और 16 वीं शताब्दी का गोपुर है।
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जय सनातन
जय श्री राम

@Mandir
Forwarded from The Narrative
मदुरई मीनाक्षी अम्मन मंदिर के 1000 स्तंभ
प्राचीन भारत का ध्वनिक चमत्कार 🛕

तमिलनाडु के मदुरै मीनाक्षी अम्मन मंदिर के 1000 स्तंभ हॉल, वास्तव में कुल 985 स्तंभ हैं।

आयराम (हजार) काल (स्तंभ) मंडपम मदुरै मीनाक्षी मंदिर के भीतर है। जैसे ही आप मंडपम में प्रवेश करते हैं, आप स्तंभों पर मूर्तियां देख सकते हैं और मध्य गलियारा आपको नटवर प्रतिमा की ओर ले जाता है।
भारतीय नृत्य के पारखी नृत्य "मुद्रा", पोशाक और संगीत वाद्ययंत्र पर प्रदर्शन का आनंद लेंगे।

यह एकदम सही साउंड इंजीनियरिंग तकनीक का एक शास्त्रीय उदाहरण है क्योंकि बिल्कुल "जीरो इको" है।

इसके अलावा, गर्भगृह के अंदर, ध्वनि का स्तर 40 डेसीबल से ऊपर नहीं जाता है।

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Forwarded from The Narrative
केदारनाथ मंदिर 🛕

हिमालय के केदार शृंग पर अवस्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक केदारनाथ बाबा का मंदिर तीन ओर से बर्फीली पहाड़ियों से घिरा है. पाँच पवित्रम नदियों के प्रयागस्थल पर स्थित इस मंदिर का सर्वप्रथम निर्माण पांडवों द्वारा करवाया गया था.

पौराणिक इतिहास के अनुसार नर एवं नारायण ऋषि के तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने यहाँ लिंग का रूप धारण किया.

प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को मंदिर का पट बन्द होता है जहाँ दीप प्रज्वलित कर भगवान शिव को उखीमठ लाया जाता है. 6 माह बाद जब अक्षय तृतीया तिथि के समीप पट खोला जाता है तो दीपक जलता हुआ ही रहता है.

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क्या यह आधुनिक तकनीकों वाला युग नींव खोदे बिना एक गगनचुंबी इमारत के निर्माण की कल्पना कर सकता है ?

यह तमिलनाडु का बृहदेश्वर मंदिर है, यह बिना नींव का मंदिर है । इसे इंटरलॉकिंग विधि का उपयोग करके बनाया गया है इसके निर्माण में पत्थरों के बीच कोई सीमेंट, प्लास्टर या किसी भी तरह के चिपकने वाले पदार्थों का प्रयोग नहीं किया गया है इसके बावजूद पिछले 1000 वर्षों में 6 बड़े भूकंपो को झेलकर भी आज अपने मूल स्वरूप में है ।

216 फीट ऊंचा यह मंदिर उस समय दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर था। इसके निर्माण के कई वर्षों बाद बनी पीसा की मीनार खराब इंजीनियरिंग की वजह से समय के साथ झुक रही है लेकिन बृहदेश्वर मंदिर पीसा की मीनार से भी प्राचीन होने के बाद भी अपने अक्ष पर एक भी अंश का झुकाव नहीं रखता ।

इस मंदिर के निर्माण के लिए 1.3 लाख टन ग्रेनाइट का उपयोग किया गया था जिसे 60 किलोमीटर दूर से 3000 हाथियों द्वारा ले जाया गया था। इस मंदिर का निर्माण पृथ्वी को खोदे बिना किया गया था यानी यह मंदिर बिना नींव का मंदिर है ।

मंदिर टॉवर के शीर्ष पर स्थित शिखर का वजन 81 टन है आज के समय में इतनी ऊंचाई पर 81 टन वजनी पत्थर को उठाने के लिए आधुनिक मशीनें फेल हो जाएंगी ।

बृहदेश्वर मंदिर के निर्माण के लिए प्रयोग किए गए इंजीनियरिंग के स्तर को दुनिया के सात आश्चर्यों में से किसी भी आश्चर्य के निर्माण की तकनीक मुकाबला नहीं कर सकती और आज की तकनीकों को देखकर भविष्य में भी कई सदियों तक ऐसा निर्माण सम्भव नहीं दिखता है ।
Forwarded from The Narrative
भारत का प्राचीन विमान शास्त्र 🛸

राइट बंधुओं ने 17 दिसंबर 1903 में पहला विमान उड़ाया पर भारत में यह हजारों वर्ष पूर्व बनाया जा चुका था ।
विद्या वाचस्पति पं मधुसूदन सरस्वती 'इंद्र विजय' नामक ग्रंथ में ऋग्वेद के 36वें सूक्त के प्रथम मंत्र का अर्थ लिखते हुए कहते हैं कि ऋषियों ने तीन पहियों वाला ऐसा रथ बनाया था जो अंतरिक्ष में उड़ सकता था ।
नासा ने 1973 में भारत में महर्षि भारद्वाज रचित 'यंत्र सर्वस्व' ग्रंथ की बड़ी खोजबीन की , क्योंकि इसका एक भाग वैमानिक शास्त्र है । वैमानिक शास्त्र के पहले प्रकरण में प्राचीन विज्ञान विषय के 25 ग्रंथों की सूची है । इस ग्रंथ में भारद्वाज मुनि ने विमान की परिभाषा , विमान का पायलट , आकाश मार्ग , वैमानिक के कपड़े , विमान के कलपुर्जे , ऊर्जा , यंत्र तथा उन्हें बनाने के लिए विभिन्न धातुओं का वर्णन किया है ।
इस तरह के कई प्रमाण यह साबित करते हैं कि भारतीय विमान शास्त्र एक पूर्ण विकसित और व्यवहार में उपयोग हो रहा विज्ञान था ।

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