पुराण प्रवचन
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बौद्ध स्तूपों में अद्भुत उड़ने का विज्ञान

सांची बौद्ध स्तूप के अनुसार गौतम बुद्ध तो हवा में उड़ जाते थे और उनके पिता शुद्धोधन अपने बेटे बुद्ध को हवा में उड़ते देख प्रार्थना भी करते थे 😂

जिनके खुद के हाथी उड़ता है और बुद्ध उड़ता है वह लोग हनुमान जी के उड़ने पर सवाल उठाते हैं? 🤣

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क्या प्राचीन बौद्धों में स्त्री को बुद्ध होने का अधिकार थी ?

फाहियान जो ४ थी शताब्दी में चीन से भारत आया था उसने अपने यात्रा वृत्तान्त में बुद्ध से जुड़े एक प्राचीन घटना का वर्णन किया है जिसमें वह लिखता है कि -
बुद्ध स्वर्ग से सीढ़ी लेके पृथ्वी पर आने वाले थे उस समय एक उत्पला नाम के भिक्षुणी की इच्छा थी कि वो बुद्ध का प्रथम दर्शन करे।

लेकिन स्त्री होने के कारण उसे ऐसा करने का कोई भी अधिकार नहीं थी।

अर्थात् स्त्री का बुद्ध बनना तो दूर की बात है स्त्रियों को बुद्ध के प्रथम दर्शन तक का कोई अधिकार नहीं थी। केवल पुरुषों को ही ऐसी अधिकार थी।
जब प्रथम दर्शन जैसी छोटी बात का भी बुद्ध ने स्त्रियों को अधिकार नहीं दिया तो स्त्री को बुद्ध बनना तो कल्पना है बस इन लोगों का।

अब मैं बता दूं यह स्वर्ग से सीढ़ी लेकर बुद्ध का आने वाला घटना का चित्रण तो सांची स्तूप में भी अंकित है।

अर्थात् यह वृतांत 3rd Century BCE में भी बौद्धों में थी जिसका उल्लेख फाहियान ने भी ४ थी शताब्दी में किया था।
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पहली बार अंबेडकर को देख कर खुशी हुई मन को चैन हुआ कि अंबेडकर का भविष्य सही हाथों में है
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✨प्राचीन भारत: विज्ञान और चिकित्सा का वैश्विक केंद्र✨

ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, खलीफाओं के काल से भी बहुत पहले भारत चिकित्सा और विज्ञान की शिक्षा का मुख्य केंद्र था। इसी ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रसिद्ध सस्सानी(फ़ारसी) राजा नोशीरवान(खुसरो 1) {A.D. 531-572} के समय में बरज़ौये (Barzouhyeh) ने विशेष रूप से भारत की यात्रा की थी।

Source- A HISTORY OF HINDU CHEMISTRY FROM THE EARLIEST TIMES TO THE MIDDLE OF THE 16th CEN. A.D. with SANSKRIT TEXTS, VARIANTS, TRANSLATION & ILLUSTRATIONS BY P.C.RAY, VOL 1

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कुछ चिमटे मीमटे लोग बोलते हैं की मनुस्मृति में लिखा है स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं होती वह विवाह से पूर्व पिता के, विवाह के बाद पति के और वृद्ध अवस्था में पुत्र के रक्षण में रहना चाहिए। इसलिए मनुस्मृति स्त्री विरोधी है।

जब की यह नियम केवल स्त्रीयों के लिए नहीं है अपितु महाभारत (12/266/11) में पुत्रों के लिए भी आया है की-
पुत्र कभी स्वतंत्र नहीं होता वो सदैव ही माता पिता के इच्छा के अधीन होता है।

सामाजिक वास्तविकता यही है की कोई भी व्यक्ति का स्वतंत्रता कभी निरंकुश नही हो सकता चाहे स्त्री हो या पुरुष उनके स्वतंत्रता हमेशा लिमिटेड ही होता है। देश के द्वारा नागरिक को दिया हुआ मौलिक अधिकार भी निरंकुश नहीं होता।
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स्त्री स्वतंत्र क्यों नहीं है? अस्वतंत्रता का केवल इतना है कि स्त्री की रक्षा उसका पुरुष करेगा अब कोई इसे वास्तविक अस्वतंत्रता समझा ले वह मूर्ख है एवं रक्षा के लिए ही अ स्वतंत्रता का निर्देश प्राप्त होता न कि तत्वत एवं इसी महाभारत में स्त्री को स्वतंत्र भी बताया है
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क्या वैदिक धर्म में स्त्री स्वतंत्र नहीं है?

कुछ गधे आज ऐसा आरोप लगाते हैं कि वैदिक धर्म में केवल स्त्री ही स्वतंत्र नहीं होती।

जब की यही बात महाभारत (12/266/11) में पुरुषों के लिए भी आता है कि -
अस्वतन्त्रं च पुत्रत्वं

पुत्र कभी भी स्वतन्त्र नहीं होता।
वह सदा माता पिता के ही इच्छा के अधीन होता है।

तो स्त्री और पुरुष यह दोनों ही गृहस्थ जीवन के बंधनों में कभी स्वतंत्र नहीं होते क्योंकि परिवार के एक दूसरे सदस्यों से बंधे हुए होते हैं अतः स्वतंत्र नहीं हैं।

लेकिन स्त्री सदा ही बंधन में रहे यह भी सत्य नहीं है क्योंकि योग्य वर आदि न मिलने पर स्त्री स्वतंत्र भी हो सकती है।

इसका उदाहरण महाभारत(१२/३२०/१८६) में आता है-
सुलभा नाम के स्त्री योग्य पति न मिलने के कारण सन्यासी होकर स्वतंत्र रूप से अकेली विचरण करती है।

तो अगर सुलभा जैसे स्त्री जो स्वतन्त्र रूप से अकेली रह सकती है और अपने इच्छा से कहीं भी विचरण कर सकती है तो वैदिकधर्म में स्त्री स्वतंत्र नहीं है यह कथन मूर्खता है इनका।
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अबे गधे अगर माता का रक्षा करना पुत्र के लिए कर्तव्य होने से पुत्र स्वतंत्र नहीं हैं

तो इस दृष्टांत से ही उसी महाभारत में उसी श्लोक में जहां पति के लिए पत्नी के भी रक्षा करना कर्तव्य बोला गया।

इस दृष्टांत से तो पत्नी के संदर्भ में भी पति अस्वतंत्र सिद्ध हो रहा क्यों कि उसके माता और साथ में पत्नी इन दोनों का रक्षा का दायित्व के बंधन में वो है।

और पत्नी इसलिए अस्वतंत्र है क्यों कि वो पति के द्वारा रक्षा के लिए निर्भर है कि पति ही उसके विपत्ति में उसकी रक्षक होगा।
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पुराण प्रवचन
अबे गधे अगर माता का रक्षा करना पुत्र के लिए कर्तव्य होने से पुत्र स्वतंत्र नहीं हैं तो इस दृष्टांत से ही उसी महाभारत में उसी श्लोक में जहां पति के लिए पत्नी के भी रक्षा करना कर्तव्य बोला गया। इस दृष्टांत से तो पत्नी के संदर्भ में भी पति अस्वतंत्र सिद्ध…
इसीलिए ही स्त्री को अस्वतंत्र कहा है क्यों कि

कुमारी अवस्था में वो अपने Protection के लिए पिता पर निर्भर करती है।

यौवन अवस्था में Protection के लिए अपने पति पर निर्भर होती है कि पति उसका विपत्ति से रक्षा करेगा।

उसके बाद के अवस्था में पुत्र अपने माता के रक्षा के दायित्व लेता है।

इस प्रकार स्त्री पिता, पति और पुत्र इन तीनों पर खुदकी रक्षा हेतु निर्भर होती है क्यों कि इन्हीं तीनों को उस स्त्री के रक्षा का दायित्व दिया गया है ताकि स्त्री पर विपत्ति न आए।
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पुराण प्रवचन
अबे गधे अगर माता का रक्षा करना पुत्र के लिए कर्तव्य होने से पुत्र स्वतंत्र नहीं हैं तो इस दृष्टांत से ही उसी महाभारत में उसी श्लोक में जहां पति के लिए पत्नी के भी रक्षा करना कर्तव्य बोला गया। इस दृष्टांत से तो पत्नी के संदर्भ में भी पति अस्वतंत्र सिद्ध…
इन चोटियों के अनुसार पुरुष का भी पति होना चाहिए 😂 अबे स्त्री का कर्तव्य पुरुष से अधिक है इसलिए उसके लिए पति आदि का वर्णन किया जिसका जितना कर्तव्य है उसकी उतनी ही परतंत्रता बताई जाएगी
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और वैसे मनुस्मृति का यह जो श्लोक है इससे तो बाल विवाह का भी खंडन हो जा रहा।

यहां बोला जा रहा कि कुमारी अवस्था अर्थात् विवाह से पहले के या बाल्यावस्था में उसके पिता उसके रक्षक होगा।

और आगे बोला गया कि कन्या जब युवती हो जाएगी उस अवस्था में पति उसके रक्षक होगा।

अब अगर बाल्यावस्था में ही विवाह हो जाता तो यहां तो यह आना चाहिए था की बाल्य ओर यौवन दोनों अवस्था में पति रक्षक होगा

लेकिन यहां सिर्फ कन्या के युवावस्था में ही पति को रक्षक माना है बाल्य अवस्था में नहीं।
और सुश्रुत संहिता ( सूत्रस्थान ३५/५०) में लिखा है की १६ वर्ष से ३० वर्ष तक के आयु को यौवन अवस्था कहा जाता है।
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क्या बाला शब्द केवल बाल्य अवस्था के लिए ही प्रयोग होता है?

एक गधा महाभारत में "बाला" शब्द देख के उछल रहा कि देखो इसमें तो बाल विवाह है।

जबकी जरूरी नहीं को "बाला" शब्द का प्रयोग सिर्फ बाल अवस्था के लिए हुआ हो क्योंकि भावात्मक दृष्टि से अपने से बड़े गुरुजन भी नव युवती को बालिका या बच्ची ऐसा बोलते थे आज भी बोलते हैं।

अब जैसे रामायण में वन गमन काल में कई जगह सीता जी को "बाला" कहा गया है। तो क्या सीता जी वन गमन काल में बाल्यावस्था में थी?

जी नहीं क्यों कि उसी रामायण में सीता जी को वन गमन से पहले "तरुणी श्यामा" भी कहा गया है जिसका अर्थ होता है मध्य यौवनावस्था।

अब देखिए सीता जी को तरुणी भी बोला गया है साथ ही बाला भी बोला गया है।

जो यह सिद्ध करता है कि "बाला" शब्द का प्रयोग तो मध्य युवावस्था के स्त्री के लिए भी प्रयोग हो सकता है।
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