पुराण प्रवचन
गधा साला चू#@या ....कह रहा है कि चरम चोचन मेरा औलाद की शूद्र मूर्ख होता है और अतिशूद्र महामूर्ख होते हैं गजब टोपाबाज़ आदमी है ये ....चूतिये 2 कौड़ी के लोमड़ी...दयानन्द सरस्वती जी जन्म से वर्ण ही नहीं मानते वो गुण और कर्म स्वभाव को ही महत्व देते हैं ना कि जन्म…
Nukilaa bans daal dunga tere gaan kaan mei
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वर्ण भेद का आधार भिन्न भिन्न व्यवसाय या कर्तव्य होता है। इसलिए जो योग्य शूद्र कुल का ज्यक्ति हो उसे राज्य तत्काल ब्राह्मण आदि उच्च वर्ण दे सकता है और इसी प्रकार जो दुराचारी ब्राह्मण कुल का व्यक्ति हो उसे राज्य शूद्र वर्ण में तत्काल गिरा सकता है। इसी तरह क्षेत्रीय और वैश्यों का भी उन्होंने कर्तव्यों से ही वर्ण में तत्काल परिवर्तन मानते थे।
~ ऋषि दयानन्द जी
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पुराण प्रवचन
वर्ण भेद का आधार भिन्न भिन्न व्यवसाय या कर्तव्य होता है। इसलिए जो योग्य शूद्र कुल का ज्यक्ति हो उसे राज्य तत्काल ब्राह्मण आदि उच्च वर्ण दे सकता है और इसी प्रकार जो दुराचारी ब्राह्मण कुल का व्यक्ति हो उसे राज्य शूद्र वर्ण में तत्काल गिरा सकता है। इसी तरह क्षेत्रीय…
जो दुराचारी ब्राह्मण हो उसे शूद्र और जो श्रेष्ठ बुद्धिमान् शूद्र हो उसको ब्राह्मण बनावे - यह बात स्वयं समाज के आधीन होनी चाहिये ।
~ ऋषि दयानन्द
~ ऋषि दयानन्द
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क्या आतिथ्य में गौ हत्या होता है?
देवपाल जैसे 12 वी शताब्दी के आचार्य अपने लौगाक्षि गृहसूत्र के भाष्य में लिखता की -
अर्थात् - ओम कहते हुए गाय को छोड़ दो। छोड़ी गई गाय अपनी इच्छा से स्वतंत्र होकर घास खाए— ऐसा कहकर, उस छोड़ी गई गाय को देखते हुए पशु के रूप में बकरे अथवा पशु अंग वाले मांस के टुकड़े को प्रतिनिधि के रूप में रखे।
इसमें देवपाल द्वारा गौ को घास चरने के लिए छोड़ा जाना और उसको घास चरते हुए देख के बकरे के पशु अंग लेने की बात कहा है।
वैसे बता दूं देवपाल भी यहां गौ हिंसा नहीं मानते हां बकरे का पशु अंग की बात करते हैं।
वैसे पशु अंग वाले खंडन हमारे पास अन्य भी प्रमाण है जिसे हम आगे सिद्ध करेंगे।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
देवपाल जैसे 12 वी शताब्दी के आचार्य अपने लौगाक्षि गृहसूत्र के भाष्य में लिखता की -
अर्हयिताह ओमित्यविचारितसिद्धं कृत्वा हे विशसितारः यूयं गामुत्सृजत। उत्सृष्टा सती स्वाच्छन्द्येन तृणान्यत्तु भक्षयतु इत्युक्त्वा तामुत्सृष्टां दृष्ट्वां पशुं छागं, पश्चङ्गं वा मांसखण्डं प्रतिनिदधीत
अर्थात् - ओम कहते हुए गाय को छोड़ दो। छोड़ी गई गाय अपनी इच्छा से स्वतंत्र होकर घास खाए— ऐसा कहकर, उस छोड़ी गई गाय को देखते हुए पशु के रूप में बकरे अथवा पशु अंग वाले मांस के टुकड़े को प्रतिनिधि के रूप में रखे।
इसमें देवपाल द्वारा गौ को घास चरने के लिए छोड़ा जाना और उसको घास चरते हुए देख के बकरे के पशु अंग लेने की बात कहा है।
वैसे बता दूं देवपाल भी यहां गौ हिंसा नहीं मानते हां बकरे का पशु अंग की बात करते हैं।
वैसे पशु अंग वाले खंडन हमारे पास अन्य भी प्रमाण है जिसे हम आगे सिद्ध करेंगे।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
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Bsdk ka anpadh tere gurn aur karam se toh arya samaji se pit ta hai
Trads ke according to tu haii hee....sala gadha chutiya itna hai ye gajputra itna chutiya....shayad hee koi hoye....padh padh bsdk ....kya likha hai ....ki shudra agar brahman par jis ang se "prahar" kare ....uska wo ang kaat dena chahye.....na ki chu lene Matra se
Sala betikot tabhi peet ta hai....😎🤣🤣🤣🤣sala gajputra 🤣....le sukkaramaddva kha ke aata hai kya🍖🍖
Ye sab dhamki hee hoti hai taaki koi ye sab karne ki soch bhi na sakee....wastav mei koi nahi deta itne kathor dand....bas dhamki hee kaafi hoti hai ...kisi ko darane ke liye
Trads ke according to tu haii hee....sala gadha chutiya itna hai ye gajputra itna chutiya....shayad hee koi hoye....padh padh bsdk ....kya likha hai ....ki shudra agar brahman par jis ang se "prahar" kare ....uska wo ang kaat dena chahye.....na ki chu lene Matra se
Sala betikot tabhi peet ta hai....😎🤣🤣🤣🤣sala gajputra 🤣....le sukkaramaddva kha ke aata hai kya🍖🍖
Ye sab dhamki hee hoti hai taaki koi ye sab karne ki soch bhi na sakee....wastav mei koi nahi deta itne kathor dand....bas dhamki hee kaafi hoti hai ...kisi ko darane ke liye
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Forwarded from ऋषि उवाच®️
श्रीराम की आठ हजार पत्नियाँ?
लोकमानस में श्रीराम एकपत्नीव्रती के रूप में प्रतिष्ठित हैं। लेकिन जैन रामायण परंपरा में उनका चित्रण इससे भिन्न मिलता है। विमलसूरि के ‘पउमचरिउ’ तथा ‘पद्मपुराण’ जैसे जैन ग्रंथों में श्रीराम की आठ हजार और लक्ष्मण की सोलह हजार पत्नियों का वर्णन किया गया है।
इतना ही नहीं, इस कथा-परंपरा में रावण का वध श्रीराम के हाथों नहीं, बल्कि लक्ष्मण के हाथों होता है। लक्ष्मण की मृत्यु के बाद श्रीराम जैन धर्म के अनुसार श्रावकाचार स्वीकार कर लेते हैं। वहीं, लक्ष्मण जैन मत स्वीकार नहीं करते, इसलिए उन्हें नरकगामी बताया गया है। रावण को भी नरकवास भोगना पड़ता है। सीता आर्यिका हो जाती हैं और उन्हें स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है।
इस प्रकार विमलसूरि ने श्रीराम के चरित्र को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप एक अलग रूप दे दिया। वे अपनी कथा को ही मूल और प्रथम रामायण बताते हैं तथा वाल्मीकि की कथा का प्रच्छन्न उपहास करते हैं। उनके अनुयायी जैन रामायणकारों की भी न वाल्मीकि में आस्था दिखाई देती है, न वाल्मीकि रामायण के दिव्य और अतिप्राकृत वर्णनों में।
अब विचार कीजिए—रामायण की विभिन्न परंपराओं में श्रीराम के मूल चरित्र के साथ कितना परिवर्तन किया गया होगा! एकपत्नीव्रती श्रीराम को आठ हजार पत्नियों वाला बताना और रावण-वध का श्रेय लक्ष्मण को देना केवल छोटे-मोटे कथाभेद नहीं हैं; ये उनके प्रचलित चरित्र और कथा के मूल स्वरूप में बड़े बदलाव हैं।
मेरी दृष्टि में, जैन और बौद्ध रामकथाओं में श्रीराम के मूल चरित्र को धूमिल करने वाले परिवर्तन हुए हैं। लेकिन आलोचना केवल उन्हीं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हमारे पौराणिक साहित्य में भी श्रीराम की कथा में जोड़े गए प्रसंगों की समीक्षा आवश्यक है। प्रश्न यही है—हम श्रीराम को वाल्मीकि की रामायण के आधार पर समझेंगे या बाद की परंपराओं में जोड़ी गई कल्पनाओं के आधार पर?
लोकमानस में श्रीराम एकपत्नीव्रती के रूप में प्रतिष्ठित हैं। लेकिन जैन रामायण परंपरा में उनका चित्रण इससे भिन्न मिलता है। विमलसूरि के ‘पउमचरिउ’ तथा ‘पद्मपुराण’ जैसे जैन ग्रंथों में श्रीराम की आठ हजार और लक्ष्मण की सोलह हजार पत्नियों का वर्णन किया गया है।
इतना ही नहीं, इस कथा-परंपरा में रावण का वध श्रीराम के हाथों नहीं, बल्कि लक्ष्मण के हाथों होता है। लक्ष्मण की मृत्यु के बाद श्रीराम जैन धर्म के अनुसार श्रावकाचार स्वीकार कर लेते हैं। वहीं, लक्ष्मण जैन मत स्वीकार नहीं करते, इसलिए उन्हें नरकगामी बताया गया है। रावण को भी नरकवास भोगना पड़ता है। सीता आर्यिका हो जाती हैं और उन्हें स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है।
इस प्रकार विमलसूरि ने श्रीराम के चरित्र को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप एक अलग रूप दे दिया। वे अपनी कथा को ही मूल और प्रथम रामायण बताते हैं तथा वाल्मीकि की कथा का प्रच्छन्न उपहास करते हैं। उनके अनुयायी जैन रामायणकारों की भी न वाल्मीकि में आस्था दिखाई देती है, न वाल्मीकि रामायण के दिव्य और अतिप्राकृत वर्णनों में।
अब विचार कीजिए—रामायण की विभिन्न परंपराओं में श्रीराम के मूल चरित्र के साथ कितना परिवर्तन किया गया होगा! एकपत्नीव्रती श्रीराम को आठ हजार पत्नियों वाला बताना और रावण-वध का श्रेय लक्ष्मण को देना केवल छोटे-मोटे कथाभेद नहीं हैं; ये उनके प्रचलित चरित्र और कथा के मूल स्वरूप में बड़े बदलाव हैं।
मेरी दृष्टि में, जैन और बौद्ध रामकथाओं में श्रीराम के मूल चरित्र को धूमिल करने वाले परिवर्तन हुए हैं। लेकिन आलोचना केवल उन्हीं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हमारे पौराणिक साहित्य में भी श्रीराम की कथा में जोड़े गए प्रसंगों की समीक्षा आवश्यक है। प्रश्न यही है—हम श्रीराम को वाल्मीकि की रामायण के आधार पर समझेंगे या बाद की परंपराओं में जोड़ी गई कल्पनाओं के आधार पर?
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Forwarded from आर्ष पुस्तकालय
मैत्रावरुण_सूक्त_पर_पौराणिक_सड़ांध_का_आर्ष_समाधान_.pdf
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शचीन्द्र शर्मा जैसे लतखोर पौराणिक द्वारा वेदों एवं आर्यसमाज पर मैत्रावरुण तथा उर्वशी से सम्बन्धित जो अश्लील व कल्पित अर्थ थोपा गया था, उसका इस आलेख में सप्रमाण व आर्ष-पद्धति से समुचित उत्तर दिया गया है; यह समस्त सत्य-पिपासु पाठकों की सेवा में सादर समर्पित है।
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पुरुष को देखकर स्त्रियाँ खो देती हैं सुदबुद्धि।
भगवान बुद्ध बताते हैं कि स्त्रियाँ अगर नए पुरुष को देख लें तो उनके मन में उसके लिए प्यार आ जाता है, उसको बोले तो “लव” हो जाता है। जाहिर से बात है इंद्रियाँ स्त्रियों के कंट्रोल में ही नहीं हैं, वरना हर स्त्री थोड़ी न हर पुरुष के प्रेम के जाल में फँस जाएगी। 😋🥵
बुद्ध के according स्त्रियाँ ऐसे ही फँसी रह जाती हैं और बार-बार परलोक में स्त्री भोगती हैं और कष्ट पाती हैं, और उनको कभी मुक्ति नहीं मिलती,
क्योंकि स्त्रियाँ नए-नए पुरुष को देखकर सुदबुद्धि खो देती हैं। 🥵🥵 मुक्ति स्त्रियाँ नहीं पा पातीं।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
भगवान बुद्ध बताते हैं कि स्त्रियाँ अगर नए पुरुष को देख लें तो उनके मन में उसके लिए प्यार आ जाता है, उसको बोले तो “लव” हो जाता है। जाहिर से बात है इंद्रियाँ स्त्रियों के कंट्रोल में ही नहीं हैं, वरना हर स्त्री थोड़ी न हर पुरुष के प्रेम के जाल में फँस जाएगी। 😋🥵
बुद्ध के according स्त्रियाँ ऐसे ही फँसी रह जाती हैं और बार-बार परलोक में स्त्री भोगती हैं और कष्ट पाती हैं, और उनको कभी मुक्ति नहीं मिलती,
क्योंकि स्त्रियाँ नए-नए पुरुष को देखकर सुदबुद्धि खो देती हैं। 🥵🥵 मुक्ति स्त्रियाँ नहीं पा पातीं।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
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Forwarded from Dharama_talks
दिन-रात मंचों से रट लगाई जाती है— "अल्लाह पूरी तरह निराकार हैं, उनका कोई रूप, आकार या वजूद नहीं है!"
पहचान का सबूत मांगने पर बाकायदा 'पिंडली' दिखाई जाएगी। जब कोई वजूद या आकार ही नहीं है, तो यह 'Shin' कहाँ से आ गई?
हदीस में लिखा है कि वे पहले देखे गए रूप को बदलकर दूसरे 'Shape' में सामने आएंगे। जब बाकायदा रूप बदला जा रहा है, तो निराकार का ढोंग क्यों? निराकार चीज़ रूप कैसे बदल सकती है? 🤷♂️️
संदर्भ - सहीह अल बुखारी 7439
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @Dharama_talks
पहचान का सबूत मांगने पर बाकायदा 'पिंडली' दिखाई जाएगी। जब कोई वजूद या आकार ही नहीं है, तो यह 'Shin' कहाँ से आ गई?
हदीस में लिखा है कि वे पहले देखे गए रूप को बदलकर दूसरे 'Shape' में सामने आएंगे। जब बाकायदा रूप बदला जा रहा है, तो निराकार का ढोंग क्यों? निराकार चीज़ रूप कैसे बदल सकती है? 🤷♂️️
संदर्भ - सहीह अल बुखारी 7439
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @Dharama_talks
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क्या अल्लाह सच में निराकार है क़ुरान में?
जी नहीं, क़ुरान 11:7 में साफ़ आता है जब अल्लाह ने 6 दिन में स्वर्ग और पृथ्वी बनाया तब उसका सिंहासन पानी के ऊपर था।
"وَكَانَ عَرْشُهُ عَلَى الْمَاءِ"
जब अल्लाह सच में निराकार है, उसका कोई फ़ॉर्म ही एग्ज़िस्ट नहीं करता तो उसका सिंहासन पानी के ऊपर कैसे हो सकता है, यानी कि अल्लाह उस सिंहासन में विराजमान थे जो कि पानी के ऊपर था। इतना तो कोई भी घिसा-पिटा दिमाग चला लेगा।
और तफ़सीर भी साफ़ यही कह रही है कि अल्लाह का सिंहासन पानी के ऊपर था तो वो निराकार कैसे?
इसमें बस मुस्लिम्स और तफ़सीर से लेकर जितने भी मौलाना लोग हैं, वो जलेबी बना के आख़िर में कह देंगे कि “सब कुछ अल्लाह जानने वाला है, हम क्या ही समझें। जो क़ुरान में लिखा है ठीक ही लिखा होगा।”
तो क़ुरान से तो पूर्ण रूप से सिद्ध हो गया, अल्लाह तो निराकार है ही नहीं। अगर है तो अल्लाह का सिंहासन पानी के ऊपर था और अल्लाह विराजमान थे!
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
जी नहीं, क़ुरान 11:7 में साफ़ आता है जब अल्लाह ने 6 दिन में स्वर्ग और पृथ्वी बनाया तब उसका सिंहासन पानी के ऊपर था।
"وَكَانَ عَرْشُهُ عَلَى الْمَاءِ"
जब अल्लाह सच में निराकार है, उसका कोई फ़ॉर्म ही एग्ज़िस्ट नहीं करता तो उसका सिंहासन पानी के ऊपर कैसे हो सकता है, यानी कि अल्लाह उस सिंहासन में विराजमान थे जो कि पानी के ऊपर था। इतना तो कोई भी घिसा-पिटा दिमाग चला लेगा।
और तफ़सीर भी साफ़ यही कह रही है कि अल्लाह का सिंहासन पानी के ऊपर था तो वो निराकार कैसे?
इसमें बस मुस्लिम्स और तफ़सीर से लेकर जितने भी मौलाना लोग हैं, वो जलेबी बना के आख़िर में कह देंगे कि “सब कुछ अल्लाह जानने वाला है, हम क्या ही समझें। जो क़ुरान में लिखा है ठीक ही लिखा होगा।”
तो क़ुरान से तो पूर्ण रूप से सिद्ध हो गया, अल्लाह तो निराकार है ही नहीं। अगर है तो अल्लाह का सिंहासन पानी के ऊपर था और अल्लाह विराजमान थे!
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
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Forwarded from NEWSORA (📴)
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Head of the "British" NGO Action Aid, Shabana Azmi, wants to give us freedom!
> 🚨 CJP PROTEST POLITICS
“Freedom” ke naam par protest, slogans aur political drama — aur phir har critic ko label kar do.
CJP ko सवाल पसंद नहीं, लेकिन देश को सवाल पूछने का पूरा हक़ है.
Foreign-hand ka claim karne se pehle evidence chahiye — warna roast bhi fact-check ke saath hi hoga.
🔥 Politics ≠ patriotism
🔥 Protest ≠ proof
🔥 Slogan ≠ evidence
CJP aur “Tukde-Tukde Gang” wali rhetoric par सवाल उठाइए, lekin facts ke saath.
JOIN @NewsoraNews
> 🚨 CJP PROTEST POLITICS
“Freedom” ke naam par protest, slogans aur political drama — aur phir har critic ko label kar do.
CJP ko सवाल पसंद नहीं, लेकिन देश को सवाल पूछने का पूरा हक़ है.
Foreign-hand ka claim karne se pehle evidence chahiye — warna roast bhi fact-check ke saath hi hoga.
🔥 Politics ≠ patriotism
🔥 Protest ≠ proof
🔥 Slogan ≠ evidence
CJP aur “Tukde-Tukde Gang” wali rhetoric par सवाल उठाइए, lekin facts ke saath.
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क्या अल्लाह और इब्लीस एक ही हैं?
सहीह मुस्लिम 2813b में आता है कि इब्लीस का सिंहासन पानी के ऊपर है:
إِنَّ إِبْلِيسَ يَضَعُ عَرْشَهُ عَلَى الْمَاءِ
और वह पति-पत्नी में झगड़ा कराने के लिए एक फितना को भेजता है, वगैरह-वगैरह।
और वही क़ुरआन में 11.7 में भी सिद्ध किया है कि अल्लाह का सिंहासन पानी के ऊपर था।
सहीह मुस्लिम में इब्लीस का सिंहासन पानी के ऊपर और क़ुरआन में 11.7 में अल्लाह का सिंहासन पानी के ऊपर?
ये क्या झोल है? अल्लाह और इब्लीस में इतनी समानता!
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
सहीह मुस्लिम 2813b में आता है कि इब्लीस का सिंहासन पानी के ऊपर है:
إِنَّ إِبْلِيسَ يَضَعُ عَرْشَهُ عَلَى الْمَاءِ
और वह पति-पत्नी में झगड़ा कराने के लिए एक फितना को भेजता है, वगैरह-वगैरह।
और वही क़ुरआन में 11.7 में भी सिद्ध किया है कि अल्लाह का सिंहासन पानी के ऊपर था।
सहीह मुस्लिम में इब्लीस का सिंहासन पानी के ऊपर और क़ुरआन में 11.7 में अल्लाह का सिंहासन पानी के ऊपर?
ये क्या झोल है? अल्लाह और इब्लीस में इतनी समानता!
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