पुराण प्रवचन
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हमारे पुराण ही हमारे धर्म के धरोहर है इसके ज्ञान को हमारे साथ पढ़ें और फैलाएं 🙏❤️
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बेचारे मिक्स ब्रीड को अब तक समझ नहीं आया पोप जी का दोगलापन , बेचारे अद्वैती ब्रह्म को भ्रम हो गया की पोप जी के द्वारा प्रस्तुत प्रमाण हमने दिऐ है ।

इस जाहिल को ये तक नहीं पता कि ये खंडन मंडन करने की शैली होती है, जैसा की आर्ष ग्रंथों में प्रश्न उत्तर की शैली का प्रयोग कर ऋषियों ने सत्य सिद्धांत की स्थापना की है ।
जैसे महर्षि दयानन्द ने अपने अमर ग्रंथ “सत्यार्थ प्रकाश” में प्रश्न-उत्तर, पोप जी-जाट जी, सिद्धान्ती-नवीन वेदान्ती, नास्तिक-आस्तिक आदि शैली में असत्य मत खंडन और सत्य मत का मंडन किया है ।

बड़े दूःख के साथ कहना पड़ रहा है
इ तो रॉंग नंबर है, अर्थात् ये तो अज्ञानी ब्रह्म निकला, जिसको पढ़कर भी कुछ समझ नहीं आता ऐसो पर हमको दया आती है । लगता है अब उसे दवा की नहीं दुआ की ही आवश्यकता है 😭

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@Pakhand_khandan
कुल्लूक भट्ट के भाष्य में हारित धर्मसूत्र के प्रथम सूत्र का प्रमाण

आचार्य कुल्लूक भट्ट ने मनुस्मृति (२/१) के भाष्य में हारित धर्मसूत्र के प्रथम सूत्र उद्धृत करते हैं जो कि है -
"अथातो धर्म व्याख्यास्यामः। श्रुतिप्रमाणको धर्मः। श्रुतिश्च द्विविधा वैदिकी तान्त्रिकी च"।

अर्थात् - अब इसके बाद हम धर्म की व्याख्या करेंगे। धर्म वह है जिसका प्रमाण श्रुति में है। और श्रुति दो प्रकार की होती है— वैदिकी और तान्त्रिकी (व्यवस्था संबंधित शास्त्र)।
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“कुशान सम्राट विमा कडफिसेस (कनिष्क के पिता) और शिव का उपासना-परंपरा”

जब विमा कडफिसेस कुशान सम्राट बने, उस समय धार्मिक जीवन की दो प्रमुख विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
पहली, ग्रीक धार्मिक कला के रूपों को अपनाना और कुशान देवताओं की ग्रीक प्रतीकात्मक (iconographic) व्याख्या करना—जिसमें देवताओं को ज़ीउस, नाइके और हेराक्लीज़ जैसे ग्रीक रूपों में दर्शाया गया।
दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण विशेषता, भारतीय धर्मों की ओर झुकाव, विशेषकर शिव-पूजा। विमा कडफिसेस के शासन में शिव का पंथ और अधिक प्रमुख हुआ। उनके सिक्कों पर शिव या नंदी सहित शिव का चित्रण मिलता है, जो यह स्पष्ट करता है कि वे शिव-पूजा को विशेष महत्व देते।

Source- History of civilizations of Central Asia, Volume II
The development of sedentary and nomadic civilizations: 700 B.C. to A.D. 250
Editor: János Harmatta Co-editors: B. N. Puri and G. F. Etemadi

UNESCO Publishing

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बौद्ध धर्म में स्त्रियां है मार डालने योग्य

त्रिपिटक ( खुद्दकनिकाय के १९३ वा जातक, चुल्लपदुम जातक )

में बुद्ध अपने पूर्व जन्म के धर्मोपदेश देते हुए एक भिक्षु को बोलते हैं कि -
स्त्रियां अकृतज्ञ, मित्रद्रोही और क्रूर हृदय वाली होती हैं।

यही बात बुद्ध ने त्रिपिटक में अंगुत्तरनिकाय (५/२२९-२३०) में भी बोला है जहां उन्होंने स्त्रियों को काले सर्प के साथ तुलना करते हैं।

और इसी बात को सिद्ध करने के लिए उन्होंने इस जातक में अपने पूर्व जन्म के वृत्तान्त बताने के बाद अपने धर्म उपदेश में पाली के कुछ श्लोक बोलते हैं जिसमें लिखा है-
स्त्रियां मार डालने या बध होने योग्य होती हैं क्यों कि उनमें सत्यता नहीं होती है।

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कुषाण काल के लगभग 200 AD का इन्द्र भगवान के मूर्ति जिसके नीचे भी ब्राह्मी लिपि में इंद्र लिखा हुआ है




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Samrat chandrgupt Maurya was jain?


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