पुराण प्रवचन
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हमारे पुराण ही हमारे धर्म के धरोहर है इसके ज्ञान को हमारे साथ पढ़ें और फैलाएं 🙏❤️
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“कुशान सम्राट विमा कडफिसेस (कनिष्क के पिता) और शिव का उपासना-परंपरा”

जब विमा कडफिसेस कुशान सम्राट बने, उस समय धार्मिक जीवन की दो प्रमुख विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
पहली, ग्रीक धार्मिक कला के रूपों को अपनाना और कुशान देवताओं की ग्रीक प्रतीकात्मक (iconographic) व्याख्या करना—जिसमें देवताओं को ज़ीउस, नाइके और हेराक्लीज़ जैसे ग्रीक रूपों में दर्शाया गया।
दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण विशेषता, भारतीय धर्मों की ओर झुकाव, विशेषकर शिव-पूजा। विमा कडफिसेस के शासन में शिव का पंथ और अधिक प्रमुख हुआ। उनके सिक्कों पर शिव या नंदी सहित शिव का चित्रण मिलता है, जो यह स्पष्ट करता है कि वे शिव-पूजा को विशेष महत्व देते।

Source- History of civilizations of Central Asia, Volume II
The development of sedentary and nomadic civilizations: 700 B.C. to A.D. 250
Editor: János Harmatta Co-editors: B. N. Puri and G. F. Etemadi

UNESCO Publishing

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"कुषाण सिक्कों पर 'महेश्वर' शब्द का वास्तविक अर्थ"

कुषाण सम्राट विम कडफिसेस के कुछ सिक्कों पर 'महेश्वर' शब्द मिलता है, जिसे सामान्यतः भगवान शिव का पर्यायवाची माना जाता है। हालाँकि, ऐतिहासिक संदर्भ में इसका अर्थ राजा के लिए 'महान ईश्वर' होना संदिग्ध लगता है। इसके पीछे भाषाई कारण यह है कि उस समय की खरोष्ठी लिपि में दीर्घ स्वरों (बड़ी मात्राओं) को अलग से नहीं दर्शाया जाता था। इसी आधार पर विद्वानों का मानना है कि इस शब्द को वास्तव में 'माहेश्वर' पढ़ा जाना चाहिए, जिसका अर्थ होता है— 'भगवान शिव का अनन्य भक्त'। यह स्पष्ट करता है कि विम ने स्वयं को ईश्वर घोषित करने के बजाय शिव के प्रति अपनी गहरी धार्मिक आस्था को व्यक्त करने के लिए इस उपाधि का उपयोग किया था।
Source- History of civilizations of Central Asia, Volume II The development of sedentary and nomadic civilizations: 700 B.C. to A.D. 250

Editor: János Harmatta Co-editors: B. N. Puri and G. F. Etemadi

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बस तथाकथित खंडन कर दे कोई sarrrr 🤣
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पुराण प्रवचन
बस तथाकथित खंडन कर दे कोई sarrrr 🤣
जल्दी जल्दी अद्वैति का pdf Post कर देता हु फिर खुद को स्कैप्टिक कह कर भागना भी तो है 🤣
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🙏 नमस्ते आर्य मित्रों 🙏
पिछले पोस्ट से आप लोगों ने पोप जी का दोगलापन देखा और तभी कुछ “कट्टर आस्थावान” पौराणिकों ने जब तोप जी के समक्ष पोप जी की हार होते देखी तब उन “कट्टर आस्थावान” पौराणिकों ने अपना आपा खो दिया और तोप जी को अपशब्द कहने लगे ऐसे अपनी गाली परंपरा का प्रदर्शन करने लगे तब पोप जी भी अपनी गाली परंपरा का अनुकरण कर डिफेंस करने लगे, लेकिन तोप जी तो ठहरे पंडा विनाशक, उनके ही तर्क व प्रमाणों से पोप जी को अपने जूतों की धूल चटा दी

पोप जी - नहीं-नहीं आपने गरुड पुराण के इस श्लोक का यहाँ गलत अर्थ किया है, आप मूर्ख आर्य समाजी कभी भी उस श्लोक का सही अर्थ नहीं समझ पाएंगे क्योंकि वास्तविक अर्थ तो वही होगा जो परंपरा प्राप्त होगा 🤬

तोप जी - तो आप ही बता दो इस श्लोक का सही अर्थ क्या होगा

पोप जी - इस श्लोक का सही और सच्चा अर्थ होगा - परम पुरुष (परमात्मा) ने तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) की तुलना तीन रूप (विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र) धारण किए । विष्णु जो सृष्टि को धारण करें, ब्रह्मा जो सृष्टि को उत्पन्न करे और शिव जो सृष्टि का विनाश करे, विष्णु ही ब्रह्मा तथा रुद्र को सृष्टि उत्पत्ति एवं विनाश के लिए प्रेरित करते है । जो लोग इन तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) के आधार पर विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र में भेद करते है, वह घोर अंधकार को प्राप्त करते है ।

तोप जी - वाह! फिर एक बार जनता के समक्ष आपका दोगलापन दिख गया, ये दोगलापन कहीं “परंपरा प्राप्त” तो नहीं 😂
आपने जब पहले भागवत और विष्णु पुराण के प्रमाण प्रस्तुत किए थे तब भी हमने कहा था आपके ये प्रमाण हमारे मत की सिद्धि करते है, और अब आपका गरुड पुराण का “परंपरा प्राप्त” अर्थ भी हमारे ही मत को सत्य सिद्ध कर रहा है, आशा है आपको भान होगा कि आपके ऐसा करने से आपके धंधे पर बहुत असर होगा, अब जब आपने पुराणों से ही पौराणिक मत के अनेक ईश्वरवाद का खंडन कर ही दिया है तो क्या आप उन पुराणों पर थूकेंगे?

पोप जी - भले ही हम एकेश्वरवाद मानते है लेकिन हम पुराणों पर नहीं थूकेंगे, उनपर हमारी आस्था है श्रद्धा है 🤲
पुराणों में भले ही हजार त्रुटियां हो लेकिन वो हमारे सर्वोच्च धर्मग्रंथ है, उनपर से हमारी आस्था न घटेगी न हटेगी, क्योंकि हमको नास्तिक घोषित होकर समाज से बहिष्कृत नहीं होना 😭

तोप जी - अब कुछ नहीं हो सकता, आपके शब्द हानि कर चूके, अब तो सामान्य हिन्दू समाज (जो अनेक ईश्वरवाद में आस्था रखता है) आपका बहिष्कार कर देगा, आपके पोस्टर पर जूतों की माला पहनाएगा, आपका पुतला जलाएगा, अब आपका क्या होगा पोप जी 😂

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@Pakhand_khandan
मैं नहीं जाता कहीं किताब पढ़ने न ही ज्ञान के लिए कोई मेहनत करता। मैं बैठा हु Chat Gpt के भरोसे। Chat Gpt में होगा तो खुद चलके ज्ञान आएगा।

- आज कल के Chat GPT ज्ञानी
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और भीमटे हमे गोबर भक्त बोलते है जिनके बुद्ध खुद गोबर भक्षी था 💀

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पोप -- न्याय सूत्रकार विताण्डा करने को सही मानते है जिज्ञासु केलिए इसलिए हम उसको करेंगे

Meanwhile वात्सायनमुनि --
जिनको तत्वज्ञान नहीं होता वो विताण्डा करे



अब सोचने वाली बात है बेचारे आदि शंकरचार्य अपने शिष्यो को तत्वज्ञान भी नहीं दे परहे है 😂 😂 उनके शिष्यो को जल्प और विताण्डा करके
पूर्वपक्ष का खंडन करना पड़ रहा है कभी कभी अद्वैतीयो पे दया आती है
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एक ही पेज को दो बार डाल देता हु एक पेज बढ़ जाएगा 😂 वाह री पुनरूक्ति लेखक

एक ही पेज से दो बार पुनरावृति हो गई इसकी तो😂
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बौद्ध धम्म में कमाल के Medicine सर्प विष चिकित्सा के लिए 💀💀
पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें


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VedSiddhantNirnay.pdf
31.5 MB
पुस्तक:- वेदसिद्धांतनिर्णय।

प्रथम संस्करण

पृष्ठ:- ७९

विषय:- हृदय में आत्मा का स्थान, यज्ञ, अभाव पदार्थ।

सम्पादक:- केशरीनन्दन

प्रकाशक:- कपिलसांख्ययोग अनुसन्धानकेन्द्र।
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कपिल सांख्ययोग अनुसन्धान केन्द्र
VedSiddhantNirnay.pdf
इसमें कुछ शब्दों की त्रुटि टाइपिंग के कारण अवश्य है उनको अगले संस्करण में शोध कर हटा दिया जायेगा
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॥ ओ३म् ॥

निरुक्त ६/२८ मूल में भगवान शाक्लय का कोई दोष नहीं गिनाया है और नाही उनको गलत कहा है, मैं challenge करता हूं सभी अनार्यों को की मूल निरुक्त ६/२८ में दिखा देवे कि कहा गलत बोला है!
उसमें केवल भगवान यास्क ने इतना ही कहा है कि शाक्लय ने "वा" और "यः" पाठ भिन्न किया है, उसको "वायः" कर देने से अर्थ निकल आएगा! नाकी पदपाठ पर कोई प्रश्न किया है! क्योंकि निरुक्तकार का काम वेद का निर्वाचन करना है, सो कर दिया, पदपाठ में दोष कहा ही नहीं भगवान यास्क ने मूल निरुक्त में! भगवान यास्क का भाव यह है कि वेद को पदपाठ से तो आपने सुरक्षित कर दिया, बस अर्थ निकालने के लिए
"उदात्तं त्वेवमाख्यातमभविष्यत्"–निरुक्त

अर्थात् स्वर अनुसार अर्थ कर दो! बस निरुक्तकार ने इतना ही कहा, यह असल rationality का प्रतीक है। यानी पाठ करने के लिए पदपाठ अनुसार "वा" और "यः" कर लो और अर्थ करने के लिए स्वरपाठ से direct "वायः" करके उसका अर्थ निकाल दो, that's it man! लेकिन शूद्रों में बुद्धि होती तो ऐसे समझाने की आवश्यकता कतये नहीं पड़ती। 🙏
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गौतम बुद्ध नंगे घुमा करते थे

त्रिपिटक (सूत्तपीटक, मज्झिम निकाय-12,महासीहनादसुत्त) में गौतम बुद्ध स्वयं बताते हैं कि -
मैंने परंपराओं की अवहेलना करते हुए नग्न अवस्था में रहा करता था।

अर्थात् गौतम बुद्ध खुद नंगे घुमा करते थे।

जो गौतम बुद्ध खुद नंगे घुमा करते थे वो विनयपीटक में भिक्षुणियों को उपदेश देते हैं कि स्तन और गुप्तांग संघ के भिक्षुओं को न दिखाएं 😂

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मूलनिवासियों के द्वारा बुद्ध पर किया जाने वाला अत्याचार।

गौतम बुद्ध खुद त्रिपिटक ( मज़्जिम निकाय -१२) में बताते है कि -
चरवाहे पास आकर मेरे ऊपर थूकते भी थे और मूतते भी थे।

मजे की बात यह है कि इन भीमटो के मुताबिक-
बुद्ध के काल में तो ब्राह्मण थे ही नहीं सब मूलनिवासी भरे पड़े थे भारत में और ब्राह्मण तो मुगलों के काल में विदेश से भारत आए
थे वेद लेके

तो बुद्ध पर मूतने वाले थूकने वाले वह कौन लोग थे ?😢

यही मूलनिवासी ही थे जो बुद्ध जी पर मूत देते थे और आज दोष ब्राह्मणों को देते हैं कि ब्राह्मणों ने बौद्धों पर अत्याचार किया😢
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मूलनिवासी be like== न बांस की बंसी न सोने का सरिया इसकी कान में डंडा दे

Source - त्रिपिटक ( मज़्जिम निकाय -१२)
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यह चित्र मथुरा से प्राप्त तीसरी शताब्दी ईस्वी के एक व्यायाम पत्थर (वेट) का है। इस पत्थर पर एक नक्काशी बनी हुई है जिसमें भगवान कृष्ण को अश्व-दानव केसी का वध करते हुए दिखाया गया है। यह प्राचीन कलाकृति उस समय की पत्थर तराशने की कला और धार्मिक कहानियों के महत्व को दर्शाती है।
Source- Vasudev Krishna & Mathura by Meenakshi Jain

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मौर्य वंश का मूल ऋषि मनु के सुर्य वंश ही था

१० वी शताब्दी के वघाली शिलालेख जिसमें एक मौर्य वंश के राजा गोविन्दराज मौर्य ने अपने मौर्य वंश के उत्पत्ति कुछ इस प्राकार वर्णन किया है -
सुतः कश्यपोभू -- तदनु मनुरभूत्तत्द्युतात्सूर्यवंश:। विख्यात: सर्वलोकेष्वमल नृपगुणैरन्वित:कीर्तिधर्मौर्म्मान्धातुर्भूमिपालात्स कलगुणनिधेन्मौर्य वंशो

इस पंक्ति में उन्होंने स्पष्ट सूर्य वंश और मनु जी के वंश से ही खुद के मौर्य वंश की उत्पत्ति का स्पष्ट उल्लेख किया है।

और इसी मनु जी के सूर्य वंश में ही राजा श्री राम जी का भी जन्म हुआ था।
Source - Epigraphia Indica, Vol. 2
by Burgess, Jas Ed, Page - 225

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