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पुराण प्रवचन
४४ दांत किसका होता है??
मेरा प्रश्न ये है कि इन दोनों को अलग अलग क्यों लिखा?🤔 दोनों तो एक ही है
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गौतम बुद्ध जी का क्या ही कहना जो खुद के मल मूत्र खाने का महान् कार्य किए थे 💀💀
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जब हम बौद्धों का पर्दाफाश करते हैं तो हमारे ही कुछ दोगले हिंदू बोलने लगते हैं कि बौद्ध तो बड़े प्यार देने वाला धम्म है आप नफरत क्यों फैला रहे हो😂😂
और जब बौद्ध राष्ट्र में इन्हीं के भगवानों के मूर्ति को तोड़ के टुकड़े टुकड़े करने के बाद वहां बुद्ध मूर्ति स्थापित किया जाता है तब यह कुछ दोगले हिंदू कुछ नहीं बोलेंगे।
क्यों कि इनके अनुसार तो बौद्ध धम्म प्यार मोहब्बत का मजहब है न 🤣🤣
और जब बौद्ध राष्ट्र में इन्हीं के भगवानों के मूर्ति को तोड़ के टुकड़े टुकड़े करने के बाद वहां बुद्ध मूर्ति स्थापित किया जाता है तब यह कुछ दोगले हिंदू कुछ नहीं बोलेंगे।
क्यों कि इनके अनुसार तो बौद्ध धम्म प्यार मोहब्बत का मजहब है न 🤣🤣
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Forwarded from पुराण प्रवचन
क्या याज्ञवल्क्य जी ने गौ मांस खाए थे?
गधों ने शतपथ ब्राह्मण(३/१/३/२१) पर आरोप लगाए हैं उसमें पूर्वपक्ष में जो गौ या बैल शब्द आया है कि इनको नहीं खाना चाहिए इसका अर्थ सायण जी ने कुछ इस प्रकार किया है -
आगे याज्ञवल्क्य जी ने जो अंसल भोजन खाने की बात बोलें है उसका तात्पर्य पूर्वपक्ष के अनुसार ही सायण ने कुछ इस प्रकार किया है-
अर्थात् याज्ञवल्क्य जी का पूर्वपक्ष के उत्तर में यह पक्ष रहा कि शरीर वर्धक अन्न और दूध भोजन होना चाहिए।
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गधों ने शतपथ ब्राह्मण(३/१/३/२१) पर आरोप लगाए हैं उसमें पूर्वपक्ष में जो गौ या बैल शब्द आया है कि इनको नहीं खाना चाहिए इसका अर्थ सायण जी ने कुछ इस प्रकार किया है -
"धेनोः क्षीरादिकम्"अर्थात् यहां पूर्वपक्ष ने जिसको खाने से निषेध कर रहे वह गौ या बैल के मांस नहीं है और ध्यान रहे पूर्वपक्ष के अनुसार ही उत्तरपक्ष का अर्थ ग्रहण किया जाता है।
अर्थ- गौ शब्द से उस से संबंधित दुग्धादि उत्पाद
"अनडुहः सम्बन्धि कर्षणसाध्यमित्यर्थ"
अर्थ- बैलों से संबंधित उसकी सहायता से कृषि द्वारा उत्पन्न पदार्थों का ही अर्थ ग्रहण किया है।
आगे याज्ञवल्क्य जी ने जो अंसल भोजन खाने की बात बोलें है उसका तात्पर्य पूर्वपक्ष के अनुसार ही सायण ने कुछ इस प्रकार किया है-
"यस्मादुभयाशने शरीरम् 'अंसेलं भवति" (अंसलभोजनं)
अर्थात् - जिस भोजन से शरीर अंसल हो जाता है अंसल से यहां अर्थ बलवान है।
अर्थात् याज्ञवल्क्य जी का पूर्वपक्ष के उत्तर में यह पक्ष रहा कि शरीर वर्धक अन्न और दूध भोजन होना चाहिए।
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पुराण प्रवचन
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याज्ञवल्क्य जी पर जो गौमांस खाने का आरोप यह बौद्ध भिखारी लगा रहा इसका पूरा खंडन हम बहुत पहले कर चुके हैं 😂😂
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Forwarded from पुराण प्रवचन
Did Rishi Yajnavalkya ate beef...pdf
1.6 MB
कुछ मूर्ख लोगों ने महर्षी याज्ञवल्क्य जी पर यह आरोप लगाया था की शतपथ ब्राह्मण में लिखा ही की महर्षी जी गौ मांस खाते थे।
इन गधों के इस निराधार आरोप का खण्डन पर हमारा यह PDF है इसमें हमने आचार्य सायण और अन्य व्याकरण आदि के मत से यह सिद्ध किया है की वहां गौ मांस का कोई वर्णन है ही नहीं।
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इन गधों के इस निराधार आरोप का खण्डन पर हमारा यह PDF है इसमें हमने आचार्य सायण और अन्य व्याकरण आदि के मत से यह सिद्ध किया है की वहां गौ मांस का कोई वर्णन है ही नहीं।
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सत्यार्थ प्रकाश 1875 ( जिसको दयानन्द जी जलाए ) पहला संस्कृण... सम्मुलास 7
👆 ये प्रमाण उन मूर्खो को जो दयानन्द जी को ईसाई और इस्लाम का एजेंट कहते
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बाईबल कुरान आदि मनुष्य कि बनाई हुई है ना कि ईश्वर कि...
वेद हि ईश्वरकृत है.. अन्य नहीं
👆 ये प्रमाण उन मूर्खो को जो दयानन्द जी को ईसाई और इस्लाम का एजेंट कहते
Credit - भारतीय अनार्य
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वैदिक काल में दासीपुत्र भी हुए हैं वेद के ऋषि
दीघानिकाय के अम्बष्ट सूत्र में गौतम बुद्ध बोलते हैं कि -
अर्थात् - दासीपुत्र होकर भी कृष्ण महान् ऋषि थे जिन्होंने ब्रह्म मंत्रों ( वेद मंत्रों ) का अध्ययन किया हुआ था।
इसमें स्पष्ट कण्हो अर्थात् कृष्ण के लिए
"इसि" शब्द का उपयोग है जिसका अर्थ पाली में ऋषि होता है
( पाली में "ऋ"कार और "ष"कार नहीं होता इसलिए "ऋषि" को "इसि" बोला जाता है)
इससे सिद्ध हुआ कि मनु पुत्र राजा इक्ष्वाकु के काल में तो शुद्रा के पुत्र होके भी कोई ब्राह्मण और ऋषि हो सकते थे और वेद भी पढ़ सकते थे।
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दीघानिकाय के अम्बष्ट सूत्र में गौतम बुद्ध बोलते हैं कि -
उळारो सो कण्हो इसि, ब्रह्ममन्ते अधीयित्वा
अर्थात् - दासीपुत्र होकर भी कृष्ण महान् ऋषि थे जिन्होंने ब्रह्म मंत्रों ( वेद मंत्रों ) का अध्ययन किया हुआ था।
इसमें स्पष्ट कण्हो अर्थात् कृष्ण के लिए
"इसि" शब्द का उपयोग है जिसका अर्थ पाली में ऋषि होता है
( पाली में "ऋ"कार और "ष"कार नहीं होता इसलिए "ऋषि" को "इसि" बोला जाता है)
इससे सिद्ध हुआ कि मनु पुत्र राजा इक्ष्वाकु के काल में तो शुद्रा के पुत्र होके भी कोई ब्राह्मण और ऋषि हो सकते थे और वेद भी पढ़ सकते थे।
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Forwarded from पुराण प्रवचन
गौ किसको कहा जाता है?
प्राचीन आचार्य वेंकट माधव जी ने अपने ऋग्वेद चौथे मंडल के भाष्य में बताते हैं कि -
अर्थात्: गमन करने के कारण पृथ्वी,सूर्य,पशु,वाणी और जल आदि के "गौ" नाम है।
आचार्य वेंकट यह भी बताते हैं कि वेदों के नाम पद को आचार्य लोग आख्यातज मानते हैं इसलिए उनका धातु से अनेक प्रकार का अर्थ संभव है। जैसे उणादिसूत्र (२/६८) के अनुसार गति अर्थ वाला "गम्" धातु से डो प्रत्यय लग के "गौ" नाम बनने के कारण जितने भी गमनशील वस्तु या प्राणी हैं उन सब के भी गौ नाम होता है।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
प्राचीन आचार्य वेंकट माधव जी ने अपने ऋग्वेद चौथे मंडल के भाष्य में बताते हैं कि -
गमनात् पृथिवी गौः स्यादादित्यः पशुरेव च। वाग वा सा गच्छति जलं निम्न प्रत्येत्ति सर्वदा॥
अर्थात्: गमन करने के कारण पृथ्वी,सूर्य,पशु,वाणी और जल आदि के "गौ" नाम है।
आचार्य वेंकट यह भी बताते हैं कि वेदों के नाम पद को आचार्य लोग आख्यातज मानते हैं इसलिए उनका धातु से अनेक प्रकार का अर्थ संभव है। जैसे उणादिसूत्र (२/६८) के अनुसार गति अर्थ वाला "गम्" धातु से डो प्रत्यय लग के "गौ" नाम बनने के कारण जितने भी गमनशील वस्तु या प्राणी हैं उन सब के भी गौ नाम होता है।
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कुषाण राजा वासुदेव-I ( 200 CE )
कुषाण वंश के राजा जिन्होंने अपने नाम "वासुदेव" (𑀯𑀸𑀲𑀼𑀤𑁂𑀯) के रूप में प्रकाशित किया है उनके सोने के सिक्के पर।
राजा वासुदेव जो प्रथम ऐसे कुषाण राजा थे जिन्होंने भारत में रहते हुए हिंदू धर्म को अपनाया और भगवान वासुदेव कृष्ण के नाम पर खुद का नाम भी वासुदेव रखा।
इस से पता चलता है कुछ विदेशी राजा जो भारत में शासन करते थे उनका हमारे धर्म के प्रति कितना रुचि रहा होगा।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
कुषाण वंश के राजा जिन्होंने अपने नाम "वासुदेव" (𑀯𑀸𑀲𑀼𑀤𑁂𑀯) के रूप में प्रकाशित किया है उनके सोने के सिक्के पर।
राजा वासुदेव जो प्रथम ऐसे कुषाण राजा थे जिन्होंने भारत में रहते हुए हिंदू धर्म को अपनाया और भगवान वासुदेव कृष्ण के नाम पर खुद का नाम भी वासुदेव रखा।
इस से पता चलता है कुछ विदेशी राजा जो भारत में शासन करते थे उनका हमारे धर्म के प्रति कितना रुचि रहा होगा।
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Forwarded from ऋषि उवाच®️
शतपथ ब्राह्मण कहता है—
“अग्रिर्वै अग्निः”, अर्थात् जो अग्र (सबसे आगे) रहता है, वही अग्नि है।
अग्नि ही वास्तव में अग्रिणी है। वेद का प्रथम शब्द भी अग्नि है।
इसी कारण सनातन धर्म के प्रत्येक यज्ञ, हवन और धर्मकार्य का आरम्भ अग्नि के आह्वान से ही किया जाता है।
अग्नि देवताओं का मुख है और वही सभी देवताओं तक आहुति पहुँचाता है।
अतः वैदिक परम्परा में प्रथम पूज्य अग्नि है।
गणेश जी की अग्रपूजा की परम्परा पौराणिक साहित्य से आई है,
वह वैदिक व्यवस्था का मूल सिद्धान्त नहीं है।
“अग्रिर्वै अग्निः”, अर्थात् जो अग्र (सबसे आगे) रहता है, वही अग्नि है।
अग्नि ही वास्तव में अग्रिणी है। वेद का प्रथम शब्द भी अग्नि है।
इसी कारण सनातन धर्म के प्रत्येक यज्ञ, हवन और धर्मकार्य का आरम्भ अग्नि के आह्वान से ही किया जाता है।
अग्नि देवताओं का मुख है और वही सभी देवताओं तक आहुति पहुँचाता है।
अतः वैदिक परम्परा में प्रथम पूज्य अग्नि है।
गणेश जी की अग्रपूजा की परम्परा पौराणिक साहित्य से आई है,
वह वैदिक व्यवस्था का मूल सिद्धान्त नहीं है।
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आयुर्वेद किस वेद का उपवेद है?
सुश्रुत संहिता (१/१/६) के अनुसार -
अर्थात् - यह आयुर्वेद अथर्ववेद का उपांग है, जिस आयुर्वेद को प्रजा उत्पन्न करने से पूर्व ब्रह्मा ने एक लाख श्लोकों में और एक हजार अध्यायों में कहा था। फिर मनुष्यों को अल्प आयु-वाले एवं अल्पबुद्धिवाले देखकर इस आयुर्वेद को आम अङ्गों में बनाया ।
अतः अथर्ववेद चिकित्सा शास्त्रों के मूल है जादू टोने की नहीं।
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सुश्रुत संहिता (१/१/६) के अनुसार -
इह खल्वायुर्वेदं नामोपाङ्गमथर्ववेदस्य
अर्थात् - यह आयुर्वेद अथर्ववेद का उपांग है, जिस आयुर्वेद को प्रजा उत्पन्न करने से पूर्व ब्रह्मा ने एक लाख श्लोकों में और एक हजार अध्यायों में कहा था। फिर मनुष्यों को अल्प आयु-वाले एवं अल्पबुद्धिवाले देखकर इस आयुर्वेद को आम अङ्गों में बनाया ।
अतः अथर्ववेद चिकित्सा शास्त्रों के मूल है जादू टोने की नहीं।
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इन्द्र द्वारा पर्वतों के पंख काटने का सत्य
निरुक्त (१०/१०) में महर्षी यास्क जी लिखते है
अर्थात् - ऋषियों को अपने दर्शन किए हुए मंत्रार्थ को आख्यान के माध्यम से वर्णन करना रुचिकर लगता है।
इसलिए बोहोत सारे प्राकृतिक स्थितियों को भी ऋषियों के शैली में एक आख्यान के रूप में अलंकार प्रयोग द्वारा वर्णित किया जाता है।
उनमें से एक आख्यान है इंद्र के द्वारा पर्वतों का पंख काटने वाला आख्यान जिसका वास्तविक स्वरूप पर हमने वैदिक ग्रंथों से प्रमाण प्रस्तुत किया है।
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निरुक्त (१०/१०) में महर्षी यास्क जी लिखते है
"ऋषेर्दृष्टार्थस्य प्रीतिर्भवत्याख्यानसंयुक्ता"
अर्थात् - ऋषियों को अपने दर्शन किए हुए मंत्रार्थ को आख्यान के माध्यम से वर्णन करना रुचिकर लगता है।
इसलिए बोहोत सारे प्राकृतिक स्थितियों को भी ऋषियों के शैली में एक आख्यान के रूप में अलंकार प्रयोग द्वारा वर्णित किया जाता है।
उनमें से एक आख्यान है इंद्र के द्वारा पर्वतों का पंख काटने वाला आख्यान जिसका वास्तविक स्वरूप पर हमने वैदिक ग्रंथों से प्रमाण प्रस्तुत किया है।
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