Forwarded from ࿗ HISTORY OF ARYAVART ࿗
"हुविष्क : ब्राह्मणवाद की ओर उन्मुख कुषाण शासक"
हुविष्क (कनिष्क का पुत्र) का शासन कुषाण इतिहास का सबसे उज्ज्वल काल माना जाता है। उसके अभिलेख वर्ष 28–62 तक मिलते हैं और उसके सिक्के कपिशा से बिहार तक पाए गए हैं, जो उसके विशाल साम्राज्य और समृद्धि को दर्शाते हैं। सोने और तांबे के विभिन्न सिक्के उसके समय की शांति और आर्थिक उन्नति का संकेत देते हैं।
धार्मिक रूप से उसका झुकाव ब्राह्मणवाद की ओर था। उसके सिक्कों पर शिव, स्कंद, कुमार, विशाख और महासेन जैसे देवताओं के साथ कुछ सिक्कों पर विष्णु का भी चित्रण मिलता है। इसके बावजूद वह जैन और बौद्ध धर्म के प्रति भी सहिष्णु था और सभी धर्मों को स्वतंत्रता देने वाला उदार शासक माना जाता है।
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हुविष्क (कनिष्क का पुत्र) का शासन कुषाण इतिहास का सबसे उज्ज्वल काल माना जाता है। उसके अभिलेख वर्ष 28–62 तक मिलते हैं और उसके सिक्के कपिशा से बिहार तक पाए गए हैं, जो उसके विशाल साम्राज्य और समृद्धि को दर्शाते हैं। सोने और तांबे के विभिन्न सिक्के उसके समय की शांति और आर्थिक उन्नति का संकेत देते हैं।
धार्मिक रूप से उसका झुकाव ब्राह्मणवाद की ओर था। उसके सिक्कों पर शिव, स्कंद, कुमार, विशाख और महासेन जैसे देवताओं के साथ कुछ सिक्कों पर विष्णु का भी चित्रण मिलता है। इसके बावजूद वह जैन और बौद्ध धर्म के प्रति भी सहिष्णु था और सभी धर्मों को स्वतंत्रता देने वाला उदार शासक माना जाता है।
Source- India Under The Kushanas
by BN Puri
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वेदों के महान् ऋषि उशना काव्य
भागवत गीता (१०/३७) में
अब यह उशना कौन थे ?
उशना काव्य और कोई नहीं स्वयं शुक्राचार्य थे जो वेदों के मान्य ऋषि और असुरों के पुरोहित भी थे।
उन्होंने ऋग्वेद ( ८.८४; ९.८७; ९.८९ ) आदि मंत्र दर्शन किए थे।
इसी शुक्रनीति (१/३८) में उन्होंने जन्म से वर्ण का खंडन करते हुए कर्म और गुण से ही वर्ण का प्रतिपादन किया है।
तथा यही मत उनके पिता भृगु के भी था जो महाभारत (१२/१८८/१०) में वर्णित है।
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भागवत गीता (१०/३७) में
भगवान श्री कृष्ण खुद को कवियों में "उशना काव्य" कहते हैं।
अब यह उशना कौन थे ?
उशना काव्य और कोई नहीं स्वयं शुक्राचार्य थे जो वेदों के मान्य ऋषि और असुरों के पुरोहित भी थे।
उन्होंने ऋग्वेद ( ८.८४; ९.८७; ९.८९ ) आदि मंत्र दर्शन किए थे।
"बृहस्पति: देवानां पुरोहित आसीद् उशना काव्योऽसुराणाम्।" - ( जैमिनीय ब्राह्मण १/१२५)शुक्रनीति (१/१) के अनुसार ऋषि उशना महर्षि भृगु के पुत्र थे जिन्होंने ब्रह्मा जी से परंपरा प्राप्त नीति शास्त्र के ज्ञान जान के इसका रचना किया था।
"बृहस्पति: अयं देवेषू उशना काव्यो असुरेषु।" - (जैमिनीय ब्राह्मण १/१२६)
इसी शुक्रनीति (१/३८) में उन्होंने जन्म से वर्ण का खंडन करते हुए कर्म और गुण से ही वर्ण का प्रतिपादन किया है।
तथा यही मत उनके पिता भृगु के भी था जो महाभारत (१२/१८८/१०) में वर्णित है।
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ऋषि भृगु के सात पुत्रों के और वंश के नाम
महाभारत ( अनुशासनपर्व ) के अनुसार -
तथा उनको "वारुण" भी कहा जाता है
क्यों कि शतपथ ब्राह्मण (११/६/१/१) के अनुसार -
अर्थात् - ऋषि भृगु वरुण के पुत्र थे और उनके पिता वरुण थे।
इसलिए ही भृगु के वंश को वारुण इस नाम से भी कहा जाता है।
ऋग्वेद के ऋषि सूची में भी भृगु को
इस नाम से वर्णित है
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महाभारत ( अनुशासनपर्व ) के अनुसार -
ऋषि भृगु के सात पुत्र थे - च्यवन, वज्रशीर्ष, शुचि, और्व, शुक्राचार्य, वरेण्य तथा सवन
तथा उनको "वारुण" भी कहा जाता है
क्यों कि शतपथ ब्राह्मण (११/६/१/१) के अनुसार -
भृगुर्ह वै वारुणिः वरुणं पितरं
अर्थात् - ऋषि भृगु वरुण के पुत्र थे और उनके पिता वरुण थे।
इसलिए ही भृगु के वंश को वारुण इस नाम से भी कहा जाता है।
ऋग्वेद के ऋषि सूची में भी भृगु को
भृगु वारुणिः
इस नाम से वर्णित है
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Forwarded from 🔱 पाखंड खंडन 🔱
पोप का लक्षण
परहित से मतलब नहीं पोप इसी का नाम ।
ठग्गी -छल कपट से साधे अपना काम ।।
अर्थ - ⬇️
छल-कपट से दूसरों को ठग कर अपना प्रयोजन साधने वाले को पोप कहते है ।
• राजा और प्रजा को विद्या न पढ़ने देना
राजा को “तुम ब्राह्मण नहीं इसलिए तुम्हें शास्त्र पढ़ने का अधिकार नहीं कहकर अज्ञान के अंधकार में रखना
• अच्छे पुरुषों का सङ्ग न होने देना, रात दिन लोगों को बहकाने के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं करना
जैसे आजकल पोप लोग महर्षि दयानन्द, आर्य समाज, आदि की बुराईयां करते रहते है
ये है पोप के लक्षण परन्तू यह बात ध्यान में रखना कि जो जो उपरोक्त छल कपटादि कुत्सित व्यवहार करते है वे ही पोप कहाते है ।
जो कोई उन में भी धार्मिक विद्वान (सत्य प्रेमी) परोपकारी है वे सच्चे ब्राह्मण और साधु है ।
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@Pakhand_khandan
जब हम अपनी पोस्ट में पोप जी शब्द प्रयोग करते है तब कुछ भोले लोग हमसे प्रायः पूछते है कि भला ये पोप जी कौन है, क्या ये कोई व्यक्ति है ?
उनको हमारा उत्तर ⬇️
परहित से मतलब नहीं पोप इसी का नाम ।
ठग्गी -छल कपट से साधे अपना काम ।।
अर्थ - ⬇️
छल-कपट से दूसरों को ठग कर अपना प्रयोजन साधने वाले को पोप कहते है ।
• राजा और प्रजा को विद्या न पढ़ने देना
राजा को “तुम ब्राह्मण नहीं इसलिए तुम्हें शास्त्र पढ़ने का अधिकार नहीं कहकर अज्ञान के अंधकार में रखना
• अच्छे पुरुषों का सङ्ग न होने देना, रात दिन लोगों को बहकाने के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं करना
जैसे आजकल पोप लोग महर्षि दयानन्द, आर्य समाज, आदि की बुराईयां करते रहते है
ये है पोप के लक्षण परन्तू यह बात ध्यान में रखना कि जो जो उपरोक्त छल कपटादि कुत्सित व्यवहार करते है वे ही पोप कहाते है ।
जो कोई उन में भी धार्मिक विद्वान (सत्य प्रेमी) परोपकारी है वे सच्चे ब्राह्मण और साधु है ।
अब उन्हीं छली कपटी स्वार्थी लोगों (मनुष्यों को ठग कर अपना प्रयोजन सिद्ध करने वालों) ही का ग्रहण “पोप” शब्द से करना ।
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Forwarded from 🔱 पाखंड खंडन 🔱
नरक का सत्यार्थ क्या है ?
अब आप दर्शक लोग देखिये, कैसे वैदिक शास्त्र एक ही बात कहते है
इस संसार में “नरक” नामक कोई स्थान या योनि नहीं और इसी से गरुड पुराण का नरक मात्र एक कल्पना बनकर लोगों का दिल बहलाने और पोप जी के घर का चूल्हा जलाने का साधन है ।
आशा है सत्य प्रेमी जनता सत्य के दर्शन करके लाभान्वित होगी और पोप जी से कुछ तीखे प्रश्न करेगी
जैसे :-
वैदिक धर्म अनुसार नरक नाम जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहने का है तो आपका पौराणिक ईश्वर पापात्मा को इस नरक से छुड़वाना क्यों चाहता है ?
इससे आपका ईश्वर अन्यायकारी, पक्षपाती सिद्ध होता है ।
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@Pakhand_khandan
अब आप दर्शक लोग देखिये, कैसे वैदिक शास्त्र एक ही बात कहते है
इस संसार में “नरक” नामक कोई स्थान या योनि नहीं और इसी से गरुड पुराण का नरक मात्र एक कल्पना बनकर लोगों का दिल बहलाने और पोप जी के घर का चूल्हा जलाने का साधन है ।
आशा है सत्य प्रेमी जनता सत्य के दर्शन करके लाभान्वित होगी और पोप जी से कुछ तीखे प्रश्न करेगी
जैसे :-
वैदिक धर्म अनुसार नरक नाम जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहने का है तो आपका पौराणिक ईश्वर पापात्मा को इस नरक से छुड़वाना क्यों चाहता है ?
इससे आपका ईश्वर अन्यायकारी, पक्षपाती सिद्ध होता है ।
पोस्ट अच्छी लगे, ज्ञानवर्धक लगे तो कृपया Reaction दीजिये 🙏💐🙏
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Forwarded from ࿗ HISTORY OF ARYAVART ࿗
"कुषाण सिक्कों पर भगवान स्कंद और विशाख"
कुषाण काल के देवता स्कैन्दो-कोमारो (Skando-Komaro) और बिज़ागो (Bizago), हिंदू युद्धदेव स्कंद/कार्तिकेय (शिव के पुत्र) से संबंधित हैं।
स्कैन्दो-कोमारो स्कंद के “कुमार” रूप (राजकुमार) का प्रतीक है।
बिज़ागो विशाख देवता है।
ये दोनों देवता कुषाण सम्राट हुविष्क के एक विशेष स्वर्ण सिक्के पर साथ दिखाई देते हैं। सिक्के पर दोनों एक-दूसरे की ओर मुख किए खड़े हैं, सिर पर प्रभामंडल है, धोती पहने हैं और हाथों में दंड (स्टैंडर्ड) व तलवार धारण किए हुए हैं। उनके केश ब्राह्मणीय जूड़े जैसे दिखते हैं और आभूषण (हार, बाजूबंद, कंगन) भी बने हैं।
बाद के हिंदू धर्म में विशाखा और महासेन को स्कंद/कार्तिकेय के ही अन्य नाम माना गया, लेकिन इस प्रारंभिक कुषाण काल में ये अलग-अलग देवताओं के रूप में दिखते हैं। सिक्के के लेख से संकेत मिलता है कि बाईं ओर स्कैन्दो-कोमारो और दाईं ओर बिज़ागो दर्शाया गया है।
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कुषाण काल के देवता स्कैन्दो-कोमारो (Skando-Komaro) और बिज़ागो (Bizago), हिंदू युद्धदेव स्कंद/कार्तिकेय (शिव के पुत्र) से संबंधित हैं।
स्कैन्दो-कोमारो स्कंद के “कुमार” रूप (राजकुमार) का प्रतीक है।
बिज़ागो विशाख देवता है।
ये दोनों देवता कुषाण सम्राट हुविष्क के एक विशेष स्वर्ण सिक्के पर साथ दिखाई देते हैं। सिक्के पर दोनों एक-दूसरे की ओर मुख किए खड़े हैं, सिर पर प्रभामंडल है, धोती पहने हैं और हाथों में दंड (स्टैंडर्ड) व तलवार धारण किए हुए हैं। उनके केश ब्राह्मणीय जूड़े जैसे दिखते हैं और आभूषण (हार, बाजूबंद, कंगन) भी बने हैं।
बाद के हिंदू धर्म में विशाखा और महासेन को स्कंद/कार्तिकेय के ही अन्य नाम माना गया, लेकिन इस प्रारंभिक कुषाण काल में ये अलग-अलग देवताओं के रूप में दिखते हैं। सिक्के के लेख से संकेत मिलता है कि बाईं ओर स्कैन्दो-कोमारो और दाईं ओर बिज़ागो दर्शाया गया है।
Source- KUSHAN, KUSHANO-SASANIAN, AND KIDARITE COINS, A CATALOGUE OF COINS FROM THE AMERICAN NUMISMATIC SOCIETY by DAVID JONGEWARD AND JOE CRIBB WITH PETER DONOVAN
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यह राजकुमारी टट्टी बोल रहा हमारे किसी भी धर्म ग्रंथों में "सनातन धर्म" शब्द नहीं हैं ये बस बौद्धों के ग्रंथों में आता है
लगता है इस अनपढ़ ने कभी कोई अध्ययन नहीं किया 🤣 बस भौंकना आता है इसे
सनातन धर्म शब्द तो हमारे ५ वी शताब्दी के माधव वर्मा जैसे राजा के शिलालेख तक में मिल जाता है जिसमें लिखा है -
अर्थात् - श्रुति स्मृति विहित सनातन धर्म है।
इसके अलावा हमारे ग्रंथों में -
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
लगता है इस अनपढ़ ने कभी कोई अध्ययन नहीं किया 🤣 बस भौंकना आता है इसे
सनातन धर्म शब्द तो हमारे ५ वी शताब्दी के माधव वर्मा जैसे राजा के शिलालेख तक में मिल जाता है जिसमें लिखा है -
श्रुतिस्मृती विहित सनातन धर्म कर्मनिरताय
अर्थात् - श्रुति स्मृति विहित सनातन धर्म है।
इसके अलावा हमारे ग्रंथों में -
अथर्ववेद (१०/८/२२-२३),●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
रामायण (४/१८/१८), महाभारत(१३/४५/२१),
रामायण (१/२५/१९), रामायण (२/१९/५२), रामायण (२/२१/४९), रामायण (२/२४/१३), रामायण (२/३०/३८), रामायण (३/४/२२)
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