बदलते भारत की छवी
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भारत में जो वर्तमान समय कि स्थिति प्रस्थिति हैं उसने बाहर निकलना है

काले अंग्रेजों से मातृ भूमि के मुक्त और गौ हत्या का विरोध करना है
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From 1947 to 2025

1947 – ₹88.62
1948 – ₹95.87
1949 – ₹94.17
1950 – ₹99.18
1951 – ₹98.05
1952 – ₹76.81
1953 – ₹73.06
1954 – ₹77.75
1955 – ₹79.18
1956 – ₹90.81
1957 – ₹90.62
1958 – ₹95.38
1959 – ₹102.56
1960 – ₹111.87
1961 – ₹119.35
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1963 – ₹97.00
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1965 – ₹71.75
1966 – ₹83.75
1967 – ₹102.50
1968 – ₹162.00
1969 – ₹176.00
1970 – ₹184.00
1971 – ₹193.00
1972 – ₹202.00
1973 – ₹278.50
1974 – ₹506
1975 – ₹540
1976 – ₹432
1977 – ₹486
1978 – ₹685
1979 – ₹1,937
1980 – ₹1,330
1981 – ₹1,670
1982 – ₹1,645
1983 – ₹1,800
1984 – ₹1,970
1985 – ₹2,130
1986 – ₹2,140
1987 – ₹2,570
1988 – ₹3,130
1989 – ₹3,140
1990 – ₹3,200
1991 – ₹3,466
1992 – ₹4,334
1993 – ₹4,140
1994 – ₹4,598
1995 – ₹4,680
1996 – ₹5,160
1997 – ₹4,725
1998 – ₹4,045
1999 – ₹4,234
2000 – ₹4,400
2001 – ₹4,300
2002 – ₹4,990
2003 – ₹5,600
2004 – ₹5,850
2005 – ₹7,000
2006 – ₹8,400
2007 – ₹10,800
2008 – ₹12,500
2009 – ₹14,500
2010 – ₹18,500
2011 – ₹26,400
2012 – ₹31,050
2013 – ₹29,600
2014 – ₹28,006
2015 – ₹26,343
2016 – ₹28,623
2017 – ₹29,667
2018 – ₹31,438
2019 – ₹35,220
2020 – ₹48,651
2021 – ₹48,720
2022 – ₹52,670
2023 – ₹65,330
2024 – ₹77,913
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*बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़: पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कुलतली गांव में, जहां ममता बनर्जी सरकार का दबदबा है, एक स्थानीय व्यापारी की शिकायत पर काला सद्दाम सरदार के घर की तलाशी ली गई, तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं...उस घर के शयनकक्ष से सीधे पड़ोसी इस्लामी देश बांग्लादेश तक एक सुरंग बनी हुई है और हर दिन घुसपैठियों को भारत लाया जा रहा है...😡*
✍1
#_देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ||🌹🌹🌹❤❤❤🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🔱🔱🔱🚩🚩🚩🚩
जय माता दी
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा: ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ।।

:---
हे मातु मैं तुम्हारा मन्त्र , यंत्र , स्तुति , आह्वान , ध्यान , स्तुतिकथा , मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता , परन्तु सब प्रकार के क्लेशों को दूर करने वाला आपका अनुसरण करना ही जानता हूँ...

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।।
:---
सबका उद्धार करने वाली हे करुणामयी माता तुम्हारी पूजा की विधि न जान्ने के कारण , धन के आभाव में , आलस्य से और उन विधियों को अच्छी तरह न कर सकने के कारण , तुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो उसे क्षमा करो , क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती...

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुत: ।
मदीयोऽयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।।
:---
हे माँ भूमण्डल में तुम्हारे सरल पुत्र अनेको है पर उनमे एक मैं विरला ही बड़ा चंचल हूँ , तो भी हे शिवे मुझे त्याग देना तुम्हे उचित नहीं , क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती...

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।।

:---
हे जगदम्ब हे मातु मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की अथवा तुम्हारे लिए प्रचुर धन भी समर्पण नहीं किया तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है की क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती.

परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ।।

:---
हे गणेश जननी मैंने अपनी पचासी वर्ष से अधिक आयु बीत जाने पर विविध विधियों द्वारा पूजा करने से घबड़ा कर सब देवों को छोड़ दिया है , यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर किस की शरण में जाऊं?

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकै: ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ।।

:---
हे माता अपर्णे यदि तुम्हारे मंत्राक्षरों के कान में पड़ते ही चांडाल भी मिठाई के समान सुमधुरवाणी से युक्त बड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी करोड़पति बन कर चिरकाल तक निर्भय विचरता है तो उसके जप का अनुष्ठान करने पर जपने से जो फल होता है, उसे कौन जान सकता है...??

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति: ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ।।

:---
जो चिता का भस्म रमाए है , विष खाते है , नंगे रहते है , जटाजूट बांधे है , गले में सर्पमाला पहने है , हाथ में खप्पर लिए है , पशुपति और भूतों के स्वामी है , ऐसे शिवजी ने भी जो एकमात्र जगदीश्वर की पदवी प्राप्त की है , वह हे भवानि तुम्हारे साथ विवाह होने का ही फल है...

न मोक्षस्याकाड़्क्षा भवविभववाण्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन: ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत: ।।
:---
हे चंद्रमुखी माता मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है , सांसारिक वैभव की भी लालसा नहीं है , विज्ञान तथा सुख की भी अभिलाषा नहीं है , इसलिए मैं तुमसे यही मांगता हूँ कि मेरी साड़ी आयु मृडानी, रुद्राणी , शिव-शिव , भवानी आदि नामो के जपते-जपते ही बीते...

नाराधितासि विधिना विविधोपचारै:
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि: ।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ।।
:---
हे श्याम मैंने अनेको उपचारों से तुम्हारी सेवा नहीं कि (यही नहीं, इसके विपरीत) अनिष्ट चिंतन में तत्पर अपने वचनों से मैंने क्या नहीं किया? (अर्थात अनेकों बुराइयाँ कि है) फिर भी मुझ अनाथ पर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह तुम्हे बहुत ही उचित है, क्योंकि तुम मेरी माता हो...

आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा:
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ।।

हे दुर्गे हे दयासागर माहेश्वरी जब मैं किसी विपत्ति में पड़ता हूँ तो तुम्हारा ही स्मरण करता हूँ , इसे तुम मेरी दुष्टता मत समझना, क्योंकि भूखे-प्यासे बालक अपनी माँ को याद किया करते हैं...
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ।।
:---
हे जगजननी मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है , इसमें आश्चर्य ही क्या है?
क्योंकि अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देती...

मत्सम: पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु ।।

हे महादेवी मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप नाश करने वाली नहीं है , यह जानकार जैसा उचित समझो , व

।।इति श्रीमच्छञ्कराचार्यकृतम् देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
👉 गो दुग्ध उत्पाद के बिना किए गए यज्ञ, हवन सफल नहीं होते हैं।
👉 बुरे स्वप्न आने पर भगवान सूर्य के 12 नाम का उच्चारण करना चाहिए।
👉 तुलसी के पौधे को छोड़कर घर के अन्दर कॉंटे वाले, दूध वाले, फल वाले पौधे नहीं लगाना चाहिए।
👉 मार्कण्डेय ऋषि की उपासना करने से मनुष्य शतायु होता है।
👉 जन्मतिथि पर दीर्घायु प्राप्ति के लिए हेतु मार्कण्डेय ऋषि की स्तुति करना चाहिए।
👉 प्रत्येक दिन प्रात:काल सर्वप्रथम आठ चिरंजीवियों का स्मरण करने से रोग निकट नहीं आते।
👉 प्रत्येक पूर्णिमा को वेदव्यास की प्रतिमा की पूजा - अर्चना करने से विद्यार्थी सदैव उच्चतम सफलता प्राप्त करता है।
👉 जो परिवार एकजुट रहता है, उस पर कुलदेवी, कुलदेवता अत्यधिक प्रसन्न रहते हैं।
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प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

प्रिय वाणी बोलने से सब लोग संतुष्ट होते हैं इसलिए प्रिय वाणी का ही प्रयोग करना चाहिए। प्रिय बोलने में दरिद्रता क्यों ? ।

ज्योतिषाचार्या मित महाकाल महादेव और योगाचार्य प्रशांत सैनी ✍🏻 🙏🏻 🙏🏻 🙏🏻
■●> एकलव्य :--एक शास्त्रीय दृष्टिकोण

महाभारत को काल्पनिक कहने वाले पाश्चात्यविद् तथा वामपन्थी इतिहासकार एकलब्य बिषय को बार बार उठाकर जनमानस में वैमनस्यता का बीज बोता है इन तथाकथित इतिहासकारों के अनुसार विश्वविख्यात अयाख्यान महाभारत जब काल्पनिक ही है तो उसमें आये हुए कथानक वास्तविका कैसे ??

उन धूर्त तथाकथित इतिहासकारों के सामने प्रथम यही प्रश्न रखना चाहिए

फिर देखिए क्या होता है ।

अस्तु यह एक ऐसा बिषय है जिसकी भ्रांति जनमानस में ऐसा व्याप्त है बड़े से बड़ा विद्वान भी इस बिषय को लेकर यह तक कह डालते है कि एकलव्य के साथ जो हुआ वह न्याय नही है

___________

सनातन धर्म मे जितनी महता एक श्रोतीय ब्राह्मण की है उतनी ही महता एक स्वधर्मप्रायण शुद्र की है

■● अपि शुद्रं च धर्मज्ञं सद् वृत्तमभिपूजयेत् (महाभारत अनुशाशन पर्व ४८/४८)

स्व स्व धर्मानुरक्त धर्मानुरागी का सम्मान तो स्वयं ईश्वर भी करता है इस लिए शूद्रकुल में उतपन्न हुए विदुर को भी साक्षात् धर्म का अंश माना गया ,निषादराज गुह्य तो हमारे इष्टदेव श्रीरामचन्द्र के सखा तक हुए फिर निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलब्य के साथ भेदभाव व्यवहार करने का कोई औचित्य भी नही बनता महाभारत में युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का वर्णन है, इस यज्ञ में सभी वर्णों के लोगों के साथ - साथ देश - विदेश के विभिन्न राजाओं को आमंत्रित किया गया था। इनमें निषादराज एकलव्य भी थे तथा उनका स्थान श्रेष्ठ राजाओं और ब्राह्मणों के मध्य था । यदि निषाद जाती के साथ भेदभाव हीनभावना होती तो एकलब्य को राजाओं और ब्राह्मणों के मध्य स्थान न मिला होता ।

■● दुर्योधने च राजेन्द्रे स्थिते पुरुषसत्तमे।

कृपे च भारताचार्ये कथं कृष्णस्त्वयाऽर्चितः।।

द्रुमं कम्पुरुषाचार्यमतिक्रम्य तथाऽर्चितः।

भीष्मके चैव दुर्धर्षे पाण्डुवत्कृतलक्षणे।।

नृपे च रुक्मिणि श्रेष्ठे एकलव्ये तथैव च। (महाभारत सभापर्व ४०/१३-१४)

अतः यह स्प्ष्ट हुआ कि जितना सम्मान भिन्न भिन्न देश से आये हुए राजाओं तथा आचार्यो का था उतना ही सम्मान निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य का भी था ।

___________

■● द्रोणाचार्य :--

■● द्रोणस्तपस्तेपे महातपाः।। (म 0आ0 १२९/४४)

■●वेदवेदाङ्गविद्वान्स तपसा ।(म0 आ0 १२९/४५)

■● गुरवे ब्रह्मवित्तम (म 0 आ0 १३१/५५)

गुरुद्रोणाचार्य के बिषय में ब्रह्मवेत्ता ,महातपस्वी,वेद वेदाङ्ग विद्या में निष्णात पद विशेषण आया है ऐसा श्रोतीय महातपस्वी ब्रह्मवेत्ता आचार्य जो सम्पूर्ण विद्या में निष्णात हो वे न किसी से द्वेष ही करते है और न किसी से मोह ऐसा श्रुतिवचन है

■◆ तत्र को मोहः कः शोकेस एकत्वमनुपश्यत

पाञ्चाल नरेश द्रुपद ने जब आचार्य द्रोणाचार्य को तिरस्कृत किया तब वे हस्तिनापुर पहुच कर वे अपनी ब्यथा भीष्म पितामह से कह सुनाई

भीष्म पितामह ने आचार्य द्रोणाचार्य के सामने अपना प्रस्ताव रखा कि आप यही हस्तिनापुर में रह कर कुरुवंश के राजकुमारों को धनुर्वेद एवं अस्त्र शस्त्र की शिक्षा दीजिए एवं कौरवों के घर पर सदा सम्मानित हो मनवान्छित उपभोगों का भोग कीजिये ।

भीष्पिताम्ह का यह प्रस्ताव गुरु द्रोणाचार्य ने स्वीकार किया और भीष्मपितामह को वचन भी दिया कि इसी कुरुवंश के राजकुमारों को मैं विश्व के महानतम योद्धा बनाऊंगा ।

■● अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय।

भुङ्क्ष भोगान्भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये।।

कुरूणामस्ति यद्वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम्।

त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव (महाभारत आदिपर्व १३०/७७-७८)

निष्पक्ष भाव से आचार्य द्रोणाचार्य कुरुवंश के राजकुमारों को धनुर्वेद सहित समस्त शास्त्रो अस्त्रों की शिक्षा देने लगे थे ।

__________

■●एकलव्य:--

निषादराज हिरण्यधनु पुत्र एकलव्य अस्त्र शस्त्र विद्या प्राप्त करने हेतु जब आचार्य द्रोणाचार्य के पास जाते है तब आचार्य द्रोणाचार्य उन्हें शिक्षा देने के लिए मना कर देते है ।

■● ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः।

एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह।।

न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्।

■● शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया। (महाभारत आदिपर्व १३१/ ३१-३२ )
एक क्षण के लिए तो यहाँ पाठकगण को यह लगेगा कि द्रोणाचार्य ने ऐसा अन्याय क्यो किया ??

●एकलब्य को धनुर्वेद की शिक्षा क्यो नही दी।

ऐसा इस लिए हुआ कि गुरुद्रोणाचार्य वचनबद्ध थे उन्होंने भीष्मपितामह को वचन दे रखा था कि कुरुवंश के राजकुमारों को अस्त्र शास्त्र की शिक्षा देगा ।

दूसरा कारण यह है कि गुरुद्रोणाचार्य को वेतन , धनधान्य तथा समस्त भोग उपलब्ध पितामह भीष्म करा रहे थे तो भला कुरुवंश को छोड़ वे अन्य कुमारों को शिक्षा देना स्वयं अपने वचनों को भंग करना होता
द्वेष का कोई कारण नही अपितु वे इस कलङ्क से भी बचना चाहते थे कि वेतन कोई और दे और धनुर्वेद सहित अस्त्र शस्त्र की शिक्षा किसी और को दे ऐसे में पितामह भीष्म भी यह प्रश्न उठा सकते थे कि आप के मनोवांछित समस्त भोग तथा वेतन कुरुवंश की ओर से प्राप्त हो रहा है और आप कुरुवंश राजकुमारों को छोड़ किसी और को अस्त्र शस्त्र विद्या में निष्णात करा रहे है ।
इस कारण आचार्य द्रोण ने एकलब्य को अपने यहाँ धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया ।

गुरु द्रोणाचार्य के मना करने के पश्चात एकलब्य ने वन में लौट कर आचार्य द्रोणाचार्य की ही मूर्ति बना धनुर्विद्या का अभ्यास आरम्भ किया ।

■● स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परन्तपः।

अरण्यमनुसंप्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम्।

तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा।

इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः।। (महाभारत आदिपर्व १३१/३३-३४)

● यहाँ दो बिषय बड़े ही महत्वपूर्ण है ।

नम्बर -१ - गुरु के अनुमति के बिना उनकी मूर्ति बना कर अभ्यास प्रारम्भ करना स्मृति शास्त्रो में स्प्ष्ट आदेश आये है कि गुरु की अनुमति के बिना विद्या का अध्ययन करने वाला चोर है और वह दण्ड के पात्र है ।

■● ब्रह्म यस्त्वननुज्ञातं अधीयानादवाप्नुयात् ।

स ब्रह्मस्तेयसंयुक्तो नरकं प्रतिपद्यते (मनुस्मृति २/११६)

और एकलब्य ने वही किया गुरुद्रोणाचार्य के मना करने के बाद भी उनकी मूर्ति बना कर धनुर्वेद विद्या का अभ्यास प्रारम्भ किया

नम्बर -२-- विद्या प्राप्त होने के पश्चात शिष्य अपने गुरु को दक्षिणा प्रदान करें ।

■● शक्त्या गुर्वर्थं आहरेत् । ।

■◆ क्षेत्रं हिरण्यं गां अश्वं छत्रोपानहं आसनम् ।

धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिं आवहेत् (मनुस्मृति २/२४५-२४६)
एकलब्य द्वारा विधा की चोरी करना उसे दण्ड का पात्र बनाता है तो गुरु के शिक्षा प्राप्त कर दक्षिणा देने का अधिकारी भी बनाता है

जब आचार्य द्रोणाचार्य को यह ज्ञात हुआ कि एकलब्य उनकी मूर्ति बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा है तो वे मनोमन प्रसन्न हुए और उनके कौशल को देखने वन में चले वहाँ एकलब्य की प्रतिभा देख वे दंग रह गए और बिचार भी किये की यदि यह बालक हस्तिनापुर क्षेत्र के अन्तर्गत रहते हुए धनुर्विद्या में पारंगत हो जाता है तो भीष्मपितामह सहित राजा धृतराष्ट्र एवं कृपाचार्य आदि आचार्यगण क्या सोचेंगे ?

इस बिषम परिस्थिति को भांपते हुए गुरुद्रोणाचार्य ने यह बिचार किया कि एकलब्य का अनिष्ट भी न हो और वे अपनी धनुर्विद्या का अभ्यास भी आरम्भ रखे और मैं कलङ्कित भी न होऊं ।

आचार्य द्रोण एकलब्य से गुरुदक्षिणा मांगता है ।

■● यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम।। (महाभारत आदिपर्व १३१/ ५४)

गुरुदक्षिणा का नाम सुन एकलव्य प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ आप स्वयं इसके लिए आज्ञा दे

आचार्य द्रोण एकलब्य से गुरुदक्षिणा में उनका अंगूठा मांग लिया

■◆तमब्रवीत्त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति।। (महाभारत आदिपर्व १३१/५६)
एकलब्य आचार्य द्रोण की इस दारुण वचन सुनकर भी बिना बिचलित हुए प्रसन्नचित हो कर अपने दाहिने हाथ के अंगूठे को काट कर द्रोणाचार्य को समर्पित किया ।

■●तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः।

छित्त्वाऽविचार्य तं प्रादाद्द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः (महाभारत आदिपर्व १३१/५८)

यहाँ भी दो विशेषता है एक तो एकलब्य स्वयं इस प्रकार के दारुणवचन सुनकर भी विचलित नही हुए और प्रसन्नचित हो गुरुदक्षिणा देकर अपनी गुरुभक्ति भी सिद्ध की ।

वामसेफियो मुलविहीन हिन्दुओ को इस प्रकरण पर भले ही पेट मे दर्द हो परन्तु एकलब्य को अंगूठे कटने पर भी दर्द न हुआ यहाँ प्रसन्नचित जो विशेषण आया है वह इसकी पुष्टि स्वयं करता है ।

एकलब्य की गुरुभक्ति देख आचार्य द्रोण भी प्रसन्न हुए और तत्क्षण एकलब्य को ऐसी विद्या दे डाली जो अपने प्रिय पुत्र तथा शिष्यों को भी प्रदान नही किये ।

■● ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत।

न तथा च स शीघ्रोऽभूद्यथा पूर्वं नराधिप।। (महाभारत आदिपर्व १३१/५९)

गुरुद्रोणाचार्य ने संकेत में ही एकलब्य को यह विद्या प्रदान की जिससे वे तर्जनी और मध्यमा अंगुली से किस प्रकार वाणों का संघान करना चाहिए ।

गुरुद्रोणाचार्य की दृष्टि में एकलब्य के प्रति द्वेष अथवा हेय भाव होता तो वे उन्हें ऐसी विद्या क्यो प्रदान की होती ?
ज्योतिष वो विज्ञान है जो मनुष्य के अंधविश्वास रूपी अंधकार का हरण करके ,ज्ञान का प्रकाश करता है।ज्योतिष भाग्य पर नहीं कर्म और केवल कर्म पर ही आधारित शास्त्र है।
प्रदोष काल:
प्रदोष काल अर्थात् सूर्यास्त के पश्चात् का काल जो भगवान शिव की साधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
प्रदोष काल निर्धारित करने की कई मान्यताएं प्रचलन में हैं:
१) एक मान्यता के अनुसार प्रदोष काल सूर्यास्त के समय से आगे चार घटी २४×४=९६ मिनिट का होता है।
२)दूसरी मान्यता के अनुसार सूर्यास्त के समय से अगले सूर्योदय तक के काल (रात्रिमान) के पांच भागों में पहला भाग प्रदोष काल माना जायेगा। सामान्यतः यह सूर्यास्त के समय से १४४ मिनिट तक रहेगा।
३)एक अन्य मतानुसार सूर्यास्त के ९० मिनिट पहले और सूर्यास्त के ९० मिनिट पश्चात तक का समय प्रदोषकाल कहलाता है।
प्रदोषकाल और प्रदोष तिथि में अन्तर:
प्रदोष काल प्रतिदिन सूर्यास्त से ९० मिनिट तक का होता है और प्रदोष तिथि अर्थात् दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि(जो उस दिन के सूर्यास्त के समय विद्यमान हो) प्रदोष तिथि में उदया त्रयोदशी से अधिक महत्व सूर्यास्त के समय विद्यमान त्रयोदशी का होता है।पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह में दो प्रदोष तिथियां अंकित की जाती हैं।
प्रदोष काल एवं प्रदोष तिथि का महामात्य:
पौराणिक मान्यतानुसार महादेव ने समुद्र मंथन से उत्पन्न विष का पान भी प्रदोष काल में ही किया था।भगवती पार्वती ने अपने सामर्थ्य से उस विष को शिवजी के कंठ तक ही रोक दिया इसीलिए शिव “नीलकंठ” कहलाएं।
भगवान शिव ने प्रदोष काल में ही समस्त सृष्टि को इस भयंकर विष के प्रभाव से बचाया इसीलिए इसे शिव उपासना के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रदोष के दिन सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में भगवान शिव की उपासना कर उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है।शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति के जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।इस व्रत को करने से भगवान शिव की कृपा सदैव आप पर बनी रहती है।
प्रदोष यानी समस्त दोषों से मुक्ति दिलाने वाला पुण्यकाल।मनुष्य के जीवन में रोग,कर्ज,शत्रु, गृहबाधा,संकट,पूर्वजन्म के पाप आदि यह सब एक प्रकार के विष ही है और प्रदोष काल के शिव पूजन से भगवान भोलेनाथ की कृपा से हम इस विष के प्रभाव से मुक्त हो सकते हैं।
इसलिए कहा गया है कि प्रदोष के दिन आप अगर संभव हो तो दिनभर उपवास रखें और सायंकाल (शाम) को प्रदोषकाल में शिवपूजन,रुद्राभिषेक, शिवस्तोत्रों का पाठ,शिव मंत्र का जाप, बिल्वार्चन, ध्यानादि साधना कर सकते हैं। प्रदोष काल के शिवपूजन से दरिद्रता दूर होती और आर्थिक उन्नति होती है।
मान्यता है कि प्रदोष काल के समय महादेव कैलाश पर्वत के रजत भवन में इस समय नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं।जो भी श्रद्धालु गण अपना कल्याण चाहते हैं यह व्रत रक्षा सकते हैं।प्रदोष व्रत को करने से हर प्रकार का दोष मिट जाता है।
वारों अनुसार प्रदोष व्रतों का विशेष महत्व:
१)रविवार: को अगर प्रदोष हो तो उसे “भानुप्रदोष” कहते हैं।यह आरोग्य प्राप्ति के लिए लाभदायी और परम कल्याणकारी होता है।रविवार के दिन प्रदोष व्रत आप रखते हैं तो सदा निरोग रहेंगे।
२)सोमवार:को अगर प्रदोष हो तो उसे “सोम प्रदोष” कहते हैं।यह सर्व प्रकार के पापों का शमन करने वाला होता है।सोमवार के दिन व्रत रखने से आपकी ईच्छा फलित होती है।
३)मंगलवार: को अगर प्रदोष हो तो उसे “भौम प्रदोष” कहते हैं।यह दरिद्रता दूर करने वाला, ऋणमुक्ति के लिए और आर्थिक उन्नति के लिये लाभदायी है।मंगलवार को प्रदोष व्रत रखने से रोग से मुक्ति मिलती है और आप स्वस्थ रहते हैं।
४)बुधवार:को अगर प्रदोष हो तो उसे बुध प्रदोष या “सौम्य प्रदोष” कहते हैं।संतान सुख प्राप्ति और विद्या प्राप्ति के लिए लाभदायी।बुधवार के दिन व्रत का पालन करने से सभी प्रकार की कामना सिद्ध होती है।
५)गुरुवार:को अगर प्रदोष हो तो यह आध्यात्मिक उन्नति एवं पितृदोष निवारण के लिये लाभदायी।
६)शुक्रवार:को अगर प्रदोष हो तो उसे “भृगु प्रदोष” कहते हैं.. शत्रु बाधा के लिये लाभदायी।
७)शनिवार:को अगर प्रदोष हो तो उसे “शनि प्रदोष” कहते हैं।यह अत्यन्त दुर्लभ और लाभदायी होता है। शनिबाधा,साढ़े साती,धन प्राप्ति, ऋण मुक्ति,राज्यपद आदि के लिये लाभदायी।शनि प्रदोष व्रत से पुत्र की प्राप्ति होती है।
सौम प्रदोष,भौम प्रदोष और शनि प्रदोष,यह तीन प्रदोष आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।और इन तीनों में शनि प्रदोष महत्वपूर्ण है।
प्रदोष काल में वर्जित कर्म (ना किए जाने वाले कर्म):
१.भोजन: मांसाहारी भोजन,शराब,सिगरेट और नशे की चीजों से पूरी तरह बचें।अन्न,चावल और साधारण नमक का सेवन भी वर्जित है।
२.व्यवहार:गुस्सा करना,झगड़ा करना,झूठ बोलना,बड़ों का अनादर करना और किसी के प्रति गलत विचार रखना।
३.पूजा सामग्री:शिवलिंग पर टूटे चावल(अक्षत) और खण्डित चंदन नहीं चढ़ाना चाहिए।
४.रंग:काले रंग के वस्त्र धारण ना करें।
५.मन:मन में नकारात्मक विचार या किसी के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए।
नमो पार्वती पतये हर हर महादेव 🙏 🚩
जय देव गुरु बृहस्पति 🙏🚩
भक्ति योग (ईश्वर के प्रति भक्ति एंव समर्पण भाव) से ज्ञान योग(अर्जित ज्ञान और विवरण) से कर्म योग (निष्काम कर्म)तक।


ज्योतिषाचार्या मित महाकाल महादेव ✍🏻
रविपुष्यामृत योग

'शिव पुराण' में पुष्य नक्षत्र को भगवान शिव की विभूति बताया गया है । पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से अनिष्ट-से-अनिष्टकर दोष भी समाप्त और निष्फल-से हो जाते हैं, वे हमारे लिए पुष्य नक्षत्र के पूरक बनकर अनुकूल फलदायी हो जाते हैं। 'सर्वसिद्धिकरः पुष्यः ।' इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर है | पुष्य नक्षत्र में किये गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है तथा कर्ता को धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है ।

इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है परंतु पुष्य में विवाह व उससे संबधित सभी मांगलिक कार्य वर्जित हैं ।
(शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)
*🌞 🚩 । l ॐ l । 🚩 🌞*
🕉 ।। *श्री गणेशाय नमः* ।। 🕉
 *सुप्रभातम् स्नेह वंदनम्* 
🌐 *आज का पंचांग* 🌐
⛳ *तिथि*……( ०३ ) तृतीया ⛳️
🍀 चतुर्थी क्षयतिथि 🍀
🙏 संकष्ट चतुर्थी 🙏
🌝 चंद्रोदय रात्रि ०९ः२१ 🌝
🌺 अंगारकी 🌺
💐 श्री मुंडिया स्वामी पुण्यतिथि 💐
0️⃣6️⃣-0️⃣1️⃣-2⃣0⃣2️⃣6️⃣
🔔 *वार*………मंगलवार 🔔
🦚 *नक्षत्र*……आश्लेषा 🦚
🪔 *योग*………प्रीति 🪔
✳️*करण*…….बव ✳️
🌅 *सूर्योदय* :-०७ः२३ 🌅
🌌 *सूर्यास्त* :-०६ः०७ 🌌
🌓 *पक्ष*....………कृष्ण 🌓
🌝 *चन्द्र राशि*….कर्क / मध्याह्न १२ः२० से सिंह 🌝
⏺️ *ऋतु*.......….शिशिर ⏺️
🍀 *अयन*………उत्तर🍀
🪷 *मास*……….गुजरात- महाराष्ट्र में पौष अन्यत्र माघ 🪷
🌻*कलियुगाब्द*….५१२७🌻
🌎 *विक्रम संवत्*.....२०८२ 🌎
⭐️ *शक संवत्*...... १९४७ ⭐️
🪻अभिजीत …..मध्याह्न १२ः१५ से १२ः५८ तक 🪻
🌚 राहुकाल …..दोपहर ०३ः३८ से ०४ः४४ तक 🌚

🙏 🌹 *जय श्री कृष्ण* 🌹🙏


ज्योतिषाचार्या मित महाकाल महादेव ✍🏻
Forwarded from कैलाश के निवासी (Meett Meett)
🙏🌹 *जय श्री महाकाल*🌹🙏
*श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का भस्म आरती श्रृंगार दर्शन*
*11-01-2026 कण-कण में महादेव*💕
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🙏🌹 *जय श्री महाकाल*🌹🙏
*श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का प्रातः कालीन दद्योदक आरती श्रृंगार दर्शन*
*12-01-2026 कण-कण में महादेव*💕
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