ज़िंदगी की यही रीत है जनाब,
पीठ पीछे बातें और मुँह पर मीठी बात है।
कमाल का हुनर रखते हैं कुछ लोग,
दिल में खंजर और लफ़्ज़ों में मिठास रखते हैं। 😏
पीठ पीछे बातें और मुँह पर मीठी बात है।
कमाल का हुनर रखते हैं कुछ लोग,
दिल में खंजर और लफ़्ज़ों में मिठास रखते हैं। 😏
❤5🥰2✍1
खाली पड़े मेरे हाथ देख लो,
कोई नहीं मेरे साथ देख लो।
जिसे चाहा सारी उम्र बड़ी शिद्दत से,
वो जाते-जाते कह गया—
पहले अपनी औकात देख लो।
कोई नहीं मेरे साथ देख लो।
जिसे चाहा सारी उम्र बड़ी शिद्दत से,
वो जाते-जाते कह गया—
पहले अपनी औकात देख लो।
❤7🔥3✍1
मन करता है इतना रोऊँ कि पूछो मत,
अपने ही दर्द से कह दूँ—अब तू भी कुछ पूछो मत।
किसे सुनाऊँ दिल में दबे हुए ये किस्से,
यहाँ कोई अपना नहीं, जिससे कह सकूँ—थोड़ी देर मेरे पास बैठो ।
मन करता है किसी के गले लगकर रोऊँ,
इतना रोऊँ कि आँखें भी कह दें—अब और मत रो।
दर्द को बताना चाहती हूँ अपना हर राज,
मगर दर्द भी चुप है,
क्योंकि उसे सुनने वाला कोई नहीं।
कभी लगता है, आँसुओं में सब कुछ बहा दूँ,
इतना रोऊँ कि मेरा दर्द भी मुझसे पूछ बैठे—
आख़िर तुझे हुआ क्या है?
पर सबसे बड़ा दर्द तो यही है,
कि रोने को दिल भरा पड़ा है,
और सिर रखने के लिए
किसी का कंधा तक नहीं है।
मन करता है बस कोई इतना कह दे—
“रो लो… मैं सुन रहा हूँ।”
शायद फिर ये आँखें भी
इतनी बेबस न रहें।
अपने ही दर्द से कह दूँ—अब तू भी कुछ पूछो मत।
किसे सुनाऊँ दिल में दबे हुए ये किस्से,
यहाँ कोई अपना नहीं, जिससे कह सकूँ—थोड़ी देर मेरे पास बैठो ।
मन करता है किसी के गले लगकर रोऊँ,
इतना रोऊँ कि आँखें भी कह दें—अब और मत रो।
दर्द को बताना चाहती हूँ अपना हर राज,
मगर दर्द भी चुप है,
क्योंकि उसे सुनने वाला कोई नहीं।
कभी लगता है, आँसुओं में सब कुछ बहा दूँ,
इतना रोऊँ कि मेरा दर्द भी मुझसे पूछ बैठे—
आख़िर तुझे हुआ क्या है?
पर सबसे बड़ा दर्द तो यही है,
कि रोने को दिल भरा पड़ा है,
और सिर रखने के लिए
किसी का कंधा तक नहीं है।
मन करता है बस कोई इतना कह दे—
“रो लो… मैं सुन रहा हूँ।”
शायद फिर ये आँखें भी
इतनी बेबस न रहें।
🔥𝐌 𝐀 𝐃 𝐃 𝐘
❤6😢2✍1
💔🫀🥀.....
Ishq........
इश्क़ में इंसान यूँ ही नहीं मरता,
रफ़्ता-रफ़्ता ख़ुद से बिछड़ता है।
कभी सीने में जलती हुई ख़ामोशी,
कभी बहते हुए आँसुओं में ढलता है।
नब्ज़ चलती रहती है, साँसें आती हैं,
पर अंदर कुछ ख़ामोश हो जाता है।
जब किसी को अपनी दुनिया मानकर,
इंसान अकेला ही रह जाता है।
अपनी ही ख़वाहिशों की मय्यत उठाकर,
हर रोज़ मुस्कुराना पड़ता है।
इश्क़ वो दर्द है जहाँ जीने के लिए,
हर पल थोड़ा-थोड़ा मरना पड़ता है।
ना कोई शिकवा, ना कोई शिकायत बचती है,
बस एक अधूरी आस रह जाती है।
जिस्म तो चलता-फिरता रहता है दुनिया में,
पर रूह किसी और के पास रह जाती है।
💔🫀🥀.......
Ishq........
इश्क़ में इंसान यूँ ही नहीं मरता,
रफ़्ता-रफ़्ता ख़ुद से बिछड़ता है।
कभी सीने में जलती हुई ख़ामोशी,
कभी बहते हुए आँसुओं में ढलता है।
नब्ज़ चलती रहती है, साँसें आती हैं,
पर अंदर कुछ ख़ामोश हो जाता है।
जब किसी को अपनी दुनिया मानकर,
इंसान अकेला ही रह जाता है।
अपनी ही ख़वाहिशों की मय्यत उठाकर,
हर रोज़ मुस्कुराना पड़ता है।
इश्क़ वो दर्द है जहाँ जीने के लिए,
हर पल थोड़ा-थोड़ा मरना पड़ता है।
ना कोई शिकवा, ना कोई शिकायत बचती है,
बस एक अधूरी आस रह जाती है।
जिस्म तो चलता-फिरता रहता है दुनिया में,
पर रूह किसी और के पास रह जाती है।
💔🫀🥀.......
❤8✍1
मैं जो बदल रही हूँ ना बहुत करीब से देखा हैं खुद का कपता हुआ शरीर
❤9✍1
🫀💔🥀......
वो मुझे छोड़कर खुश हैं तो शिकायत कैसी,
अब उन्हें खुश भी न देखूँ तो मोहब्बत कैसी...
दर्द मेरा देखकर वो हँस दें, तो हँसी भी क़बूल है,
उनके रास्ते का काँटा बनूँ, ये मोहब्बत का कौन-सा ज़ूल है?
उन्हें मिली है राहत हमसे दूर जाकर,
फिर मेरी इस तड़प की अब कोई क़ीमत कैसी...
मेरी चाहत का मक़सद उन्हें पाना कभी था ही नहीं,
उनका मुस्कुराना ही तो मेरी हर दुआ का हासिल था सही।
अगर मेरी तन्हाई में ही छिपी है उनकी हर खुशी,
तो इस तन्हाई से मुझे अब कोई अदावत कैसी?
वो मुझे छोड़कर खुश हैं तो शिकायत कैसी,
अब उन्हें खुश भी न देखूँ तो मोहब्बत कैसी..
💔🫀🥀........
वो मुझे छोड़कर खुश हैं तो शिकायत कैसी,
अब उन्हें खुश भी न देखूँ तो मोहब्बत कैसी...
दर्द मेरा देखकर वो हँस दें, तो हँसी भी क़बूल है,
उनके रास्ते का काँटा बनूँ, ये मोहब्बत का कौन-सा ज़ूल है?
उन्हें मिली है राहत हमसे दूर जाकर,
फिर मेरी इस तड़प की अब कोई क़ीमत कैसी...
मेरी चाहत का मक़सद उन्हें पाना कभी था ही नहीं,
उनका मुस्कुराना ही तो मेरी हर दुआ का हासिल था सही।
अगर मेरी तन्हाई में ही छिपी है उनकी हर खुशी,
तो इस तन्हाई से मुझे अब कोई अदावत कैसी?
वो मुझे छोड़कर खुश हैं तो शिकायत कैसी,
अब उन्हें खुश भी न देखूँ तो मोहब्बत कैसी..
💔🫀🥀........
❤10✍1
जो हमेशा सबके लिए मौजूद रहते हैं,
अक्सर वही सबसे ज्यादा अकेले रह जाते हैं।
लोग आदत बना लेते हैं हमारी मौजूदगी की,
फिर हमारी कद्र करना भूल जाते हैं।
इसलिए जहाँ बार-बार दिल दुखे,
वहाँ शिकायत नहीं…
बस धीरे-से दूर हो जाना चाहिए।
अक्सर वही सबसे ज्यादा अकेले रह जाते हैं।
लोग आदत बना लेते हैं हमारी मौजूदगी की,
फिर हमारी कद्र करना भूल जाते हैं।
इसलिए जहाँ बार-बार दिल दुखे,
वहाँ शिकायत नहीं…
बस धीरे-से दूर हो जाना चाहिए।
❤6🔥5✍1
मैंने किसी को अपने से दूर नहीं किया, वो सब विश्वास की दुर्घटना में मारे गए।
❤6✍1
मैं किससे कहूँ कि भीतर से घुट रही हूँ…
मैं किससे कहूँ कि ये दर्द कितना गहरा है!
मैं किससे कहूँ कि हौसला हार रही हूँ…
मैं किससे कहूँ कि अब बहुत थक चुकी हूँ!
मैं किससे कहूँ कि बस थोड़ा सुकून चाहिए…
मैं किससे कहूँ कि आज जी भरकर रोना चाहती हूँ!
मैं किससे कहूँ कि मन बुझने लगा है…
मैं किससे कहूँ कि दिल किसी अनजाने डर से काँप रहा है!
मैं… मैं… आखिर किससे कहूँ?
किसके सामने रखूँ ये दिल का हाल…
किससे कहूँ… किससे कहूँ!
मैं किससे कहूँ कि ये दर्द कितना गहरा है!
मैं किससे कहूँ कि हौसला हार रही हूँ…
मैं किससे कहूँ कि अब बहुत थक चुकी हूँ!
मैं किससे कहूँ कि बस थोड़ा सुकून चाहिए…
मैं किससे कहूँ कि आज जी भरकर रोना चाहती हूँ!
मैं किससे कहूँ कि मन बुझने लगा है…
मैं किससे कहूँ कि दिल किसी अनजाने डर से काँप रहा है!
मैं… मैं… आखिर किससे कहूँ?
किसके सामने रखूँ ये दिल का हाल…
किससे कहूँ… किससे कहूँ!
❤12✍1
जब भी तन्हाई में दिल का हिसाब करता हूँ, ख़ुद को ही अपनी नज़रों में ख़राब करता हूँ। ख्वाब जो देखे थे सब रेत की तरह बिखर गए, हम अपनों की उम्मीदों से भी नीचे उतर गए।
माँ-बाप का फ़ख़्र बनना था, मगर शर्मिंदगी बन गए, ज़िंदगी की दौड़ में जाने कब एक ख़ता बन गए। न तक़दीर से प्यार मिला, न कोई सहारा मिला, इस तूफ़ान में डूबती कश्ती को न किनारा मिला।
अब तो आईना भी मेरी बेबसी पर हँसता है, एक टूटा हुआ इंसान इस सीने में बस्ता है। दिल कहता है काश ये साँसें कभी आई ही न होतीं, इस दुनिया में आने की इतनी बड़ी सज़ा न होती।
माँ-बाप का फ़ख़्र बनना था, मगर शर्मिंदगी बन गए, ज़िंदगी की दौड़ में जाने कब एक ख़ता बन गए। न तक़दीर से प्यार मिला, न कोई सहारा मिला, इस तूफ़ान में डूबती कश्ती को न किनारा मिला।
अब तो आईना भी मेरी बेबसी पर हँसता है, एक टूटा हुआ इंसान इस सीने में बस्ता है। दिल कहता है काश ये साँसें कभी आई ही न होतीं, इस दुनिया में आने की इतनी बड़ी सज़ा न होती।
❤5✍1🔥1
मैं यूँ ही नहीं थी दुनिया के ख़िलाफ़,
मेरे हिस्से के हर किरदार गद्दार निकले।
अब शिकायत भी किससे करूँ,
जब अपने ही मेरे ख़िलाफ़ निकले।
मेरे हिस्से के हर किरदार गद्दार निकले।
अब शिकायत भी किससे करूँ,
जब अपने ही मेरे ख़िलाफ़ निकले।
❤6✍1
बाहर से शांत दिखना इतना आसान नहीं होता,
अक्सर उस ख़ामोशी के पीछे इंसान ने
अपने ही अंदर से बहुत लंबी लड़ाई लड़ी होती है।
अक्सर उस ख़ामोशी के पीछे इंसान ने
अपने ही अंदर से बहुत लंबी लड़ाई लड़ी होती है।
🥀
❤3🔥2✍1
सोने जाती हूँ, मगर नींद नहीं आती,
तनाव इतना है कि रोना चाहती हूँ,
मगर आँखों से आँसू भी नहीं आते।
अजीब सा दर्द ठहर गया है दिल में,
न बाहर निकलता है, न कम होता है…
बस ख़ामोशी से हर रात
मुझे भीतर ही भीतर थका देता है।
तनाव इतना है कि रोना चाहती हूँ,
मगर आँखों से आँसू भी नहीं आते।
अजीब सा दर्द ठहर गया है दिल में,
न बाहर निकलता है, न कम होता है…
बस ख़ामोशी से हर रात
मुझे भीतर ही भीतर थका देता है।
❤7✍1
चलो चलते हैं…
इस दुनिया से थोड़ी दूर,
अपनी ही एक दुनिया में।
बहुत रह लिए लोगों के बीच,
बहुत सुन लिया, बहुत सह लिया…
अब कुछ पल ख़ामोशी के नाम करते हैं।
जहाँ बस मैं रहूँ,
मेरी ख़ामोशी रहे,
और मेरे दिल की अनकही बातें रहें।
जहाँ ये दर्द भी अपना लगे,
जहाँ ये ग़म भी कुछ मीठा-सा लगे,
जहाँ किसी को कुछ समझाना न पड़े…
बस जी भरकर रो लूँ,
दिल का बोझ थोड़ा हल्का कर लूँ,
और फिर ख़ुद को थोड़ा-सा समेटकर
एक नई सुबह की ओर चल दूँ।
इस दुनिया से थोड़ी दूर,
अपनी ही एक दुनिया में।
बहुत रह लिए लोगों के बीच,
बहुत सुन लिया, बहुत सह लिया…
अब कुछ पल ख़ामोशी के नाम करते हैं।
जहाँ बस मैं रहूँ,
मेरी ख़ामोशी रहे,
और मेरे दिल की अनकही बातें रहें।
जहाँ ये दर्द भी अपना लगे,
जहाँ ये ग़म भी कुछ मीठा-सा लगे,
जहाँ किसी को कुछ समझाना न पड़े…
बस जी भरकर रो लूँ,
दिल का बोझ थोड़ा हल्का कर लूँ,
और फिर ख़ुद को थोड़ा-सा समेटकर
एक नई सुबह की ओर चल दूँ।
🥹
❤6✍1
मुझे नहीं पता मैं क्या बनती जा रही हूँ…
बस इतना जानती हूँ कि अब मैं अपनी उस पुरानी ज़िंदगी में लौट जाना चाहती हूँ, जहाँ सिर्फ़ मैं थी और मेरी ख़ामोशी।
जहाँ किसी से कोई उम्मीद नहीं थी,
न किसी से शिकायत,
न किसी के आने की ख़ुशी,
न किसी के जाने का डर।
बस अपने आप से बातें करती थी,
अपने दर्द को अपने साथ रखती थी
और उसी दर्द के साथ मुस्कुरा लेती थी।
अब न कोई माया चाहिए,
न कोई मोह,
न किसी रिश्ते की उलझन…
बस अपनी ख़ामोशी में रहना है,
अपने ही साथ,
बिल्कुल बेफ़िक्र…
बस इतना जानती हूँ कि अब मैं अपनी उस पुरानी ज़िंदगी में लौट जाना चाहती हूँ, जहाँ सिर्फ़ मैं थी और मेरी ख़ामोशी।
जहाँ किसी से कोई उम्मीद नहीं थी,
न किसी से शिकायत,
न किसी के आने की ख़ुशी,
न किसी के जाने का डर।
बस अपने आप से बातें करती थी,
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और उसी दर्द के साथ मुस्कुरा लेती थी।
अब न कोई माया चाहिए,
न कोई मोह,
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बस अपनी ख़ामोशी में रहना है,
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बिल्कुल बेफ़िक्र…
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जमुई की घटना के बाद सबसे पहले सवाल लड़की से क्यों पूछा जाता है—
“वह रात में बाहर क्यों गई थी?”
लेकिन यह सवाल उस लड़के से क्यों नहीं पूछा जाता,
जिसने अपनी मर्यादा और संस्कार भूलकर एक लड़की के साथ गलत व्यवहार किया?
लड़कियों को बार-बार समय, कपड़े और बाहर जाने की पाबंदियाँ समझाने से पहले,
अपने बेटों को यह सिखाइए कि किसी लड़की की इच्छा के विरुद्ध उसे छूना, परेशान करना या अपमानित करना गलत है।
बेटियों को डराकर नहीं,
बेटों को संस्कार देकर समाज सुरक्षित बनेगा।
किसी लड़की का रात में बाहर होना किसी को उसके साथ गलत करने का अधिकार नहीं देता।
गलती करने वाले से सवाल होना चाहिए
पीड़ित से नहीं।
“वह रात में बाहर क्यों गई थी?”
लेकिन यह सवाल उस लड़के से क्यों नहीं पूछा जाता,
जिसने अपनी मर्यादा और संस्कार भूलकर एक लड़की के साथ गलत व्यवहार किया?
लड़कियों को बार-बार समय, कपड़े और बाहर जाने की पाबंदियाँ समझाने से पहले,
अपने बेटों को यह सिखाइए कि किसी लड़की की इच्छा के विरुद्ध उसे छूना, परेशान करना या अपमानित करना गलत है।
बेटियों को डराकर नहीं,
बेटों को संस्कार देकर समाज सुरक्षित बनेगा।
किसी लड़की का रात में बाहर होना किसी को उसके साथ गलत करने का अधिकार नहीं देता।
गलती करने वाले से सवाल होना चाहिए
पीड़ित से नहीं।
𝐊𝐚𝐚𝐥𝐢𝐧𝐢 🌑🔱
❤11✍1🥰1
आख़िर हर बार रोक-टोक सिर्फ़ लड़कियों पर ही क्यों?
दिल्ली की हालिया घटना ने फिर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
जब किसी लड़की के साथ अपराध होता है, तो सलाह अक्सर लड़की को ही दी जाती है…
“बाहर मत निकलो”, “अकेले मत जाओ”, “रात में मत निकलना”, “सावधान रहना”…
लेकिन लड़कों से यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाता कि
किसी लड़की की इज़्ज़त और सुरक्षा की सीमा का सम्मान करना उन्हें कौन सिखाएगा?
लड़कियों की आज़ादी सीमित करने के बजाय
लड़कों को भी बचपन से सम्मान, सहमति, मर्यादा और कानून की सही समझ दी जानी चाहिए।
सुरक्षा का मतलब यह नहीं कि लड़कियाँ घरों में बंद हो जाएँ।
सुरक्षा का मतलब यह है कि अपराध करने वाले पर रोक लगे, पीड़िता पर नहीं।
लड़कियों को डराकर नहीं,
समाज को सोच बदलकर सुरक्षित बनाया जा सकता है।
सवाल लड़की के बाहर निकलने का नहीं,
सवाल अपराधी की सोच और उस पर होने वाली कार्रवाई का है।
दिल्ली की हालिया घटना ने फिर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
जब किसी लड़की के साथ अपराध होता है, तो सलाह अक्सर लड़की को ही दी जाती है…
“बाहर मत निकलो”, “अकेले मत जाओ”, “रात में मत निकलना”, “सावधान रहना”…
लेकिन लड़कों से यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाता कि
किसी लड़की की इज़्ज़त और सुरक्षा की सीमा का सम्मान करना उन्हें कौन सिखाएगा?
लड़कियों की आज़ादी सीमित करने के बजाय
लड़कों को भी बचपन से सम्मान, सहमति, मर्यादा और कानून की सही समझ दी जानी चाहिए।
सुरक्षा का मतलब यह नहीं कि लड़कियाँ घरों में बंद हो जाएँ।
सुरक्षा का मतलब यह है कि अपराध करने वाले पर रोक लगे, पीड़िता पर नहीं।
लड़कियों को डराकर नहीं,
समाज को सोच बदलकर सुरक्षित बनाया जा सकता है।
सवाल लड़की के बाहर निकलने का नहीं,
सवाल अपराधी की सोच और उस पर होने वाली कार्रवाई का है।
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मानसिक तौर से पुरुष बीमार है, लेकिन सामाजिक तौर पर स्त्रियों को पर्दा करना पड़ता हैl
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संघर्ष की बात मत करो हर रोज़ मारते दम तक प्रयास करते है...!
😔
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