गोविन्दं गोकुलानन्दं गोपालं गोपिवल्लभम् । गोवर्धनोद्धरं धीरं तं वन्दे गोमतीप्रियम् ॥
नारायणं निराकारं नरवीरं नरोत्तमम्। नृसिंहं नागनाथं च तं वन्दे नरकान्तकम् ॥
@Sanatan
नारायणं निराकारं नरवीरं नरोत्तमम्। नृसिंहं नागनाथं च तं वन्दे नरकान्तकम् ॥
@Sanatan
🙏28❤8👍3
हरि-हरात्मक
-----------------
"क्या" के पीछे भागने वाली इस ब्रह्म सृष्टि में ब्रह्मा के वरदान, देवताओं के वरदान, मनुष्यों के आशीर्वाद सिर्फ "क्या" में ही वृद्धि करते हैं। "क्या" और उलझाता है। नरसिंह अवतार को देख ब्रह्मा समेत समस्त देवगण अचम्भित हो बोल उठे यह क्या? यह क्या है ? यह महा "क्या" कैसे रच गया, यह "क्या" महाविकट स्वरूप है। हाँ नरसिंह अवतार जैसे महा "क्या" स्वरूप में श्रीहरि को अत्यंत ही कष्ट हुआ इसलिए वे ब्रह्मा से बोले "क्या" प्रदान करते समय आप संयमित रहें आपके "क्या" के विधान को तोड़ने के लिए मैंने यह महास्वरूप धारण किया है। भविष्य में वरदान देते समय विशेष ध्यान रखें। तप क्या है ? उपासना क्या है ? जो ब्रह्मा ने नहीं दिया एवं उसमें पुनः कुछ अतिरिक्त जोड़ने हेतु अधिकांशतः तप एवं उपासनायें सम्पन्न की जाती हैं। ब्रह्मा क्यों नहीं देते ? क्योंकि ब्रह्म सृष्टि आवेशात्मक नहीं है, आवेश में ब्रह्मा सृष्टि का निर्माण नहीं करते। सृष्टि निर्माण करने वाले की पहचान ही यही है कि उसमें आवेश सूक्ष्मतम हो इसलिए देवगण, असुरगण, दैत्य गण से लेकर वनस्पति तक विशेष हानिकारक नहीं होते और न ही इनके लिए श्री हरि को अवतरित होना पड़ता है परन्तु ब्रह्म सृष्टि के अलावा अन्य लोकों के जीव भी कभी-कभी आवेशात्मक वरदानों, पापों इत्यादि के कारण जीवन ग्रहण कर लेते हैं और इसी से असंतुलन की स्थिति पृथ्वी पर निर्मित होती है।
ब्रह्म सृष्टि के जीव अल्पतम ज्ञान, तकनीक, बुद्धि, तर्क, मानस इत्यादि क्षमताओं के मालिक होते हैं। श्रीहरि ने नर और नारायण अवतार लेकर युगल रूप में बद्रीनाथ में उपासना की है, आज भी उपासना रत हैं एवं तप निष्टों को भाव जगत में साक्षात् दर्शन देते हैं एवं इन्हीं के प्रभाव से तप के मार्ग पर चलकर अन्य लोकों से आये जीव तपोमयी बनकर कुछ अतिरिक्त, कुछ विलक्षण, कुछ हटकर, कुछ अद्भुत ग्रहण कर लेते हैं, प्राप्त कर लेते हैं और कालान्तर अतिरिक्त बल, अतिरिक्त शक्ति, अतिरिक्त दैवीय प्रभाव के दम पर आवेशित हो उत्पात मचाते हैं, असंतुलन बनाते हैं और यही पर श्रीहरि को अवतरित होना पड़ता है। मनुष्य को मनुष्य से खतरा नहीं है। सबसे खतरनाक साधक होते हैं, तपस्वी होते हैं, सिद्ध होते हैं। रावण से लेकर दुर्योधन एवं आज के युग में भी अनेकों लोग, वैज्ञानिक इत्यादि सबके सब एक खतरनाक श्रेणी के जीव हैं, सृष्टि के लिए खतरा हैं अतः अवतारों को आना पड़ता है।
अवतार भी कभी-कभी विशेषकर आवेशात्मक होते हैं सृष्टि के लिए खतरा बन जाते हैं, उनमें भी विकृति आ जाती है अतः इनकी उपासना लोपित कर दी जाती है, कीलित कर दी जाती है। रेणुका ने 21 बार अपने उदर पर प्रहार किया। जमदग्नि का सिर काट ले गया था सहस्रार्जुन, परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से क्षत्रियों को नष्ट करने की प्रतिज्ञा ले ली। इतने शक्ति सम्पन्न तो नहीं थे अतः तप और अनुसंधान प्रारम्भ किया। शिव और महाकाली से कुछ अतिरिक्त मांग लाये और क्षत्रियों के दूध मुंहे बच्चों का भी वध प्रारम्भ कर दिया । अवतार में विकृति आ गई, समूचा ऋषि मण्डल बोल उठा नहीं राम नहीं, "राम तुम प्रस्थान करो तुम्हें जाना ही होगा राम" राम तुम्हारा आवेश ब्रह्मानुकूल नहीं है। सृष्टि के उच्च ब्रह्म ऋषि मण्डल ने दूसरे ही क्षण परशुराम की उपासना प्रतिबंधित कर दी, महर्षि कश्यप को जब परशुराम ने समस्त भूमि दान कर दी तब दूसरे ही क्षण महर्षि कश्यप बोले "राम तुम जाओ कभी भी सूर्योदय के पश्चात भूमि पर कदम मत रखना" यह ऋषि आज्ञा है । तब से लेकर आज तक परशुराम भूमि पर कदम नहीं रखते, पर्वत की ऊँची चोटी पर ही रहते हैं। हाँ कभी-कभार रात्रि में भूमि को स्पर्श कर लेते हैं।
नरसिंह अवतार का एकमात्र ध्येय है कि साधनाओं के माध्यम से, तप के माध्यम से प्राप्त अतिरिक्त आवेगों को पुनः अपने आपमें खींच लेना। सद्गुरु वही जो पुनः खींच ले, पुनः छीन ले, बलि के बलवान को खींच ले, दीक्षित की दीक्षा खींच ले, सिद्ध की सिद्धियाँ छीन ले वैज्ञानिक की वैज्ञानिकता छीन ले, आवेशित, उद्वेलित, उन्मादी की उन्मादकता छीन ले । आदि गुरु शंकराचार्य जी पिछले 2000 वर्षों में उत्पन्न हुई महाविभूतियों में सबसे श्रेष्ठतम तंत्रज्ञ थे। उनकी प्रत्येक रचना चाहे वह सौन्दर्य लहरी हो, लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्र हो, निर्वाण षट्कम हो, ब्रह्म सूत्रम् हो इत्यादि- इत्यादि सबकी सब पूर्ण तांत्रिक रचनायें हैं। पद्मपाद के रूप में उनके साथ विष्णु अंशांश चलते थे, पद्मपाद आदि शंकर के परम आवेशित शिष्य थे। क्षण भर में आवेशित हो जाते थे, मरने- मारने पर उतारू हो जाते थे। पद्मपाद के इष्ट थे नरसिंह।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
-----------------
"क्या" के पीछे भागने वाली इस ब्रह्म सृष्टि में ब्रह्मा के वरदान, देवताओं के वरदान, मनुष्यों के आशीर्वाद सिर्फ "क्या" में ही वृद्धि करते हैं। "क्या" और उलझाता है। नरसिंह अवतार को देख ब्रह्मा समेत समस्त देवगण अचम्भित हो बोल उठे यह क्या? यह क्या है ? यह महा "क्या" कैसे रच गया, यह "क्या" महाविकट स्वरूप है। हाँ नरसिंह अवतार जैसे महा "क्या" स्वरूप में श्रीहरि को अत्यंत ही कष्ट हुआ इसलिए वे ब्रह्मा से बोले "क्या" प्रदान करते समय आप संयमित रहें आपके "क्या" के विधान को तोड़ने के लिए मैंने यह महास्वरूप धारण किया है। भविष्य में वरदान देते समय विशेष ध्यान रखें। तप क्या है ? उपासना क्या है ? जो ब्रह्मा ने नहीं दिया एवं उसमें पुनः कुछ अतिरिक्त जोड़ने हेतु अधिकांशतः तप एवं उपासनायें सम्पन्न की जाती हैं। ब्रह्मा क्यों नहीं देते ? क्योंकि ब्रह्म सृष्टि आवेशात्मक नहीं है, आवेश में ब्रह्मा सृष्टि का निर्माण नहीं करते। सृष्टि निर्माण करने वाले की पहचान ही यही है कि उसमें आवेश सूक्ष्मतम हो इसलिए देवगण, असुरगण, दैत्य गण से लेकर वनस्पति तक विशेष हानिकारक नहीं होते और न ही इनके लिए श्री हरि को अवतरित होना पड़ता है परन्तु ब्रह्म सृष्टि के अलावा अन्य लोकों के जीव भी कभी-कभी आवेशात्मक वरदानों, पापों इत्यादि के कारण जीवन ग्रहण कर लेते हैं और इसी से असंतुलन की स्थिति पृथ्वी पर निर्मित होती है।
ब्रह्म सृष्टि के जीव अल्पतम ज्ञान, तकनीक, बुद्धि, तर्क, मानस इत्यादि क्षमताओं के मालिक होते हैं। श्रीहरि ने नर और नारायण अवतार लेकर युगल रूप में बद्रीनाथ में उपासना की है, आज भी उपासना रत हैं एवं तप निष्टों को भाव जगत में साक्षात् दर्शन देते हैं एवं इन्हीं के प्रभाव से तप के मार्ग पर चलकर अन्य लोकों से आये जीव तपोमयी बनकर कुछ अतिरिक्त, कुछ विलक्षण, कुछ हटकर, कुछ अद्भुत ग्रहण कर लेते हैं, प्राप्त कर लेते हैं और कालान्तर अतिरिक्त बल, अतिरिक्त शक्ति, अतिरिक्त दैवीय प्रभाव के दम पर आवेशित हो उत्पात मचाते हैं, असंतुलन बनाते हैं और यही पर श्रीहरि को अवतरित होना पड़ता है। मनुष्य को मनुष्य से खतरा नहीं है। सबसे खतरनाक साधक होते हैं, तपस्वी होते हैं, सिद्ध होते हैं। रावण से लेकर दुर्योधन एवं आज के युग में भी अनेकों लोग, वैज्ञानिक इत्यादि सबके सब एक खतरनाक श्रेणी के जीव हैं, सृष्टि के लिए खतरा हैं अतः अवतारों को आना पड़ता है।
अवतार भी कभी-कभी विशेषकर आवेशात्मक होते हैं सृष्टि के लिए खतरा बन जाते हैं, उनमें भी विकृति आ जाती है अतः इनकी उपासना लोपित कर दी जाती है, कीलित कर दी जाती है। रेणुका ने 21 बार अपने उदर पर प्रहार किया। जमदग्नि का सिर काट ले गया था सहस्रार्जुन, परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से क्षत्रियों को नष्ट करने की प्रतिज्ञा ले ली। इतने शक्ति सम्पन्न तो नहीं थे अतः तप और अनुसंधान प्रारम्भ किया। शिव और महाकाली से कुछ अतिरिक्त मांग लाये और क्षत्रियों के दूध मुंहे बच्चों का भी वध प्रारम्भ कर दिया । अवतार में विकृति आ गई, समूचा ऋषि मण्डल बोल उठा नहीं राम नहीं, "राम तुम प्रस्थान करो तुम्हें जाना ही होगा राम" राम तुम्हारा आवेश ब्रह्मानुकूल नहीं है। सृष्टि के उच्च ब्रह्म ऋषि मण्डल ने दूसरे ही क्षण परशुराम की उपासना प्रतिबंधित कर दी, महर्षि कश्यप को जब परशुराम ने समस्त भूमि दान कर दी तब दूसरे ही क्षण महर्षि कश्यप बोले "राम तुम जाओ कभी भी सूर्योदय के पश्चात भूमि पर कदम मत रखना" यह ऋषि आज्ञा है । तब से लेकर आज तक परशुराम भूमि पर कदम नहीं रखते, पर्वत की ऊँची चोटी पर ही रहते हैं। हाँ कभी-कभार रात्रि में भूमि को स्पर्श कर लेते हैं।
नरसिंह अवतार का एकमात्र ध्येय है कि साधनाओं के माध्यम से, तप के माध्यम से प्राप्त अतिरिक्त आवेगों को पुनः अपने आपमें खींच लेना। सद्गुरु वही जो पुनः खींच ले, पुनः छीन ले, बलि के बलवान को खींच ले, दीक्षित की दीक्षा खींच ले, सिद्ध की सिद्धियाँ छीन ले वैज्ञानिक की वैज्ञानिकता छीन ले, आवेशित, उद्वेलित, उन्मादी की उन्मादकता छीन ले । आदि गुरु शंकराचार्य जी पिछले 2000 वर्षों में उत्पन्न हुई महाविभूतियों में सबसे श्रेष्ठतम तंत्रज्ञ थे। उनकी प्रत्येक रचना चाहे वह सौन्दर्य लहरी हो, लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्र हो, निर्वाण षट्कम हो, ब्रह्म सूत्रम् हो इत्यादि- इत्यादि सबकी सब पूर्ण तांत्रिक रचनायें हैं। पद्मपाद के रूप में उनके साथ विष्णु अंशांश चलते थे, पद्मपाद आदि शंकर के परम आवेशित शिष्य थे। क्षण भर में आवेशित हो जाते थे, मरने- मारने पर उतारू हो जाते थे। पद्मपाद के इष्ट थे नरसिंह।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍12🙏7🔥3❤1😁1🤔1
भागवत पुराण » स्कन्ध 1: सृष्टि » अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य »
अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य
श्लोक 15:एक बार सूर्योदय होते ही उन्होंने (व्यासदेव ने) सरस्वती के जल से प्रात:कालीन आचमन किया और मन एकाग्र करने के लिए वे एकान्त में बैठ गये।
श्लोक 16: महर्षि व्यासदेव ने युग के कर्तव्यों में विरोधाभास देखा। कालक्रम में पृथ्वी पर अदृश्य शक्तियों के कारण विभिन्न युगों में ऐसा होता रहता है।
श्लोक 17-18: परम ज्ञानी ऋषि, अपनी दिव्य दृष्टि से, युग के प्रभाव से प्रत्येक भौतिक वस्तु की अवनति को देख सकते थे। वे यह भी देख सकते थे कि श्रद्धाविहीन व्यक्तियों की आयु क्षीण होगी और वे सच्चगुण के अभाव के कारण अधीर रहेंगे। इस प्रकार उन्होंने समस्त वर्णों तथा आश्रमों के लोगों के कल्याण पर विचार किया।
श्लोक 19: उन्होंने देखा कि वेदों में वर्णित यज्ञ वे साधन हैं, जिनसे लोगों की वृत्तियों को शुद्ध बनाया जा सकता है। अत: इस विधि को सरल बनाने के लिए ही उन्होंने एक ही वेद के चार भाग कर दिये, जिससे वे लोगों के बीच फैल सकें।
श्लोक 20: मूल ज्ञान के स्रोतों (वेदों) के चार पृथक् विभाग किये गये। लेकिन पुराणों में वर्णित ऐतिहासिक तथ्य तथा प्रामाणिक कथाएँ पंचम वेद कहलाती हैं।
श्लोक 21: वेदों के चार खण्डों में विभाजित हो जाने के बाद, पैल ऋषि ऋग्वेद के आचार्य बने और जैमिनि साम वेद के। यजुर्वेद के कारण एकमात्र वैशम्पायन यशस्वी हुए।
श्लोक 22: अत्यन्त अनुरक्त रहने वाले सुमन्तु मुनि अंगिरा को अथर्ववेद सौंपा गया और मेरे पिता रोमहर्षण को पुराण तथा इतिहास सौंपे गये।
श्लोक 23: इन सब विद्वानों ने अपनी पारी में, उन्हें सौंपे गये वेदों को अपने अनेक शिष्यों, प्रशिष्यों तथा उनके भी शिष्यों को प्रदान किया और इस प्रकार वेदों के अनुयायियों की अपनी- अपनी शाखाएँ बनीं।
श्लोक 24: इस प्रकार, अज्ञानी जनसमूह पर अत्यन्त कृपालु ऋषि व्यासदेव ने वेदों का संकलन किया, जिससे कम ज्ञानी पुरुष भी उनको आत्मसात् कर सकें।
श्लोक 25: महर्षि ने अनुकम्पावश हितकर समझा कि यह मनुष्यों को जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त करने में यह सहायक होगा। इस प्रकार उन्होंने स्त्रियों, शूद्रों तथा द्विज-बन्धुओं के लिए महाभारत नामक महान ऐतिहासिक कथा का संकलन किया।
@Sanatan
अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य
श्लोक 15:एक बार सूर्योदय होते ही उन्होंने (व्यासदेव ने) सरस्वती के जल से प्रात:कालीन आचमन किया और मन एकाग्र करने के लिए वे एकान्त में बैठ गये।
श्लोक 16: महर्षि व्यासदेव ने युग के कर्तव्यों में विरोधाभास देखा। कालक्रम में पृथ्वी पर अदृश्य शक्तियों के कारण विभिन्न युगों में ऐसा होता रहता है।
श्लोक 17-18: परम ज्ञानी ऋषि, अपनी दिव्य दृष्टि से, युग के प्रभाव से प्रत्येक भौतिक वस्तु की अवनति को देख सकते थे। वे यह भी देख सकते थे कि श्रद्धाविहीन व्यक्तियों की आयु क्षीण होगी और वे सच्चगुण के अभाव के कारण अधीर रहेंगे। इस प्रकार उन्होंने समस्त वर्णों तथा आश्रमों के लोगों के कल्याण पर विचार किया।
श्लोक 19: उन्होंने देखा कि वेदों में वर्णित यज्ञ वे साधन हैं, जिनसे लोगों की वृत्तियों को शुद्ध बनाया जा सकता है। अत: इस विधि को सरल बनाने के लिए ही उन्होंने एक ही वेद के चार भाग कर दिये, जिससे वे लोगों के बीच फैल सकें।
श्लोक 20: मूल ज्ञान के स्रोतों (वेदों) के चार पृथक् विभाग किये गये। लेकिन पुराणों में वर्णित ऐतिहासिक तथ्य तथा प्रामाणिक कथाएँ पंचम वेद कहलाती हैं।
श्लोक 21: वेदों के चार खण्डों में विभाजित हो जाने के बाद, पैल ऋषि ऋग्वेद के आचार्य बने और जैमिनि साम वेद के। यजुर्वेद के कारण एकमात्र वैशम्पायन यशस्वी हुए।
श्लोक 22: अत्यन्त अनुरक्त रहने वाले सुमन्तु मुनि अंगिरा को अथर्ववेद सौंपा गया और मेरे पिता रोमहर्षण को पुराण तथा इतिहास सौंपे गये।
श्लोक 23: इन सब विद्वानों ने अपनी पारी में, उन्हें सौंपे गये वेदों को अपने अनेक शिष्यों, प्रशिष्यों तथा उनके भी शिष्यों को प्रदान किया और इस प्रकार वेदों के अनुयायियों की अपनी- अपनी शाखाएँ बनीं।
श्लोक 24: इस प्रकार, अज्ञानी जनसमूह पर अत्यन्त कृपालु ऋषि व्यासदेव ने वेदों का संकलन किया, जिससे कम ज्ञानी पुरुष भी उनको आत्मसात् कर सकें।
श्लोक 25: महर्षि ने अनुकम्पावश हितकर समझा कि यह मनुष्यों को जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त करने में यह सहायक होगा। इस प्रकार उन्होंने स्त्रियों, शूद्रों तथा द्विज-बन्धुओं के लिए महाभारत नामक महान ऐतिहासिक कथा का संकलन किया।
@Sanatan
👍24❤1
--- सिद्ध महापुरुषों की गुप्त तपस्थलियाँ ---
सिद्धभूमियाँ विशेष एवं रहस्यमय होती हैं। यहाँ की
सत्ता पर देश एवं काल का प्रभाव नहीं पड़ता है।
ये सिद्धों की वासस्थली होती हैं, जिनकी तपस्या की
ऊर्जा से ये भूमियाँ ओत-प्रोत होती हैं। इन भूमियों के
कण-कण में सिद्धों की तपस्या सन्निहित होती है, अत: ये
भूमियाँ सिद्धों की इच्छाओं एवं विचारों से संचालित एवं
परिचालित होती हैं। इस विचित्रता का कारण यह है कि इन भूमियों की स्थिति स्थूल में होकर भी सूक्ष्मसत्ता में होती है।
इन भूमियों की प्रभा एवं आभा दिव्य एवं विशिष्ट होती है।
तपस्वियों के महातप से उनका निवासस्थल दिव्य
एवं सिद्ध बन जाता है। ध्रुवलोक तपस्वी बालक ध्रुव की
तपस्या से ओत-प्रोत है। सुखावती पुरी भगवान बुद्ध की
तपस्या से परिपूर्ण है। ज्ञानगंज का राजराजेश्वरी स्थल भी
सिद्धभूमि माना जाता है। गंगाद्वार से कैलासपर्यंत का
विशाल क्षेत्र सिद्धमंडल है। यमुनोत्तरी से लेकर नंदादेवी
तक का क्षेत्र सिद्धक्षेत्र के नाम से परिचित है। श्रीशैल
पर्वत, नंदा देवी, विंध्यांचल, दक्षिण भारत का अरुणाचलम् पर्वत, बिहार स्थित गुह्यकूट पर्वत सिद्धस्थली कहे जाते हैं। कैलास मानसरोवर तो भगवान शिव की विख्यात तपस्थली है। कैलास को तो धरती का ही नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि का केंद्रबिंदु माना जाता है। सारी सृष्टि उसी केंद्र पर आधारित मानी जाती है।
वाल्मीकि रामायण में ऐसे दिव्य एवं सिद्ध क्षेत्रों का
वर्णन प्रचुरता से आया है। किष्किंधाकांड में उल्लेख
मिलता है कि सीता माता की खोज करते-करते हनुमान
जी एवं वानरगण एक अलौकिक स्थान पर पहुँच गए थे।
इसका नाम था ऋक्षबिल, जो मंत्रशक्ति द्वारा नियोजित था और एक दानव इसकी रक्षा करता था। वह गुफा अत्यंत भयानक एवं रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। गुफा में गहन अंधकार था। वानरगण किसी तरह से इस अंधकार को पार करने के बाद जब आगे पहुँचे तो उनको प्रकाश दिखाई दिया। यह प्रकाश स्वर्णिम आभायुक्त था और उसके प्रकाश से लता, वृक्ष, भवन और यहाँ तक कि जलाशय के जलचर भी प्रकाशित हो रहे थे।
हनुमान जी को वहाँ एक तपस्विनी तप करते हुए दिखाई दी। तपस्विनी ने हनुमान जी से कहा कि इस स्थान में प्रवेश करने के बाद यहाँ से अपने प्रयास के बल पर बाहर नहीं जाया जा सकता है। यहाँ के सिद्ध महात्मा ही उन्हें बाहर कर सकते हैं। हनुमान जी के आग्रह पर तपस्विनी ने उनको अपने तपोबल से बाहर निकाला। जब वे बाहर निकले तो समुद्र के पास प्रस्रवण के पर्वत के पास थे; जबकि गुफा में प्रवेश करते समय वे विंध्यपर्वत के नैऋत्य कोण से होते हुए दक्षिण भारत की पर्वतमाला तक पहुँचे थे।
मतंगाश्रम भी इसी प्रकार का दिव्यक्षेत्र था। भगवान
श्रीराम ने वहाँ पर भक्तिमती शवरी से भेंट की थी। उस
दिव्य आश्रम में बहुत सारे ऋषि तपस्यारत थे, परंतु भगवान राम के वनगमन के दस वर्ष पूर्व उच्चस्तरीय लोकों को प्रस्थान कर चुके थे। शबरी श्रीराम को वह स्थल दिखाते हुए कह रही थी कि दस वर्ष पूर्व जो ऋषि स्नान के पश्चात अपने गीले वस्त्र सूखने के लिए फैलाकर छोड़ गए थे, वे अभी तक इसी प्रकार गीले हैं। सिद्धों द्वारा छोड़ी कमल की मालाएँ, कई प्रकार के पुष्प, दूर्वा आदि वैसे ही थे, मुरझाए नहीं थे। इन वस्तुओं से एक विशेष प्रकार की किरणें निकल रही थीं, जो ऋषियों की तपस्या की ऊर्जा से सन्निहित थीं।
महाभारत के वनपर्व में भी ऐसे सिद्ध आश्रमों का उल्लेख मिलता है। दमयंती राजा नल को खोजते-खोजते एक ऐसे वन में चली गई थी, जहाँ का दृश्य अत्यंत मनोरम एवं सुंदर था। उस वन के अंदर एक तपोवन था।
अनेक ऋषि वहाँ तपस्या कर रहे थे। वे वल्कल एवं
मृगछाला धारण किए हुए थे। दमयंती ने जब उनको
प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाई तो ऋषियों ने
आशीर्वाद दिया कि महाराज नल निषध प्रदेश पर पुनः
सिंहासनारूढ़ होंगे और तुम्हारे साथ उनका पुनर्मिलन
होगा। इसके पश्चात सभी ऋषिगण उस तपोवन के साथ
अदृश्य हो गए। दमयंती तमाम प्रयासों के बावजूद उस
दिव्य तपोवन का पुनः दर्शन नहीं कर सकी।
महाभारत में आए एक अन्य कथानक के अनुसार,
पांडवों ने भी अपने वनवास काल में महर्षि लोमश तथा
धौम्य के साथ अनेक सिद्धाश्रमों का दर्शन प्राप्त किया
था। कैलास पर्वत के पूर्व में स्थित मणिमंत प्रदेश को भी
सिद्धों की गुप्तस्थली कहते हैं। वर्तमान में इसे माणा
शिखर के नाम से जाना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से
गंधमादन पर्वत तथा माणा को अलकनंदा के पश्चिम तट
पर तथा नंदादेवी को अलकनंदा के पूर्व तट पर स्थित
मानते हैं। अलकनंदा के दोनों भागों को सिद्धों का विचरण
स्थल माना जाता है। यहाँ पर सिद्ध महात्मा एवं ऋषि
१/२
@Sanatan
सिद्धभूमियाँ विशेष एवं रहस्यमय होती हैं। यहाँ की
सत्ता पर देश एवं काल का प्रभाव नहीं पड़ता है।
ये सिद्धों की वासस्थली होती हैं, जिनकी तपस्या की
ऊर्जा से ये भूमियाँ ओत-प्रोत होती हैं। इन भूमियों के
कण-कण में सिद्धों की तपस्या सन्निहित होती है, अत: ये
भूमियाँ सिद्धों की इच्छाओं एवं विचारों से संचालित एवं
परिचालित होती हैं। इस विचित्रता का कारण यह है कि इन भूमियों की स्थिति स्थूल में होकर भी सूक्ष्मसत्ता में होती है।
इन भूमियों की प्रभा एवं आभा दिव्य एवं विशिष्ट होती है।
तपस्वियों के महातप से उनका निवासस्थल दिव्य
एवं सिद्ध बन जाता है। ध्रुवलोक तपस्वी बालक ध्रुव की
तपस्या से ओत-प्रोत है। सुखावती पुरी भगवान बुद्ध की
तपस्या से परिपूर्ण है। ज्ञानगंज का राजराजेश्वरी स्थल भी
सिद्धभूमि माना जाता है। गंगाद्वार से कैलासपर्यंत का
विशाल क्षेत्र सिद्धमंडल है। यमुनोत्तरी से लेकर नंदादेवी
तक का क्षेत्र सिद्धक्षेत्र के नाम से परिचित है। श्रीशैल
पर्वत, नंदा देवी, विंध्यांचल, दक्षिण भारत का अरुणाचलम् पर्वत, बिहार स्थित गुह्यकूट पर्वत सिद्धस्थली कहे जाते हैं। कैलास मानसरोवर तो भगवान शिव की विख्यात तपस्थली है। कैलास को तो धरती का ही नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि का केंद्रबिंदु माना जाता है। सारी सृष्टि उसी केंद्र पर आधारित मानी जाती है।
वाल्मीकि रामायण में ऐसे दिव्य एवं सिद्ध क्षेत्रों का
वर्णन प्रचुरता से आया है। किष्किंधाकांड में उल्लेख
मिलता है कि सीता माता की खोज करते-करते हनुमान
जी एवं वानरगण एक अलौकिक स्थान पर पहुँच गए थे।
इसका नाम था ऋक्षबिल, जो मंत्रशक्ति द्वारा नियोजित था और एक दानव इसकी रक्षा करता था। वह गुफा अत्यंत भयानक एवं रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। गुफा में गहन अंधकार था। वानरगण किसी तरह से इस अंधकार को पार करने के बाद जब आगे पहुँचे तो उनको प्रकाश दिखाई दिया। यह प्रकाश स्वर्णिम आभायुक्त था और उसके प्रकाश से लता, वृक्ष, भवन और यहाँ तक कि जलाशय के जलचर भी प्रकाशित हो रहे थे।
हनुमान जी को वहाँ एक तपस्विनी तप करते हुए दिखाई दी। तपस्विनी ने हनुमान जी से कहा कि इस स्थान में प्रवेश करने के बाद यहाँ से अपने प्रयास के बल पर बाहर नहीं जाया जा सकता है। यहाँ के सिद्ध महात्मा ही उन्हें बाहर कर सकते हैं। हनुमान जी के आग्रह पर तपस्विनी ने उनको अपने तपोबल से बाहर निकाला। जब वे बाहर निकले तो समुद्र के पास प्रस्रवण के पर्वत के पास थे; जबकि गुफा में प्रवेश करते समय वे विंध्यपर्वत के नैऋत्य कोण से होते हुए दक्षिण भारत की पर्वतमाला तक पहुँचे थे।
मतंगाश्रम भी इसी प्रकार का दिव्यक्षेत्र था। भगवान
श्रीराम ने वहाँ पर भक्तिमती शवरी से भेंट की थी। उस
दिव्य आश्रम में बहुत सारे ऋषि तपस्यारत थे, परंतु भगवान राम के वनगमन के दस वर्ष पूर्व उच्चस्तरीय लोकों को प्रस्थान कर चुके थे। शबरी श्रीराम को वह स्थल दिखाते हुए कह रही थी कि दस वर्ष पूर्व जो ऋषि स्नान के पश्चात अपने गीले वस्त्र सूखने के लिए फैलाकर छोड़ गए थे, वे अभी तक इसी प्रकार गीले हैं। सिद्धों द्वारा छोड़ी कमल की मालाएँ, कई प्रकार के पुष्प, दूर्वा आदि वैसे ही थे, मुरझाए नहीं थे। इन वस्तुओं से एक विशेष प्रकार की किरणें निकल रही थीं, जो ऋषियों की तपस्या की ऊर्जा से सन्निहित थीं।
महाभारत के वनपर्व में भी ऐसे सिद्ध आश्रमों का उल्लेख मिलता है। दमयंती राजा नल को खोजते-खोजते एक ऐसे वन में चली गई थी, जहाँ का दृश्य अत्यंत मनोरम एवं सुंदर था। उस वन के अंदर एक तपोवन था।
अनेक ऋषि वहाँ तपस्या कर रहे थे। वे वल्कल एवं
मृगछाला धारण किए हुए थे। दमयंती ने जब उनको
प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाई तो ऋषियों ने
आशीर्वाद दिया कि महाराज नल निषध प्रदेश पर पुनः
सिंहासनारूढ़ होंगे और तुम्हारे साथ उनका पुनर्मिलन
होगा। इसके पश्चात सभी ऋषिगण उस तपोवन के साथ
अदृश्य हो गए। दमयंती तमाम प्रयासों के बावजूद उस
दिव्य तपोवन का पुनः दर्शन नहीं कर सकी।
महाभारत में आए एक अन्य कथानक के अनुसार,
पांडवों ने भी अपने वनवास काल में महर्षि लोमश तथा
धौम्य के साथ अनेक सिद्धाश्रमों का दर्शन प्राप्त किया
था। कैलास पर्वत के पूर्व में स्थित मणिमंत प्रदेश को भी
सिद्धों की गुप्तस्थली कहते हैं। वर्तमान में इसे माणा
शिखर के नाम से जाना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से
गंधमादन पर्वत तथा माणा को अलकनंदा के पश्चिम तट
पर तथा नंदादेवी को अलकनंदा के पूर्व तट पर स्थित
मानते हैं। अलकनंदा के दोनों भागों को सिद्धों का विचरण
स्थल माना जाता है। यहाँ पर सिद्ध महात्मा एवं ऋषि
१/२
@Sanatan
👍7👏7❤6🙏6🔥1🤔1
अभी भी तपस्यारत हैं और स्वेच्छा एवं अनुग्रहवश कभी-
कभी जनसामान्य को दर्शन भी दिया करते हैं।
महाकवि कालिदास ने मंदाकिनी के पार्श्व में स्थित उपत्यका श्रेणी को गौरी का पिता कहा है। यह भी अत्यंत
रहस्यावृत प्रदेश है। आदिशंकराचार्य, गोरक्षनाथ, माधवाचार्य, गोस्वामी तुलसीदास, स्वामी रामतीर्थ आदि महापुरुषों को इस क्षेत्र में अलौकिक एवं अद्भुत दर्शन मिल चुके हैं।
यमुनोत्तरी पर आज भी कुछ सिद्ध रहते हैं तथा भीषण
हिमपात में भी वे वह स्थान नहीं छोड़ते। दीपावली के बाद होली तक वहाँ भोजन सामग्री नहीं मिलती और कहते हैं कि इस स्थिति में यक्ष लोग उनके लिए भोजन सामग्री की व्यवस्था कर देते हैं। इस तरह सिद्ध-महात्मा अपनी तपस्या में दीर्घकाल तक निमग्न रह पाते हैं।
एक बार महायोगी त्रिपुरलिंग असम के जयंतिया
पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे। वहाँ उनको गहन वन में एक
गुफा दीखी। उन्होंने वहाँ पर रात्रि व्यतीत करना चाही।
अर्द्धरात्रि में संपूर्ण वन गंभीर निस्तब्धता से व्याप्त हो
उठा। तब योगिराज त्रिपुरलिंग भगवान शिव की आराधना
में तल्लीन थे। ध्यान से बाहर निकलने के बाद उन्होंने
देखा कि गुफा एक दिव्य ज्योति से उद्भासित है और
एक जटाजूटधारी तेजोदीप्त महापुरुष उनके सामने खड़े
हैं। वे योगिराज को अनेक प्रकार के उपदेश देकर अदृश्य
हो गए। योगिराज ने देखा कि महापुरुष के साथ वह गुफा
एवं वह सिद्ध भूमि भी सूक्ष्म में समाहित हो गई।
इसी तरह बंगाल के प्रख्यात लेखक प्रमोद कुमार
चट्टोपाध्याय ने प्रयाग क्षेत्र में झूसी के पास एक सिद्ध
गुफा के दर्शन किए थे। यह विवरण उनके बंगाली ग्रंथ
'अवधूत ओ योगिसंग' में उल्लेख है। उन्होंने वहाँ किले
के पास देखा कि किले के भग्नावशेष के नीचे पर्वत पर
कई गुफाएँ थीं, जिनके ऊपर कुछ कमरे थे और ८-१०
सीढ़ियाँ उतरते ही वहाँ एक गली जैसा संकीर्ण मार्ग था।
ऐसी ही एक गुफा में एक दीपक जल रहा था। उस
दीपक के प्रकाश में मृगचर्मासन पर बैठे एक सिद्ध का
दर्शन उन्हें हुआ। कहते हैं कि वे बाबा कल्पनाथ थे।
बाबा ने उस निर्जन गुफा में पूड़ी, साग, अचार तथा
मालपुआ प्रस्तुत किए। सभी वस्तुएँ ताजी लाई गई थीं।
भोजनोपरांत उन्हें उपदेश देकर पूरी गुफा ही अंतर्धान हो
गई। इस प्रकार सिद्ध एवं सिद्धाश्रम होते हैं, जहाँ पर वे
जनकल्याण हेतु तपस्या करते हैं। श्रद्धासिक्त एवं ज्ञानपिपासु को ही उनकी कृपा की प्राप्ति होती है
२/२
@Sanatan
कभी जनसामान्य को दर्शन भी दिया करते हैं।
महाकवि कालिदास ने मंदाकिनी के पार्श्व में स्थित उपत्यका श्रेणी को गौरी का पिता कहा है। यह भी अत्यंत
रहस्यावृत प्रदेश है। आदिशंकराचार्य, गोरक्षनाथ, माधवाचार्य, गोस्वामी तुलसीदास, स्वामी रामतीर्थ आदि महापुरुषों को इस क्षेत्र में अलौकिक एवं अद्भुत दर्शन मिल चुके हैं।
यमुनोत्तरी पर आज भी कुछ सिद्ध रहते हैं तथा भीषण
हिमपात में भी वे वह स्थान नहीं छोड़ते। दीपावली के बाद होली तक वहाँ भोजन सामग्री नहीं मिलती और कहते हैं कि इस स्थिति में यक्ष लोग उनके लिए भोजन सामग्री की व्यवस्था कर देते हैं। इस तरह सिद्ध-महात्मा अपनी तपस्या में दीर्घकाल तक निमग्न रह पाते हैं।
एक बार महायोगी त्रिपुरलिंग असम के जयंतिया
पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे। वहाँ उनको गहन वन में एक
गुफा दीखी। उन्होंने वहाँ पर रात्रि व्यतीत करना चाही।
अर्द्धरात्रि में संपूर्ण वन गंभीर निस्तब्धता से व्याप्त हो
उठा। तब योगिराज त्रिपुरलिंग भगवान शिव की आराधना
में तल्लीन थे। ध्यान से बाहर निकलने के बाद उन्होंने
देखा कि गुफा एक दिव्य ज्योति से उद्भासित है और
एक जटाजूटधारी तेजोदीप्त महापुरुष उनके सामने खड़े
हैं। वे योगिराज को अनेक प्रकार के उपदेश देकर अदृश्य
हो गए। योगिराज ने देखा कि महापुरुष के साथ वह गुफा
एवं वह सिद्ध भूमि भी सूक्ष्म में समाहित हो गई।
इसी तरह बंगाल के प्रख्यात लेखक प्रमोद कुमार
चट्टोपाध्याय ने प्रयाग क्षेत्र में झूसी के पास एक सिद्ध
गुफा के दर्शन किए थे। यह विवरण उनके बंगाली ग्रंथ
'अवधूत ओ योगिसंग' में उल्लेख है। उन्होंने वहाँ किले
के पास देखा कि किले के भग्नावशेष के नीचे पर्वत पर
कई गुफाएँ थीं, जिनके ऊपर कुछ कमरे थे और ८-१०
सीढ़ियाँ उतरते ही वहाँ एक गली जैसा संकीर्ण मार्ग था।
ऐसी ही एक गुफा में एक दीपक जल रहा था। उस
दीपक के प्रकाश में मृगचर्मासन पर बैठे एक सिद्ध का
दर्शन उन्हें हुआ। कहते हैं कि वे बाबा कल्पनाथ थे।
बाबा ने उस निर्जन गुफा में पूड़ी, साग, अचार तथा
मालपुआ प्रस्तुत किए। सभी वस्तुएँ ताजी लाई गई थीं।
भोजनोपरांत उन्हें उपदेश देकर पूरी गुफा ही अंतर्धान हो
गई। इस प्रकार सिद्ध एवं सिद्धाश्रम होते हैं, जहाँ पर वे
जनकल्याण हेतु तपस्या करते हैं। श्रद्धासिक्त एवं ज्ञानपिपासु को ही उनकी कृपा की प्राप्ति होती है
२/२
@Sanatan
❤22👍9🙏4🥰1
भगवान भास्कर की त्रिकाल स्तुति
-----------------------------------------
प्रातः कालीन सूर्य स्तुतिः-
प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं, रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि ।
सामानि यस्य किरणाः प्रभवादि हेतुं, ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्य रूपम् ॥
प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाङ्मनोभिः, बहोन्द्र पूर्वक सुरतमर्चितं च । वृष्टि प्रमोचनविनिग्रह हेतुभूतं, त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च ॥
प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्तिं, पापौघ शत्रुभयरोग हरं परं च ।
तं सर्वलोक कलनात्मक कालमूर्ति, गोकण्ठबन्धन विमोचनमादि देवम् ॥
मध्याह (दोपहर ) कालीन सूर्य स्तुतिः
य उद्गान् महतोऽर्णवात् विभ्राजमानः सलिलस्य मध्यात् ।
स मा वृषभो लोहिताक्षः, सूर्यो विपश्चिन्मनसा पुनातु ॥
सायंकालीन सूर्य स्तुतिः
'ध्येयः सदा सवितृ मण्डल मध्यवर्ती, नारायणः सरसिजासन संनिविष्टि: ।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटो, हारी हिरण्मय वपुर्धत शंख चक्रः ॥
त्रिकाल संध्या कर्म में गायत्री - स्तुति
आज के व्यस्त भौतिक युग में भी कितने ही श्रद्धालुजन दैनिक रूप में त्रिकाल सन्ध्योपासना करते हैं। यह त्रिकाल भगवान सूर्य की गति और स्थिति पर आधारित रहते हैं। प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या- यह तीनों बेलाएं सूर्य की उदय, मध्य और अस्त स्थितियों की प्रतिरूप हैं। अतः सूर्य भगवान की गति और स्थिति को देखकर ही यह काल ॥ निर्धारण किया गया है। यह त्रिकाल बेला गायत्री साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इन तीनों में यद्यपि जप का मूल मंत्र गायत्री तो एक ही रहता है परन्तु समय (बेला) भेद के आधार पर गायत्री को ध्यान स्तुतियाँ भिन्न-भिन्न है।
प्रभातकालीन गायत्री की ध्यान स्तुतिः
"हंसारूढा सिताब्जे त्वरुण मणि लसद् भूषणां साष्ट्रनेत्रां ।
वेदाख्यामक्षमालां स्वजभय कमलं दण्डमप्यादधानम् ॥
ध्याये दोर्भिश्चतुर्भिस्त्रभुवन जननीं पूर्वसन्ध्यादि वन्द्याम् ।
गायत्री मृक सावित्रीमिनव वयसं मण्डले चण्ड रश्मेः ॥
विश्वमातः सुराम्यर्च्य पुण्ये गायत्र आवाहयाम्युदास्त्यर्थ मोनोि पुनीहिमाम् ॥
मध्याह्नकालीन गायत्री की ध्यान स्तुति
वृषेन्द्र वाहनादेवी ज्वलत् त्रिशिख धारिणी, श्वेताम्बरधरा श्वेत नागाभरेण भूषिता ।
श्वेतस्त्रराक्ष मालालंकृता रक्ता च शङ्करा, जटाधर धराधात्री धरेन्द्राङ्ग भवाम्भवा ॥
मातर्भवानि विश्वेशि, आहूतैहि पुनीहिमाम्
संध्याकालीन गायत्री की ध्यान स्तुति
सन्ध्या सायन्तनी कृष्णा विष्णुदेवा सरस्वती, खगगा कृष्ण वक्त्रा तु शंखचक्र धरापरा ।
कृष्ण स्त्रक् भूषणैर्युक्ता सर्वज्ञानमयीं वरा, वीणाक्षमौलिका चारुहस्ता स्मित वरानना ।
मातर्वाग्देवते स्तुत्ये आहूतहि पुनीहिमाम् ॥
देवी गायत्री के जिन पाँच मुखों की परिकल्पना की गयी है और उनके जिन पाँच रंगों का वर्णन प्राप्त होता है वे वास्तव में सूर्यमण्डल में स्थिति शक्ति (देवी) के दृश्यमान दिख पड़ने वाले पाँच रंग हैं।
मुक्ता विद्रुम हेम नील धवलच्छायैमुखैवीक्षण युक्तामिन्दु निबद्ध रत्नमुकुटां तत्वात्म वर्णात्मिकाम् ।
सावित्रीं वरदाभयां कुशकशाः शुभ्रं कपालं गुणं,शंखचक्रमथार विन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे ॥
देवी गायत्री और भगवान सूर्य में कोई अंतर नहीं है, वे परस्पर अभिन्न हैं, इस तथ्य के प्रतिपादन में एक और स्तुति उसी ग्रंथ शारदा तिलक में प्राप्त होती है।
हेमाम्भोज प्रवाल प्रतिमनिज रुचिं चारुखट्वाङ्ग पद्मौ, चक्रं शक्तिं सपाशं सृणिमति रुचिराक्षमालां कपालम् । हस्ताम्भोजेर्दधानं त्रिनयनविलसद वेदवक्त्राभिरामं, मार्त्तण्डं बल्ला भाई मणिमय मुकुटं हारदीप्तं भजामः ॥
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
-----------------------------------------
प्रातः कालीन सूर्य स्तुतिः-
प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं, रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि ।
सामानि यस्य किरणाः प्रभवादि हेतुं, ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्य रूपम् ॥
प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाङ्मनोभिः, बहोन्द्र पूर्वक सुरतमर्चितं च । वृष्टि प्रमोचनविनिग्रह हेतुभूतं, त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च ॥
प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्तिं, पापौघ शत्रुभयरोग हरं परं च ।
तं सर्वलोक कलनात्मक कालमूर्ति, गोकण्ठबन्धन विमोचनमादि देवम् ॥
मध्याह (दोपहर ) कालीन सूर्य स्तुतिः
य उद्गान् महतोऽर्णवात् विभ्राजमानः सलिलस्य मध्यात् ।
स मा वृषभो लोहिताक्षः, सूर्यो विपश्चिन्मनसा पुनातु ॥
सायंकालीन सूर्य स्तुतिः
'ध्येयः सदा सवितृ मण्डल मध्यवर्ती, नारायणः सरसिजासन संनिविष्टि: ।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटो, हारी हिरण्मय वपुर्धत शंख चक्रः ॥
त्रिकाल संध्या कर्म में गायत्री - स्तुति
आज के व्यस्त भौतिक युग में भी कितने ही श्रद्धालुजन दैनिक रूप में त्रिकाल सन्ध्योपासना करते हैं। यह त्रिकाल भगवान सूर्य की गति और स्थिति पर आधारित रहते हैं। प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या- यह तीनों बेलाएं सूर्य की उदय, मध्य और अस्त स्थितियों की प्रतिरूप हैं। अतः सूर्य भगवान की गति और स्थिति को देखकर ही यह काल ॥ निर्धारण किया गया है। यह त्रिकाल बेला गायत्री साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इन तीनों में यद्यपि जप का मूल मंत्र गायत्री तो एक ही रहता है परन्तु समय (बेला) भेद के आधार पर गायत्री को ध्यान स्तुतियाँ भिन्न-भिन्न है।
प्रभातकालीन गायत्री की ध्यान स्तुतिः
"हंसारूढा सिताब्जे त्वरुण मणि लसद् भूषणां साष्ट्रनेत्रां ।
वेदाख्यामक्षमालां स्वजभय कमलं दण्डमप्यादधानम् ॥
ध्याये दोर्भिश्चतुर्भिस्त्रभुवन जननीं पूर्वसन्ध्यादि वन्द्याम् ।
गायत्री मृक सावित्रीमिनव वयसं मण्डले चण्ड रश्मेः ॥
विश्वमातः सुराम्यर्च्य पुण्ये गायत्र आवाहयाम्युदास्त्यर्थ मोनोि पुनीहिमाम् ॥
मध्याह्नकालीन गायत्री की ध्यान स्तुति
वृषेन्द्र वाहनादेवी ज्वलत् त्रिशिख धारिणी, श्वेताम्बरधरा श्वेत नागाभरेण भूषिता ।
श्वेतस्त्रराक्ष मालालंकृता रक्ता च शङ्करा, जटाधर धराधात्री धरेन्द्राङ्ग भवाम्भवा ॥
मातर्भवानि विश्वेशि, आहूतैहि पुनीहिमाम्
संध्याकालीन गायत्री की ध्यान स्तुति
सन्ध्या सायन्तनी कृष्णा विष्णुदेवा सरस्वती, खगगा कृष्ण वक्त्रा तु शंखचक्र धरापरा ।
कृष्ण स्त्रक् भूषणैर्युक्ता सर्वज्ञानमयीं वरा, वीणाक्षमौलिका चारुहस्ता स्मित वरानना ।
मातर्वाग्देवते स्तुत्ये आहूतहि पुनीहिमाम् ॥
देवी गायत्री के जिन पाँच मुखों की परिकल्पना की गयी है और उनके जिन पाँच रंगों का वर्णन प्राप्त होता है वे वास्तव में सूर्यमण्डल में स्थिति शक्ति (देवी) के दृश्यमान दिख पड़ने वाले पाँच रंग हैं।
मुक्ता विद्रुम हेम नील धवलच्छायैमुखैवीक्षण युक्तामिन्दु निबद्ध रत्नमुकुटां तत्वात्म वर्णात्मिकाम् ।
सावित्रीं वरदाभयां कुशकशाः शुभ्रं कपालं गुणं,शंखचक्रमथार विन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे ॥
देवी गायत्री और भगवान सूर्य में कोई अंतर नहीं है, वे परस्पर अभिन्न हैं, इस तथ्य के प्रतिपादन में एक और स्तुति उसी ग्रंथ शारदा तिलक में प्राप्त होती है।
हेमाम्भोज प्रवाल प्रतिमनिज रुचिं चारुखट्वाङ्ग पद्मौ, चक्रं शक्तिं सपाशं सृणिमति रुचिराक्षमालां कपालम् । हस्ताम्भोजेर्दधानं त्रिनयनविलसद वेदवक्त्राभिरामं, मार्त्तण्डं बल्ला भाई मणिमय मुकुटं हारदीप्तं भजामः ॥
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
🙏16👍10👏2🔥1
हे दुःख भंजन! देवकीनन्दन!
जय श्री राधे गोविन्द! 🙏
वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनं!
देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरूं!
***
याद रखो---जीव जब तक मनुष्य योनि में नहीं आता, तब तक तो वह अपने पूर्व मानव-जन्मकृत भोगों को भोगकर कर्म-ऋण से क्रमश: मुक्त होता रहता है, पर मानव-शरीर प्राप्त करके यदि भगवत प्राप्ति के साधन में नहीं लगता और भोग-प्रत्यार्थ सत्कर्म करता है, तो उसे जन्म-मरण के चक्र में पड़े रहकर सत्कर्मों के फलस्वरुप विविध लोकों तथा योनियों में लौकिक सुख मिलता है,भगवत्प्राप्ति नहीं होती।
यह उसकी महान हानि होती है। मानव जीवन का सुदुर्लभ अवसर हाथसे चला जाता है। और यदि वह मानव-शरीर में दुष्कर्म करता है, तब तो उसे विविध प्रकार की भीषण नरकयंत्रणा और विविध जघन्य योनियों में जन्म लेकर अपार-कष्ट भोग करना पड़ता है, इससे अच्छा था कि वह मानव-शरीर ही प्राप्त न करता।
@Sanatan
जय श्री राधे गोविन्द! 🙏
वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनं!
देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरूं!
***
याद रखो---जीव जब तक मनुष्य योनि में नहीं आता, तब तक तो वह अपने पूर्व मानव-जन्मकृत भोगों को भोगकर कर्म-ऋण से क्रमश: मुक्त होता रहता है, पर मानव-शरीर प्राप्त करके यदि भगवत प्राप्ति के साधन में नहीं लगता और भोग-प्रत्यार्थ सत्कर्म करता है, तो उसे जन्म-मरण के चक्र में पड़े रहकर सत्कर्मों के फलस्वरुप विविध लोकों तथा योनियों में लौकिक सुख मिलता है,भगवत्प्राप्ति नहीं होती।
यह उसकी महान हानि होती है। मानव जीवन का सुदुर्लभ अवसर हाथसे चला जाता है। और यदि वह मानव-शरीर में दुष्कर्म करता है, तब तो उसे विविध प्रकार की भीषण नरकयंत्रणा और विविध जघन्य योनियों में जन्म लेकर अपार-कष्ट भोग करना पड़ता है, इससे अच्छा था कि वह मानव-शरीर ही प्राप्त न करता।
@Sanatan
🙏24👍12🔥11
पिष्टपेषण +++
⚘️दीक्षा क्या है?? ⚘️
भिन्न धर्मों में दीक्षा लेने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। फिर भी अनेक लोग नहीं जानते कि आखिर दीक्षा में होता क्या है? दीक्षा है क्या? साधारण भाषा में कहें तो किसी गुरु की देख-रेख में एक साधना पद्धति को अपनाने का संकल्प दीक्षा है। गुरु अपने शिष्य को साधना के गहन सूत्र बता कर उसके मस्तिष्क और संपूर्ण तंत्रिका तंत्र को अध्यात्म प्रवाह के लिए खोल देता है। लेकिन गुरु और अध्यापक में अंतर है। आजकल किसी को भी गुरु कहना फैशन बन गया है।
मनुष्य के तीन शरीर होते हैं- पहला- स्थूल शरीर, दूसरा- सूक्ष्म शरीर और तीसरा- कारण शरीर। स्थूल शरीर तो हमें दिखाई देता है। यह सोलह तत्वों का बना होता है। पहली नजर में हमारा चेहरा ही हमारे स्थूल शरीर का परिचय होता है। लेकिन स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर होता है जो 19 तत्वों का बना होता है। ये 19 तत्व हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, पांच ज्ञानेंद्रियां (आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा), पांच महाभूत ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश), तथा पांच प्राण- प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान।
सूक्ष्म शरीर के भीतर हमारा कारण शरीर सूक्ष्मतम है जो 35 तत्वों का बना होता है- स्थूल शरीर के 16 और सूक्ष्म शरीर के 19 मिला कर कुल 35 तत्व। गुरु की दी हुई साधना (दीक्षा) इन सभी स्थूल और सूक्ष्म तत्वों/ऊर्जाओं को संतुलित बनाता है। हमारे शरीर और मन को स्वस्थ रखता है। गहन से गहनतर साधना से ईश्वर का यथासमय आभास और साक्षात्कार हो पाता है।
दीक्षा को अमृत संचार भी कहते हैं। क्योंकि यह साधना हमारे मन को पवित्रतम और उच्चतर स्तर तक ले जाती है, जहां साधक ईश्वर रूपी अमृत का पान करता है। लेकिन कई साधक दीक्षा लेकर भूल जाते हैं कि उन्हें कोई साधना भी करनी है। उन्हें याद भी रहता है तो आलस्य के कारण वे दीक्षा के नियमों का पालन नहीं करते। दिन पर दिन बीतते जाते हैं और एक दिन उनका अंतिम समय आ जाता है। तब उन्हें एक मानसिक झटका लगता है कि साधना तो हुई ही नहीं और मृत्यु का समय आ गया। लेकिन अब पछताने का कोई अर्थ नहीं होता। जो बीत गई सो बात गई।
कई बार हम अपनी गलत आदतों के कारण अपने शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों में कचरा भर उनके स्वाभाविक प्रवाह पथ को लगभग जाम कर देते हैं। उसके कारण हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता रहता है। हमें उन कष्टों को झेलने की आदत पड़ती जाती है, लेकिन साधना कर इन नाड़ियों को शुद्ध करने का थोड़ा सा परिश्रम हम नहीं कर पाते।
भगवत् गीता में तो भगवान कृष्ण ने कहा ही है कि मनुष्य अपना ही मित्र और शत्रु है। यदि वह साधना करता है, अपना जीवन हर तरह से संतुलित और ईश्वरीय नियमों के अनुकूल बिताता है तो वह अपना मित्र है, लेकिन यदि वह खान- पान से लेकर आचार-व्यवहार तक में अराजक है तो वह स्वयं अपना ही शत्रु है।
🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏
@Sanatan
⚘️दीक्षा क्या है?? ⚘️
भिन्न धर्मों में दीक्षा लेने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। फिर भी अनेक लोग नहीं जानते कि आखिर दीक्षा में होता क्या है? दीक्षा है क्या? साधारण भाषा में कहें तो किसी गुरु की देख-रेख में एक साधना पद्धति को अपनाने का संकल्प दीक्षा है। गुरु अपने शिष्य को साधना के गहन सूत्र बता कर उसके मस्तिष्क और संपूर्ण तंत्रिका तंत्र को अध्यात्म प्रवाह के लिए खोल देता है। लेकिन गुरु और अध्यापक में अंतर है। आजकल किसी को भी गुरु कहना फैशन बन गया है।
मनुष्य के तीन शरीर होते हैं- पहला- स्थूल शरीर, दूसरा- सूक्ष्म शरीर और तीसरा- कारण शरीर। स्थूल शरीर तो हमें दिखाई देता है। यह सोलह तत्वों का बना होता है। पहली नजर में हमारा चेहरा ही हमारे स्थूल शरीर का परिचय होता है। लेकिन स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर होता है जो 19 तत्वों का बना होता है। ये 19 तत्व हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, पांच ज्ञानेंद्रियां (आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा), पांच महाभूत ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश), तथा पांच प्राण- प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान।
सूक्ष्म शरीर के भीतर हमारा कारण शरीर सूक्ष्मतम है जो 35 तत्वों का बना होता है- स्थूल शरीर के 16 और सूक्ष्म शरीर के 19 मिला कर कुल 35 तत्व। गुरु की दी हुई साधना (दीक्षा) इन सभी स्थूल और सूक्ष्म तत्वों/ऊर्जाओं को संतुलित बनाता है। हमारे शरीर और मन को स्वस्थ रखता है। गहन से गहनतर साधना से ईश्वर का यथासमय आभास और साक्षात्कार हो पाता है।
दीक्षा को अमृत संचार भी कहते हैं। क्योंकि यह साधना हमारे मन को पवित्रतम और उच्चतर स्तर तक ले जाती है, जहां साधक ईश्वर रूपी अमृत का पान करता है। लेकिन कई साधक दीक्षा लेकर भूल जाते हैं कि उन्हें कोई साधना भी करनी है। उन्हें याद भी रहता है तो आलस्य के कारण वे दीक्षा के नियमों का पालन नहीं करते। दिन पर दिन बीतते जाते हैं और एक दिन उनका अंतिम समय आ जाता है। तब उन्हें एक मानसिक झटका लगता है कि साधना तो हुई ही नहीं और मृत्यु का समय आ गया। लेकिन अब पछताने का कोई अर्थ नहीं होता। जो बीत गई सो बात गई।
कई बार हम अपनी गलत आदतों के कारण अपने शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों में कचरा भर उनके स्वाभाविक प्रवाह पथ को लगभग जाम कर देते हैं। उसके कारण हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता रहता है। हमें उन कष्टों को झेलने की आदत पड़ती जाती है, लेकिन साधना कर इन नाड़ियों को शुद्ध करने का थोड़ा सा परिश्रम हम नहीं कर पाते।
भगवत् गीता में तो भगवान कृष्ण ने कहा ही है कि मनुष्य अपना ही मित्र और शत्रु है। यदि वह साधना करता है, अपना जीवन हर तरह से संतुलित और ईश्वरीय नियमों के अनुकूल बिताता है तो वह अपना मित्र है, लेकिन यदि वह खान- पान से लेकर आचार-व्यवहार तक में अराजक है तो वह स्वयं अपना ही शत्रु है।
🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏
@Sanatan
👍35❤7🙏4
निर्वाण षट्कम्
-------------------
अघोरता ही सत्य है, अघोरता ही शिव है। शिव को सिद्ध करना है तो अघोरता ही सिद्ध करनी होगी। आदि गुरु शंकराचार्य जी ने अपने जीवन का समस्त सार निर्वाण षटकम श्लोक में व्यक्त कर दिया है। यह अति उच्चतम एवं स्थित प्रज्ञ शिव भाव स्थिति है। इस परम भाव को प्राप्त करने की प्रत्येक मनुष्य के अन्तःकरण में सुषुप्त लालसा होती है। यह एक ऐसी लालसा है जो कि कभी नहीं बुझती भगवान शंकर ने कहा है- पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् । इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥ अर्थात फिर से जन्म एवं पुनः माता के गर्भ में शयन फिर से मृत्यु प्राप्ति इन दारूण चक्रों से मुक्ति केवल शिव ही दिला सकते हैं।
अध्यात्म में कोई नियम नहीं चलते। अध्यात्म की कोई परिभाषा नहीं है। अध्यात्म पाठयक्रम के अनुसार नहीं पढ़ाया जा सकता। पूर्व में श्रीधर आचार्य नामक एक महात्मा हुए हैं। वे कई वर्षों से घनघोर तपस्या करते रहे ज्ञान प्राप्ति के लिए सारे जतन, पूजन इत्यादि करके वे थक गये पर ज्ञान प्राप्ति नहीं हो रही थी। एक दिन वट वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ बैठे हुए थे। अचानक वृक्ष पर से एक पक्षी का अण्डा गिरा एवं उसमें से एक छोटा सा एवं अत्यंत कोमल शिशु निकलकर हिलने-डुलने लगा। श्रीधर आचार्य को लगा कि अगर मैंने मदद नहीं की तो यह मर जायेगा परन्तु दूसरे ही क्षण कुछ परिन्दे उड़ते हुए आये और अण्डे की खोल में से निकले लसलसे पदार्थ में फँस गये। दूसरे ही क्षण नवजात पक्षी ने उनका भक्षण कर अपनी भूख मिटा ली। इस सम्यक घटना को देख श्रीधर को ज्ञान प्राप्त हो गया।
साक्षात् भगवान ने स्वयं ही सृष्टि चक्र के द्वारा नवजात शिशु को भोजन पहुँचा दिया। कब किसे किस घटना के द्वारा किस क्रिया के द्वारा ज्ञान प्राप्त हो जाये यह कहना बहुत ही असम्भव है। ईश्वर के इसी परम भाव की स्तुति है नीचे वर्णित निर्वाण षट्कम् ।
निर्वाणषट्कम्
-------------------
मनो वुद्धयहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायु- सच्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ॥
मैं मन नहीं हूँ और न ही बुद्धि अहंकार या चित्त ही हूँ। मैं न श्रोत्र हूँ और न जिह्वा, न नासिका या नेत्र हूँ । मैं आकाश नहीं हूँ और वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी भी नहीं हूँ। मैं चिदानन्द रूप हूँ मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चकोशन वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः ।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिंदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ॥
मैं प्राण-संज्ञा नहीं हूँ मैं पज्वायु नहीं हूँ। मैं सप्तधातु नहीं हूँ और न पञ्चकोश ही हूँ। मैं हाथ-पाँव, वाणी, गुदा या जननेन्द्रिय भी नहीं हूँ। मैं चिदानन्दरूप हूँ। मैं शिव हूँ, मैं
शिव हूँ।
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष- सच्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ॥
मुझमें न द्वेष है, न राग, न लोभ, न मोह, न मद है, न मत्सर मुझमें धर्म नहीं है, अर्थ भी नहीं है। न इच्छा है, न मोक्ष ही है। मैं चिदानन्दरूप हूँ। मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ।।
मैं न पुण्य हूँ, न पाप हूँ, न सुख हूँ, न दुःख हूँ। मैं मंत्र नहीं हूँ, तीर्थ नहीं हूँ। में वेद नहीं हूँ, यज्ञ भी नहीं शिव हूँ। हूँ। मैं न भोज भोजन का कर्म हूँ और न भोजन करने वाला हूँ। मैं चिदानन्दरूप हूँ। मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता च जन्म ।
न बन्धुर्न मित्र गुरुर्नैव शिष्य- सच्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ॥
मेरे लिए न मृत्यु है, न शंका है, न जाति भेद है, न माता पिता, मेरे लिए जन्म नहीं है। मैं बन्धु नहीं हूँ, मित्र नहीं हूँ गुरु नहीं हूँ, शिव हूँ। मैं चिदानन्दरूप हूँ मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय- सच्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।।
मैं विचारहीन हूँ, आकारहीन हूं। सर्वशक्तिमान हूँ, सर्वत्र हूं। सभी के परे, सबसे अलिप्त हूँ। मेरे लिए मुक्ति भी कुछ नहीं है। मैं चिदानन्द हूँ। मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
शिव शासनत: शिव शासनत:🌹
🙏 @Sanatan
-------------------
अघोरता ही सत्य है, अघोरता ही शिव है। शिव को सिद्ध करना है तो अघोरता ही सिद्ध करनी होगी। आदि गुरु शंकराचार्य जी ने अपने जीवन का समस्त सार निर्वाण षटकम श्लोक में व्यक्त कर दिया है। यह अति उच्चतम एवं स्थित प्रज्ञ शिव भाव स्थिति है। इस परम भाव को प्राप्त करने की प्रत्येक मनुष्य के अन्तःकरण में सुषुप्त लालसा होती है। यह एक ऐसी लालसा है जो कि कभी नहीं बुझती भगवान शंकर ने कहा है- पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् । इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥ अर्थात फिर से जन्म एवं पुनः माता के गर्भ में शयन फिर से मृत्यु प्राप्ति इन दारूण चक्रों से मुक्ति केवल शिव ही दिला सकते हैं।
अध्यात्म में कोई नियम नहीं चलते। अध्यात्म की कोई परिभाषा नहीं है। अध्यात्म पाठयक्रम के अनुसार नहीं पढ़ाया जा सकता। पूर्व में श्रीधर आचार्य नामक एक महात्मा हुए हैं। वे कई वर्षों से घनघोर तपस्या करते रहे ज्ञान प्राप्ति के लिए सारे जतन, पूजन इत्यादि करके वे थक गये पर ज्ञान प्राप्ति नहीं हो रही थी। एक दिन वट वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ बैठे हुए थे। अचानक वृक्ष पर से एक पक्षी का अण्डा गिरा एवं उसमें से एक छोटा सा एवं अत्यंत कोमल शिशु निकलकर हिलने-डुलने लगा। श्रीधर आचार्य को लगा कि अगर मैंने मदद नहीं की तो यह मर जायेगा परन्तु दूसरे ही क्षण कुछ परिन्दे उड़ते हुए आये और अण्डे की खोल में से निकले लसलसे पदार्थ में फँस गये। दूसरे ही क्षण नवजात पक्षी ने उनका भक्षण कर अपनी भूख मिटा ली। इस सम्यक घटना को देख श्रीधर को ज्ञान प्राप्त हो गया।
साक्षात् भगवान ने स्वयं ही सृष्टि चक्र के द्वारा नवजात शिशु को भोजन पहुँचा दिया। कब किसे किस घटना के द्वारा किस क्रिया के द्वारा ज्ञान प्राप्त हो जाये यह कहना बहुत ही असम्भव है। ईश्वर के इसी परम भाव की स्तुति है नीचे वर्णित निर्वाण षट्कम् ।
निर्वाणषट्कम्
-------------------
मनो वुद्धयहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायु- सच्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ॥
मैं मन नहीं हूँ और न ही बुद्धि अहंकार या चित्त ही हूँ। मैं न श्रोत्र हूँ और न जिह्वा, न नासिका या नेत्र हूँ । मैं आकाश नहीं हूँ और वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी भी नहीं हूँ। मैं चिदानन्द रूप हूँ मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चकोशन वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः ।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिंदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ॥
मैं प्राण-संज्ञा नहीं हूँ मैं पज्वायु नहीं हूँ। मैं सप्तधातु नहीं हूँ और न पञ्चकोश ही हूँ। मैं हाथ-पाँव, वाणी, गुदा या जननेन्द्रिय भी नहीं हूँ। मैं चिदानन्दरूप हूँ। मैं शिव हूँ, मैं
शिव हूँ।
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष- सच्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ॥
मुझमें न द्वेष है, न राग, न लोभ, न मोह, न मद है, न मत्सर मुझमें धर्म नहीं है, अर्थ भी नहीं है। न इच्छा है, न मोक्ष ही है। मैं चिदानन्दरूप हूँ। मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ।।
मैं न पुण्य हूँ, न पाप हूँ, न सुख हूँ, न दुःख हूँ। मैं मंत्र नहीं हूँ, तीर्थ नहीं हूँ। में वेद नहीं हूँ, यज्ञ भी नहीं शिव हूँ। हूँ। मैं न भोज भोजन का कर्म हूँ और न भोजन करने वाला हूँ। मैं चिदानन्दरूप हूँ। मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता च जन्म ।
न बन्धुर्न मित्र गुरुर्नैव शिष्य- सच्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ॥
मेरे लिए न मृत्यु है, न शंका है, न जाति भेद है, न माता पिता, मेरे लिए जन्म नहीं है। मैं बन्धु नहीं हूँ, मित्र नहीं हूँ गुरु नहीं हूँ, शिव हूँ। मैं चिदानन्दरूप हूँ मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय- सच्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।।
मैं विचारहीन हूँ, आकारहीन हूं। सर्वशक्तिमान हूँ, सर्वत्र हूं। सभी के परे, सबसे अलिप्त हूँ। मेरे लिए मुक्ति भी कुछ नहीं है। मैं चिदानन्द हूँ। मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
शिव शासनत: शिव शासनत:🌹
🙏 @Sanatan
👍11👏7🙏4😁2
पूर्ण रहस्यम्
-----------------
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
मेरे गुरु निखिलेश्वरानंद जी का प्रत्येक शिविर भी इसी वाक्य से प्रारम्भ होता था। उनके मुख से मैंने अनेकों बार मधुर ध्वनि में इस परम गूढ़ श्लोक को ग्रहण किया है। आदि गुरु शंकराचार्य जी ने भी अनेकों बार इस श्लोक की व्याख्या की है। उनका भी यह प्रिय श्लोक था। उनका भी नहीं अपितु जब भी मैं किसी महापुरुष की जीवनी या उनके ग्रंथ पढ़ता हूँ एक न एक बार सभी आध्यात्मिक महापुरुषों का मन एवं वाणी इस श्लोक आकर जरूर अटक जाती है।यह श्लोक एक स्थिति का परिचायक हैं। यह एकांत की परिभाषा है। बौद्धों ने भी बड़े सुन्दर ढंग से इसकी व्याख्या की है। बौद्धों का अनीश्वरवाद इसी श्लोक के इर्द-गिर्द घूमता है। पिछले दो हजार वर्षों में बुद्ध ही एक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने कि सर्वप्रथम धर्म को वैज्ञानिक स्वरूप दिया है।
देखिए वैज्ञानिक का मतलब यह नहीं है कि किसी भौतिक वस्तु का अविष्कार या किसी उपाधि से अलंकृत किया जाना। यह काल का चलन है।आज जिन्हें हम वैज्ञानिक कहकर प्रमाणीकृत करते हैं उनके मस्तिष्क कोई बहुत ज्यादा विकासशील नहीं हैं और यह भी जरूरी नहीं है कि वे ब्रह्मा हो गये हैं। ऋषि भी परम वैज्ञानिक हैं। साधु संत भी वैज्ञानिक ही हैं। वनवासी भी वैज्ञानिक हो सकते हैं। हो सकते क्या हैं ही। वैज्ञानिक कोई भी हो सकता है। वैज्ञानिक शब्द का तात्पर्य है सत्य को परखना, सूक्ष्मतीत होना। ईश्वर अनंत गतिविधियों में से किसी एक गतिविधि का तटस्थता के साथ अवलोकन करना।यही अवलोकन एक सिद्धांत को जन्म देगा। सिद्धांत में से यंत्रों का उदय होगा। सिद्धांत का अवलोकन ही ज्ञान प्राप्ति है। ध्यान रखें सिद्धांत काल के अंतर्गत है। सिद्धांत का भी जन्म होता है इसीलिए वह कालातीत है। सिद्धांत निर्मित और लुप्त भी हो सकते हैं। मुख्य रूप से सिद्धांत पूर्णता की निशानी नहीं है। सिद्धांत निर्भर है अनेकों स्थितियों पर अतः निर्भरता अपूर्णता हो देगी।
हमारी पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण अनेकों स्थितियों पर निर्भर है।इन स्थितियों में परिवर्तन होने पर गुरुत्वाकर्षण में परिवर्तन हो जायेगा। गुरुत्वाकर्षण कम एवं ज्यादा भी हो सकता है। निर्भरता सभी जगह है।निर्भरता के कारण ही नश्वरता का जन्म होता है।निर्भरता हटा दो नश्वरता समाप्त हो जायेगी।सब कुछ अजर अमर हो जायेगा तो फिर सृजन की सम्भावना खत्म हो जायेगी और जब सृजन ही नहीं होगा तो फिर कैसे काम चलेगा।कुछ भी अजर- अमर नहीं है इसीलिए नये-नये सिद्धांत बनते बिगड़ते रहते हैं।मैं अपने गुरु के मुख से जब भी ऊपर वर्णित श्लोक सुनाता हूँ एक नये प्रकार का स्पंदन, एक नये प्रकार का ज्ञान एक नया दृष्टिकोण एवं एक नये भाव का प्रादुर्भाव दृष्टिगोचर होता है।
महावीर ने एक सिद्धांत रचा जिसका नाम रखा श्याददाह यह सिद्धांत भी वही कह रहा है जो कि मैंने पहले कहा है। वे भी इस सिद्धांत में एकांत से अनेकांत की बात कर रहे हैं। वे भी कह रहे हैं कि एक पिता से अनेक पुत्र होंगे, एक गुरु से अनेक शिष्य होंगे।एक वस्तु का एक स्थिति विशेष या काल विशेष में परिणाम कुछ और होगा तो दूसरे काल विशेष में कुछ और परिणाम होगा।चौदहवीं ईसवी के अंत में भारत की स्थिति अत्यंत ही दयनीय थी। धर्माद्ध मुसलमानों के अत्याचारों से आर्य जाति पीड़ित थी। बंगाल का मुसलमान शासक इतना क्रूर था कि उसने सारे हिन्दुओं के घर लुटवा दिए। हिन्दुओं के पास सिर्फ मिट्टी के बर्तन बचे। उसका कहना था कि हिन्दुओं को अच्छा जीवन जीने का हक नहीं है क्योंकि वे मूर्ति पूजक हैं। वह तो भला हो प्रभु स्वामी जैसे कुछ वैष्णवी महापुरुषों का जो कि बंगाल की धरती पर उदित हुए और उन्होंने इन दुष्टों को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से परास्त कर सारे हिन्दुस्तान को बचा लिया अन्यथा हिन्दुस्तान भी आज अफगानिस्तान और ईरान के समान एक कट्टर और सड़ा-गला इस्लामी राष्ट्र होता।
हिन्दुस्तान का इस्लामीकरण नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और भ्रष्ट पण्डितों ने नहीं रोका है। हिन्दुस्तान को इस्लामीकरण से रोकने में अनेकों महान आध्यात्मिक विभूतियों ने अपने प्राणों तक को न्यौछावर किया है। अध्यात्म ही एकमात्र रास्ता है आसुरी शक्तियों को परास्त करने का।अध्यात्म ही पूर्ण परिवर्तन का मार्ग है अगर किसी नये वंश का उदय करना है, किसी श्रेष्ठ मानव जाति का निर्माण करना है या फिर उच्च अनुवांशिकता को प्रादुर्भाव में लाना है तो फिर उसके पीछे परम वैज्ञानिक ऋषि मस्तिष्कों की ही आवश्यकता होगी। अधिकांशतः क्षत्रिय अग्निकुण्ड से उत्पन्न हुए हैं। सिसोदिया वंश तो राजस्थान में हवन कुण्ड से उत्पन्न किया गया।यही हाल चौहानों का है। इन सबकी विधि है।100 सोम यज्ञ एक वंश में सम्पन्न कर लिए जायें तो उस वंश में भगवान जन्म लेते हैं।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
-----------------
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
मेरे गुरु निखिलेश्वरानंद जी का प्रत्येक शिविर भी इसी वाक्य से प्रारम्भ होता था। उनके मुख से मैंने अनेकों बार मधुर ध्वनि में इस परम गूढ़ श्लोक को ग्रहण किया है। आदि गुरु शंकराचार्य जी ने भी अनेकों बार इस श्लोक की व्याख्या की है। उनका भी यह प्रिय श्लोक था। उनका भी नहीं अपितु जब भी मैं किसी महापुरुष की जीवनी या उनके ग्रंथ पढ़ता हूँ एक न एक बार सभी आध्यात्मिक महापुरुषों का मन एवं वाणी इस श्लोक आकर जरूर अटक जाती है।यह श्लोक एक स्थिति का परिचायक हैं। यह एकांत की परिभाषा है। बौद्धों ने भी बड़े सुन्दर ढंग से इसकी व्याख्या की है। बौद्धों का अनीश्वरवाद इसी श्लोक के इर्द-गिर्द घूमता है। पिछले दो हजार वर्षों में बुद्ध ही एक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने कि सर्वप्रथम धर्म को वैज्ञानिक स्वरूप दिया है।
देखिए वैज्ञानिक का मतलब यह नहीं है कि किसी भौतिक वस्तु का अविष्कार या किसी उपाधि से अलंकृत किया जाना। यह काल का चलन है।आज जिन्हें हम वैज्ञानिक कहकर प्रमाणीकृत करते हैं उनके मस्तिष्क कोई बहुत ज्यादा विकासशील नहीं हैं और यह भी जरूरी नहीं है कि वे ब्रह्मा हो गये हैं। ऋषि भी परम वैज्ञानिक हैं। साधु संत भी वैज्ञानिक ही हैं। वनवासी भी वैज्ञानिक हो सकते हैं। हो सकते क्या हैं ही। वैज्ञानिक कोई भी हो सकता है। वैज्ञानिक शब्द का तात्पर्य है सत्य को परखना, सूक्ष्मतीत होना। ईश्वर अनंत गतिविधियों में से किसी एक गतिविधि का तटस्थता के साथ अवलोकन करना।यही अवलोकन एक सिद्धांत को जन्म देगा। सिद्धांत में से यंत्रों का उदय होगा। सिद्धांत का अवलोकन ही ज्ञान प्राप्ति है। ध्यान रखें सिद्धांत काल के अंतर्गत है। सिद्धांत का भी जन्म होता है इसीलिए वह कालातीत है। सिद्धांत निर्मित और लुप्त भी हो सकते हैं। मुख्य रूप से सिद्धांत पूर्णता की निशानी नहीं है। सिद्धांत निर्भर है अनेकों स्थितियों पर अतः निर्भरता अपूर्णता हो देगी।
हमारी पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण अनेकों स्थितियों पर निर्भर है।इन स्थितियों में परिवर्तन होने पर गुरुत्वाकर्षण में परिवर्तन हो जायेगा। गुरुत्वाकर्षण कम एवं ज्यादा भी हो सकता है। निर्भरता सभी जगह है।निर्भरता के कारण ही नश्वरता का जन्म होता है।निर्भरता हटा दो नश्वरता समाप्त हो जायेगी।सब कुछ अजर अमर हो जायेगा तो फिर सृजन की सम्भावना खत्म हो जायेगी और जब सृजन ही नहीं होगा तो फिर कैसे काम चलेगा।कुछ भी अजर- अमर नहीं है इसीलिए नये-नये सिद्धांत बनते बिगड़ते रहते हैं।मैं अपने गुरु के मुख से जब भी ऊपर वर्णित श्लोक सुनाता हूँ एक नये प्रकार का स्पंदन, एक नये प्रकार का ज्ञान एक नया दृष्टिकोण एवं एक नये भाव का प्रादुर्भाव दृष्टिगोचर होता है।
महावीर ने एक सिद्धांत रचा जिसका नाम रखा श्याददाह यह सिद्धांत भी वही कह रहा है जो कि मैंने पहले कहा है। वे भी इस सिद्धांत में एकांत से अनेकांत की बात कर रहे हैं। वे भी कह रहे हैं कि एक पिता से अनेक पुत्र होंगे, एक गुरु से अनेक शिष्य होंगे।एक वस्तु का एक स्थिति विशेष या काल विशेष में परिणाम कुछ और होगा तो दूसरे काल विशेष में कुछ और परिणाम होगा।चौदहवीं ईसवी के अंत में भारत की स्थिति अत्यंत ही दयनीय थी। धर्माद्ध मुसलमानों के अत्याचारों से आर्य जाति पीड़ित थी। बंगाल का मुसलमान शासक इतना क्रूर था कि उसने सारे हिन्दुओं के घर लुटवा दिए। हिन्दुओं के पास सिर्फ मिट्टी के बर्तन बचे। उसका कहना था कि हिन्दुओं को अच्छा जीवन जीने का हक नहीं है क्योंकि वे मूर्ति पूजक हैं। वह तो भला हो प्रभु स्वामी जैसे कुछ वैष्णवी महापुरुषों का जो कि बंगाल की धरती पर उदित हुए और उन्होंने इन दुष्टों को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से परास्त कर सारे हिन्दुस्तान को बचा लिया अन्यथा हिन्दुस्तान भी आज अफगानिस्तान और ईरान के समान एक कट्टर और सड़ा-गला इस्लामी राष्ट्र होता।
हिन्दुस्तान का इस्लामीकरण नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और भ्रष्ट पण्डितों ने नहीं रोका है। हिन्दुस्तान को इस्लामीकरण से रोकने में अनेकों महान आध्यात्मिक विभूतियों ने अपने प्राणों तक को न्यौछावर किया है। अध्यात्म ही एकमात्र रास्ता है आसुरी शक्तियों को परास्त करने का।अध्यात्म ही पूर्ण परिवर्तन का मार्ग है अगर किसी नये वंश का उदय करना है, किसी श्रेष्ठ मानव जाति का निर्माण करना है या फिर उच्च अनुवांशिकता को प्रादुर्भाव में लाना है तो फिर उसके पीछे परम वैज्ञानिक ऋषि मस्तिष्कों की ही आवश्यकता होगी। अधिकांशतः क्षत्रिय अग्निकुण्ड से उत्पन्न हुए हैं। सिसोदिया वंश तो राजस्थान में हवन कुण्ड से उत्पन्न किया गया।यही हाल चौहानों का है। इन सबकी विधि है।100 सोम यज्ञ एक वंश में सम्पन्न कर लिए जायें तो उस वंश में भगवान जन्म लेते हैं।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
🙏11👍5👏5🤔1
पूर्ण रहस्यम् (२)
-------------------
भगवान का अवतार उसी वंश में होगा जिस वंश में 100 सोम यज्ञों को सम्पन्न कर लिया गया हो।
श्री वल्लभाचार्य जी राधा के अवतार माने जाते हैं। इन्होंने अपने जीवन में कृष्ण की प्रेममयी आराधना की है। इनकी सात पीढ़ियों में 100 सोम यज्ञों का आयोजन हुआ था और जब इनके पिता ने 100 वे सोम यज्ञ के सम्पन्न हो जाने के उपलक्ष्य में काशी नगरी में जाकर एक लाख ब्राह्मणों को भोजन कराया तब अवतारी वल्लभाचार्य जी का उनके वंश में जन्म हुआ। कुछ भी आसान नहीं है। सात सात पीढ़ियाँ लग जाती हैं शिव आराधना में तब कहीं जाकर गुरुओं का जन्म होता है उस वंश में एक गुरु के पीछे कितना तप कार्य करता है आप इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते। शिव भक्ति ऐसे ही प्राप्त नहीं हो जाती। शिव इतनी जल्दी प्रसन्न थोड़े ही होते हैं। रावण रोज गर्दन काटता रोज शिव को अर्पित करता। शिव तुरंत अपने पार्षद को भेज उसकी गर्दन जुड़वा देते। रावण गर्दन काटता जाता शिव जोड़ते जाते आखिरकार एक दिन प्रसन्न हुए ही।
अगर एक तीर को नीचे से देखोगे तो पहले निचला हिस्सा दिखेगा फिर तीर का अग्र भाग दिखाई देगा। ऊपर से देखोगे तो पहले अग्र भाग दिखाई देगा बाद में निचला हिस्सा। बीच में देखोगे तो तीनों हिस्से दिखाई पड़ेगे। थोड़ी दूरी से देखोगे तो तीर का आकार छोटा दिखाई देगा। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी दृष्टिकोण से देखो कुछ न कुछ हिस्सा पिण्ड का आँखों के सामने नहीं पड़ेगा। दृष्टि में कभी भी गहराई ऊँचाई का लोप विलोप हो सकता है। पंचेन्द्रियों की समस्याऐं बड़ी विचित्र हैं। पंचेन्द्रियों का प्रभाव सीमित है। थोड़ी सी दूरी बढ़ने पर गंध का लोप हो जायेगा। दूरी रंगों को भी लुप्त कर सकती है।
पंचेन्द्रियों के बाद आती है बुद्धि । वह तो इतनी खण्डित और पूर्वाग्रह से ग्रसित है कि कभी भी पूर्णता के साथ कुछ भी नहीं दिखा सकती। यही हाल चेतन एवं अवचेतन मन का भी है। सबसे ज्यादा मुसीबत तर्क कोष की है। सबसे ज्यादा भ्रमित तर्क कोष ही करते हैं। अर्थ का अनर्थ हो जाता है। शब्द भी सीमित हैं। अतः इन सब माध्यमों से पूर्णता की प्राप्ति सम्भव नहीं है। यह जीवन अंशात्मक है। अंश की परम्परा को समझना पड़ेगा। पूर्णता के साथ आप क्या ग्रहण कर पाते हैं? आप एक मिष्ठान खुले में छोड़ दो। कुछ अंश चीटियाँ उठा ले जायेंगी, कुछ अन्य पशु पक्षी उठा ले जायेंगे, बाकी बचा खुचा प्राकृतिक शक्तियाँ ले लेंगी। कुछ सूर्य ले लेंगे, कुछ वायु और कुछ अग्नि ले लेगी। ध्यान रहे जो ले रहे हैं वे भी अंशात्मक ही लेंगे।
गाय ने एक रोटी खाई या चारा खाया। जितना जरूरी था शरीर ने ले लिया। गाय का गोबर भी व्यर्थ नहीं है। उसमें भी अंश मौजूद है। उसे भी अन्य लघु कीट पतंग भक्षण कर लेंगे। गाय के गोबर में से भी पक्षी अपना भोजन ढूंढ लेते हैं। जो गाय ने ग्रहण किया उसका अंश आप पुनः दूध के साथ प्राप्त कर लेंगे। वह अनंत प्रक्रिया है। निरंतर चलती रहेगी। गाय के गोबर से पुनः बहुत कुछ पेड़-पौधे प्राप्त कर लेंगे। उनका भोजन ही गोबर की उर्वरता से बनता है। यह सारा ब्रह्माण्ड अंशात्मक स्थिति पर कायम है। कोई भी व्यक्ति या जीव या पिण्ड अंशात्मक ही ग्रहण कर सकता है। ऐसा कोई पदार्थ, पिण्ड या तत्व नहीं है जो पूर्णता के साथ ग्रहण कर ले। केवल अंश ही चलते हैं। हवन एवं यज्ञादि का मात्र दस प्रतिशत देवता ग्रहण करते हैं इसीलिए दशांस होम होता है। नब्बे प्रतिशत कहाँ गया? इस नब्बे प्रतिशत को । मनुष्य अकेला ग्रहण नहीं कर सकता। जब देव योनि दशांस से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पा रही हैं तो फिर आप और हम जैसे मनुष्य तो एकांश का दसवा हिस्सा भी ग्रहण कर लें तो बहुत बड़ी बात है। यह है शक्ति रहस्य । इसे और अच्छी तरह से अर्धनारीश्वर योग के नाम से जाना जा सकता है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
-------------------
भगवान का अवतार उसी वंश में होगा जिस वंश में 100 सोम यज्ञों को सम्पन्न कर लिया गया हो।
श्री वल्लभाचार्य जी राधा के अवतार माने जाते हैं। इन्होंने अपने जीवन में कृष्ण की प्रेममयी आराधना की है। इनकी सात पीढ़ियों में 100 सोम यज्ञों का आयोजन हुआ था और जब इनके पिता ने 100 वे सोम यज्ञ के सम्पन्न हो जाने के उपलक्ष्य में काशी नगरी में जाकर एक लाख ब्राह्मणों को भोजन कराया तब अवतारी वल्लभाचार्य जी का उनके वंश में जन्म हुआ। कुछ भी आसान नहीं है। सात सात पीढ़ियाँ लग जाती हैं शिव आराधना में तब कहीं जाकर गुरुओं का जन्म होता है उस वंश में एक गुरु के पीछे कितना तप कार्य करता है आप इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते। शिव भक्ति ऐसे ही प्राप्त नहीं हो जाती। शिव इतनी जल्दी प्रसन्न थोड़े ही होते हैं। रावण रोज गर्दन काटता रोज शिव को अर्पित करता। शिव तुरंत अपने पार्षद को भेज उसकी गर्दन जुड़वा देते। रावण गर्दन काटता जाता शिव जोड़ते जाते आखिरकार एक दिन प्रसन्न हुए ही।
अगर एक तीर को नीचे से देखोगे तो पहले निचला हिस्सा दिखेगा फिर तीर का अग्र भाग दिखाई देगा। ऊपर से देखोगे तो पहले अग्र भाग दिखाई देगा बाद में निचला हिस्सा। बीच में देखोगे तो तीनों हिस्से दिखाई पड़ेगे। थोड़ी दूरी से देखोगे तो तीर का आकार छोटा दिखाई देगा। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी दृष्टिकोण से देखो कुछ न कुछ हिस्सा पिण्ड का आँखों के सामने नहीं पड़ेगा। दृष्टि में कभी भी गहराई ऊँचाई का लोप विलोप हो सकता है। पंचेन्द्रियों की समस्याऐं बड़ी विचित्र हैं। पंचेन्द्रियों का प्रभाव सीमित है। थोड़ी सी दूरी बढ़ने पर गंध का लोप हो जायेगा। दूरी रंगों को भी लुप्त कर सकती है।
पंचेन्द्रियों के बाद आती है बुद्धि । वह तो इतनी खण्डित और पूर्वाग्रह से ग्रसित है कि कभी भी पूर्णता के साथ कुछ भी नहीं दिखा सकती। यही हाल चेतन एवं अवचेतन मन का भी है। सबसे ज्यादा मुसीबत तर्क कोष की है। सबसे ज्यादा भ्रमित तर्क कोष ही करते हैं। अर्थ का अनर्थ हो जाता है। शब्द भी सीमित हैं। अतः इन सब माध्यमों से पूर्णता की प्राप्ति सम्भव नहीं है। यह जीवन अंशात्मक है। अंश की परम्परा को समझना पड़ेगा। पूर्णता के साथ आप क्या ग्रहण कर पाते हैं? आप एक मिष्ठान खुले में छोड़ दो। कुछ अंश चीटियाँ उठा ले जायेंगी, कुछ अन्य पशु पक्षी उठा ले जायेंगे, बाकी बचा खुचा प्राकृतिक शक्तियाँ ले लेंगी। कुछ सूर्य ले लेंगे, कुछ वायु और कुछ अग्नि ले लेगी। ध्यान रहे जो ले रहे हैं वे भी अंशात्मक ही लेंगे।
गाय ने एक रोटी खाई या चारा खाया। जितना जरूरी था शरीर ने ले लिया। गाय का गोबर भी व्यर्थ नहीं है। उसमें भी अंश मौजूद है। उसे भी अन्य लघु कीट पतंग भक्षण कर लेंगे। गाय के गोबर में से भी पक्षी अपना भोजन ढूंढ लेते हैं। जो गाय ने ग्रहण किया उसका अंश आप पुनः दूध के साथ प्राप्त कर लेंगे। वह अनंत प्रक्रिया है। निरंतर चलती रहेगी। गाय के गोबर से पुनः बहुत कुछ पेड़-पौधे प्राप्त कर लेंगे। उनका भोजन ही गोबर की उर्वरता से बनता है। यह सारा ब्रह्माण्ड अंशात्मक स्थिति पर कायम है। कोई भी व्यक्ति या जीव या पिण्ड अंशात्मक ही ग्रहण कर सकता है। ऐसा कोई पदार्थ, पिण्ड या तत्व नहीं है जो पूर्णता के साथ ग्रहण कर ले। केवल अंश ही चलते हैं। हवन एवं यज्ञादि का मात्र दस प्रतिशत देवता ग्रहण करते हैं इसीलिए दशांस होम होता है। नब्बे प्रतिशत कहाँ गया? इस नब्बे प्रतिशत को । मनुष्य अकेला ग्रहण नहीं कर सकता। जब देव योनि दशांस से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पा रही हैं तो फिर आप और हम जैसे मनुष्य तो एकांश का दसवा हिस्सा भी ग्रहण कर लें तो बहुत बड़ी बात है। यह है शक्ति रहस्य । इसे और अच्छी तरह से अर्धनारीश्वर योग के नाम से जाना जा सकता है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍20❤5🙏4🥰2
पूर्ण रहस्यम् (३)
-------------------
अघोरता में प्रतिस्पर्धा नहीं चलती। अध्यात्म प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं है। आज का युग बड़ा ही अजीब युग है अगर कोई महाराज हवाई जहाज से उतरते हैं, बड़ी सी कार में चलते हैं या फिर दूरदर्शन पर बकवास करते हैं तो जनता उनके पीछे दौड़ती है परन्तु अगर कोई सिद्ध पुरुष फंटे कपड़े पहने सामने आ जाये तो उसे खाने को एक रोटी भी नहीं मिलती। पहचान न कर पाना ही सबसे बड़ी समस्या बन गई है आजकल। खुद को पहचान लो तो शिव और शक्ति को भी पहचान लोगे। अघोर क्रियाऐं अत्यंत ही गूढ़ होती हैं। नियम धर्म इनमें नहीं चलते। लोक लज्जा इनमें नहीं चलती। सफाई इन क्रियाओं में नहीं दी जाती। अघोरत्व अपनाना है अर्थात आध्यात्मिक बनना है तो फिर प्रमाणीकरण से प्रभावित मत होना। किसी अखबार ने छाप दिया कि फला अच्छा है या फंला बुरा है और आपने उसे मान लिया तो फिर बन चुके आप अघोरी हाँ में हाँ मिलाना छोड़ दो।
क्या पूर्णता एक शब्द है? या फिर सच्चाई है। निश्चित ही पूर्णता सच्चाई है। पूर्णता होती है इसीलिए इसकी बात की जाती है अपूर्णता क्या है? अपूर्णता कुछ नहीं होती। अपूर्णता पूर्णता का हिस्सा है। अगर मैं कहूं आम के फल में तने हैं, पत्तियाँ हैं तो आप कहोगे कि हमें तो नहीं दिख रहीं। आप अपने घर में आम का बीज बो दो तने और पत्ती निकल आयेंगे तो पूर्णता तो आम के फल में है। अपूर्णता यह थी कि एक समय विशेष में आपकी इन्द्रियाँ पत्ते और तने को नहीं देख पा रहीं थी। यह एक सामान्य मस्तिष्क की क्रिया है। यहाँ पर सामान्य मस्तिष्क असफल हो गया। अपूर्णता कालाधीन है। कुछ समय बाद काल बदलेगा और पुनः कालानुसार आपको आम्र वृक्ष आम के बीज में से निकलता हुआ दिखाई देगा। अब सवाल उठता है हाँ और न का क्या करें ? इस सोच से तो हाँ और न दोनों खण्डित हो रहे हैं। वास्तव में हाँ और न के अलावा एक तीसरी स्थिति है तिर्यक अवस्था जब हाँ और न का विलोप हो जाये तो तिर्यक अवस्था प्रादुर्भाव में आती है।
देखो यह केवल मनुष्यों की ही समस्या नहीं है। इस ब्रह्माण्ड में जितने भी मस्तिष्क या उसके समान संरचनाऐं जहाँ-जहाँ भी मौजूद हैं वे सबकी सब हाँ और न के लिए ही प्रशिक्षित हैं ये दो शब्द ही समस्त पंचभूतीय पिण्डों को क्रिया कराने के लिए उपयुक्त हैं हम अपने जीवन का 99 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं दो अवस्थाओं के कारण क्रियाशील करा पाने में सक्षम हैं। मोक्ष होना चाहिए इसीलिए मस्तिष्क को एक विशेष कर्मों को सम्पादित करने के लिए क्रियाशील करो। यह सम्पूर्ण सोच हाँ अर्थात स्वीकारोक्ति के लिए सम्पन्न की गई इसके विपरीत की स्थिति नकारने की स्थिति होगी। अब तिर्यक अवस्था क्या है? एक कथा सुनाता हूँ एक राजा था। वह हाँ, न में जी रहा था। जो भी साधु संत उसके दरबार में जाते वह उनसे एक ही प्रश्न करता क्या तुम मुझे भगवान दिखाओगे? मुँह चलाने वाले साधु संत, प्रवचन करने वाले साधु संत तर्क शास्त्री इत्यादि-इत्यादि कोई भी उसे भगवान नहीं दिखा पाया। उसने सभी को कैद खाने में डलवा दिया।
घूमते-घूमते एक सिद्ध वहाँ पहुँचे। राजा ने वहीं प्रश्न दोहराया और अपनी शर्त भी रखी कैदखाने वाली। सिद्ध ने कंहा आप घोड़े पर बैठो मैं आपकी इच्छा पूरी कर देता हूँ। जैसे ही राजा - घोड़े पर सवार होने लगा सिद्ध ने अपना हाथ राजा के सिर पर रख दिया। राजा उसी क्षण संज्ञा शून्य हो गया। लगातार तीन दिन तक घोड़े पर चुपचाप बैठा रहा। तीन दिन तक तिर्यक अवस्था में रहा। इसे आप समाधिस्थ होना भी कह सकते हैं। सारे कर्म तीन दिन के लिए रुक गये, समय भी तीन दिन के लिए रुक गया। तीन दिन बाद जब तंद्रा टूटी तो उसे लगा अभी एक क्षण पहले की ही बात है। यह है ईश्वर का साक्षात्कार। ब्रह्माण्ड छोटा हो गया, समय का महत्व घट गया, सारी व्यर्थ की क्रियाएं जो कि हाँ न के द्वारा संचालित थीं लोप हो गई बस यही पूर्णता है। ईश्वर के दर्शन रोज-रोज नहीं होते। यह क्षण जीवन का परम दुर्लभ क्षण है। ईश्वर ही पूर्णता है। पूर्णता जीवन में आयेगी। वह कुछ क्षणों के लिए ही आती है। पूर्णता रोज- रोज का खेल नहीं है। रोज-रोज का खेल हाँ और न है। पूर्णता से पूर्णता ही उत्पन्न होगी। पूर्णता पूर्णता में ही विलीन होगी।
शिव शासनत शिव शासनत 🌹
🙏 @Sanatan
-------------------
अघोरता में प्रतिस्पर्धा नहीं चलती। अध्यात्म प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं है। आज का युग बड़ा ही अजीब युग है अगर कोई महाराज हवाई जहाज से उतरते हैं, बड़ी सी कार में चलते हैं या फिर दूरदर्शन पर बकवास करते हैं तो जनता उनके पीछे दौड़ती है परन्तु अगर कोई सिद्ध पुरुष फंटे कपड़े पहने सामने आ जाये तो उसे खाने को एक रोटी भी नहीं मिलती। पहचान न कर पाना ही सबसे बड़ी समस्या बन गई है आजकल। खुद को पहचान लो तो शिव और शक्ति को भी पहचान लोगे। अघोर क्रियाऐं अत्यंत ही गूढ़ होती हैं। नियम धर्म इनमें नहीं चलते। लोक लज्जा इनमें नहीं चलती। सफाई इन क्रियाओं में नहीं दी जाती। अघोरत्व अपनाना है अर्थात आध्यात्मिक बनना है तो फिर प्रमाणीकरण से प्रभावित मत होना। किसी अखबार ने छाप दिया कि फला अच्छा है या फंला बुरा है और आपने उसे मान लिया तो फिर बन चुके आप अघोरी हाँ में हाँ मिलाना छोड़ दो।
क्या पूर्णता एक शब्द है? या फिर सच्चाई है। निश्चित ही पूर्णता सच्चाई है। पूर्णता होती है इसीलिए इसकी बात की जाती है अपूर्णता क्या है? अपूर्णता कुछ नहीं होती। अपूर्णता पूर्णता का हिस्सा है। अगर मैं कहूं आम के फल में तने हैं, पत्तियाँ हैं तो आप कहोगे कि हमें तो नहीं दिख रहीं। आप अपने घर में आम का बीज बो दो तने और पत्ती निकल आयेंगे तो पूर्णता तो आम के फल में है। अपूर्णता यह थी कि एक समय विशेष में आपकी इन्द्रियाँ पत्ते और तने को नहीं देख पा रहीं थी। यह एक सामान्य मस्तिष्क की क्रिया है। यहाँ पर सामान्य मस्तिष्क असफल हो गया। अपूर्णता कालाधीन है। कुछ समय बाद काल बदलेगा और पुनः कालानुसार आपको आम्र वृक्ष आम के बीज में से निकलता हुआ दिखाई देगा। अब सवाल उठता है हाँ और न का क्या करें ? इस सोच से तो हाँ और न दोनों खण्डित हो रहे हैं। वास्तव में हाँ और न के अलावा एक तीसरी स्थिति है तिर्यक अवस्था जब हाँ और न का विलोप हो जाये तो तिर्यक अवस्था प्रादुर्भाव में आती है।
देखो यह केवल मनुष्यों की ही समस्या नहीं है। इस ब्रह्माण्ड में जितने भी मस्तिष्क या उसके समान संरचनाऐं जहाँ-जहाँ भी मौजूद हैं वे सबकी सब हाँ और न के लिए ही प्रशिक्षित हैं ये दो शब्द ही समस्त पंचभूतीय पिण्डों को क्रिया कराने के लिए उपयुक्त हैं हम अपने जीवन का 99 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं दो अवस्थाओं के कारण क्रियाशील करा पाने में सक्षम हैं। मोक्ष होना चाहिए इसीलिए मस्तिष्क को एक विशेष कर्मों को सम्पादित करने के लिए क्रियाशील करो। यह सम्पूर्ण सोच हाँ अर्थात स्वीकारोक्ति के लिए सम्पन्न की गई इसके विपरीत की स्थिति नकारने की स्थिति होगी। अब तिर्यक अवस्था क्या है? एक कथा सुनाता हूँ एक राजा था। वह हाँ, न में जी रहा था। जो भी साधु संत उसके दरबार में जाते वह उनसे एक ही प्रश्न करता क्या तुम मुझे भगवान दिखाओगे? मुँह चलाने वाले साधु संत, प्रवचन करने वाले साधु संत तर्क शास्त्री इत्यादि-इत्यादि कोई भी उसे भगवान नहीं दिखा पाया। उसने सभी को कैद खाने में डलवा दिया।
घूमते-घूमते एक सिद्ध वहाँ पहुँचे। राजा ने वहीं प्रश्न दोहराया और अपनी शर्त भी रखी कैदखाने वाली। सिद्ध ने कंहा आप घोड़े पर बैठो मैं आपकी इच्छा पूरी कर देता हूँ। जैसे ही राजा - घोड़े पर सवार होने लगा सिद्ध ने अपना हाथ राजा के सिर पर रख दिया। राजा उसी क्षण संज्ञा शून्य हो गया। लगातार तीन दिन तक घोड़े पर चुपचाप बैठा रहा। तीन दिन तक तिर्यक अवस्था में रहा। इसे आप समाधिस्थ होना भी कह सकते हैं। सारे कर्म तीन दिन के लिए रुक गये, समय भी तीन दिन के लिए रुक गया। तीन दिन बाद जब तंद्रा टूटी तो उसे लगा अभी एक क्षण पहले की ही बात है। यह है ईश्वर का साक्षात्कार। ब्रह्माण्ड छोटा हो गया, समय का महत्व घट गया, सारी व्यर्थ की क्रियाएं जो कि हाँ न के द्वारा संचालित थीं लोप हो गई बस यही पूर्णता है। ईश्वर के दर्शन रोज-रोज नहीं होते। यह क्षण जीवन का परम दुर्लभ क्षण है। ईश्वर ही पूर्णता है। पूर्णता जीवन में आयेगी। वह कुछ क्षणों के लिए ही आती है। पूर्णता रोज- रोज का खेल नहीं है। रोज-रोज का खेल हाँ और न है। पूर्णता से पूर्णता ही उत्पन्न होगी। पूर्णता पूर्णता में ही विलीन होगी।
शिव शासनत शिव शासनत 🌹
🙏 @Sanatan
👍12❤3🙏1
शिव तंत्र
------------
शिव सर्वसुलभ एवं सर्वव्याप्त हैं। सर्वसुलभ एवं सर्वव्याप्त वही हो सकता है जो कि विशुद्ध हो। इस पृथ्वी पर किसी बात की कमी है तो वह है विशुद्धता की। विशुद्धता इस भूमण्डल पर अल्पकालीन ही रहती है। इसका मुख्य कारण पृथ्वी पर गोचर जीवन की प्रचुरता से है। गोचरता तभी सम्भव है जब मिलन एवं योग की प्रक्रिया अत्यन्त ही तीव्रगामी हो। यहां पर सभी तत्वों एवं पदार्थों की न्यून से न्यून आवृत्तियां भी एक क्षण के लिये एकाकी नहीं रह पाती हैं। उनकी प्रकृति ही दूसरे तत्व से मिलन एवं योग की है। इसी कारणवश असंख्यों जीव-जंतु, वनस्पति, पदार्थ, रत्न इत्यादि प्रकट होते ही रहते हैं। जीवन की इतनी भिन्नता ब्रह्माण्ड के अन्य स्थलों पर देखने को नहीं मिलती है। भिन्न-भिन्न पशुओं के मिलन से नई प्रजातियां उत्पन्न होती हैं, पशुओं एवं वनस्पति के मिलन से कुछ और नया दृष्टिगोचर होता है और यहां तक कि मनुष्य और पशु के मिलन से या फिर मनुष्य एवं वनस्पति के मिलन से कुछ नया ही निर्मित हो जाता है। मिलन का तात्पर्य केवल सम्भोग ही नहीं है।
आप देखेंगे कि मनुष्य की एक विशेष जाति सदियों से विशेष वनस्पतिों का सेवन करती रहती है जिससे कि उस जाति विशेष के मनुष्य अन्य जातियों से भिन्न गुणों से युक्त हो जाते हैं। ऐसा ही मांस भक्षण के कारण भी मनुष्यों में होता है। यह प्रक्रिया सार्वभौमिक है इसीलिये तीव्र परिवर्तन इस पृथ्वी की नियति है । आज मनुष्य के जिस स्वरूप को आप देख रहे हैं वह 500 वर्ष पहले नहीं था और 500 वर्ष बाद भी कुछ और होगा। 500 वर्ष के इस अंतराल में मनुष्य मस्तिष्कीय क्षमतायें लोप हो जाती हैं तो वहीं अन्य क्षमताओं का भी प्रादुर्भाव सामने आ जाता है।मस्तिष्क का आकार- प्रकार,आयतन, विशिष्टतायें,क्षमतायें पूर्ण रूप से परिवर्तनीय हैं अतः इन्द्रिय क्षमतायें भी परिवर्तित होती रहती हैं। इसी कारणवश शारीरिक संरचनायें भी जीव में निरंतर परिवर्तित होती रहती है।परिवर्तन की तीव्रता के कारण अशुद्धता तो निश्चित तौर पर आयेगी ।
ब्रह्माण्ड के अन्य स्थलों पर पंच आयामी जीवन न्यून है।पंच आयामी जीवन की न्यूनता के कारण ही वहां पर विशुद्धता पृथ्वी की अपेक्षा ज्यादा है।जल की विशुद्ध अवस्था पृथ्वी पर दुर्लभ है।यहां तो महासागर रूपी जल 70 प्रतिशत स्थान को घेरे हुऐ है इस जल में न जाने क्या-क्या मिश्रित है।मिश्रण ही पृथ्वी की पहचान है अगर इसे संयोजना की भूमि कहा जाय तो ज्यादा उपयुक्त होगा इसीलिये गोचर जीवन में मिश्रण या मिलन की अंधी प्रक्रिया प्राकृतिक गुण है यही पृथ्वी के जीवों की विडम्बना है परन्तु विशुद्धता मूल में है।शिवत्व केन्द्र बिंदु है।इस बिंदु तक पहुँचकर ही मिलन से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।मिलन पूर्ण रूप से भौतिकवाद का आधार है इसीलिए पशु से लेकर मनुष्य और वनस्पति तक भौतिक रूप से कुछ प्राप्त करने में ही अपने जीवन की समस्त ऊर्जा नष्ट कर देते हैं।माया का यह आवरण अत्यंत ही शक्तिशाली है।इसे भेदकर ही शिव सानिध्य प्राप्त किया जा सकता है यही एक मात्र रास्ता है।
भौतिकवाद और साधना एक साथ नहीं चल सकते यह पृथ्वी अगर चल रही है तो केवल शिव साधकों के कारण जिस दिन शिव साधक खत्म हो जायेंगे उस दिन पृथ्वी पर गोचर जीवन भी समाप्त हो जायेगा।कुछ प्राप्त करने की लालसा,लेन-देन का गणित,सौदेबाजी से केवल हिंसा,प्रतिस्पर्धा,द्वेष,द्वंद इत्यादि-इत्यादि रूपों में मात्र विष ही उत्पन्न होता है। यह विष इतना तीक्ष्ण है कि अगर शिव साधक रूपी शक्तियां इनका पान न करें तो सभी खत्म हो जायेंगे। शिव साधक का तात्पर्य ठीक उसी प्रकार से जीवन यापन करना है जिस प्रकार देवाधिदेव शंभु करते हैं। शिवलिङ्ग और ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में वे विभिन्न स्थानों पर प्रतिष्ठित हो अनेको प्रकार के दैव दुर्लभ उत्सर्जन से समस्त जीवों का कल्याण करते रहते हैं बदले में सिर्फ जल, धतूरा,बिल्व या आक के पुष्प ही मांगते हैं। इतनी साधारण वस्तुयें उन्हें अर्पित करनी पड़ती है।
शिव पदलोलुप नहीं हैं,सिंहासन पर वे कतई विराजमान नहीं होते हैं।उनका पूजन सबसे सरल और सबसे आसान है।उनके पूजन में न श्रंगार की जरूरत है, न ही स्वर्ण और रत्नजड़ित हारों की या विशेष वस्त्रों की। प्रत्येक जीव उनकी उपासना कर सकता है किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं है। शिव के अलावा कौन सा और देव स्वयं प्रकट होता है या स्वयंभू है। उनके देवालय सादगीपूर्ण होते हैं और अगर भूलवश या प्रेमवश कभी किसी ने उन्हें रत्नजड़ित कर भी दिया है तो उन्होंने स्वयं ही आडम्बरों को किसी न किसी तरह से हटवा ही दिया है। शिव जो कि त्रिकूट पर्वत पर बनी सोने की लंका विशर्वा को दान दे सकतें हैं तो फिर वह सोमनाथ स्थित ज्योतिर्लिङ्ग में लगे रत्नों को भी लुटा सकते हैं। सोमनाथ से दो कौड़ी के रत्न जा सकते हैं परन्तु ज्योतिर्लिङ्ग की असंख्य रत्नों से
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
------------
शिव सर्वसुलभ एवं सर्वव्याप्त हैं। सर्वसुलभ एवं सर्वव्याप्त वही हो सकता है जो कि विशुद्ध हो। इस पृथ्वी पर किसी बात की कमी है तो वह है विशुद्धता की। विशुद्धता इस भूमण्डल पर अल्पकालीन ही रहती है। इसका मुख्य कारण पृथ्वी पर गोचर जीवन की प्रचुरता से है। गोचरता तभी सम्भव है जब मिलन एवं योग की प्रक्रिया अत्यन्त ही तीव्रगामी हो। यहां पर सभी तत्वों एवं पदार्थों की न्यून से न्यून आवृत्तियां भी एक क्षण के लिये एकाकी नहीं रह पाती हैं। उनकी प्रकृति ही दूसरे तत्व से मिलन एवं योग की है। इसी कारणवश असंख्यों जीव-जंतु, वनस्पति, पदार्थ, रत्न इत्यादि प्रकट होते ही रहते हैं। जीवन की इतनी भिन्नता ब्रह्माण्ड के अन्य स्थलों पर देखने को नहीं मिलती है। भिन्न-भिन्न पशुओं के मिलन से नई प्रजातियां उत्पन्न होती हैं, पशुओं एवं वनस्पति के मिलन से कुछ और नया दृष्टिगोचर होता है और यहां तक कि मनुष्य और पशु के मिलन से या फिर मनुष्य एवं वनस्पति के मिलन से कुछ नया ही निर्मित हो जाता है। मिलन का तात्पर्य केवल सम्भोग ही नहीं है।
आप देखेंगे कि मनुष्य की एक विशेष जाति सदियों से विशेष वनस्पतिों का सेवन करती रहती है जिससे कि उस जाति विशेष के मनुष्य अन्य जातियों से भिन्न गुणों से युक्त हो जाते हैं। ऐसा ही मांस भक्षण के कारण भी मनुष्यों में होता है। यह प्रक्रिया सार्वभौमिक है इसीलिये तीव्र परिवर्तन इस पृथ्वी की नियति है । आज मनुष्य के जिस स्वरूप को आप देख रहे हैं वह 500 वर्ष पहले नहीं था और 500 वर्ष बाद भी कुछ और होगा। 500 वर्ष के इस अंतराल में मनुष्य मस्तिष्कीय क्षमतायें लोप हो जाती हैं तो वहीं अन्य क्षमताओं का भी प्रादुर्भाव सामने आ जाता है।मस्तिष्क का आकार- प्रकार,आयतन, विशिष्टतायें,क्षमतायें पूर्ण रूप से परिवर्तनीय हैं अतः इन्द्रिय क्षमतायें भी परिवर्तित होती रहती हैं। इसी कारणवश शारीरिक संरचनायें भी जीव में निरंतर परिवर्तित होती रहती है।परिवर्तन की तीव्रता के कारण अशुद्धता तो निश्चित तौर पर आयेगी ।
ब्रह्माण्ड के अन्य स्थलों पर पंच आयामी जीवन न्यून है।पंच आयामी जीवन की न्यूनता के कारण ही वहां पर विशुद्धता पृथ्वी की अपेक्षा ज्यादा है।जल की विशुद्ध अवस्था पृथ्वी पर दुर्लभ है।यहां तो महासागर रूपी जल 70 प्रतिशत स्थान को घेरे हुऐ है इस जल में न जाने क्या-क्या मिश्रित है।मिश्रण ही पृथ्वी की पहचान है अगर इसे संयोजना की भूमि कहा जाय तो ज्यादा उपयुक्त होगा इसीलिये गोचर जीवन में मिश्रण या मिलन की अंधी प्रक्रिया प्राकृतिक गुण है यही पृथ्वी के जीवों की विडम्बना है परन्तु विशुद्धता मूल में है।शिवत्व केन्द्र बिंदु है।इस बिंदु तक पहुँचकर ही मिलन से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।मिलन पूर्ण रूप से भौतिकवाद का आधार है इसीलिए पशु से लेकर मनुष्य और वनस्पति तक भौतिक रूप से कुछ प्राप्त करने में ही अपने जीवन की समस्त ऊर्जा नष्ट कर देते हैं।माया का यह आवरण अत्यंत ही शक्तिशाली है।इसे भेदकर ही शिव सानिध्य प्राप्त किया जा सकता है यही एक मात्र रास्ता है।
भौतिकवाद और साधना एक साथ नहीं चल सकते यह पृथ्वी अगर चल रही है तो केवल शिव साधकों के कारण जिस दिन शिव साधक खत्म हो जायेंगे उस दिन पृथ्वी पर गोचर जीवन भी समाप्त हो जायेगा।कुछ प्राप्त करने की लालसा,लेन-देन का गणित,सौदेबाजी से केवल हिंसा,प्रतिस्पर्धा,द्वेष,द्वंद इत्यादि-इत्यादि रूपों में मात्र विष ही उत्पन्न होता है। यह विष इतना तीक्ष्ण है कि अगर शिव साधक रूपी शक्तियां इनका पान न करें तो सभी खत्म हो जायेंगे। शिव साधक का तात्पर्य ठीक उसी प्रकार से जीवन यापन करना है जिस प्रकार देवाधिदेव शंभु करते हैं। शिवलिङ्ग और ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में वे विभिन्न स्थानों पर प्रतिष्ठित हो अनेको प्रकार के दैव दुर्लभ उत्सर्जन से समस्त जीवों का कल्याण करते रहते हैं बदले में सिर्फ जल, धतूरा,बिल्व या आक के पुष्प ही मांगते हैं। इतनी साधारण वस्तुयें उन्हें अर्पित करनी पड़ती है।
शिव पदलोलुप नहीं हैं,सिंहासन पर वे कतई विराजमान नहीं होते हैं।उनका पूजन सबसे सरल और सबसे आसान है।उनके पूजन में न श्रंगार की जरूरत है, न ही स्वर्ण और रत्नजड़ित हारों की या विशेष वस्त्रों की। प्रत्येक जीव उनकी उपासना कर सकता है किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं है। शिव के अलावा कौन सा और देव स्वयं प्रकट होता है या स्वयंभू है। उनके देवालय सादगीपूर्ण होते हैं और अगर भूलवश या प्रेमवश कभी किसी ने उन्हें रत्नजड़ित कर भी दिया है तो उन्होंने स्वयं ही आडम्बरों को किसी न किसी तरह से हटवा ही दिया है। शिव जो कि त्रिकूट पर्वत पर बनी सोने की लंका विशर्वा को दान दे सकतें हैं तो फिर वह सोमनाथ स्थित ज्योतिर्लिङ्ग में लगे रत्नों को भी लुटा सकते हैं। सोमनाथ से दो कौड़ी के रत्न जा सकते हैं परन्तु ज्योतिर्लिङ्ग की असंख्य रत्नों से
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍8🙏6❤5👏1