पुनर्जन्म रहस्यम् (५)
कर्मों के क्षय होने पर योग्यतानुसार इस पृथ्वी पर उच्च कुलों में प्रादुर्भाव लेते हैं।
स्वर्ग भी कई प्रकार के हैं। आनंद भी कई प्रकार के हैं। कुछ आनंदों की पूर्ति के लिए तो पृथ्वी लोक ही उपयुक्त है। अनेकों प्रकार के वैभवशाली भोग तो पृथ्वी लोक पर ही सम्पन्न किये जा सकते हैं। देना ईश्वर का कार्य है माँगना आपका कार्य है। जो मागोगे वह आपको मिलेगा। आप चाहते हों कि हमारे पास परम सुन्दरियाँ हों, भोग के लिए खूब पैसा हो तो ऐसा भी इस पृथ्वी पर मिल जाता है कोई बड़ी बात नहीं है। बस आप उस प्रकार के कर्म सम्पन्न कर लीजिए जिन्हे ईश्वर ने इन पारितोषिकों के लिए निमित्त ने कहा किया है। मुख्य रूप से संकल्प शक्ति ही मनुष्य को नव जीवन प्रदान करने का कारण है।
प्रभु श्री कृष्ण है कि जो मृत्यु के समय मुझे भजता है वह मुझमें लीन हो जाता है और जो मृत्यु के समय जैसी आंकाक्षा रखता है, उसके भाव जैसे होते हैं उसका जन्म भी उसी प्रकार से होता है। अगर किसी व्यक्ति की हत्या होती है तो मृत्यु के समय उसके मन में बदले के भाव होते हैं। ईश्वर तुरंत ही उस व्यक्ति को हत्यारे के घर में या उसके आस-पास जन्म दे देगा और हत्या हुए व्यक्ति को पूरी छूट होगी अपने अपराधी से दण्ड वसूल करने की। अधिकांशत: मनुष्य मृत्यु पश्चात् स्वयं के कुल में ही जन्म लेते हैं। उनकी आत्मायें बहुत ज्यादा दूर नहीं जाती हैं। इसीलिए पूर्व जन्म की स्मृतियां विस्मृत कर दी जाती हैं। एक झीना सा आवरण डाल दिया जाता है। नहीं तो कर्म सम्पादित नहीं हो पायेंगे।
एक जन्म के रिश्ते तो हम निभ्रा नहीं पाते हैं पूर्व जन्म के रिश्ते हम क्या निभायेंगें। अगर हमें मालुम चल जाये कि सामने खड़े जिस व्यक्ति को हम दुत्कार रहें हैं वह पूर्व जन्म में हमारा पिता था या सामने खड़ी स्त्री जो कि हमें अकारण ही कष्ट दे रही है वह पूर्व जन्म में हमारी पत्नी थी तो फिर हम कर्म सम्पादित नहीं कर पायेंगे। कर्म बंधनों से हमारी मुक्ति नहीं हो पायेगी। फिर भी अध्यात्म के पथ पर चले साधकों को पूर्व जन्म तो अवश्य ही मालुम करना पड़ेगा। साक्षी भाव सब कुछ देखना पड़ेगा। तभी वह एक विलक्षण पुरुष बन पायेगा एवं निर्लिस भाव से सारी लीलाओं को झेल पायेगा। यह एक प्रकार से दूसरी दुनिया का निर्माण होगा सामान्य दुनिया से बिल्कुल भिन्न । एक नये व्यक्तित्व का उदय होगा ठीक बुद्ध के समान जब वे ज्ञान प्राप्त कर लौटे तो फिर पत्नी शिष्या हो गई और पुत्र भी शिष्य हो गया। कल तक जो पुत्र और पत्नी थे आज वे शिष्य हो गये। सब कुछ बदल गया।
ज्ञान प्राप्ति विशेष रूप से पुनर्जन्म ज्ञान नये व्यक्तित्व का उदय है। हम मूर्च्छित हैं। मूर्च्छित व्यक्ति क्या जाने रिश्तों को। मूर्च्छित व्यक्ति तो जड़ है। मूर्च्छा के विभिन्न तल हैं। कभी मानस मूर्च्छित होता है, कभी चेतना मूर्च्छित होती है। कभी हमारा बीता हुआ काल भी मूर्च्छित होता है। हमें उठना ही होगा लक्ष्मण के समान संजीवनी हमें सूंघनी ही होगी। नहीं तो राम रोते रहेंगे और लक्ष्मण मूर्च्छित भाव से पड़ा होगा। क्या कभी चैतन्य अवस्था मे लक्ष्मण राम को विलाप करते हुए देख सकता है कदापि नहीं। कभी-कभी तो आघात के कारण हम अपनी वर्तमान की स्मृति भी खो बैठते हैं। हम स्वयं को पहचानने से इन्कार कर देते हैं अपना नाम भूल जाते हैं। क्या मृत्यु एक आघात है? जो हमें हमारा पूर्व जन्म भुला देती है। निश्चित ही मृत्यु एक आघात है। आघात से ही मूर्च्छा उत्पन्न होगी। मूर्च्छा को दूर करेगी संजीवनी आघात को भरेगी संजीवनी।
प्रभु का ध्यान, गुरु का आशीर्वाद, गुरु की दीक्षा ही संजीवनी है। सद्मार्ग, ईश्वर अनुष्ठान ही उपचार है आघातों का और आघातों के जाने के पश्चात् ही पुनर्जन्म का वृत्तान्त सामने आयेगा। इस बात को साधक अच्छी तरह से समझ लें। एक बार नांथ योगी गोरक्षनाथ एक दूसरे नाथ योगी के सामने पहुँचे। उन्हें देह सिद्धि थी। गोरक्षनाथ ने कहा मुझे भी देह सिद्धि है आप मेरे शरीर पर वज्र से प्रहार कीजिए मेरा कुछ नहीं होगा। महायोगी ने गोरक्षनाथ के शरीर पर खड्ग से प्रहार किया सिर्फ ध्वनि उत्पन्न हुई पर उनके शरीर का कुछ नहीं हुआ। तत्पश्चात् महायोगी ने गोरक्षनाथ से कहा आप अब मेरे शरीर पर तलवार से प्रहार कीजिए ध्वनि भी उत्पन्न नहीं होगी। जैसे ही गोरक्षनाथ ने प्रहार किया ध्वनि भी उत्पन्न नहीं हुई। तलवार किसी वस्तु से टकराई ही नहीं गोरक्षनाथ दंग रह गये तुरंत ही महानाथ के चरण पकड़ लिए। पानी में तलवार मारो पानी अलग नहीं होगा। लकड़ी पर तलवार मारोगे तो लकड़ी कट जायेगी।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
कर्मों के क्षय होने पर योग्यतानुसार इस पृथ्वी पर उच्च कुलों में प्रादुर्भाव लेते हैं।
स्वर्ग भी कई प्रकार के हैं। आनंद भी कई प्रकार के हैं। कुछ आनंदों की पूर्ति के लिए तो पृथ्वी लोक ही उपयुक्त है। अनेकों प्रकार के वैभवशाली भोग तो पृथ्वी लोक पर ही सम्पन्न किये जा सकते हैं। देना ईश्वर का कार्य है माँगना आपका कार्य है। जो मागोगे वह आपको मिलेगा। आप चाहते हों कि हमारे पास परम सुन्दरियाँ हों, भोग के लिए खूब पैसा हो तो ऐसा भी इस पृथ्वी पर मिल जाता है कोई बड़ी बात नहीं है। बस आप उस प्रकार के कर्म सम्पन्न कर लीजिए जिन्हे ईश्वर ने इन पारितोषिकों के लिए निमित्त ने कहा किया है। मुख्य रूप से संकल्प शक्ति ही मनुष्य को नव जीवन प्रदान करने का कारण है।
प्रभु श्री कृष्ण है कि जो मृत्यु के समय मुझे भजता है वह मुझमें लीन हो जाता है और जो मृत्यु के समय जैसी आंकाक्षा रखता है, उसके भाव जैसे होते हैं उसका जन्म भी उसी प्रकार से होता है। अगर किसी व्यक्ति की हत्या होती है तो मृत्यु के समय उसके मन में बदले के भाव होते हैं। ईश्वर तुरंत ही उस व्यक्ति को हत्यारे के घर में या उसके आस-पास जन्म दे देगा और हत्या हुए व्यक्ति को पूरी छूट होगी अपने अपराधी से दण्ड वसूल करने की। अधिकांशत: मनुष्य मृत्यु पश्चात् स्वयं के कुल में ही जन्म लेते हैं। उनकी आत्मायें बहुत ज्यादा दूर नहीं जाती हैं। इसीलिए पूर्व जन्म की स्मृतियां विस्मृत कर दी जाती हैं। एक झीना सा आवरण डाल दिया जाता है। नहीं तो कर्म सम्पादित नहीं हो पायेंगे।
एक जन्म के रिश्ते तो हम निभ्रा नहीं पाते हैं पूर्व जन्म के रिश्ते हम क्या निभायेंगें। अगर हमें मालुम चल जाये कि सामने खड़े जिस व्यक्ति को हम दुत्कार रहें हैं वह पूर्व जन्म में हमारा पिता था या सामने खड़ी स्त्री जो कि हमें अकारण ही कष्ट दे रही है वह पूर्व जन्म में हमारी पत्नी थी तो फिर हम कर्म सम्पादित नहीं कर पायेंगे। कर्म बंधनों से हमारी मुक्ति नहीं हो पायेगी। फिर भी अध्यात्म के पथ पर चले साधकों को पूर्व जन्म तो अवश्य ही मालुम करना पड़ेगा। साक्षी भाव सब कुछ देखना पड़ेगा। तभी वह एक विलक्षण पुरुष बन पायेगा एवं निर्लिस भाव से सारी लीलाओं को झेल पायेगा। यह एक प्रकार से दूसरी दुनिया का निर्माण होगा सामान्य दुनिया से बिल्कुल भिन्न । एक नये व्यक्तित्व का उदय होगा ठीक बुद्ध के समान जब वे ज्ञान प्राप्त कर लौटे तो फिर पत्नी शिष्या हो गई और पुत्र भी शिष्य हो गया। कल तक जो पुत्र और पत्नी थे आज वे शिष्य हो गये। सब कुछ बदल गया।
ज्ञान प्राप्ति विशेष रूप से पुनर्जन्म ज्ञान नये व्यक्तित्व का उदय है। हम मूर्च्छित हैं। मूर्च्छित व्यक्ति क्या जाने रिश्तों को। मूर्च्छित व्यक्ति तो जड़ है। मूर्च्छा के विभिन्न तल हैं। कभी मानस मूर्च्छित होता है, कभी चेतना मूर्च्छित होती है। कभी हमारा बीता हुआ काल भी मूर्च्छित होता है। हमें उठना ही होगा लक्ष्मण के समान संजीवनी हमें सूंघनी ही होगी। नहीं तो राम रोते रहेंगे और लक्ष्मण मूर्च्छित भाव से पड़ा होगा। क्या कभी चैतन्य अवस्था मे लक्ष्मण राम को विलाप करते हुए देख सकता है कदापि नहीं। कभी-कभी तो आघात के कारण हम अपनी वर्तमान की स्मृति भी खो बैठते हैं। हम स्वयं को पहचानने से इन्कार कर देते हैं अपना नाम भूल जाते हैं। क्या मृत्यु एक आघात है? जो हमें हमारा पूर्व जन्म भुला देती है। निश्चित ही मृत्यु एक आघात है। आघात से ही मूर्च्छा उत्पन्न होगी। मूर्च्छा को दूर करेगी संजीवनी आघात को भरेगी संजीवनी।
प्रभु का ध्यान, गुरु का आशीर्वाद, गुरु की दीक्षा ही संजीवनी है। सद्मार्ग, ईश्वर अनुष्ठान ही उपचार है आघातों का और आघातों के जाने के पश्चात् ही पुनर्जन्म का वृत्तान्त सामने आयेगा। इस बात को साधक अच्छी तरह से समझ लें। एक बार नांथ योगी गोरक्षनाथ एक दूसरे नाथ योगी के सामने पहुँचे। उन्हें देह सिद्धि थी। गोरक्षनाथ ने कहा मुझे भी देह सिद्धि है आप मेरे शरीर पर वज्र से प्रहार कीजिए मेरा कुछ नहीं होगा। महायोगी ने गोरक्षनाथ के शरीर पर खड्ग से प्रहार किया सिर्फ ध्वनि उत्पन्न हुई पर उनके शरीर का कुछ नहीं हुआ। तत्पश्चात् महायोगी ने गोरक्षनाथ से कहा आप अब मेरे शरीर पर तलवार से प्रहार कीजिए ध्वनि भी उत्पन्न नहीं होगी। जैसे ही गोरक्षनाथ ने प्रहार किया ध्वनि भी उत्पन्न नहीं हुई। तलवार किसी वस्तु से टकराई ही नहीं गोरक्षनाथ दंग रह गये तुरंत ही महानाथ के चरण पकड़ लिए। पानी में तलवार मारो पानी अलग नहीं होगा। लकड़ी पर तलवार मारोगे तो लकड़ी कट जायेगी।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍11
पुनर्जन्म रहस्यम् (६)
जब जीवन पानी के समान होगा आघात विहीन तब फिर पूर्व जन्म और वर्तमान में फर्क ही नहीं होगा परन्तु अगर जीवन शैली लकड़ी की भाँति होगी तो फिर पूर्वजन्म भूल जाओगे। आपको जीवन में ऐसे चेहरे मिलेगें जिन्हें देखकर अपनापन लगेगा। ऐसे व्यक्ति मिलेगें जिनसे बात करके मालुम पड़ेगा कि इनसे पता नहीं कब से सम्बन्ध हैं। कहीं कुछ ऐसा पढ़ोगे तो ऐसा लगेगा कि ये तो हमें मालुम है, यह तो वही विचार है जो हमारे हृदय में भी उत्पन्न होता है। मनुष्य भटकता है क्यों? कौन भटकाता है जीवन में असंख्य नरमुण्डों के बीच रहने के बाद भी वह कुछ तलाशता रहता है। कुछ भूले बिसरे चेहरे निरंतर हमारा मानस जीवन के अंतिम समय तक कहीं कुछ ढूँढ़ता रहता है। हम ढूँढ़ते रहते हैं अपने आदि अनंत सम्बन्धों को जब हम प्रथम बार इस सृष्टि पर उदित हुए थे तो हमारे साथ कौन-कौन थे? उन्हें ही हम ढूँढ़ते रहते हैं। कौन थी हमारी आदि पत्नी ? कौन था हमारा प्रथम आदि पिता? कौन थी हमारी प्रथम आदि माता ? कौन थे हमारे प्रथम आदि गुरु ? जब तक ये नहीं मिल जाते, जब तक हम इनसे साक्षात्कार नहीं कर लेते चाहे ये किसी भी रूप में क्यों न हो हम संतुष्ट नहीं हो सकते। हमारी आत्मा की भूख नहीं मिट सकती। हमारे सम्बन्ध पूर्ण नहीं हो सकते। हम मुक्त नहीं हो सकते।
बालक माता की गोद में ही शांत होता है, पिता को देखकर ही खुश होता है। पत्नी ही उसकी वास्तविक अर्धांगिनी होती है। मित्र ही उसके साथ बतियाते हैं वास्तव में । वास्तव में ही सब कुछ होना चाहिए। वास्तव ही समृद्धिकारक है। वास्तव ही पूर्णता देता है। संतुष्टि और पूर्णता में जमीन आसमान का फर्क है। पूर्णता ही आत्मा की शक्ति है। पूर्णता ही आत्मा को सबल करती है। संतुष्टि मन बहलाने की क्रिया है। समय काटने की प्रक्रिया है संतुष्टि तो रोज उगती है रोज मिटती है परन्तु पूर्णता वास्तव देती है। उसके बाद संतुष्टि की मृत्यु हो जाती है। जब तक वास्तविक पत्नी नहीं मिलती मन का भटकना तो निश्चित् है चाहे एक जन्म लगे या सौ जन्म और जब तक वास्तविक गुरु नहीं मिलता गुरु घंटालों से दिल बहलाया जा सकता है। यही है पुनर्जन्म की खोज । वास्तविक वास्तविक है और नकलीनकली। समझौता मत कीजिए। साधकों को समय को लात मारकर दूर फेंक देना चाहिए। असफलता के शब्द साधक के मुख पर नहीं आने चाहिए। यह घटिया मस्तिष्क की पहचान है। असफलता शब्द को चुनौती शब्द में परिवर्तित कर दिजिए। असफलता की मृत्यु हो जायेगी। असफलता काल के अधीन है। चुनौती महाकाल का विषय है। महाकाल ही कालजयी है। अपने अंदर बैठे आदि पुरुष को पहचानना ही पुनर्जन्म विज्ञान का मूल तत्व है। जब स्वयं के अंदर स्थित आदि पुरुष को पहचान जाऐगे तो साक्षात आप के सामने आदि माता, आदि पिता और आदि गुरु खड़े होंगे। बस इतना ही।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
जब जीवन पानी के समान होगा आघात विहीन तब फिर पूर्व जन्म और वर्तमान में फर्क ही नहीं होगा परन्तु अगर जीवन शैली लकड़ी की भाँति होगी तो फिर पूर्वजन्म भूल जाओगे। आपको जीवन में ऐसे चेहरे मिलेगें जिन्हें देखकर अपनापन लगेगा। ऐसे व्यक्ति मिलेगें जिनसे बात करके मालुम पड़ेगा कि इनसे पता नहीं कब से सम्बन्ध हैं। कहीं कुछ ऐसा पढ़ोगे तो ऐसा लगेगा कि ये तो हमें मालुम है, यह तो वही विचार है जो हमारे हृदय में भी उत्पन्न होता है। मनुष्य भटकता है क्यों? कौन भटकाता है जीवन में असंख्य नरमुण्डों के बीच रहने के बाद भी वह कुछ तलाशता रहता है। कुछ भूले बिसरे चेहरे निरंतर हमारा मानस जीवन के अंतिम समय तक कहीं कुछ ढूँढ़ता रहता है। हम ढूँढ़ते रहते हैं अपने आदि अनंत सम्बन्धों को जब हम प्रथम बार इस सृष्टि पर उदित हुए थे तो हमारे साथ कौन-कौन थे? उन्हें ही हम ढूँढ़ते रहते हैं। कौन थी हमारी आदि पत्नी ? कौन था हमारा प्रथम आदि पिता? कौन थी हमारी प्रथम आदि माता ? कौन थे हमारे प्रथम आदि गुरु ? जब तक ये नहीं मिल जाते, जब तक हम इनसे साक्षात्कार नहीं कर लेते चाहे ये किसी भी रूप में क्यों न हो हम संतुष्ट नहीं हो सकते। हमारी आत्मा की भूख नहीं मिट सकती। हमारे सम्बन्ध पूर्ण नहीं हो सकते। हम मुक्त नहीं हो सकते।
बालक माता की गोद में ही शांत होता है, पिता को देखकर ही खुश होता है। पत्नी ही उसकी वास्तविक अर्धांगिनी होती है। मित्र ही उसके साथ बतियाते हैं वास्तव में । वास्तव में ही सब कुछ होना चाहिए। वास्तव ही समृद्धिकारक है। वास्तव ही पूर्णता देता है। संतुष्टि और पूर्णता में जमीन आसमान का फर्क है। पूर्णता ही आत्मा की शक्ति है। पूर्णता ही आत्मा को सबल करती है। संतुष्टि मन बहलाने की क्रिया है। समय काटने की प्रक्रिया है संतुष्टि तो रोज उगती है रोज मिटती है परन्तु पूर्णता वास्तव देती है। उसके बाद संतुष्टि की मृत्यु हो जाती है। जब तक वास्तविक पत्नी नहीं मिलती मन का भटकना तो निश्चित् है चाहे एक जन्म लगे या सौ जन्म और जब तक वास्तविक गुरु नहीं मिलता गुरु घंटालों से दिल बहलाया जा सकता है। यही है पुनर्जन्म की खोज । वास्तविक वास्तविक है और नकलीनकली। समझौता मत कीजिए। साधकों को समय को लात मारकर दूर फेंक देना चाहिए। असफलता के शब्द साधक के मुख पर नहीं आने चाहिए। यह घटिया मस्तिष्क की पहचान है। असफलता शब्द को चुनौती शब्द में परिवर्तित कर दिजिए। असफलता की मृत्यु हो जायेगी। असफलता काल के अधीन है। चुनौती महाकाल का विषय है। महाकाल ही कालजयी है। अपने अंदर बैठे आदि पुरुष को पहचानना ही पुनर्जन्म विज्ञान का मूल तत्व है। जब स्वयं के अंदर स्थित आदि पुरुष को पहचान जाऐगे तो साक्षात आप के सामने आदि माता, आदि पिता और आदि गुरु खड़े होंगे। बस इतना ही।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
👍11❤3🙏2
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
यह श्लोक श्रीगुरु के नमस्कार का श्लोक है। यहां गुरू को श्रीगुरु कहा गया है। 'श्री' शब्द पराशक्ति वाचक है, श्रीसहित या श्रीयुत गुरु ही श्रीगुरु है, इसमें कोई संदेह नहीं। अगर गुरु शक्तिहीन हुए तो उनके द्वारा जीव या जगत् का कल्याण-साधन संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में वे जीव के उपास्य नहीं है, यहां तक कि वे नमस्कार के विषयीभूत भी नहीं है। क्योंकि शक्तिहीन शिव अव्यक्त और जीव के लिए अनाधिगम्य है। हठयोग एवं तंत्रशास्त्र दोनों में ही स्वरूपभूता शक्ति के साथ नित्यमिलित गुरू को लक्ष्य करके ही शास्त्र रहस्य वर्णित हुआ है। कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होकर समस्त आधार कमल बिद्ध एवं अतिक्रम करते हुए उत्थित सहस्रकमल के बिन्दुस्थान परमशिव के साथ मिलती है। यह मिलन ही नित्य का मिलन है, इस मिलन से शिवरूपी गुरु शक्तियुक्त रूप में साक्षी जीव के निकट निरंतर अपरोक्ष भाव में प्रकाशित होते हैं। जीव अपने साधन बल से या भगवत् कृपा से, किसी क्षण में इस महामिलन की अवस्था प्राप्त करता है। किंतु श्रीगुरु नित्य ही नित्यशक्ति के द्वारा आलंगित् रहते हैं, इसलिए वे नमस्य हैं।
(सनातन साधना की गुप्त धारा)
@Sanatan
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
यह श्लोक श्रीगुरु के नमस्कार का श्लोक है। यहां गुरू को श्रीगुरु कहा गया है। 'श्री' शब्द पराशक्ति वाचक है, श्रीसहित या श्रीयुत गुरु ही श्रीगुरु है, इसमें कोई संदेह नहीं। अगर गुरु शक्तिहीन हुए तो उनके द्वारा जीव या जगत् का कल्याण-साधन संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में वे जीव के उपास्य नहीं है, यहां तक कि वे नमस्कार के विषयीभूत भी नहीं है। क्योंकि शक्तिहीन शिव अव्यक्त और जीव के लिए अनाधिगम्य है। हठयोग एवं तंत्रशास्त्र दोनों में ही स्वरूपभूता शक्ति के साथ नित्यमिलित गुरू को लक्ष्य करके ही शास्त्र रहस्य वर्णित हुआ है। कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होकर समस्त आधार कमल बिद्ध एवं अतिक्रम करते हुए उत्थित सहस्रकमल के बिन्दुस्थान परमशिव के साथ मिलती है। यह मिलन ही नित्य का मिलन है, इस मिलन से शिवरूपी गुरु शक्तियुक्त रूप में साक्षी जीव के निकट निरंतर अपरोक्ष भाव में प्रकाशित होते हैं। जीव अपने साधन बल से या भगवत् कृपा से, किसी क्षण में इस महामिलन की अवस्था प्राप्त करता है। किंतु श्रीगुरु नित्य ही नित्यशक्ति के द्वारा आलंगित् रहते हैं, इसलिए वे नमस्य हैं।
(सनातन साधना की गुप्त धारा)
@Sanatan
👍16❤1
मृत्यु महोत्सव
----------------
देखिए तीन रस हैं सत, तम और रज। आप फल खाते हैं उसमें जो सत होता है अर्थात अमृत्व वह शरीर में रह जाता है। रज फल का आकर्षण उसका स्वरूप, उसकी गंध, उसका स्वाद इत्यादि के रूप में आप महसूस करते हैं। रज अति महत्वपूर्ण है। रज सक्रियता प्रदान करता है। रज रस को स्त्रावित करता है। मस्तिष्क को इन्द्रियों के माध्यम से रसों के स्त्राव के लिए आदेशित करता है। तीसरा हिस्सा है तम अर्थात अनुपयोगी वह प्रातः काल मलमूत्र के रूप में विसर्जित हो जाता है। तम विष प्रधान हिस्सा हैं। मल मूत्र अगर विसर्जित नहीं होगा तो मृत्यु आ जायेगी । जो फल आपको जीवन दे रहा था वही फल मृत्यु को कारण बन जायेगा। फल मृत्यु का कारण नहीं बनेगा। मृत्यु होगी तम के कारण अर्थात विष के कारण।
सत अत्यंत ही न्यून होता है। एक किलो सब्जी में से मात्र एकांश और ज्यादा से ज्यादा दशांश ही सत होगा बाकी सब मलमूत्र बनकर विसर्जित हो जायेगा। सत भी आगे चलकर परिष्कृत होता है। मस्तिष्क के अंदर सत की अति परिष्कृत श्रृंखला ही प्रविष्ट हो पायेगी अन्य सब शरीर के काम आ जायेगी। भोजन का सबसे परिष्कृत एवं विशुद्धात्मक अर्क हीं मस्तिष्क में प्रविष्ट हो पाता है यही सबसे जटिल व्यवस्था है। मस्तिष्क चारों तरफ से पूरी तरह से प्रतिबंधित है। चाहे स्वाद हो, ध्वनि, गंध, संवेदन इत्यादि-इत्यादि यह सब मस्तिष्क तक स्थूल रूप में नहीं पहुँचते हैं। वहाँ पर तो सिर्फ अत्यंत ही सूक्ष्म संवेग ही पहुँच पाते हैं और वह भी अनंत प्रकार के इन्द्रिय जालों से छनकर। केवल अमृत ही मस्तिष्क में पहुँचेगा इसीलिए मृत्यु के कई घण्टों पश्चात भी मस्तिष्क जीवित रहता है, क्रियाशील रहता है। मस्तिष्क की मृत्यु आसान नहीं है। मस्तिष्क जब स्थूल ग्रहण ही नहीं करता है तो फिर उसकी स्थूल मृत्यु होती ही नहीं है। मृत्यु से पूर्व ही मस्तिष्क अपनी सूक्ष्मतम आवृत्ति में आ जाता है और आत्मा के साथ शरीर से बाहर निकल आगे की यात्रा तय करता है। वह अपने साथ समस्त कर्म प्रणाली, स्मृति प्रणाली, संस्कार एवं ज्ञान लेकर चलता बनता है।
ज्ञान इसलिए कभी खत्म नहीं होता अगर जिसे हम मृत्यु कहते हैं वह वास्तव में होने लगे तो फिर दूसरे ही क्षण नये मनुष्य का बनना बंद हो जायेगा। आप एक मानव निर्मित यंत्र को उठाइये और उसे तोड़ डालिये। अब उसमें से नया यंत्र नहीं उत्पन्न होगा परन्तु मनुष्य के शरीर त्यागने के पश्चात भी नया मानव निर्मित हो जाता है ठीक वही सब ज्ञान लिए हुए। एक पीढ़ी पहले जो ज्ञान कठिन लगता है वही ज्ञान दूसरी पीढ़ी में सहज हो जाता है। पचास वर्ष पूर्व कम्प्यूटर चलाना किसे आता था परन्तु अब तो दस वर्ष के बच्चे भी उसमें निपुण हो गये हैं । यह है मस्तिष्क के स्वतः प्रतिरोपित होने की अद्भुत क्षमता । यह पूरी तरह से पूर्व जन्म के संस्कारों से जुड़ी हुई है। गाय के पेट से निकलते ही बछड़ा कूदने लगता है अर्थात उस बछड़े की आत्मा के अंदर संस्कार पूर्व से ही मौजूद थे बस अनुकूल परिस्थिति मिलते ही स्मृति पटल पर क्रियाशील हो गये। एक तरह से आत्मा अर्थात आत्म अर्थात वह ब्रह्माण्डीय बीज है जो कि अपने अंदर उन सब गुणों और संस्कारों को युक्त किए हुए है जो कि इस ब्रह्माण्ड के प्रादुर्भाव में आते समय उसे मिले थे। आत्मा सभी गुणों, ज्ञानों और संस्कारों से युक्त होती है एवं शरीर मात्र माध्यम होता है इन्हें प्रदर्शित करने का ।
एक कम्प्यूटर चिप में लाखों तरह की फाइलों को भण्डारित किया जा सकता है। अब तो विज्ञान भी इतना आगे बढ़ गया है कि नाखून बराबर एक माइक्रोचिप के ऊपर पता नहीं कितना ज्ञान भण्डारित कर सकता है। जैसे ही इस चिप को आप कम्प्यूटर में लगाते हैं परदे पर बटन दबा दबाकर आप सब कुछ विस्तृत रूप से पढ़ सकते हैं। मनुष्य सारा जीवन पराशक्ति या परम परमेश्वर की नकल करने में लगा रहता है और काफी हद तक वह कर भी लेता है परन्तु स्थूल रूप में क्योंकि वह स्वयं स्थूल है। उसे अभी अदृश्य आत्मा का निर्माण करना नहीं आया है। हमें जो जानकारी चाहिए होती है हम उस फाइल को खोलते हैं नियंत्रण का केन्द्र हमारा मस्तिष्क होता है ठीक ऐसे ही हमें जो योनि चाहिए होती है उसे ईश्वर देता है। अतः आत्मा तो अजर-अमर है बस शरीर आते जाते रहते हैं कर्म सम्पादित होते रहते हैं। आत्मा के कर्म । क्या ज्ञान की मृत्यु होती है? क्या संस्कार की मृत्यु होती है? क्या प्रकाश की मृत्यु होती है? कभी नहीं। जो तत्व आत्मा से जुड़े हुए हैं वे कभी नहीं मरते। वे अमर होते हैं इन्हीं का समूह आत्मा है। अमरता है प्रतिक्षण इसीलिए अमरता की बात की जाती है प्रतिक्षण मृत्यु है इसीलिए मृत्यु की बात की जाती है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
----------------
देखिए तीन रस हैं सत, तम और रज। आप फल खाते हैं उसमें जो सत होता है अर्थात अमृत्व वह शरीर में रह जाता है। रज फल का आकर्षण उसका स्वरूप, उसकी गंध, उसका स्वाद इत्यादि के रूप में आप महसूस करते हैं। रज अति महत्वपूर्ण है। रज सक्रियता प्रदान करता है। रज रस को स्त्रावित करता है। मस्तिष्क को इन्द्रियों के माध्यम से रसों के स्त्राव के लिए आदेशित करता है। तीसरा हिस्सा है तम अर्थात अनुपयोगी वह प्रातः काल मलमूत्र के रूप में विसर्जित हो जाता है। तम विष प्रधान हिस्सा हैं। मल मूत्र अगर विसर्जित नहीं होगा तो मृत्यु आ जायेगी । जो फल आपको जीवन दे रहा था वही फल मृत्यु को कारण बन जायेगा। फल मृत्यु का कारण नहीं बनेगा। मृत्यु होगी तम के कारण अर्थात विष के कारण।
सत अत्यंत ही न्यून होता है। एक किलो सब्जी में से मात्र एकांश और ज्यादा से ज्यादा दशांश ही सत होगा बाकी सब मलमूत्र बनकर विसर्जित हो जायेगा। सत भी आगे चलकर परिष्कृत होता है। मस्तिष्क के अंदर सत की अति परिष्कृत श्रृंखला ही प्रविष्ट हो पायेगी अन्य सब शरीर के काम आ जायेगी। भोजन का सबसे परिष्कृत एवं विशुद्धात्मक अर्क हीं मस्तिष्क में प्रविष्ट हो पाता है यही सबसे जटिल व्यवस्था है। मस्तिष्क चारों तरफ से पूरी तरह से प्रतिबंधित है। चाहे स्वाद हो, ध्वनि, गंध, संवेदन इत्यादि-इत्यादि यह सब मस्तिष्क तक स्थूल रूप में नहीं पहुँचते हैं। वहाँ पर तो सिर्फ अत्यंत ही सूक्ष्म संवेग ही पहुँच पाते हैं और वह भी अनंत प्रकार के इन्द्रिय जालों से छनकर। केवल अमृत ही मस्तिष्क में पहुँचेगा इसीलिए मृत्यु के कई घण्टों पश्चात भी मस्तिष्क जीवित रहता है, क्रियाशील रहता है। मस्तिष्क की मृत्यु आसान नहीं है। मस्तिष्क जब स्थूल ग्रहण ही नहीं करता है तो फिर उसकी स्थूल मृत्यु होती ही नहीं है। मृत्यु से पूर्व ही मस्तिष्क अपनी सूक्ष्मतम आवृत्ति में आ जाता है और आत्मा के साथ शरीर से बाहर निकल आगे की यात्रा तय करता है। वह अपने साथ समस्त कर्म प्रणाली, स्मृति प्रणाली, संस्कार एवं ज्ञान लेकर चलता बनता है।
ज्ञान इसलिए कभी खत्म नहीं होता अगर जिसे हम मृत्यु कहते हैं वह वास्तव में होने लगे तो फिर दूसरे ही क्षण नये मनुष्य का बनना बंद हो जायेगा। आप एक मानव निर्मित यंत्र को उठाइये और उसे तोड़ डालिये। अब उसमें से नया यंत्र नहीं उत्पन्न होगा परन्तु मनुष्य के शरीर त्यागने के पश्चात भी नया मानव निर्मित हो जाता है ठीक वही सब ज्ञान लिए हुए। एक पीढ़ी पहले जो ज्ञान कठिन लगता है वही ज्ञान दूसरी पीढ़ी में सहज हो जाता है। पचास वर्ष पूर्व कम्प्यूटर चलाना किसे आता था परन्तु अब तो दस वर्ष के बच्चे भी उसमें निपुण हो गये हैं । यह है मस्तिष्क के स्वतः प्रतिरोपित होने की अद्भुत क्षमता । यह पूरी तरह से पूर्व जन्म के संस्कारों से जुड़ी हुई है। गाय के पेट से निकलते ही बछड़ा कूदने लगता है अर्थात उस बछड़े की आत्मा के अंदर संस्कार पूर्व से ही मौजूद थे बस अनुकूल परिस्थिति मिलते ही स्मृति पटल पर क्रियाशील हो गये। एक तरह से आत्मा अर्थात आत्म अर्थात वह ब्रह्माण्डीय बीज है जो कि अपने अंदर उन सब गुणों और संस्कारों को युक्त किए हुए है जो कि इस ब्रह्माण्ड के प्रादुर्भाव में आते समय उसे मिले थे। आत्मा सभी गुणों, ज्ञानों और संस्कारों से युक्त होती है एवं शरीर मात्र माध्यम होता है इन्हें प्रदर्शित करने का ।
एक कम्प्यूटर चिप में लाखों तरह की फाइलों को भण्डारित किया जा सकता है। अब तो विज्ञान भी इतना आगे बढ़ गया है कि नाखून बराबर एक माइक्रोचिप के ऊपर पता नहीं कितना ज्ञान भण्डारित कर सकता है। जैसे ही इस चिप को आप कम्प्यूटर में लगाते हैं परदे पर बटन दबा दबाकर आप सब कुछ विस्तृत रूप से पढ़ सकते हैं। मनुष्य सारा जीवन पराशक्ति या परम परमेश्वर की नकल करने में लगा रहता है और काफी हद तक वह कर भी लेता है परन्तु स्थूल रूप में क्योंकि वह स्वयं स्थूल है। उसे अभी अदृश्य आत्मा का निर्माण करना नहीं आया है। हमें जो जानकारी चाहिए होती है हम उस फाइल को खोलते हैं नियंत्रण का केन्द्र हमारा मस्तिष्क होता है ठीक ऐसे ही हमें जो योनि चाहिए होती है उसे ईश्वर देता है। अतः आत्मा तो अजर-अमर है बस शरीर आते जाते रहते हैं कर्म सम्पादित होते रहते हैं। आत्मा के कर्म । क्या ज्ञान की मृत्यु होती है? क्या संस्कार की मृत्यु होती है? क्या प्रकाश की मृत्यु होती है? कभी नहीं। जो तत्व आत्मा से जुड़े हुए हैं वे कभी नहीं मरते। वे अमर होते हैं इन्हीं का समूह आत्मा है। अमरता है प्रतिक्षण इसीलिए अमरता की बात की जाती है प्रतिक्षण मृत्यु है इसीलिए मृत्यु की बात की जाती है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍16❤9👏1
मृत्यु महोत्सव (२)
संगठन टूटता है। यह शरीर भी सत्रह से इक्कीस तत्वों का संगठन है टूट जाता है। जिसे हम मृत्यु कहते हैं। टूटता क्यों है? टूटना ही पड़ेगा क्योंकि सूर्य मृत्यु है, सूर्य मृत्यु क्यों है? इसलिए कि वह हमारे शरीर से सूर्य तत्व को खींच लेता है प्रतिक्षण खींचता रहता है। ज्यादा देर के लिए वह सूर्य तत्व प्रदान नहीं करता है। यह एक सिद्धांत है। तत्व विशेष का मूल लोक उन आवृत्ति विशेषों को अपनी तरफ स्वत: ही आकर्षित करता है। वर्षा की प्रत्येक बूंद को समुद्र का जल अपनी और प्रतिक्षण आकर्षित करता है। प्रत्येक जल की बूंद को एक निश्चित यात्रा के पश्चात् समुद्र में विलीन होना ही पड़ेगा। हम कुछ देर के लिए अगर कड़ी धूप में खड़े हो जायें तो हमारे शरीर में मौजूद जल को सूर्य रश्मियों के माध्यम से समुद्र अपनी तरफ खींच ही लेगा। यही हाल चन्द्र तत्व का भी है। चन्द्रमा भी धीरे-धीरे शरीर से मौजूद चन्द्र तत्व को खींचता ही रहता है। ऊर्जा से पदार्थ और पदार्थ से ऊर्जा का एक अद्भुत चक्र है। ऊर्जा के घनीभूत और समायोजित होने से पदार्थ का निर्माण होता है और कालान्तर पदार्थ से ऊर्जा निष्कासित होती रहती है। जब तक कि सम्पूर्ण ऊर्जा निष्कासित न हो जाये पदार्थ जीवित कहलाता है। इनके केन्द्र में आत्मा है।
एक शरीर मरता है उसे अनि पर रख दिया जाता है कुछ ही देर में अग्नि की लपटें पदार्थ में से ऊर्जा पूरी तरह से ब्रह्माण्ड में विलीन कर देती हैं। अमृत तत्व है तो मृत्यु तत्व भी है। दोनों एक साथ गतिशील होते हैं। अमृत घट से उत्पन्न शक्ति जोड़ने का काम करती है। एक अणु से कई परमाणु इसी अमृत तुल्य शक्ति के कारण जुड़ते हैं। दूसरी तरफ मृत्यु घट से उत्पन्न शक्ति प्रतिक्षण एक-एक करके पदार्थों को अलग करती हैं। बड़ा अजीब खेल है। ब्रह्मा ने दोनों को एक साथ निर्मित किया है। दोनों को एक साथ सभी जगह प्रतिष्ठित किया है। एक अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करती है तो दूसरी अपने चरित्र के अनुसार अमृत को मृत्यु नहीं मार सकती और मृत्यु को अमृत नहीं मार सकता। सभी पिण्ड, सभी पदार्थ, सभी परमाणु काल के अधीन हैं। काल की भी मृत्यु होती हैं। अत: काल के अंतर्गत आने वाले सूर्य, चंद्र, सप्त ऋषिगण तारे, ब्रह्मा, इन्द्र इत्यादि सभी मृत्यु के अधीन हैं काल परिवर्तन का नाम है।
जब सूर्य की ही मृत्यु हो रही है उसकी भी उम्र निर्धारित है तो वह भी मृत्यु प्रदान करेगा। सभी देव काल के अधीन आते हैं। ये भी मृत्यु के कारक हैं। पंचभूतों की तो बात ही क्या यह तो साक्षात प्रतिक्षण मृत्यु उत्पन्न करते हैं। मृत्यु शाश्वत् सत्य है। इस ब्रह्माण्ड में स्वीकारोक्ति अगर किसी की सबसे कम है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति भागता है तो वह है मृत्यु । मृत्यु ही पुनर्जन्म एवं परिवर्तन का कारक हैं। प्रतिक्षण मृत्यु हैं। मृत्यु प्रतिक्षण होती है। अभी तीस वर्षों की उम्र की मृत्यु हो गयी कुछ देर बाद अभी दिन की मृत्यु हो जायेगी । प्रतिक्षण जाना है कुछ न कुछ तो जाना ही है। क्षण की भी मृत्यु हैं श्रम भी मृत्यु हे श्रम से भी कुछ न कुछ जायेगा सब कुछ निश्चित है श्रम की सीमा भी निश्चित है। एक पुरानी कहावत है जो व्यक्ति इण्डे के भय और स्त्री के लटके झटके से मुक्त हो गया वह तो भगवान बन ही जाता है। इस बात में बड़ा गृढ़ अर्थ है। दण्ड का भय पकड़े जाने का भय पाप और पुण्य का भय चोट लग जाने का भय लक्ष्मी के चले जाने का भय। भय सबसे बड़ा कारक है मृत्यु प्राप्त करने का, श्वास के रुक जाने का यही है यमराज का अंकुश यही है यमराज द्वारा रस्सी में बांधे जाने का तात्पर्य भय ही बांधता है।
दूसरी तरफ स्त्री है वह उलझाती है सांसारिक बंधनों में। वह मोहित करती है। सब कुछ खींचने की शक्ति है उसमें । इस दुनिया के नाना प्रकार के प्रपंचों के पीछे केवल स्त्री है। जो इन दोनों से मुक्त गया वही मृत्युंजय साधना में सफल हुआ। उसे ही शिव का सानिध्य प्राप्त होगा। वही वास्तविक संन्यासी है। मृत्यु से परे । वास्तविक संन्यासियों को देखिए उनकी चाल की गर्विता को देखिए, उनके चेहरे के आभामण्डल को देखिए। एक प्रधानमंत्री के चेहरे पर भी इतनी सौम्यता नहीं होती है। एक सम्राट के पास हजारों स्त्रियाँ होने के पश्चात भी वह इतना शालीन नहीं होता है। संन्यासी ने संसार की सच्चाई को जान लिया है कि जिसे वह अमृत समझ रहा है वास्तव में वह तो विष है। वह तो मृत्यु का कारण है। जितने ज्यादा कारण पालोगे उतनी ही जल्दी मृत्यु आयेगी।
अमेरिका में एक अभिनेत्री थी मरलिन मुनरो अत्यधिक खूबसूरत खूबसूरती ही उसके लिए जीवन था। जैसे ही वह अधेड़ हुई उसने आत्महत्या कर ली। वह अपनी जाती हुई खूबसूरती को बर्दाश्त नहीं कर सकी। खूबसूरती मृत्यु बन गई।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
संगठन टूटता है। यह शरीर भी सत्रह से इक्कीस तत्वों का संगठन है टूट जाता है। जिसे हम मृत्यु कहते हैं। टूटता क्यों है? टूटना ही पड़ेगा क्योंकि सूर्य मृत्यु है, सूर्य मृत्यु क्यों है? इसलिए कि वह हमारे शरीर से सूर्य तत्व को खींच लेता है प्रतिक्षण खींचता रहता है। ज्यादा देर के लिए वह सूर्य तत्व प्रदान नहीं करता है। यह एक सिद्धांत है। तत्व विशेष का मूल लोक उन आवृत्ति विशेषों को अपनी तरफ स्वत: ही आकर्षित करता है। वर्षा की प्रत्येक बूंद को समुद्र का जल अपनी और प्रतिक्षण आकर्षित करता है। प्रत्येक जल की बूंद को एक निश्चित यात्रा के पश्चात् समुद्र में विलीन होना ही पड़ेगा। हम कुछ देर के लिए अगर कड़ी धूप में खड़े हो जायें तो हमारे शरीर में मौजूद जल को सूर्य रश्मियों के माध्यम से समुद्र अपनी तरफ खींच ही लेगा। यही हाल चन्द्र तत्व का भी है। चन्द्रमा भी धीरे-धीरे शरीर से मौजूद चन्द्र तत्व को खींचता ही रहता है। ऊर्जा से पदार्थ और पदार्थ से ऊर्जा का एक अद्भुत चक्र है। ऊर्जा के घनीभूत और समायोजित होने से पदार्थ का निर्माण होता है और कालान्तर पदार्थ से ऊर्जा निष्कासित होती रहती है। जब तक कि सम्पूर्ण ऊर्जा निष्कासित न हो जाये पदार्थ जीवित कहलाता है। इनके केन्द्र में आत्मा है।
एक शरीर मरता है उसे अनि पर रख दिया जाता है कुछ ही देर में अग्नि की लपटें पदार्थ में से ऊर्जा पूरी तरह से ब्रह्माण्ड में विलीन कर देती हैं। अमृत तत्व है तो मृत्यु तत्व भी है। दोनों एक साथ गतिशील होते हैं। अमृत घट से उत्पन्न शक्ति जोड़ने का काम करती है। एक अणु से कई परमाणु इसी अमृत तुल्य शक्ति के कारण जुड़ते हैं। दूसरी तरफ मृत्यु घट से उत्पन्न शक्ति प्रतिक्षण एक-एक करके पदार्थों को अलग करती हैं। बड़ा अजीब खेल है। ब्रह्मा ने दोनों को एक साथ निर्मित किया है। दोनों को एक साथ सभी जगह प्रतिष्ठित किया है। एक अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करती है तो दूसरी अपने चरित्र के अनुसार अमृत को मृत्यु नहीं मार सकती और मृत्यु को अमृत नहीं मार सकता। सभी पिण्ड, सभी पदार्थ, सभी परमाणु काल के अधीन हैं। काल की भी मृत्यु होती हैं। अत: काल के अंतर्गत आने वाले सूर्य, चंद्र, सप्त ऋषिगण तारे, ब्रह्मा, इन्द्र इत्यादि सभी मृत्यु के अधीन हैं काल परिवर्तन का नाम है।
जब सूर्य की ही मृत्यु हो रही है उसकी भी उम्र निर्धारित है तो वह भी मृत्यु प्रदान करेगा। सभी देव काल के अधीन आते हैं। ये भी मृत्यु के कारक हैं। पंचभूतों की तो बात ही क्या यह तो साक्षात प्रतिक्षण मृत्यु उत्पन्न करते हैं। मृत्यु शाश्वत् सत्य है। इस ब्रह्माण्ड में स्वीकारोक्ति अगर किसी की सबसे कम है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति भागता है तो वह है मृत्यु । मृत्यु ही पुनर्जन्म एवं परिवर्तन का कारक हैं। प्रतिक्षण मृत्यु हैं। मृत्यु प्रतिक्षण होती है। अभी तीस वर्षों की उम्र की मृत्यु हो गयी कुछ देर बाद अभी दिन की मृत्यु हो जायेगी । प्रतिक्षण जाना है कुछ न कुछ तो जाना ही है। क्षण की भी मृत्यु हैं श्रम भी मृत्यु हे श्रम से भी कुछ न कुछ जायेगा सब कुछ निश्चित है श्रम की सीमा भी निश्चित है। एक पुरानी कहावत है जो व्यक्ति इण्डे के भय और स्त्री के लटके झटके से मुक्त हो गया वह तो भगवान बन ही जाता है। इस बात में बड़ा गृढ़ अर्थ है। दण्ड का भय पकड़े जाने का भय पाप और पुण्य का भय चोट लग जाने का भय लक्ष्मी के चले जाने का भय। भय सबसे बड़ा कारक है मृत्यु प्राप्त करने का, श्वास के रुक जाने का यही है यमराज का अंकुश यही है यमराज द्वारा रस्सी में बांधे जाने का तात्पर्य भय ही बांधता है।
दूसरी तरफ स्त्री है वह उलझाती है सांसारिक बंधनों में। वह मोहित करती है। सब कुछ खींचने की शक्ति है उसमें । इस दुनिया के नाना प्रकार के प्रपंचों के पीछे केवल स्त्री है। जो इन दोनों से मुक्त गया वही मृत्युंजय साधना में सफल हुआ। उसे ही शिव का सानिध्य प्राप्त होगा। वही वास्तविक संन्यासी है। मृत्यु से परे । वास्तविक संन्यासियों को देखिए उनकी चाल की गर्विता को देखिए, उनके चेहरे के आभामण्डल को देखिए। एक प्रधानमंत्री के चेहरे पर भी इतनी सौम्यता नहीं होती है। एक सम्राट के पास हजारों स्त्रियाँ होने के पश्चात भी वह इतना शालीन नहीं होता है। संन्यासी ने संसार की सच्चाई को जान लिया है कि जिसे वह अमृत समझ रहा है वास्तव में वह तो विष है। वह तो मृत्यु का कारण है। जितने ज्यादा कारण पालोगे उतनी ही जल्दी मृत्यु आयेगी।
अमेरिका में एक अभिनेत्री थी मरलिन मुनरो अत्यधिक खूबसूरत खूबसूरती ही उसके लिए जीवन था। जैसे ही वह अधेड़ हुई उसने आत्महत्या कर ली। वह अपनी जाती हुई खूबसूरती को बर्दाश्त नहीं कर सकी। खूबसूरती मृत्यु बन गई।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
❤17👍10👏3🥰2
शंख
------
जीवन का पंचेन्द्रिय स्वरूप जितना विलक्षण, विविध और चमत्कारिक रूप से विकसित जल के भीतर देखने को मिलता है उसका एकांश भी पृथ्वी के ऊपर देखने को नहीं मिलता। पृथ्वी का सत्तर प्रतिशत हिस्सा जल से ढका हुआ है। पंचेन्द्रिय जीव के रूप में जीवन की प्रथम उत्पत्ति जल के भीतर ही हुई है। अगर पृथ्वी के ऊपर एक जीव की कुछ सौ प्रजातियाँ पायी जाती हैं तो जल के भीतर रहने वाले एक विशेष जीव की लाखों प्रजातियाँ पायी जाती हैं। मछली के कितने करोड़ स्वरूप हैं इसका अंदाजा तो आज तक मनुष्य भी नहीं लगा पाया है परन्तु इसके विपरीत भूमि के ऊपर निवास करने वाला मनुष्य मुश्किल से तीस चालीस प्रजातियों में ही पाया जाता है। जीव विकास की एक चमत्कारिक श्रृंखला जल के भीतर प्रतिक्षण विकासशील हो रही है भले ही वह मानव दृष्टि में भगोर बनी हुई हो। जो कुछ उत्पन्न होगा उसका आदि रूप जल के भीतर ही सर्वप्रथम निर्मित होगा। जल ही जीवन है।
महालक्ष्मी तो आद्र स्वरूप हैं। समुद्र के अंदर जीवन इतना विस्तृत है कि जीव अलग और अस्थि अलग एवं यह चमत्कारिक कार्य होता है शंख की संरचना के रूप में शंख एक अत्यंत ही कोमल जीव की अस्थि है। वह इसके भीतर निवास करता है। रक्षा एवं प्रतिरक्षा का सबसे अद्भुत विकास शंख के रूप में ही देखने को मिलता है। शंख के रूप में जीव द्वारा उत्पादित यह विलक्षण संरचना कई करोड़ वर्ष तक यथा रूप में विराजमान रहती है। शंख जीव का ही उत्पादन है। संसार के प्रत्येक धर्म मे आदिकाल से शंख का उपयोग निर्विवाद रूप से चला आ रहा है। शंख के दर्शन प्रत्येक मनुष्य में सात्विकता के भाव विकसित करते हैं। मध्यप्रदेश के मण्डला जिले में बड़ी-बड़ी चट्टानों के भीतर से पूर्ण विकसित शंख अचानक प्राप्त हो जाते हैं। कई करोड़ वर्ष पूर्व यहाँ पर समुद्र रहा होगा परन्तु कल्प के बदलने से उत्पन्न हुए प्रलय के कारण यह फॉसिल के रूप में चट्टानों में कैद हो गये। इस प्रकार के दुर्लभ शंख अधिकांशतः साधक नहीं देख पाते। यह सब तो सिर्फ गुरु कृपा से ही प्राप्त होता है।
शंख से मात्र एक ही ध्वनि का उच्चारण होता है और वह है ओंकारनाद। जैसे ही व्यक्ति शंख बजाता है साधक के मस्तिष्क में शुद्ध रक्त का संचार तीव्रता के साथ बढ़ जाता है। सभी द्वार एवं अवरोध स्वत: ही खुल जाते हैं एवं मुख मण्डल लालिमा युक्तं हो जाता है। किसी भी क्रोधित व्यक्ति को शंख बजाने के लिए दे दो। मात्र दो बार शंख बजाने से उसका क्रोध दिन भर के लिए स्वतः समाप्त हो जायेगा। उसे अगर कोई अपशब्द भी बोलेगा तो वह शांत रहेगा। विश्वास न हो तो इसे आजमाकर देख लीजिए। शंख की संरचना ऐसी है कि ध्वनि का कम्पन इतना एकाग्रचित्त हो जाता है कि मीलों दूर तक शांत वातावरण मैं शंख की ध्वनि को सुना जा सकता है। किसी भी यंत्र में इतनी शक्ति नहीं है कि वह ध्वनि को इस प्रकार से घनीभूत कर दे। हाँ ध्वनि का घनत्व बढ़ाया जा सकता है तो केवल शंख के माध्यम से।
जो कहते हैं हमारा पूजा में मन नहीं लगता। मंत्र जप करते समय हमें उच्चाटन आता है। ध्यान करते समय हमारा मन इधर-उधर भागता है। मैं उनसे सिर्फ एक बात कहना चाहता हूँ बाजार से शुद्ध शंख प्राप्त कर लो एवं 11 बार "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करके सिर्फ तीन बार शंख को बजा लो और उसके पश्चात ध्यान, पूजन एवं मंत्र जप में बैठो और फिर मुझे बताओ ध्यान लगा कि नहीं। नपुंसकों को सलाह देता प्रतिदिन दिन में तीन बार शंख बजा लो अखण्ड रूप से एक महीने बाद बात करना नपुंसकता गई कि नहीं। सांस फूलना बंद हो जायेगी। उच्च रक्त चाप सामान्य हो जायेगा यह है शंख की विलक्षण शक्ति इसीलिए प्रत्येक देवी देवता इसे अपने हाथ में धारण किए हुए हैं। जब ईश्वरी शक्ति ने शंख को धारण कर रखा है तो आप भी इसे एक बार धारण करके देखें।
ध्वनि सम्पूर्ण विकास करती है जिनके परिवार में बाल झड़ने या छोटी उम्र में बालों में सफेदी आने की बीमारी है वे अपने बालकों से दस वर्ष की उम्र से ही शंख बजाने का अभ्यास करवायें। इसमें पैसा - रुपया खर्च नहीं होता और परिणाम देखिए । भगवान श्रीकृष्ण के पास पाँचजन्य शंख था वे इस शंख के माध्यम से समस्त भूमण्डल को कम्पित करके रख देते थे। कम्पित वही करेगा जो स्वयं परा रूप में एकाग्रचित्त होगा। एकाग्रता एवं स्तम्भन की प्राप्ति शंख के माध्यम से ही होती है। कम्पन के माध्यम से ही परा शक्तियों को अनुभूत किया जा सकता है। इतर योनियाँ भी कम्पन के माध्यम से अनुभूत की जा सकती हैं। शंख ध्वनि इतनी स्तम्भित कर देने वाली होती है कि आप ध्यान से देखिए जैसे ही शंख बजाया जाता है मंदिर के आसपास बैठे पक्षियों में से एक भी पक्षी उड़ने में असमर्थ हो जाता है। शंख ध्वनि सीधे व्यक्ति के आज्ञा चक्र पर प्रभाव डालती है और स्तम्भित करके रख देती है।.
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
------
जीवन का पंचेन्द्रिय स्वरूप जितना विलक्षण, विविध और चमत्कारिक रूप से विकसित जल के भीतर देखने को मिलता है उसका एकांश भी पृथ्वी के ऊपर देखने को नहीं मिलता। पृथ्वी का सत्तर प्रतिशत हिस्सा जल से ढका हुआ है। पंचेन्द्रिय जीव के रूप में जीवन की प्रथम उत्पत्ति जल के भीतर ही हुई है। अगर पृथ्वी के ऊपर एक जीव की कुछ सौ प्रजातियाँ पायी जाती हैं तो जल के भीतर रहने वाले एक विशेष जीव की लाखों प्रजातियाँ पायी जाती हैं। मछली के कितने करोड़ स्वरूप हैं इसका अंदाजा तो आज तक मनुष्य भी नहीं लगा पाया है परन्तु इसके विपरीत भूमि के ऊपर निवास करने वाला मनुष्य मुश्किल से तीस चालीस प्रजातियों में ही पाया जाता है। जीव विकास की एक चमत्कारिक श्रृंखला जल के भीतर प्रतिक्षण विकासशील हो रही है भले ही वह मानव दृष्टि में भगोर बनी हुई हो। जो कुछ उत्पन्न होगा उसका आदि रूप जल के भीतर ही सर्वप्रथम निर्मित होगा। जल ही जीवन है।
महालक्ष्मी तो आद्र स्वरूप हैं। समुद्र के अंदर जीवन इतना विस्तृत है कि जीव अलग और अस्थि अलग एवं यह चमत्कारिक कार्य होता है शंख की संरचना के रूप में शंख एक अत्यंत ही कोमल जीव की अस्थि है। वह इसके भीतर निवास करता है। रक्षा एवं प्रतिरक्षा का सबसे अद्भुत विकास शंख के रूप में ही देखने को मिलता है। शंख के रूप में जीव द्वारा उत्पादित यह विलक्षण संरचना कई करोड़ वर्ष तक यथा रूप में विराजमान रहती है। शंख जीव का ही उत्पादन है। संसार के प्रत्येक धर्म मे आदिकाल से शंख का उपयोग निर्विवाद रूप से चला आ रहा है। शंख के दर्शन प्रत्येक मनुष्य में सात्विकता के भाव विकसित करते हैं। मध्यप्रदेश के मण्डला जिले में बड़ी-बड़ी चट्टानों के भीतर से पूर्ण विकसित शंख अचानक प्राप्त हो जाते हैं। कई करोड़ वर्ष पूर्व यहाँ पर समुद्र रहा होगा परन्तु कल्प के बदलने से उत्पन्न हुए प्रलय के कारण यह फॉसिल के रूप में चट्टानों में कैद हो गये। इस प्रकार के दुर्लभ शंख अधिकांशतः साधक नहीं देख पाते। यह सब तो सिर्फ गुरु कृपा से ही प्राप्त होता है।
शंख से मात्र एक ही ध्वनि का उच्चारण होता है और वह है ओंकारनाद। जैसे ही व्यक्ति शंख बजाता है साधक के मस्तिष्क में शुद्ध रक्त का संचार तीव्रता के साथ बढ़ जाता है। सभी द्वार एवं अवरोध स्वत: ही खुल जाते हैं एवं मुख मण्डल लालिमा युक्तं हो जाता है। किसी भी क्रोधित व्यक्ति को शंख बजाने के लिए दे दो। मात्र दो बार शंख बजाने से उसका क्रोध दिन भर के लिए स्वतः समाप्त हो जायेगा। उसे अगर कोई अपशब्द भी बोलेगा तो वह शांत रहेगा। विश्वास न हो तो इसे आजमाकर देख लीजिए। शंख की संरचना ऐसी है कि ध्वनि का कम्पन इतना एकाग्रचित्त हो जाता है कि मीलों दूर तक शांत वातावरण मैं शंख की ध्वनि को सुना जा सकता है। किसी भी यंत्र में इतनी शक्ति नहीं है कि वह ध्वनि को इस प्रकार से घनीभूत कर दे। हाँ ध्वनि का घनत्व बढ़ाया जा सकता है तो केवल शंख के माध्यम से।
जो कहते हैं हमारा पूजा में मन नहीं लगता। मंत्र जप करते समय हमें उच्चाटन आता है। ध्यान करते समय हमारा मन इधर-उधर भागता है। मैं उनसे सिर्फ एक बात कहना चाहता हूँ बाजार से शुद्ध शंख प्राप्त कर लो एवं 11 बार "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करके सिर्फ तीन बार शंख को बजा लो और उसके पश्चात ध्यान, पूजन एवं मंत्र जप में बैठो और फिर मुझे बताओ ध्यान लगा कि नहीं। नपुंसकों को सलाह देता प्रतिदिन दिन में तीन बार शंख बजा लो अखण्ड रूप से एक महीने बाद बात करना नपुंसकता गई कि नहीं। सांस फूलना बंद हो जायेगी। उच्च रक्त चाप सामान्य हो जायेगा यह है शंख की विलक्षण शक्ति इसीलिए प्रत्येक देवी देवता इसे अपने हाथ में धारण किए हुए हैं। जब ईश्वरी शक्ति ने शंख को धारण कर रखा है तो आप भी इसे एक बार धारण करके देखें।
ध्वनि सम्पूर्ण विकास करती है जिनके परिवार में बाल झड़ने या छोटी उम्र में बालों में सफेदी आने की बीमारी है वे अपने बालकों से दस वर्ष की उम्र से ही शंख बजाने का अभ्यास करवायें। इसमें पैसा - रुपया खर्च नहीं होता और परिणाम देखिए । भगवान श्रीकृष्ण के पास पाँचजन्य शंख था वे इस शंख के माध्यम से समस्त भूमण्डल को कम्पित करके रख देते थे। कम्पित वही करेगा जो स्वयं परा रूप में एकाग्रचित्त होगा। एकाग्रता एवं स्तम्भन की प्राप्ति शंख के माध्यम से ही होती है। कम्पन के माध्यम से ही परा शक्तियों को अनुभूत किया जा सकता है। इतर योनियाँ भी कम्पन के माध्यम से अनुभूत की जा सकती हैं। शंख ध्वनि इतनी स्तम्भित कर देने वाली होती है कि आप ध्यान से देखिए जैसे ही शंख बजाया जाता है मंदिर के आसपास बैठे पक्षियों में से एक भी पक्षी उड़ने में असमर्थ हो जाता है। शंख ध्वनि सीधे व्यक्ति के आज्ञा चक्र पर प्रभाव डालती है और स्तम्भित करके रख देती है।.
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
🙏18❤8👍6😁1
शंख (२)
------ ----
जो काम कई बार मंत्रोच्चार के द्वारा नहीं होता वह शंख ध्वनि के साथ सम्पन्न कर लिया जाता है। शंख बजाना अपने आप में एक अत्यंत ही गोपनीय कला रही है। आजकल यह लुप्त प्रायः सी हो गई है। शंख ध्वनि के माध्यम से वर्षा करवाई जा सकती है, वर्षा का स्तम्भन भी किया जा सकता है। शंख के द्वारा उत्पन्न ध्वनि से अग्नि का भी प्रादुर्भाव किया जा सकता है । यह पंचतत्वों को आकर्षित करने का अद्भुत यंत्र है। मस्तिष्क की क्रियाशीलता सबसे ज्यादा ध्वनि प्रदूषण के कारण प्रभावित होती है। अनेकों सम्प्रदाय में गुरु शिष्य को गुरु परम्परा के अनुसार शंख प्रदान करता है। कई सम्प्रदायों में ऐसे शंख भी मिल जाते हैं जिनका उपयोग दस पीढ़ियों से गुरु लगातार करते चले आ रहे हैं। विशेषकर तिब्बत के दलाई लामाओं में उनके प्रथम गुरु द्वारा उपयोग में लाया गया विशालकाय शंख वर्तमान केन्दलाईलामा के पास भी उपस्थित है । लामा तंत्र साधना में ध्वनि को अत्यंत महत्त्व दिया गया है।
नकारात्मक एवं भूत-प्रेत जैसी योनियों के निवारण हेतु शंखनाद लामाओं में प्राचीनकाल से चला आ रहा है ध्वनि प्रदूषण को रोकना एवं ध्वनि के कारण प्रदूषित हो गये मस्तिष्क को शंखनाद के द्वारा शुद्ध करना ही शंख का मूलभूत उपयोग है अलक्ष्मी का नाश एवं लक्ष्मी का स्थापत्य शंख के माध्यम से ही होता है। शंख रखना है तो फिर विशाल से विशालतम रखो। आध्यात्मिक वस्तुओं के एकत्रीकरण में धन की कृपणता नहीं करनी चाहिए भले एक बार भौतिक सुखों की वस्तुओं को एकत्रित करने में धन की कृपणता कर लो। दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का सहोदर माना गया है। लक्ष्मीजी ने विष्णु भगवान द्वारा पूछने पर स्वयं ही यह तथ्य उद्घाटित किया
वसामि पद्मोत्पल शंख मध्ये ।
वसामि चन्द्र च महेश्वरे च ॥
मैं पद्म, उत्पन्न शंख, चन्द्रमा और शिवजी में निवास करती हूँ। हम जितने भी शंख देखते हैं, भले ही वे किसी आकृति में हों, प्रायः वामावर्ती होते हैं। अर्थात् उनका पेट बाँयी ओर खुला होता है। उनके मुँह से पेट की ओर चलने वाली परतें बाँयी ओर घूमा करती हैं। वाम आवर्त्त का अर्थ ही है- बायीं ओर की भँवर (घुमाव ) अर्थात जिसकी भँवर बायीं ओर को घूमी हो, वह वामावर्त है। तंत्र शास्त्र में वामावर्ती शंख की अपेक्षा दक्षिणावर्ती शंख को विशेष महत्व दिया गया है। यह शंख सामान्य शंखों के भिन्न दिशा में अर्थात दाँयी ओर को घूमा रहता है। उसके मुख से पेट की ओर चलने पर भँवर का घुमाव दाहिनी ओर पड़ता है। दाँयी ओर की भँवर वाला शंख दक्षिणावर्ती कहलाता है। मान्यता है कि यह शंख दक्षिणावर्ती बहुत ही शुभ, श्री समृद्धि दायक और अन्य प्रकार से वैभवकारी होता है। दक्षिणावर्ती शंख सरलता से नहीं मिलता। यह संसार के बहुत कम स्थानों में पाया जाता है। दुर्लभ होने के कारण इसका मूल्य भी अधिक होता है। यह आकार में गेहूँ के दाने से लेकर नारियल के समूचे फल (जटा सहित) ..के बराबर तक पाया जाता है। भारत के दक्षिणी समुद्र तट पर रामेश्वरम और कन्याकुमारी के आसपास ये शंख प्राप्त होते हैं।
सामान्यतः यह शंख श्वेत वर्ण का होता है परन्तु गौर से देखें तो इस पर लाल पीली या काली आभा या धारियाँ भी पायी जाती हैं। शुद्ध श्वेत दूधिया वर्ण का जिस पर दूसरे रंग की झलक न हो, ऐसा शंख सर्वोत्तम माना जाता है, परन्तु यह कदाचित ही कहीं दिखाई पड़े अन्यथा यह पीताभ तथा रक्ताभ होता है। चूंकि यह शंख सर्वत्र सुलभ नहीं रहता, इसलिए इसकी प्राप्ति के लिए मुहूर्त वाला प्रतिबन्ध व्यावहारिक नहीं रह जाता। पहले किसी पुरोहित से शुभ मुहूर्त पूछ लें। यदि उस दिन यह शंख मिल जाता है तो ले आयें। यह स्थिति सर्वश्रेष्ठ होती है किन्तु ऐसा न हो सके तो जब भी जहाँ भी यह शंख मिले या तो बात तय करके घर में देव- प्रतिमाओं के पास रख दें। जब शुभ मुहूर्त आये तब उसकी पूजा करें। शुभ मुहूर्त के लिए सामान्यतः रामनवमी, विजया दशमी, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, रक्षा बन्धन, गंगा दशहरा आदि के दिन शुभ होते हैं। गुरु पुष्य योग अथवा रविपुष्य योग सर्वश्रेष्ठ मूहूर्त होता है। स्थानीय पण्डित पुरोहित से पूंछकर कोई भी शुभ दिन मालुम किया जा सकता है दिन, तिथि, नक्षत्र और योग की गणना करके लोग शुभ मुहूर्त बता देते हैं। प्रायः सभी अंग एक साथ अनुकूल स्थिति में नहीं आते, एक न एक त्रुटि अवश्य रहती है फिर भी अधिकतम अंगों के आधार पर मुहूर्त निर्धारित किया जा सकता है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
------ ----
जो काम कई बार मंत्रोच्चार के द्वारा नहीं होता वह शंख ध्वनि के साथ सम्पन्न कर लिया जाता है। शंख बजाना अपने आप में एक अत्यंत ही गोपनीय कला रही है। आजकल यह लुप्त प्रायः सी हो गई है। शंख ध्वनि के माध्यम से वर्षा करवाई जा सकती है, वर्षा का स्तम्भन भी किया जा सकता है। शंख के द्वारा उत्पन्न ध्वनि से अग्नि का भी प्रादुर्भाव किया जा सकता है । यह पंचतत्वों को आकर्षित करने का अद्भुत यंत्र है। मस्तिष्क की क्रियाशीलता सबसे ज्यादा ध्वनि प्रदूषण के कारण प्रभावित होती है। अनेकों सम्प्रदाय में गुरु शिष्य को गुरु परम्परा के अनुसार शंख प्रदान करता है। कई सम्प्रदायों में ऐसे शंख भी मिल जाते हैं जिनका उपयोग दस पीढ़ियों से गुरु लगातार करते चले आ रहे हैं। विशेषकर तिब्बत के दलाई लामाओं में उनके प्रथम गुरु द्वारा उपयोग में लाया गया विशालकाय शंख वर्तमान केन्दलाईलामा के पास भी उपस्थित है । लामा तंत्र साधना में ध्वनि को अत्यंत महत्त्व दिया गया है।
नकारात्मक एवं भूत-प्रेत जैसी योनियों के निवारण हेतु शंखनाद लामाओं में प्राचीनकाल से चला आ रहा है ध्वनि प्रदूषण को रोकना एवं ध्वनि के कारण प्रदूषित हो गये मस्तिष्क को शंखनाद के द्वारा शुद्ध करना ही शंख का मूलभूत उपयोग है अलक्ष्मी का नाश एवं लक्ष्मी का स्थापत्य शंख के माध्यम से ही होता है। शंख रखना है तो फिर विशाल से विशालतम रखो। आध्यात्मिक वस्तुओं के एकत्रीकरण में धन की कृपणता नहीं करनी चाहिए भले एक बार भौतिक सुखों की वस्तुओं को एकत्रित करने में धन की कृपणता कर लो। दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का सहोदर माना गया है। लक्ष्मीजी ने विष्णु भगवान द्वारा पूछने पर स्वयं ही यह तथ्य उद्घाटित किया
वसामि पद्मोत्पल शंख मध्ये ।
वसामि चन्द्र च महेश्वरे च ॥
मैं पद्म, उत्पन्न शंख, चन्द्रमा और शिवजी में निवास करती हूँ। हम जितने भी शंख देखते हैं, भले ही वे किसी आकृति में हों, प्रायः वामावर्ती होते हैं। अर्थात् उनका पेट बाँयी ओर खुला होता है। उनके मुँह से पेट की ओर चलने वाली परतें बाँयी ओर घूमा करती हैं। वाम आवर्त्त का अर्थ ही है- बायीं ओर की भँवर (घुमाव ) अर्थात जिसकी भँवर बायीं ओर को घूमी हो, वह वामावर्त है। तंत्र शास्त्र में वामावर्ती शंख की अपेक्षा दक्षिणावर्ती शंख को विशेष महत्व दिया गया है। यह शंख सामान्य शंखों के भिन्न दिशा में अर्थात दाँयी ओर को घूमा रहता है। उसके मुख से पेट की ओर चलने पर भँवर का घुमाव दाहिनी ओर पड़ता है। दाँयी ओर की भँवर वाला शंख दक्षिणावर्ती कहलाता है। मान्यता है कि यह शंख दक्षिणावर्ती बहुत ही शुभ, श्री समृद्धि दायक और अन्य प्रकार से वैभवकारी होता है। दक्षिणावर्ती शंख सरलता से नहीं मिलता। यह संसार के बहुत कम स्थानों में पाया जाता है। दुर्लभ होने के कारण इसका मूल्य भी अधिक होता है। यह आकार में गेहूँ के दाने से लेकर नारियल के समूचे फल (जटा सहित) ..के बराबर तक पाया जाता है। भारत के दक्षिणी समुद्र तट पर रामेश्वरम और कन्याकुमारी के आसपास ये शंख प्राप्त होते हैं।
सामान्यतः यह शंख श्वेत वर्ण का होता है परन्तु गौर से देखें तो इस पर लाल पीली या काली आभा या धारियाँ भी पायी जाती हैं। शुद्ध श्वेत दूधिया वर्ण का जिस पर दूसरे रंग की झलक न हो, ऐसा शंख सर्वोत्तम माना जाता है, परन्तु यह कदाचित ही कहीं दिखाई पड़े अन्यथा यह पीताभ तथा रक्ताभ होता है। चूंकि यह शंख सर्वत्र सुलभ नहीं रहता, इसलिए इसकी प्राप्ति के लिए मुहूर्त वाला प्रतिबन्ध व्यावहारिक नहीं रह जाता। पहले किसी पुरोहित से शुभ मुहूर्त पूछ लें। यदि उस दिन यह शंख मिल जाता है तो ले आयें। यह स्थिति सर्वश्रेष्ठ होती है किन्तु ऐसा न हो सके तो जब भी जहाँ भी यह शंख मिले या तो बात तय करके घर में देव- प्रतिमाओं के पास रख दें। जब शुभ मुहूर्त आये तब उसकी पूजा करें। शुभ मुहूर्त के लिए सामान्यतः रामनवमी, विजया दशमी, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, रक्षा बन्धन, गंगा दशहरा आदि के दिन शुभ होते हैं। गुरु पुष्य योग अथवा रविपुष्य योग सर्वश्रेष्ठ मूहूर्त होता है। स्थानीय पण्डित पुरोहित से पूंछकर कोई भी शुभ दिन मालुम किया जा सकता है दिन, तिथि, नक्षत्र और योग की गणना करके लोग शुभ मुहूर्त बता देते हैं। प्रायः सभी अंग एक साथ अनुकूल स्थिति में नहीं आते, एक न एक त्रुटि अवश्य रहती है फिर भी अधिकतम अंगों के आधार पर मुहूर्त निर्धारित किया जा सकता है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
❤6👍3👏1
शंख (३)
-----------
यहाँ विद्वानों में भी भेद पाया जाता है। कोई दिनको महत्व देता है, कोई तिथि को कोई नक्षत्र को वरीयता देता है, कोई योग को । सब एक साथ मिल जायें तब तो कहना ही क्या है, किन्तु यदि ऐसा न हो सके तो रविपुष्य या गुरु पुष्य को मान्यता देनी चाहिए। यदि ऐसा मुहूर्त आने में बहुत विलम्ब है और साधक को जल्दी है तो वह शुभ नक्षत्र और शुभ योग की उपस्थिति में साधना कर सकता है। आशय यह है कि दुर्योग में, अशुभ मुहूर्त में कोई काम नहीं करना चाहिए। सर्वप्रथम दक्षिणावर्ती शंख कहीं से प्राप्त करें। फिर शुभ मुहूर्त में अपना दैनिक पूजा से निवृत्त होकर, शुद्ध लकड़ी के पीठे पर चाँदी की तश्तरी पर रखें। यह न हो सके तो कोई भी धातु का पात्र तांबा प्रीतल ले लें। उस पर कमल पुष्प का दल बिछायें न मिले तो लाल कपड़ा बिछा दें। शंख को थाली में रखकर गो दुग्ध गंगाजल से भली भांति स्नान करायें। स्वच्छ नवीन वस्त्र से उसे पोंछकर उसी तश्तरी पर रखें। सफेद चन्दन, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप से पूजा करके, मेवा मिठाई का नैवेद्य अर्पित करें और चाँदी का सिक्का चढ़ायें। यह न मिले तो प्रचलित सिक्का (रुपया) चढ़ा दें। साथ ही चाँदी का कोई टुकड़ा धोकर चढ़ा दें। उत्तम होगा कि इसके लिए पहले से ही दस बीस रुपये का चाँदी का गोल टुकड़ा या "श्री" "ॐ" जैसा कुछ बनवा लें और वही चढ़ायें।
पूजन के उपरांत परम श्रद्धा भाव से मंत्र का जप करें। जप पूरा हो चुकने पर सामान्य हवन सामग्री में घी, शक्कर, जौ, तिल, अक्षत मिलाकर उसी मंत्र से 21 या 51 बार आहुति देते हुए हवन करें। दक्षिणावर्ती शंख की पूजा के लिए निम्न में से कोई भी एक मंत्र लिया जा सकता है। पूजा में आदि से अंत तक उसी का जप करना चाहिए। शंख पर चढ़ाया गया जल अपने ऊपर तथा घर में छिड़क देना चाहिए। उसे इधर-उधर न फेंके। शास्त्र में लिखा है कि दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर उसे जिसके ऊपर छिड़क दिया जाये वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
मंत्र
ॐ श्रीं लक्ष्मी सहोदराय नमः ।
ॐ श्री पयोनिधि जाताय नमः ।
ॐ श्रीं दक्षिणावर्त शंखाय नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीधर करस्थाय पयोनिधि
जाताय, लक्ष्मी सहोदराय दक्षिणावर्त शंखाय नम:।
ॐ ह्रीं श्रीं श्रींधर करस्थाय, लक्ष्मीप्रियाय, दक्षिणावर्त शंखाय मम चिन्तित फलं प्राप्तर्शय नमः ।
इनमें सबसे सरल प्रथम मंत्र है। वैसे साधक अपनी सामर्थ्य श्रद्धा के अनुसार कोई भी मंत्र जपकर इस शंख के अद्भुत प्रभाव का लाभ उठा सकते हैं।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
-----------
यहाँ विद्वानों में भी भेद पाया जाता है। कोई दिनको महत्व देता है, कोई तिथि को कोई नक्षत्र को वरीयता देता है, कोई योग को । सब एक साथ मिल जायें तब तो कहना ही क्या है, किन्तु यदि ऐसा न हो सके तो रविपुष्य या गुरु पुष्य को मान्यता देनी चाहिए। यदि ऐसा मुहूर्त आने में बहुत विलम्ब है और साधक को जल्दी है तो वह शुभ नक्षत्र और शुभ योग की उपस्थिति में साधना कर सकता है। आशय यह है कि दुर्योग में, अशुभ मुहूर्त में कोई काम नहीं करना चाहिए। सर्वप्रथम दक्षिणावर्ती शंख कहीं से प्राप्त करें। फिर शुभ मुहूर्त में अपना दैनिक पूजा से निवृत्त होकर, शुद्ध लकड़ी के पीठे पर चाँदी की तश्तरी पर रखें। यह न हो सके तो कोई भी धातु का पात्र तांबा प्रीतल ले लें। उस पर कमल पुष्प का दल बिछायें न मिले तो लाल कपड़ा बिछा दें। शंख को थाली में रखकर गो दुग्ध गंगाजल से भली भांति स्नान करायें। स्वच्छ नवीन वस्त्र से उसे पोंछकर उसी तश्तरी पर रखें। सफेद चन्दन, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप से पूजा करके, मेवा मिठाई का नैवेद्य अर्पित करें और चाँदी का सिक्का चढ़ायें। यह न मिले तो प्रचलित सिक्का (रुपया) चढ़ा दें। साथ ही चाँदी का कोई टुकड़ा धोकर चढ़ा दें। उत्तम होगा कि इसके लिए पहले से ही दस बीस रुपये का चाँदी का गोल टुकड़ा या "श्री" "ॐ" जैसा कुछ बनवा लें और वही चढ़ायें।
पूजन के उपरांत परम श्रद्धा भाव से मंत्र का जप करें। जप पूरा हो चुकने पर सामान्य हवन सामग्री में घी, शक्कर, जौ, तिल, अक्षत मिलाकर उसी मंत्र से 21 या 51 बार आहुति देते हुए हवन करें। दक्षिणावर्ती शंख की पूजा के लिए निम्न में से कोई भी एक मंत्र लिया जा सकता है। पूजा में आदि से अंत तक उसी का जप करना चाहिए। शंख पर चढ़ाया गया जल अपने ऊपर तथा घर में छिड़क देना चाहिए। उसे इधर-उधर न फेंके। शास्त्र में लिखा है कि दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर उसे जिसके ऊपर छिड़क दिया जाये वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
मंत्र
ॐ श्रीं लक्ष्मी सहोदराय नमः ।
ॐ श्री पयोनिधि जाताय नमः ।
ॐ श्रीं दक्षिणावर्त शंखाय नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीधर करस्थाय पयोनिधि
जाताय, लक्ष्मी सहोदराय दक्षिणावर्त शंखाय नम:।
ॐ ह्रीं श्रीं श्रींधर करस्थाय, लक्ष्मीप्रियाय, दक्षिणावर्त शंखाय मम चिन्तित फलं प्राप्तर्शय नमः ।
इनमें सबसे सरल प्रथम मंत्र है। वैसे साधक अपनी सामर्थ्य श्रद्धा के अनुसार कोई भी मंत्र जपकर इस शंख के अद्भुत प्रभाव का लाभ उठा सकते हैं।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
👍14❤6
मृत्यु महोत्सव (३)
----------------------
https://t.me/Sanatan/2097
एक गुरु महाराज थे उन्हें अपना मान सम्मान, यश, प्रसिद्धि इत्यादि अत्यधिक प्रिय थे। उन्हें प्रतिदिन अगर कोई चरण स्पर्श न करे तो आनंद ही नहीं आता था। अचानक एक दिन अपयश दरवाजे पर आ धमका। गुरु महाराज का गुरुत्व धरा रह गया। अपशय को देखते ही हृदय गति रुक गई। वह लिप्त था यश में ऐसा ही होता है इन स्थितियों के बीच कभी-कभी कुछ विहंगम स्थितियाँ भी बनती हैं। तुलसीदास को उनकी पत्नी ने अपमानित कर दिया वे गंगा में शरीर त्यागने जा रहे थे पर अचानक किसी संन्यासी ने आकार झंझकोर दिया यहाँ पर शरीर त्यागने के विचार की मृत्यु हो गयी। तुलसीदास पुनः जीवित हो उठे। उनका पुनर्जन्म हो गया रामायण का अनुवाद कर बैठे।
हम सबके साथ एक अत्यंत ही विलक्षण ग्रंथि जुड़ी हुई है जो कि मृत्यु के कारणों को भी मृत्यु प्रदान कर देती है । यही वह सबसे दुर्लभ ग्रंथि है जिसका कि साधक को अनुसंधान करना चाहिए। जिसे कि प्रत्येक आध्यात्मिक महामानव सिद्ध इत्यादि चैतन्य और जाग्रत करते हैं। यह है यमराज साधना । इसे कहते हैं महाकाल साधना। पहले यम को साधो । स्वयं साक्षात यमराज बनो किसी और के लिए नहीं बल्कि स्वयं के लिए। यमराज का रंग काला है। काले भैसे पर सवार हैं, हाथ में गदा, अंकुश और पाश है बिल्कुल निर्मोही हैं कृष्ण के समान । वे किसी की नहीं सुनते हैं बस सीधे मृत व्यक्ति की आत्मा को घसीटकर रस्सी से बांधकर अपने साथ ले जाते हैं सीधे चित्रगुप्त के पास। जहाँ पर आत्मा के कर्मों का लेखा-जोखा होता है।
यमराज से सब डरते हैं। सांसारिक आत्माऐं तो रोती हैं, चिल्लाती हैं, घिघयाती हैं, हाथ पैर जोड़ती हैं परन्तु वे कदापि नहीं छोड़ते हैं। अपने कर्म के प्रति पूर्ण समर्पित हैं। हम सब भी यमराज हैं यमराज की नकल करते हैं। न जाने कितने जीवों को अपने स्वार्थ के लिए मृत्यु प्रदान करते हैं। वे चिल्लाते हैं, रोते हैं, तड़पते हैं फिर भी हम मनुष्यों का शोषण करते हैं, जीवों को काटकर खा जाते हैं और भी न जाने क्या-क्या। स्वयं की मृत्यु टालने के लिए दूसरों को मृत्यु प्रदान करना। यह है इस काल के अधीन संसार में सभी का कार्य इसीलिए कालाधीन सभी पिण्ड, शरीर और जीव इत्यादि यम के द्वारा ही मृत्युलोक में ले जाये जाते हैं। हमें भी अपने मृत्यु के कारकों को यमराज के समान एक-एक करके पाश से बांधकर घसीटते हुए पूरी निर्ममता के साथ निकालना होगा तब कहीं जाकर मृत्यु को टालने में हम कुछ हद तक सफल हो पायेंगे। नहीं तो मृत्यु शीघ्र ही दरवाजे पर खड़ी होगी।
जितना हम मृत्यु का खेल खेलेंगें एक तरह से उसका आह्वान करेंगे वह उतनी ही जल्दी प्रकट होगी। देखिए अंतिम समय सांसारिक व्यक्ति कितना तड़पता है अपनी सारी दौलत लुटाने को तैयार हो जाता है। कुछ भी करके वह कुछ क्षण हासिल करना चाहता है । मृत्यु को भगाना चाहता है परन्तु मृत्यु इतनी ज्यादा कण-कण में, रग-रग में प्रविष्ट हो चुकी होती है कि कहाँ कहाँ से भगायेगा। कहीं न कहीं से पकड़ में आ ही जायेगा। यह है ऋण मुक्ति का सिद्धांत। पंचभूतों का यह शरीर सिर्फ कुछ समय के लिए सभी तत्वों को उधार में लेता है विभिन्न स्त्रोतों से ऋण की एक अवधि होती है उस अवधि में ऋण के साथ ब्याज भी चुकाना पड़ता है। लोग ब्याज ही नहीं चुकाते हैं मूलधन की तो बात ही छोड़ो। एक दिन तो दिवालिया होना निश्चित है।
लिया अर्थात ऋण ऋण है तो व्याज भी है। देना तो पड़ेगा ही। शरीर प्राप्त किया तो फिर कर्म भी करने पड़ेगें। कर्म ही ब्याज है, कर्म ही मूलधन की वापसी है। जब तक इस भाव से कार्य नहीं करोगे हर समय मृत्यु दरवाजे पर खड़ी होगी मांगने वाले के समान। रोने से मृत्यु थोड़ी टल जायेगी। आपको शरीर क्यों दिया गया? क्योंकि आपने कर्म सम्पादित करने के लिए उसे मांगा। युधिष्ठिर से यक्ष ने पूछा कि इस पृथ्वी का सबसे बड़ा सत्य क्या है? युधिष्ठिर ने कहा इस पृथ्वी का सबसे बड़ा सत्य यह है कि सभी लोग मृत्यु से भाग रहे हैं अर्थात मृत्यु परम सत्य है इससे भागने से कुछ नहीं होगा। क्या मृत्यु एक आयामी है? नहीं कदापि नहीं। मृत्यु के अनंत आयाम हैं। एक शरीर में अनेक पुरुष हैं किसी न किसी पुरुष की मृत्यु किसी न किसी क्षण हो हीं जाती है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
----------------------
https://t.me/Sanatan/2097
एक गुरु महाराज थे उन्हें अपना मान सम्मान, यश, प्रसिद्धि इत्यादि अत्यधिक प्रिय थे। उन्हें प्रतिदिन अगर कोई चरण स्पर्श न करे तो आनंद ही नहीं आता था। अचानक एक दिन अपयश दरवाजे पर आ धमका। गुरु महाराज का गुरुत्व धरा रह गया। अपशय को देखते ही हृदय गति रुक गई। वह लिप्त था यश में ऐसा ही होता है इन स्थितियों के बीच कभी-कभी कुछ विहंगम स्थितियाँ भी बनती हैं। तुलसीदास को उनकी पत्नी ने अपमानित कर दिया वे गंगा में शरीर त्यागने जा रहे थे पर अचानक किसी संन्यासी ने आकार झंझकोर दिया यहाँ पर शरीर त्यागने के विचार की मृत्यु हो गयी। तुलसीदास पुनः जीवित हो उठे। उनका पुनर्जन्म हो गया रामायण का अनुवाद कर बैठे।
हम सबके साथ एक अत्यंत ही विलक्षण ग्रंथि जुड़ी हुई है जो कि मृत्यु के कारणों को भी मृत्यु प्रदान कर देती है । यही वह सबसे दुर्लभ ग्रंथि है जिसका कि साधक को अनुसंधान करना चाहिए। जिसे कि प्रत्येक आध्यात्मिक महामानव सिद्ध इत्यादि चैतन्य और जाग्रत करते हैं। यह है यमराज साधना । इसे कहते हैं महाकाल साधना। पहले यम को साधो । स्वयं साक्षात यमराज बनो किसी और के लिए नहीं बल्कि स्वयं के लिए। यमराज का रंग काला है। काले भैसे पर सवार हैं, हाथ में गदा, अंकुश और पाश है बिल्कुल निर्मोही हैं कृष्ण के समान । वे किसी की नहीं सुनते हैं बस सीधे मृत व्यक्ति की आत्मा को घसीटकर रस्सी से बांधकर अपने साथ ले जाते हैं सीधे चित्रगुप्त के पास। जहाँ पर आत्मा के कर्मों का लेखा-जोखा होता है।
यमराज से सब डरते हैं। सांसारिक आत्माऐं तो रोती हैं, चिल्लाती हैं, घिघयाती हैं, हाथ पैर जोड़ती हैं परन्तु वे कदापि नहीं छोड़ते हैं। अपने कर्म के प्रति पूर्ण समर्पित हैं। हम सब भी यमराज हैं यमराज की नकल करते हैं। न जाने कितने जीवों को अपने स्वार्थ के लिए मृत्यु प्रदान करते हैं। वे चिल्लाते हैं, रोते हैं, तड़पते हैं फिर भी हम मनुष्यों का शोषण करते हैं, जीवों को काटकर खा जाते हैं और भी न जाने क्या-क्या। स्वयं की मृत्यु टालने के लिए दूसरों को मृत्यु प्रदान करना। यह है इस काल के अधीन संसार में सभी का कार्य इसीलिए कालाधीन सभी पिण्ड, शरीर और जीव इत्यादि यम के द्वारा ही मृत्युलोक में ले जाये जाते हैं। हमें भी अपने मृत्यु के कारकों को यमराज के समान एक-एक करके पाश से बांधकर घसीटते हुए पूरी निर्ममता के साथ निकालना होगा तब कहीं जाकर मृत्यु को टालने में हम कुछ हद तक सफल हो पायेंगे। नहीं तो मृत्यु शीघ्र ही दरवाजे पर खड़ी होगी।
जितना हम मृत्यु का खेल खेलेंगें एक तरह से उसका आह्वान करेंगे वह उतनी ही जल्दी प्रकट होगी। देखिए अंतिम समय सांसारिक व्यक्ति कितना तड़पता है अपनी सारी दौलत लुटाने को तैयार हो जाता है। कुछ भी करके वह कुछ क्षण हासिल करना चाहता है । मृत्यु को भगाना चाहता है परन्तु मृत्यु इतनी ज्यादा कण-कण में, रग-रग में प्रविष्ट हो चुकी होती है कि कहाँ कहाँ से भगायेगा। कहीं न कहीं से पकड़ में आ ही जायेगा। यह है ऋण मुक्ति का सिद्धांत। पंचभूतों का यह शरीर सिर्फ कुछ समय के लिए सभी तत्वों को उधार में लेता है विभिन्न स्त्रोतों से ऋण की एक अवधि होती है उस अवधि में ऋण के साथ ब्याज भी चुकाना पड़ता है। लोग ब्याज ही नहीं चुकाते हैं मूलधन की तो बात ही छोड़ो। एक दिन तो दिवालिया होना निश्चित है।
लिया अर्थात ऋण ऋण है तो व्याज भी है। देना तो पड़ेगा ही। शरीर प्राप्त किया तो फिर कर्म भी करने पड़ेगें। कर्म ही ब्याज है, कर्म ही मूलधन की वापसी है। जब तक इस भाव से कार्य नहीं करोगे हर समय मृत्यु दरवाजे पर खड़ी होगी मांगने वाले के समान। रोने से मृत्यु थोड़ी टल जायेगी। आपको शरीर क्यों दिया गया? क्योंकि आपने कर्म सम्पादित करने के लिए उसे मांगा। युधिष्ठिर से यक्ष ने पूछा कि इस पृथ्वी का सबसे बड़ा सत्य क्या है? युधिष्ठिर ने कहा इस पृथ्वी का सबसे बड़ा सत्य यह है कि सभी लोग मृत्यु से भाग रहे हैं अर्थात मृत्यु परम सत्य है इससे भागने से कुछ नहीं होगा। क्या मृत्यु एक आयामी है? नहीं कदापि नहीं। मृत्यु के अनंत आयाम हैं। एक शरीर में अनेक पुरुष हैं किसी न किसी पुरुष की मृत्यु किसी न किसी क्षण हो हीं जाती है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍12❤2🙏1
मृत्यु महोत्सव (४)
किसी स्त्री ने शिकायत की उसका पति काम रहित हो गया है। वह कामरहित, नहीं हुआ है बल्कि उसके अंदर विराजमान काम पुरुष की मुत्यु हो गई है। मृत्यु हो गई है तो हो गई । उसका यह निम्र कोटी का कर्म समाप्त हो गया तो हो गया। क्रोध चला गया तो चला गया क्रोध रूपी पुरुष की मृत्यु हो गई तो हो गई। सबकी सब ग्रंथियाँ मृत्यु के अधीन हैं। बाल सफेद हो गये अर्थात बाल काला करने की ग्रंथि की मृत्यु हो गई। वह निष्क्रिय हो गई। उसका जीवन चक्र पूरा हो गया। अब परेशान होने से क्या फायदा जब तुम्हारा स्वयं का शरीर अमर
नहीं है तो किसी एक ग्रंथि विशेष । मृत्यु पर इतना संताप क्यों । कुल मिला-जुलाकर दो की बाते स्पष्ट होती हैं पहली जो तत्व जितना ज्यादा गतिशील, जितना ज्यादा काल के प्रभाव से ग्रसित होगा उसकी मृत्यु उतनी ही निकट है दूसरी जो नित्य और प्रति नूतन है जिसके ऊपर काल का प्रभाव नगण्य या शून्य है वह अमर है अजर है। वह मृत्यु के अधीन नहीं है। दो विपरीत धारा बह रही है एक बिन्दु मृत्यु का है दूसरा अमृत्व का मृत्यु के क्षेत्र में काल आता है। जैसे ही आप अमृत्व की और बढ़ेंगे मृत्यु के कारक पीछे छूटते जायेंगे और काल के प्रभाव को जहाँ आपने लांघा अमृत कुण्ड सामने दिखाई देगा।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
किसी स्त्री ने शिकायत की उसका पति काम रहित हो गया है। वह कामरहित, नहीं हुआ है बल्कि उसके अंदर विराजमान काम पुरुष की मुत्यु हो गई है। मृत्यु हो गई है तो हो गई । उसका यह निम्र कोटी का कर्म समाप्त हो गया तो हो गया। क्रोध चला गया तो चला गया क्रोध रूपी पुरुष की मृत्यु हो गई तो हो गई। सबकी सब ग्रंथियाँ मृत्यु के अधीन हैं। बाल सफेद हो गये अर्थात बाल काला करने की ग्रंथि की मृत्यु हो गई। वह निष्क्रिय हो गई। उसका जीवन चक्र पूरा हो गया। अब परेशान होने से क्या फायदा जब तुम्हारा स्वयं का शरीर अमर
नहीं है तो किसी एक ग्रंथि विशेष । मृत्यु पर इतना संताप क्यों । कुल मिला-जुलाकर दो की बाते स्पष्ट होती हैं पहली जो तत्व जितना ज्यादा गतिशील, जितना ज्यादा काल के प्रभाव से ग्रसित होगा उसकी मृत्यु उतनी ही निकट है दूसरी जो नित्य और प्रति नूतन है जिसके ऊपर काल का प्रभाव नगण्य या शून्य है वह अमर है अजर है। वह मृत्यु के अधीन नहीं है। दो विपरीत धारा बह रही है एक बिन्दु मृत्यु का है दूसरा अमृत्व का मृत्यु के क्षेत्र में काल आता है। जैसे ही आप अमृत्व की और बढ़ेंगे मृत्यु के कारक पीछे छूटते जायेंगे और काल के प्रभाव को जहाँ आपने लांघा अमृत कुण्ड सामने दिखाई देगा।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
👍19❤9🙏3🔥1
नरसिंह रहस्यम्
--------------------
दिव्य महाकैलाश पर विराजमान परम शिव अपने तीनों नेत्रों से अनंत ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण एवं प्राणी को निहार रहे थे। शिव त्रिनेत्रों के माध्यम से ही समस्त देवताओं के साथ- साथ प्रत्येक सूर्य, चंद्र, नक्षत्र इत्यादि को नियंत्रित करते रहते हैं एवं उनकी प्रत्येक गतिविधियों पर लगाम लगाये रखते हैं तभी अचानक उमा ने लीलावश परम शिव के दोनों नेत्र अपनी हथेलियों से ढँक दिए। शिव तीसरे नेत्र के माध्यम से सृष्टि का अवलोकन कर रहे थे तभी उमा ने उनका तीसरा नेत्र भी ढँक दिया। आद्या ने लीलावश प्रथम बार समस्त सृष्टि को पाश विहीन होने का अनुभव दे दिया। अचानक सृष्टि प्रकाश विहीन हो उठी एवं नैतिकता, मर्यादा, आध्यात्मिकता, सामाजिकता, मानसिकता इत्यादि के पाश समाप्त हो गये।
कुछ क्षण के लिए उमा की इस लीला से शिव की सर्वव्यापकता, नित्य व्यापकता इत्यादि का समस्त जगत में विलोप हो गया। चारों तरफ उन्मुकता ही उन्मुकता, पशुता ही पशुता बची। उमा और शिव के इस अद्भुत मिलन से, विचित्र संयोग से प्रथम सकंर वर्ण निर्मित हो उठा अर्थात अंधक जन्म ले बैठा। एक ऐसा जीव जो कि न तो मनुष्य था,न पशु,न असुर था,न देव क्योंकि बंधन नष्ट हुए थे, मर्यादा खत्म हुई थी शिवाभाव का ह्रास हुआ था अन्यथा इस प्रकार की विचित्र सृष्टि सम्भव नहीं होती। सभी मर्यादा में रहते हैं, जीवन का प्रत्येक तल मर्यादा में रहता है। जीवन का प्रत्येक तल मर्यादा में ही संसर्ग करता है। पशु योनि पशु ही उत्पन्न करती है, मनुष्य योनि मनुष्य ही उत्पन्न करती है, देव योनि में देव ही उत्पन्न होते हैं। वनस्पति जगत में वनस्पति का ही प्रादुर्भाव होता है।
मर्यादा का शिव भय के कारण ही सृष्टि में सभी पालन करते हैं। आद्य और आद्या का अनैसर्गिक प्रणय, अकारण प्रणय, कुछ विचित्र सा मिलन सम्पन्न हुआ जिसके कारण विचित्र जीव अंधक का प्रादुर्भाव हुआ। उमा की चेतना जागी, शिव के त्रिनेत्रों पर से आवरण हटा परन्तु तब तक देर हो चुकी थी और अंधक सृष्टि में आ ही गया, पशुत्व और शिवत्व का अद्भुत चित्र रच ही गया। यह है भावावेश में हुआ सृजन । उमा ने भावावेश में शिवं की आँखें मूंदी अर्थात भावावेश के कारण शिव और शक्ति का मिलन हुआ। भाव के आवेश में उन्मुक्तता ही उन्मुक्तता होती है, भावावेश स्त्री पुरुषों को देखिए वे सब कुछ भूल जाते हैं, पूर्ण उन्मुक्त हो जाते हैं। प्रेम के भाव में ग्रसित, धन के भाव में ग्रसित, सौन्दर्य के भाव में ग्रसित, राज्य के भाव में ग्रसित, सत्ता के भाव में ग्रसित जातक उन्मादी होते हैं, अंधे होते हैं एवं किसी मर्यादा किसी नियम, किसी सिद्धांत को नहीं मानते। उनकी आँखों के सामने समस्त जगत की समस्त गतिविधियाँ अदृश्य हो जाती हैं। वे सिर्फ एक भाव में जीते हैं। वे पाप पुण्य, अच्छा-बुरा, सही-गलत, जीवन-मृत्यु, हिंसा-अहिंसा, भूख प्यास इत्यादि सब भूल जाते हैं। दिन और रात का फर्क भी समाप्त हो जाता है, भावावेश में काल तो क्या महाकाल की उपस्थिति भी नगण्य हो जाती है।
भान की समाप्ति, प्रकाश की समाप्ति, अस्तित्व की समाप्ति का नाम है भावावेश। श्रीहरि का भावावेश अवतार भाव के आवेश में आकर अवतार लेना, भाव के आवेश में आकर कुछ नये रूप में सृजित होना। नरसिंह किसी की कोख से पैदा नहीं हुए, किसी के पुत्र नहीं बने, उनकी कोई माता नहीं है अपितु वे तो भक्त के भाव के आवेश में आकर खम्भा फाड़कर प्रकट हो गये। उन्होंने राज नहीं किया, कुछ क्षण के लिए पृथ्वी पर रहे, कार्य सम्पन्न और नरसिंह अवतार का गमन । अदृश्य से आये कुछ क्षण के लिए, दृश्यमान हुए और पुनः अदृश्य में विलीन । शिव और उमा की लीला ने प्रथम बार ब्रह्मा को भावावेश का अनुभव कराया।
भाव का वेग कितना प्रचण्ड होता है, भाव की अनुभूति कितनी परम है ब्रह्मा यह समझ गये। भाव तत्व अब ब्रह्मा ने सीख लिया था तत्काल ही ब्रह्मा ने समस्त रचनाओं में भाव का स्थापत्य कर दिया। महाउन्मुक्तता विष्णु को भी भा गई वृषभ अवतार ले बैठे। ऋषभ देव को जैन सम्प्रदाय अपना प्रथम तीर्थंकर मानता है परन्तु सनातन धर्म में वे हैं विष्णु अवतार। ऋषभ अवतार के रूप में विष्णु सर्वथा नग्न, शरीर के भान से भी मुक्त, समस्त क्रियाकलापों से मुक्त, न उम्र की परवाह, न काम की परवाह, न स्त्री का आकर्षण, न धन और राज्य का आकर्षण, न चोट का एहसास, न मृत्यु का भय, न शारीरिक गतिविधियों के कारण शर्म का भय अर्थात महाउन्मुक्तता। ऋषभ देव इतने महाउन्मुक्त थे, इतने भावातीत ध्यान में मग्न रहते थे कि बालकों के समान जब जरूरत पड़ी कहीं पर भी मल-मूत्र त्याग कर देते थे। सर्वथा मुक्त ऋषभ जी परम शिव के ध्यान में बस खोये रहते थे, यही है पाशुपत व्रत्त।
.
(क्रमशः)
🙏@Sanatan
--------------------
दिव्य महाकैलाश पर विराजमान परम शिव अपने तीनों नेत्रों से अनंत ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण एवं प्राणी को निहार रहे थे। शिव त्रिनेत्रों के माध्यम से ही समस्त देवताओं के साथ- साथ प्रत्येक सूर्य, चंद्र, नक्षत्र इत्यादि को नियंत्रित करते रहते हैं एवं उनकी प्रत्येक गतिविधियों पर लगाम लगाये रखते हैं तभी अचानक उमा ने लीलावश परम शिव के दोनों नेत्र अपनी हथेलियों से ढँक दिए। शिव तीसरे नेत्र के माध्यम से सृष्टि का अवलोकन कर रहे थे तभी उमा ने उनका तीसरा नेत्र भी ढँक दिया। आद्या ने लीलावश प्रथम बार समस्त सृष्टि को पाश विहीन होने का अनुभव दे दिया। अचानक सृष्टि प्रकाश विहीन हो उठी एवं नैतिकता, मर्यादा, आध्यात्मिकता, सामाजिकता, मानसिकता इत्यादि के पाश समाप्त हो गये।
कुछ क्षण के लिए उमा की इस लीला से शिव की सर्वव्यापकता, नित्य व्यापकता इत्यादि का समस्त जगत में विलोप हो गया। चारों तरफ उन्मुकता ही उन्मुकता, पशुता ही पशुता बची। उमा और शिव के इस अद्भुत मिलन से, विचित्र संयोग से प्रथम सकंर वर्ण निर्मित हो उठा अर्थात अंधक जन्म ले बैठा। एक ऐसा जीव जो कि न तो मनुष्य था,न पशु,न असुर था,न देव क्योंकि बंधन नष्ट हुए थे, मर्यादा खत्म हुई थी शिवाभाव का ह्रास हुआ था अन्यथा इस प्रकार की विचित्र सृष्टि सम्भव नहीं होती। सभी मर्यादा में रहते हैं, जीवन का प्रत्येक तल मर्यादा में रहता है। जीवन का प्रत्येक तल मर्यादा में ही संसर्ग करता है। पशु योनि पशु ही उत्पन्न करती है, मनुष्य योनि मनुष्य ही उत्पन्न करती है, देव योनि में देव ही उत्पन्न होते हैं। वनस्पति जगत में वनस्पति का ही प्रादुर्भाव होता है।
मर्यादा का शिव भय के कारण ही सृष्टि में सभी पालन करते हैं। आद्य और आद्या का अनैसर्गिक प्रणय, अकारण प्रणय, कुछ विचित्र सा मिलन सम्पन्न हुआ जिसके कारण विचित्र जीव अंधक का प्रादुर्भाव हुआ। उमा की चेतना जागी, शिव के त्रिनेत्रों पर से आवरण हटा परन्तु तब तक देर हो चुकी थी और अंधक सृष्टि में आ ही गया, पशुत्व और शिवत्व का अद्भुत चित्र रच ही गया। यह है भावावेश में हुआ सृजन । उमा ने भावावेश में शिवं की आँखें मूंदी अर्थात भावावेश के कारण शिव और शक्ति का मिलन हुआ। भाव के आवेश में उन्मुक्तता ही उन्मुक्तता होती है, भावावेश स्त्री पुरुषों को देखिए वे सब कुछ भूल जाते हैं, पूर्ण उन्मुक्त हो जाते हैं। प्रेम के भाव में ग्रसित, धन के भाव में ग्रसित, सौन्दर्य के भाव में ग्रसित, राज्य के भाव में ग्रसित, सत्ता के भाव में ग्रसित जातक उन्मादी होते हैं, अंधे होते हैं एवं किसी मर्यादा किसी नियम, किसी सिद्धांत को नहीं मानते। उनकी आँखों के सामने समस्त जगत की समस्त गतिविधियाँ अदृश्य हो जाती हैं। वे सिर्फ एक भाव में जीते हैं। वे पाप पुण्य, अच्छा-बुरा, सही-गलत, जीवन-मृत्यु, हिंसा-अहिंसा, भूख प्यास इत्यादि सब भूल जाते हैं। दिन और रात का फर्क भी समाप्त हो जाता है, भावावेश में काल तो क्या महाकाल की उपस्थिति भी नगण्य हो जाती है।
भान की समाप्ति, प्रकाश की समाप्ति, अस्तित्व की समाप्ति का नाम है भावावेश। श्रीहरि का भावावेश अवतार भाव के आवेश में आकर अवतार लेना, भाव के आवेश में आकर कुछ नये रूप में सृजित होना। नरसिंह किसी की कोख से पैदा नहीं हुए, किसी के पुत्र नहीं बने, उनकी कोई माता नहीं है अपितु वे तो भक्त के भाव के आवेश में आकर खम्भा फाड़कर प्रकट हो गये। उन्होंने राज नहीं किया, कुछ क्षण के लिए पृथ्वी पर रहे, कार्य सम्पन्न और नरसिंह अवतार का गमन । अदृश्य से आये कुछ क्षण के लिए, दृश्यमान हुए और पुनः अदृश्य में विलीन । शिव और उमा की लीला ने प्रथम बार ब्रह्मा को भावावेश का अनुभव कराया।
भाव का वेग कितना प्रचण्ड होता है, भाव की अनुभूति कितनी परम है ब्रह्मा यह समझ गये। भाव तत्व अब ब्रह्मा ने सीख लिया था तत्काल ही ब्रह्मा ने समस्त रचनाओं में भाव का स्थापत्य कर दिया। महाउन्मुक्तता विष्णु को भी भा गई वृषभ अवतार ले बैठे। ऋषभ देव को जैन सम्प्रदाय अपना प्रथम तीर्थंकर मानता है परन्तु सनातन धर्म में वे हैं विष्णु अवतार। ऋषभ अवतार के रूप में विष्णु सर्वथा नग्न, शरीर के भान से भी मुक्त, समस्त क्रियाकलापों से मुक्त, न उम्र की परवाह, न काम की परवाह, न स्त्री का आकर्षण, न धन और राज्य का आकर्षण, न चोट का एहसास, न मृत्यु का भय, न शारीरिक गतिविधियों के कारण शर्म का भय अर्थात महाउन्मुक्तता। ऋषभ देव इतने महाउन्मुक्त थे, इतने भावातीत ध्यान में मग्न रहते थे कि बालकों के समान जब जरूरत पड़ी कहीं पर भी मल-मूत्र त्याग कर देते थे। सर्वथा मुक्त ऋषभ जी परम शिव के ध्यान में बस खोये रहते थे, यही है पाशुपत व्रत्त।
.
(क्रमशः)
🙏@Sanatan
👍12
नरसिंह रहस्यम् (२)
------------
वन में घोर अग्नि अनुसंधान हो रहा था, दक्षिण क्षेत्र में वन धू-धू करके दधक रहे थे और भावातीत ध्यान में मग्न ऋषभ देव शिव के भावावेश में वन में प्रविष्ठ हो गये, वन के साथ साथ शरीर भी धू-धू करके जल उठा, वन में ही विलीन हो गये ऋषभ देव । जो शिव ने अनुभव किया उमा के सानिध्य में प्रचण्ड भावावेश वही अनुभव प्राप्त करने के लिए श्रीहरि ने भी ऋषभ देव नरसिंह, परशुराम इत्यादि के रूप में अनेकों बार भावावेश अवतार ग्रहण किए। आसमान में बिजली कड़कती है, समुद्र में ज्वर उठते हैं, वायु अंधड़ का रूप लेकर सब कुछ उड़ा ले जाने को तत्पर हो जाती है, वर्षा के बादल फट जाते हैं, पृथ्वी डोल उठती हैं, अग्नि की लपटें ज्वालामुखी से निकल निकल कर आसमान को छू लेने की कोशिश करती हैं, दैत्य पगला उठते हैं, मनुष्य नृत्य कर उठते हैं,स्त्री-पुरुष आवेशित हो क्या-क्या नहीं करते? सभी भावावेश में आते हैं। भावावेश क्षणिक है परन्तु सत्य है। भावावेश न हो तो युद्ध ही न हो, प्रेम ही न हो, स्त्री- पुरुष का मिलन ही न हो, सब कुछ मंद पड़ जायेगा,चारों तरफ नीरवता ही नीरवता छा जायेगी। आवेशित नदियाँ न बहें तो जल प्रपातों की रचना सम्भव नहीं,पहाड़ों का सीना चीरना सम्भव नहीं। नर्मदा जब आवेशित होती है तो अपने साथ बड़े-बड़े प्रस्तर खण्ड भी बहा ले जाती है, सिंह जब आवेशित होता है तो भैरव नाद करता है। भैरव नाद क्या है ? यह समस्त पशुओं की समझ में आ जाता है। सिंह का नाद ही महाभैरव नाद है हिलाकर रख देता है समस्त पशुओं, मनुष्यों के हृदय को ।
नरसिंह अवतार में जब विष्णु ने यही महाभैरव नाद किया था तो दैत्यों के हृदय फट गये थे, हिरण्यकशिपु के समस्त पाप धुल गये थे, वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था, मल-मूत्र का त्याग कर बैठा था। अंधक का तो जन्म ही आद्य और आद्या के भावावेश के कारण हुआ था अतः वह तो जीता जागता भाव जगत का पिण्ड था और उसे ग्रहण किया पुत्र के रूप में हिरण्याक्ष ने। हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप सदैव भावावेश में ही इष्टोपासना, शिवोपासना, ब्रह्मोपासना सम्पन्न करते थे। हिरण्याक्ष इतना भावावेशी था कि कहीं पृथ्वी पर जीवन न सृजित हो जाये अतः वह पृथ्वी को रसातल में उठा ले गया। ब्रह्मा यह देख आवेशित हो उठे, उनकी भौंहें तन गईं, नासिका लाल हो गईं और अचानक आवेशित हो फड़कने लगीं तभी जोर की छींक आयी । ब्रह्मा के इस आवेशित ब्रह्मचित्र से उनकी नासिका छिद्र के द्वारा विष्णु का वराह अवतार सम्पन्न हो गया।देखते ही देखते एक अद्भुत वराह मुख लिए हुए स्वस्थ शिशु सृजित हो गया, ब्रह्मा अपनी इस भाव आवेशित संरचना को देख मुस्कुरा उठे, पुनःभाव के परम आवेश में आ परम आनंदित हो उठे।भाव जगत की यह विशेषता है कि उसमें अगर किसी चित्र का निर्माण हो गया तो वह अकल्पनिक गति से विकसित होता जाता हैभाव जगत में उत्पन्न चित्र देखते ही देखते सम्पूर्ण भाव जगत में सर्वमय हो उठता है ठीक इसी प्रकार विष्णु के वराह अवतार ने देखते ही देखते अति विशाल रूप धारण कर लिया और जल में प्रविष्ठ हो हिरण्याक्ष का वध कर डाला एवं पृथ्वी को पुनः रसातल से निकालकर स्थापित कर दिया।
हिरण्याक्ष वधं का समाचार मिलते ही भानुमति पति वियोग में आवेशित हो उठी, उद्वेलित हो उठी, जाग गया उसका भाव केन्द्र, भूल गईं सब कुछ। जब भाव केन्द्र जाग उठता है तो सिर्फ अनियंत्रण ही अनियंत्रण होता है। जाग तो मीरा का भी भाव केन्द्र गया था, राजमहल छोड़ पग में घुंघरू बांध नाच उठी थीं। विष्णु का तो प्रत्येक अवतार एक विशेष भाव में आवेशित होता ही है। भाव केन्द्र को आवेशित करना, भाव केन्द्र को जागृत करना,भाव केन्द्र के माध्यम से भक्तों को दर्शन देना,भाव जगत का प्राणी बनाकर रख देना, भावों को मथकर रख देना यही तो विष्णु की विशेषता है चाहे कृष्ण के रूप में पूर्णांश हों,राम के रूप में अंशांश हों या फिर परशुराम, नरसिंह, वामन इत्यादि रूपों में भावांश हों।
विष्णु भाव केन्द्र को ही मथते हैं,अर्जुन का भाव केन्द्र जागृत कर उसे विराट स्वरूप दिखा दिया, असुरों के भाव केन्द्र को जागृत कर मोहिनी अवतार ले उन्हें ठग बैठे।यहाँ तक कि जब विष्णु ने अपना परम मोहिनी स्वरूप शिव को दिखाया तो शिव भी स्खलित हो बैठे,विष्णु के पीछे दौड़ उठे।तब से लेकर आज तक विष्णु की माया भाव केन्द्र के माध्यम से ही काम करती हैं। भाव केन्द्र अच्छा है या बुरा यह विषय नहीं है अपितु विषय यह है कि भाव केन्द्र के अभाव में कोई भी जातक अध्यात्म जगत से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता परन्तु भाव केन्द्र से ऊपर भी कुछ है वह शिव क्षेत्र है।अभी उस पर चर्चा करना जरूरी नहीं है फिर कभी चर्चा करेंगे। हिरण्याक्ष की पत्नी भानुमती सति होने जा रही थीं सबने समझाया पर नहीं मानी। दैत्य, असुर कौन हैं ? यह सबके सब मानसिक विक्षप्त हैं अर्थात अंग्रेजी में साइको हैं ।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
------------
वन में घोर अग्नि अनुसंधान हो रहा था, दक्षिण क्षेत्र में वन धू-धू करके दधक रहे थे और भावातीत ध्यान में मग्न ऋषभ देव शिव के भावावेश में वन में प्रविष्ठ हो गये, वन के साथ साथ शरीर भी धू-धू करके जल उठा, वन में ही विलीन हो गये ऋषभ देव । जो शिव ने अनुभव किया उमा के सानिध्य में प्रचण्ड भावावेश वही अनुभव प्राप्त करने के लिए श्रीहरि ने भी ऋषभ देव नरसिंह, परशुराम इत्यादि के रूप में अनेकों बार भावावेश अवतार ग्रहण किए। आसमान में बिजली कड़कती है, समुद्र में ज्वर उठते हैं, वायु अंधड़ का रूप लेकर सब कुछ उड़ा ले जाने को तत्पर हो जाती है, वर्षा के बादल फट जाते हैं, पृथ्वी डोल उठती हैं, अग्नि की लपटें ज्वालामुखी से निकल निकल कर आसमान को छू लेने की कोशिश करती हैं, दैत्य पगला उठते हैं, मनुष्य नृत्य कर उठते हैं,स्त्री-पुरुष आवेशित हो क्या-क्या नहीं करते? सभी भावावेश में आते हैं। भावावेश क्षणिक है परन्तु सत्य है। भावावेश न हो तो युद्ध ही न हो, प्रेम ही न हो, स्त्री- पुरुष का मिलन ही न हो, सब कुछ मंद पड़ जायेगा,चारों तरफ नीरवता ही नीरवता छा जायेगी। आवेशित नदियाँ न बहें तो जल प्रपातों की रचना सम्भव नहीं,पहाड़ों का सीना चीरना सम्भव नहीं। नर्मदा जब आवेशित होती है तो अपने साथ बड़े-बड़े प्रस्तर खण्ड भी बहा ले जाती है, सिंह जब आवेशित होता है तो भैरव नाद करता है। भैरव नाद क्या है ? यह समस्त पशुओं की समझ में आ जाता है। सिंह का नाद ही महाभैरव नाद है हिलाकर रख देता है समस्त पशुओं, मनुष्यों के हृदय को ।
नरसिंह अवतार में जब विष्णु ने यही महाभैरव नाद किया था तो दैत्यों के हृदय फट गये थे, हिरण्यकशिपु के समस्त पाप धुल गये थे, वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था, मल-मूत्र का त्याग कर बैठा था। अंधक का तो जन्म ही आद्य और आद्या के भावावेश के कारण हुआ था अतः वह तो जीता जागता भाव जगत का पिण्ड था और उसे ग्रहण किया पुत्र के रूप में हिरण्याक्ष ने। हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप सदैव भावावेश में ही इष्टोपासना, शिवोपासना, ब्रह्मोपासना सम्पन्न करते थे। हिरण्याक्ष इतना भावावेशी था कि कहीं पृथ्वी पर जीवन न सृजित हो जाये अतः वह पृथ्वी को रसातल में उठा ले गया। ब्रह्मा यह देख आवेशित हो उठे, उनकी भौंहें तन गईं, नासिका लाल हो गईं और अचानक आवेशित हो फड़कने लगीं तभी जोर की छींक आयी । ब्रह्मा के इस आवेशित ब्रह्मचित्र से उनकी नासिका छिद्र के द्वारा विष्णु का वराह अवतार सम्पन्न हो गया।देखते ही देखते एक अद्भुत वराह मुख लिए हुए स्वस्थ शिशु सृजित हो गया, ब्रह्मा अपनी इस भाव आवेशित संरचना को देख मुस्कुरा उठे, पुनःभाव के परम आवेश में आ परम आनंदित हो उठे।भाव जगत की यह विशेषता है कि उसमें अगर किसी चित्र का निर्माण हो गया तो वह अकल्पनिक गति से विकसित होता जाता हैभाव जगत में उत्पन्न चित्र देखते ही देखते सम्पूर्ण भाव जगत में सर्वमय हो उठता है ठीक इसी प्रकार विष्णु के वराह अवतार ने देखते ही देखते अति विशाल रूप धारण कर लिया और जल में प्रविष्ठ हो हिरण्याक्ष का वध कर डाला एवं पृथ्वी को पुनः रसातल से निकालकर स्थापित कर दिया।
हिरण्याक्ष वधं का समाचार मिलते ही भानुमति पति वियोग में आवेशित हो उठी, उद्वेलित हो उठी, जाग गया उसका भाव केन्द्र, भूल गईं सब कुछ। जब भाव केन्द्र जाग उठता है तो सिर्फ अनियंत्रण ही अनियंत्रण होता है। जाग तो मीरा का भी भाव केन्द्र गया था, राजमहल छोड़ पग में घुंघरू बांध नाच उठी थीं। विष्णु का तो प्रत्येक अवतार एक विशेष भाव में आवेशित होता ही है। भाव केन्द्र को आवेशित करना, भाव केन्द्र को जागृत करना,भाव केन्द्र के माध्यम से भक्तों को दर्शन देना,भाव जगत का प्राणी बनाकर रख देना, भावों को मथकर रख देना यही तो विष्णु की विशेषता है चाहे कृष्ण के रूप में पूर्णांश हों,राम के रूप में अंशांश हों या फिर परशुराम, नरसिंह, वामन इत्यादि रूपों में भावांश हों।
विष्णु भाव केन्द्र को ही मथते हैं,अर्जुन का भाव केन्द्र जागृत कर उसे विराट स्वरूप दिखा दिया, असुरों के भाव केन्द्र को जागृत कर मोहिनी अवतार ले उन्हें ठग बैठे।यहाँ तक कि जब विष्णु ने अपना परम मोहिनी स्वरूप शिव को दिखाया तो शिव भी स्खलित हो बैठे,विष्णु के पीछे दौड़ उठे।तब से लेकर आज तक विष्णु की माया भाव केन्द्र के माध्यम से ही काम करती हैं। भाव केन्द्र अच्छा है या बुरा यह विषय नहीं है अपितु विषय यह है कि भाव केन्द्र के अभाव में कोई भी जातक अध्यात्म जगत से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता परन्तु भाव केन्द्र से ऊपर भी कुछ है वह शिव क्षेत्र है।अभी उस पर चर्चा करना जरूरी नहीं है फिर कभी चर्चा करेंगे। हिरण्याक्ष की पत्नी भानुमती सति होने जा रही थीं सबने समझाया पर नहीं मानी। दैत्य, असुर कौन हैं ? यह सबके सब मानसिक विक्षप्त हैं अर्थात अंग्रेजी में साइको हैं ।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍12
नरसिंह रहस्यम् (३)
----------------
दैत्यों और असुरों में मानस का वेग असंतुलित होता है,संतुलन दैत्यों और असुरों का स्वभाव नहीं है। 50 फीसदी आध्यात्मिक साधक मानसिक विक्षप्त होते हैं, उनका मानस पूरी तरह से नाना प्रकार की विक्षप्ताओं से ग्रसित होता है। एक प्रकार से यह जीव संरचना में कुछ कमी, कुछ न्यूनता का द्योतक है। आवेशित ब्रह्मा द्वारा भावावेश में की गई संरचना से ही असुरत्व का निर्माण हुआ है एवं यह भव जगत का सबसे बदनुमा दाग है। मानसिक विक्षप्त, मानसिक रोगी कमजोर नहीं होते हैं अपितु अन्य जातकों की अपेक्षा ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा प्रचण्ड साधक, सनकी, धुन के पक्के होते हैं। इनमें जीवन जीने की शक्ति अन्यों की अपेक्षा कई करोड़ गुना ज्यादा विकसित होती है। मानसिक विक्षप्त नाना प्रकार की अलौकिक, गोपनीय, मानसिक, बौद्धिक, वैज्ञानिक, तार्किक, शारीरिक इत्यादि क्षमताओं से अन्यों के मुकाबले जयादा सम्पन्न होते हैं।
जिन लोगों में देवत्व होता है उनके चेहरे की बनावट अंग प्रत्यंग की बनावट, अत्यंत ही संतुलित, सुगठित एवं दर्शनीय होती है इसके विपरीत असुरत्व से ग्रसित स्त्री-पुरुषों के चेहरे की बनावट हमेशा असंतुलित होती है। इनके शरीर और मस्तिष्क में तार्तम्य नहीं होता, ये असंतुलित देह और मस्तिष्क के स्वामी होते हैं। ईश्वर शारीरिक लक्षणों के माध्यम से सब कुछ वर्णित करके भेज देता है, आँखें सब बता देती हैं। देखने का तरीका, स्थूलता, भद्दापन, आँखों की गतिविधियाँ इत्यादि जातक में असुरत्व है, देवत्व है, मनुषत्व है या पशुत्व है स्पष्ट रूप से इंगित कर देती है । भानुमति बोलीं अगर आप लोग मुझे जीवित रखना चाहते हैं तो प्रतिदिन मेरे उठने से पूर्व मेरी शय्या के नजदीक एक विष्णु भक्त का कटा हुआ, रक्त से सना हुआ शीश अवश्य रखा मिलना चाहिए। मेरी दृष्टि सर्वप्रथम विष्णु भक्त के कटे सिर पर पड़नी चाहिए।
भानुमति के भाव केन्द्र में विष्णु शत्रु के रूप में विराजमान हो गये। विष्णु की उपासना करने का अद्भुत विधान हैं। भजो चाहे शत्रु के रूप में, मित्र के रूप में, पति के रूप में, परम स्वरूप में, भगवान के स्वरूप में पर भजना मुझे ही पड़ेगा। विष्णु को शत्रु उपासना भी उतनी ही प्रिय है जितनी कि युद्धोपासना या प्रेमोपासना मार्ग कोई सा भी हो, लीला किसी भी प्रकार की रचनी पड़े आखिर में ले देकर विरहोपासना हो ही जाती है और जातक को किसी न किसी माध्यम से अंत में विष्णु मुक्ति प्रदान कर ही देते हैं। विष्णु छोड़ते नहीं है क्योंकि एक बार भाव जगत में बैठ गये, भाव केन्द्र के क्षीर सागर में शेषनाग पर विराजमान हो गये तो अंत में जातक को बैकुण्ठधाम प्राप्त हो ही जाता है।
भावावेश में विक्षप्त होना असुरों का दैत्यों का प्रमुख लक्षण है। हिरण्यकशिपु भी विष्णु भाव से ग्रसित हो गया सोते, उठते बैठते, जागते बस शत्रु के रूप में विष्णु ही विष्णु। विक्षप्तों के समान विष्णु को ढूंढ रहा था कहीं तो मिल जायें विष्णु, किसी भी तरह मिल जायें, किसी भी रूप में मिल जायें उसे तो विष्णु चाहिए थे। विष्णु नहीं मिले तो उसने समस्त विष्णु भक्तों को मार डाला, विष्णु पूजन प्रतिबंधित कर दिया, विष्णु उपासना केन्द्रों को ध्वस्त कर दिया, विष्णु साहित्य को नष्ट कर दिया। विष्णु विरोध, विष्णु द्रोह के माध्यम से ही वह "ॐ श्री विष्णवे नमः, ॐ श्री विष्णवे नमः" का उल्टा जप कर रहा था। उसने सभी विष्णु उपासकों को कारागृह में डाल दिया। उधर हिरण्याक्ष पुत्र अंधक भी भावावेशित हो उठा, आद्या के रूप पर मोहित हो उठा। आद्या को ही प्राप्त करने चल बैठा। शिव गणों से घोर युद्ध हुआ । भव अर्थात शिव को यह अच्छा नहीं लगा, शिव भव जगत से परे हैं तुरंत आद्या को छोड़ महापाशुपत अनुष्ठान के लिए प्रस्थान कर गये एवं आद्या के भाव से मुक्त हो गये। आद्या एकांत गुफा में शिव गणों के साथ शिव का इंतजार करने लगीं तभी पुन:अंधक ने आक्रमण कर दिया।
भव रोग से ग्रसित होने के कारण शिव गण परास्त होने लगे तभी आद्या ने विष्णु का ध्यान किया, वे भाव जगत के राजाधिराज हैं देखते ही देखते विष्णु अपनी समस्त मायावी शक्तियों के साथ युद्धरत हो गये, घोर युद्ध चलने लगा अचानक शिव का पाशुपत अनुष्ठान सम्पन्न हुआ वे आ पहुँचे। मैंने पूर्व में कहा भाव जगत की विशेषता यह है कि भवातीत प्राणी अतिशीघ्र ही अलौकिक वृद्धि को प्राप्त होते हैं आश्चर्य जनक रूप से वृद्धि सिद्धि उन्हें प्राप्त होती है। विष्णु तो सर्वमय भाव जगत के कारण ही हुए हैं, अंधक परम भाव सिद्ध था अतः जैसे ही शिव का त्रिशूल उसका छेदन करता उसके लहु की प्रत्येक बूंद से एक और अंधक निर्मित हो जाता । निराभाव शिव ने तत्काल ही विष्णु को अपने कर्ण में प्रविष्ट कर उन्हें योग विद्या के द्वारा स्त्री के रूप में परिवर्तित कर दिया। एक ऐसी स्त्री जो कि भूख से व्याकुल
(क्रमशः)
🙏@Sanatan
----------------
दैत्यों और असुरों में मानस का वेग असंतुलित होता है,संतुलन दैत्यों और असुरों का स्वभाव नहीं है। 50 फीसदी आध्यात्मिक साधक मानसिक विक्षप्त होते हैं, उनका मानस पूरी तरह से नाना प्रकार की विक्षप्ताओं से ग्रसित होता है। एक प्रकार से यह जीव संरचना में कुछ कमी, कुछ न्यूनता का द्योतक है। आवेशित ब्रह्मा द्वारा भावावेश में की गई संरचना से ही असुरत्व का निर्माण हुआ है एवं यह भव जगत का सबसे बदनुमा दाग है। मानसिक विक्षप्त, मानसिक रोगी कमजोर नहीं होते हैं अपितु अन्य जातकों की अपेक्षा ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा प्रचण्ड साधक, सनकी, धुन के पक्के होते हैं। इनमें जीवन जीने की शक्ति अन्यों की अपेक्षा कई करोड़ गुना ज्यादा विकसित होती है। मानसिक विक्षप्त नाना प्रकार की अलौकिक, गोपनीय, मानसिक, बौद्धिक, वैज्ञानिक, तार्किक, शारीरिक इत्यादि क्षमताओं से अन्यों के मुकाबले जयादा सम्पन्न होते हैं।
जिन लोगों में देवत्व होता है उनके चेहरे की बनावट अंग प्रत्यंग की बनावट, अत्यंत ही संतुलित, सुगठित एवं दर्शनीय होती है इसके विपरीत असुरत्व से ग्रसित स्त्री-पुरुषों के चेहरे की बनावट हमेशा असंतुलित होती है। इनके शरीर और मस्तिष्क में तार्तम्य नहीं होता, ये असंतुलित देह और मस्तिष्क के स्वामी होते हैं। ईश्वर शारीरिक लक्षणों के माध्यम से सब कुछ वर्णित करके भेज देता है, आँखें सब बता देती हैं। देखने का तरीका, स्थूलता, भद्दापन, आँखों की गतिविधियाँ इत्यादि जातक में असुरत्व है, देवत्व है, मनुषत्व है या पशुत्व है स्पष्ट रूप से इंगित कर देती है । भानुमति बोलीं अगर आप लोग मुझे जीवित रखना चाहते हैं तो प्रतिदिन मेरे उठने से पूर्व मेरी शय्या के नजदीक एक विष्णु भक्त का कटा हुआ, रक्त से सना हुआ शीश अवश्य रखा मिलना चाहिए। मेरी दृष्टि सर्वप्रथम विष्णु भक्त के कटे सिर पर पड़नी चाहिए।
भानुमति के भाव केन्द्र में विष्णु शत्रु के रूप में विराजमान हो गये। विष्णु की उपासना करने का अद्भुत विधान हैं। भजो चाहे शत्रु के रूप में, मित्र के रूप में, पति के रूप में, परम स्वरूप में, भगवान के स्वरूप में पर भजना मुझे ही पड़ेगा। विष्णु को शत्रु उपासना भी उतनी ही प्रिय है जितनी कि युद्धोपासना या प्रेमोपासना मार्ग कोई सा भी हो, लीला किसी भी प्रकार की रचनी पड़े आखिर में ले देकर विरहोपासना हो ही जाती है और जातक को किसी न किसी माध्यम से अंत में विष्णु मुक्ति प्रदान कर ही देते हैं। विष्णु छोड़ते नहीं है क्योंकि एक बार भाव जगत में बैठ गये, भाव केन्द्र के क्षीर सागर में शेषनाग पर विराजमान हो गये तो अंत में जातक को बैकुण्ठधाम प्राप्त हो ही जाता है।
भावावेश में विक्षप्त होना असुरों का दैत्यों का प्रमुख लक्षण है। हिरण्यकशिपु भी विष्णु भाव से ग्रसित हो गया सोते, उठते बैठते, जागते बस शत्रु के रूप में विष्णु ही विष्णु। विक्षप्तों के समान विष्णु को ढूंढ रहा था कहीं तो मिल जायें विष्णु, किसी भी तरह मिल जायें, किसी भी रूप में मिल जायें उसे तो विष्णु चाहिए थे। विष्णु नहीं मिले तो उसने समस्त विष्णु भक्तों को मार डाला, विष्णु पूजन प्रतिबंधित कर दिया, विष्णु उपासना केन्द्रों को ध्वस्त कर दिया, विष्णु साहित्य को नष्ट कर दिया। विष्णु विरोध, विष्णु द्रोह के माध्यम से ही वह "ॐ श्री विष्णवे नमः, ॐ श्री विष्णवे नमः" का उल्टा जप कर रहा था। उसने सभी विष्णु उपासकों को कारागृह में डाल दिया। उधर हिरण्याक्ष पुत्र अंधक भी भावावेशित हो उठा, आद्या के रूप पर मोहित हो उठा। आद्या को ही प्राप्त करने चल बैठा। शिव गणों से घोर युद्ध हुआ । भव अर्थात शिव को यह अच्छा नहीं लगा, शिव भव जगत से परे हैं तुरंत आद्या को छोड़ महापाशुपत अनुष्ठान के लिए प्रस्थान कर गये एवं आद्या के भाव से मुक्त हो गये। आद्या एकांत गुफा में शिव गणों के साथ शिव का इंतजार करने लगीं तभी पुन:अंधक ने आक्रमण कर दिया।
भव रोग से ग्रसित होने के कारण शिव गण परास्त होने लगे तभी आद्या ने विष्णु का ध्यान किया, वे भाव जगत के राजाधिराज हैं देखते ही देखते विष्णु अपनी समस्त मायावी शक्तियों के साथ युद्धरत हो गये, घोर युद्ध चलने लगा अचानक शिव का पाशुपत अनुष्ठान सम्पन्न हुआ वे आ पहुँचे। मैंने पूर्व में कहा भाव जगत की विशेषता यह है कि भवातीत प्राणी अतिशीघ्र ही अलौकिक वृद्धि को प्राप्त होते हैं आश्चर्य जनक रूप से वृद्धि सिद्धि उन्हें प्राप्त होती है। विष्णु तो सर्वमय भाव जगत के कारण ही हुए हैं, अंधक परम भाव सिद्ध था अतः जैसे ही शिव का त्रिशूल उसका छेदन करता उसके लहु की प्रत्येक बूंद से एक और अंधक निर्मित हो जाता । निराभाव शिव ने तत्काल ही विष्णु को अपने कर्ण में प्रविष्ट कर उन्हें योग विद्या के द्वारा स्त्री के रूप में परिवर्तित कर दिया। एक ऐसी स्त्री जो कि भूख से व्याकुल
(क्रमशः)
🙏@Sanatan
🙏11👍7❤2
नरसिंह रहस्यम् (४)
--------------------
कंकाल के समान, श्वेत वस्त्र धारण किए हुए उनके कर्ण से बाहर निकली और उसके साथ असंख्य मातृकाएं शिव ने सृजित कर दीं जो सबकी सब भूख के भाव से व्याकुल, परमक्षुधा भाव से ग्रसित और इस प्रकार माँ धूमावती के साथ चलने वाली अनेकों मातृकाएं उदित हो उठीं। कुछ ही क्षणों में उन सबने अंधक एवं उसकी सेना के समस्त लहू का पान कर लिया फिर भी चिल्लाती रहीं कि हमें भूख लगी है हमें भूख लगी है। धूमावती एवं उनकी गणिकाओं का यही स्वरूप है।
अंधक का समस्त शरीर शक्तिविहीन हो गया, लहू विहीन हो गया फिर भी वह परम भाव सिद्ध होने के कारण अपने नाखूनों से, सिर से, दाँतों से, पंजों से शिव पर प्रहार करने से नहीं चूक रहा था। अंत में शिव ने महाघोर भैरवनाद करते हुए अंधक का पेट फाड़ डाला त्रिशूल से एवं उसके हृदय कमल को निकालकर हाथों में ले लिया। विष्णु यह देख रहे थे कालान्तर नरसिंह रूप में विष्णु ने भी यही सब किया । शिव ने अंधक को त्रिशूल में पिरो लिया और उसे सुखा दिया। मातृकाएं पैदा तो हो गईं परन्तु उनका क्षुधाभाव नहीं गया, धूमावती ने शिव को ही निगल लिया परन्तु शिव धुंआ बन नासिका से निकल आये। महाकैलाश पर मातृकाएं चिल्लाने लगीं कि हमें भूख लगी है- हमें भूख लगी है। हम सब समस्त जीव, देव,असुर इत्यादि को खाकर अपनी भूख मिटायेंगे। शिव ने समझाया कि यह सृष्टि के नियम के विरुद्ध है परन्तु क्षुधा भाव से आवेशित मातृकाएं कहाँ मानने वाली थीं?
अंत में शिव ने ध्यान लगा विष्णु स्तवन किया। देखते ही देखते बिजलियाँ कड़कने लगीं, आकाश पिण्ड हिलने लगे, समस्त लोक डोलने लगे, समस्त जगत स्तम्भित हो गया और एक विराट नरसिंह आकृति ब्रह्माण्ड में उदित हो उठीं जिसकी देह में समस्त ब्रह्माण्ड समाया हुआ था, जिनके नेत्र द्वादश आदित्यों से भी ज्यादा प्रकाश वान थे, जिनके दंत और नख में असंख्य सृष्टि द्रोही दैत्य असुर मरे हुए चिपके थे, जिनके शरीर पर असुरों के रक्त के छींटे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। मातृकाएं घबरा गईं, उनका भावावेश जाता रहा। भाव का सामना महाभाव से हुआ, भैरवियों का सामना महाभैरव से हुआ और इस प्रकार सृष्टि में प्रथम भावेशित नरसिंह अवतार शिव ने रच दिया। चाहे कोई कितना भी भावेशित क्यों न हो, महाभावेशित नरसिंह अर्थात शिव के राजकुमार श्रीहरि जिन्हें आप महाविष्णु के नाम से भी जानते हैं समस्त भावों को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं।
राम, कृष्ण, बुद्ध, वामन, परशुराम या नर-नारायण, ऋषभ देव इत्यादि अनेकों विष्णु अवतार माता के गर्भ से उदित हुए हैं। इन्होंने मनुष्यों के रूप में बाल्यावस्था देखी है, पुत्र उत्पन्न किए हैं, राजपाट किया है अर्थात जो एक मनुष्य अपने जीवनकाल में समस्त क्रियाएं सम्पन्न करता है वे सब इन अवतारों ने की है परन्तु नरसिंह अवतार जो कि चाक्षुष मनवंतर में हुआ वह सबसे अल्पतम काल के लिए सम्पन्न हुआ अतः इस अवतार में महाविष्णु ने जो रूप दिखाया वह वास्तव में शिव तुल्य है, रुद्र तुल्य है। विष्णु ने हर अवतार में रुद्रात्मकता धारण की कुछ अंश तक परन्तु पूर्णांश में रुद्रात्मकता केवल नरसिंह अवतार में ही धारण की।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
--------------------
कंकाल के समान, श्वेत वस्त्र धारण किए हुए उनके कर्ण से बाहर निकली और उसके साथ असंख्य मातृकाएं शिव ने सृजित कर दीं जो सबकी सब भूख के भाव से व्याकुल, परमक्षुधा भाव से ग्रसित और इस प्रकार माँ धूमावती के साथ चलने वाली अनेकों मातृकाएं उदित हो उठीं। कुछ ही क्षणों में उन सबने अंधक एवं उसकी सेना के समस्त लहू का पान कर लिया फिर भी चिल्लाती रहीं कि हमें भूख लगी है हमें भूख लगी है। धूमावती एवं उनकी गणिकाओं का यही स्वरूप है।
अंधक का समस्त शरीर शक्तिविहीन हो गया, लहू विहीन हो गया फिर भी वह परम भाव सिद्ध होने के कारण अपने नाखूनों से, सिर से, दाँतों से, पंजों से शिव पर प्रहार करने से नहीं चूक रहा था। अंत में शिव ने महाघोर भैरवनाद करते हुए अंधक का पेट फाड़ डाला त्रिशूल से एवं उसके हृदय कमल को निकालकर हाथों में ले लिया। विष्णु यह देख रहे थे कालान्तर नरसिंह रूप में विष्णु ने भी यही सब किया । शिव ने अंधक को त्रिशूल में पिरो लिया और उसे सुखा दिया। मातृकाएं पैदा तो हो गईं परन्तु उनका क्षुधाभाव नहीं गया, धूमावती ने शिव को ही निगल लिया परन्तु शिव धुंआ बन नासिका से निकल आये। महाकैलाश पर मातृकाएं चिल्लाने लगीं कि हमें भूख लगी है- हमें भूख लगी है। हम सब समस्त जीव, देव,असुर इत्यादि को खाकर अपनी भूख मिटायेंगे। शिव ने समझाया कि यह सृष्टि के नियम के विरुद्ध है परन्तु क्षुधा भाव से आवेशित मातृकाएं कहाँ मानने वाली थीं?
अंत में शिव ने ध्यान लगा विष्णु स्तवन किया। देखते ही देखते बिजलियाँ कड़कने लगीं, आकाश पिण्ड हिलने लगे, समस्त लोक डोलने लगे, समस्त जगत स्तम्भित हो गया और एक विराट नरसिंह आकृति ब्रह्माण्ड में उदित हो उठीं जिसकी देह में समस्त ब्रह्माण्ड समाया हुआ था, जिनके नेत्र द्वादश आदित्यों से भी ज्यादा प्रकाश वान थे, जिनके दंत और नख में असंख्य सृष्टि द्रोही दैत्य असुर मरे हुए चिपके थे, जिनके शरीर पर असुरों के रक्त के छींटे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। मातृकाएं घबरा गईं, उनका भावावेश जाता रहा। भाव का सामना महाभाव से हुआ, भैरवियों का सामना महाभैरव से हुआ और इस प्रकार सृष्टि में प्रथम भावेशित नरसिंह अवतार शिव ने रच दिया। चाहे कोई कितना भी भावेशित क्यों न हो, महाभावेशित नरसिंह अर्थात शिव के राजकुमार श्रीहरि जिन्हें आप महाविष्णु के नाम से भी जानते हैं समस्त भावों को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं।
राम, कृष्ण, बुद्ध, वामन, परशुराम या नर-नारायण, ऋषभ देव इत्यादि अनेकों विष्णु अवतार माता के गर्भ से उदित हुए हैं। इन्होंने मनुष्यों के रूप में बाल्यावस्था देखी है, पुत्र उत्पन्न किए हैं, राजपाट किया है अर्थात जो एक मनुष्य अपने जीवनकाल में समस्त क्रियाएं सम्पन्न करता है वे सब इन अवतारों ने की है परन्तु नरसिंह अवतार जो कि चाक्षुष मनवंतर में हुआ वह सबसे अल्पतम काल के लिए सम्पन्न हुआ अतः इस अवतार में महाविष्णु ने जो रूप दिखाया वह वास्तव में शिव तुल्य है, रुद्र तुल्य है। विष्णु ने हर अवतार में रुद्रात्मकता धारण की कुछ अंश तक परन्तु पूर्णांश में रुद्रात्मकता केवल नरसिंह अवतार में ही धारण की।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍8
नरसिंह रहस्यम् (५)
--------------------
हिरण्यकशिपु का हिरण्यपुर अविभाजित पंजाब के मुलतान शहर में है। यहीं पर विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए थे। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु महर्षि कश्यप के पुत्र थे और महर्षि कश्यप की तपोस्थली का ही नाम मूल स्थान है। मूल पुरुष की भूमि को ही मूल स्थान कहा जाता है कालान्तर मूल स्थान नामक जगह मुलतान में परिवर्तित हो गईं। आज भी मुलतान के किले में भगवान नरसिंह का विराट मंदिर है एवं भक्त प्रहलाद के राजमहल के सभी अवशेष विराजमान हैं। जब भी भारतवर्ष पर आक्रमण हुआ मुलतान केन्द्र बिन्दु रहा। यह श्रीमाली कुल का स्थान है, यहाँ के शासक श्रीमाली कहलाते थे।
कई शताब्दियों तक श्रीमालियों ने मुलतान पर शासन किया, सिकन्दर ने भारत वर्ष पर आक्रमण किया मुलतान के श्रीमाली शासकों ने घोर युद्ध किया। सिकन्दर को पहली बार छाती में गम्भीर चोट लगी, एक गहरा घाव हो गया वह मृत्यु को प्राप्त होने ही वाला था तभी आपस की फूट का उसे लाभ मिला और मुलतान में श्रीमालियों का रक्त बहा । सिकन्दर के आदेश से असंख्य नर श्रीमालियों की हत्या हुई। मुलतान शहर वृद्ध, जवान, बाल्य पुरुष श्रीमालियों के रक्त से सन गया परन्तु सिकन्दर विजय प्राप्त नहीं कर पाया। श्रीमाली यौद्धाओं द्वारा प्राप्त घाव ही कालान्तर उसकी मृत्यु का कारण बना। यह इतिहास के पन्नों से लिया गया है। नरसिंह ने श्रीमालियों की रक्षा की। तुर्क आक्रमणकर्ताओं से लेकर सिकन्दर तक कोई भी मुलतान के किले में स्थापित नरसिंह अवतार के चिन्हों को नहीं मिटा पाया कालान्तर मुलतान सिक्खों का केन्द्र बिन्दु बना गुरु गोविन्द सिंह ने मुलतान के किले में पुन: पूर्ण विधि-विधान के साथ नरसिंहोपासना प्रारम्भ करवाई। सिक्खों के रूप में पुनः भारतवर्ष को नरसिंह तत्व प्राप्त हुआ एक परम आवेशित ऊर्जा प्राप्त हुई जिसने कि हिन्दु धर्म को संरक्षित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
--------------------
हिरण्यकशिपु का हिरण्यपुर अविभाजित पंजाब के मुलतान शहर में है। यहीं पर विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए थे। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु महर्षि कश्यप के पुत्र थे और महर्षि कश्यप की तपोस्थली का ही नाम मूल स्थान है। मूल पुरुष की भूमि को ही मूल स्थान कहा जाता है कालान्तर मूल स्थान नामक जगह मुलतान में परिवर्तित हो गईं। आज भी मुलतान के किले में भगवान नरसिंह का विराट मंदिर है एवं भक्त प्रहलाद के राजमहल के सभी अवशेष विराजमान हैं। जब भी भारतवर्ष पर आक्रमण हुआ मुलतान केन्द्र बिन्दु रहा। यह श्रीमाली कुल का स्थान है, यहाँ के शासक श्रीमाली कहलाते थे।
कई शताब्दियों तक श्रीमालियों ने मुलतान पर शासन किया, सिकन्दर ने भारत वर्ष पर आक्रमण किया मुलतान के श्रीमाली शासकों ने घोर युद्ध किया। सिकन्दर को पहली बार छाती में गम्भीर चोट लगी, एक गहरा घाव हो गया वह मृत्यु को प्राप्त होने ही वाला था तभी आपस की फूट का उसे लाभ मिला और मुलतान में श्रीमालियों का रक्त बहा । सिकन्दर के आदेश से असंख्य नर श्रीमालियों की हत्या हुई। मुलतान शहर वृद्ध, जवान, बाल्य पुरुष श्रीमालियों के रक्त से सन गया परन्तु सिकन्दर विजय प्राप्त नहीं कर पाया। श्रीमाली यौद्धाओं द्वारा प्राप्त घाव ही कालान्तर उसकी मृत्यु का कारण बना। यह इतिहास के पन्नों से लिया गया है। नरसिंह ने श्रीमालियों की रक्षा की। तुर्क आक्रमणकर्ताओं से लेकर सिकन्दर तक कोई भी मुलतान के किले में स्थापित नरसिंह अवतार के चिन्हों को नहीं मिटा पाया कालान्तर मुलतान सिक्खों का केन्द्र बिन्दु बना गुरु गोविन्द सिंह ने मुलतान के किले में पुन: पूर्ण विधि-विधान के साथ नरसिंहोपासना प्रारम्भ करवाई। सिक्खों के रूप में पुनः भारतवर्ष को नरसिंह तत्व प्राप्त हुआ एक परम आवेशित ऊर्जा प्राप्त हुई जिसने कि हिन्दु धर्म को संरक्षित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
🙏10👍3🥰3