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-150 प्रश्न हिंदी
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9 MB
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🔆 प्राचीन भारत में साहित्यिक गतिविधियाँ
📍 प्रारंभिक व्याकरण और कानून की पुस्तकें
✅ अष्टाध्यायी – पाणिनी (5वीं शताब्दी ईसा पूर्व) , सबसे प्रारंभिक व्याकरण पुस्तक, जिसे भगवती सूत्र भी कहा जाता है
✅ महाभाष्य – पतंजलि द्वारा लिखित
✅ मनुस्मृति – एक कानून की किताब
✅ अर्थशास्त्र – कौटिल्य द्वारा लिखित
✅ इंडिका – मेगस्थनीज द्वारा , मौर्य समाज और प्रशासन का एक स्रोत
✅ चण्डसूत्र – पिंगला द्वारा लिखित
📍 बौद्ध एवं शास्त्रीय साहित्यिक कृतियाँ
✅ बुद्धचरित – अश्वघोष द्वारा
✅ रघुवंश – कालिदास द्वारा
✅ नैषध चरित – श्री हर्ष द्वारा
📍 शास्त्रीय एवं काव्य साहित्य
✅ कामसूत्र और आर्य मंजुश्री – वात्स्यायन द्वारा
✅ पवनधूत – धोयी द्वारा
✅ स्वप्न वासवदत्ता – भासा द्वारा
✅ मतविलास प्रहसन – महेंद्रवर्मन प्रथम द्वारा
✅ हर्षचरित – बाणभट्ट द्वारा लिखित
✅ विक्रमदेव चरित – बिल्हण द्वारा लिखित
📍 संस्कृत एवं अन्य शास्त्रीय कृतियाँ
✅ दशकुमारचरित – दण्डिन द्वारा
✅ वासवदत्ता – सुबांडु द्वारा
✅ बृहत् कथामंजरी – क्षेमेन्द्र द्वारा
✅ कथासरित्सागर – सोमदेव द्वारा
✅ पंचतंत्र – विष्णुशर्मा द्वारा
✅ हितोपदेश – नारायण पंडित द्वारा
📍 यात्रा एवं ऐतिहासिक विवरण
✅ फ़ो-क्यो-की – फ़ा-हिएन द्वारा
✅ सी-यू-की – ह्वेन त्सांग द्वारा
📍 वैज्ञानिक एवं खगोलीय ग्रंथ
✅ पंचसिद्धांतिका – वराहमिहिर द्वारा
✅ सूर्यसिद्धांतिका और आर्यभट्टीयम – आर्यभट्ट द्वारा
✅ नीतिसार – कामन्दका द्वारा
✅ चरक संहिता – चरक द्वारा
✅ हस्तायुर्वेद – पालकाप्य द्वारा
📍 कानूनी और चिकित्सा ग्रंथ
✅ मिताक्षरा – विग्नेश्वर द्वारा
✅ दायभाग – जीमूतवाहन द्वारा
✅ सिद्धांत सिरोमणि – भास्कराचार्य द्वारा
✅ निगाहन्तु – धन्वन्तरि द्वारा
📍 ऐतिहासिक एवं राजनीतिक कार्य
✅ मुद्राराक्षस – विशाखदत्त द्वारा
✅ प्रबंध चिंतामणि – मेरुथुंगा द्वारा
✅ भारत का भूगोल – टॉलेमी द्वारा
✅ बृहत् कथाकोश – हरिषेण द्वारा
✅ मृचकटिका – शूद्रक द्वारा
✅ पृथ्वीराज विजया – जयानक द्वारा
✅ नाला वेम्बा – पुगालेंडी द्वारा
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✅ एक ही स्थान पर पूरी तैयारी - अब सिलेक्शन की जिम्मेदारी हमारी
आप सभी के रिस्पॉन्स पर ही यह बैच शुरू किया जाएगा,,,इतना विश्वास दिलाते हैं कि इस बैच के बाद आपको कहीं और भटकने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी,,, संपूर्ण और व्यवस्थित तैयारी, एक ही जगह l
तो क्या आप सब तैयार है ?
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◾️अभी नहीं 🙏
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बेसिक से लेकर एडवांस लेवल तक, हर विषय को टॉपिक-वाइज कवर किया जाएगा।
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Ancient history भारतीय इतिहास स्रोत l LECTURE 5 l RO-ARO | UPPSC | BEO |...
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Note 👉 ऐसे ही सभी सब्जेक्ट का रिवीजन करा देंगे
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52वाँ संशोधन (1985):
संसद और विधान मंडलों के सदस्यों को दल-बदल के आधार पर वर्गीकरण की व्यवस्था दी गई और इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए एक नई अनुसूची (दसवीं अनुसूची) को जोड़ा गया।
👉61वाँ संशोधन (1988)
विपक्ष और राज्य विधान सभा के चुनाव में मतदान की आयु 21 वर्ष से 18 वर्ष कर दी गई।
👉73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992):
73वाँ संशोधन अधिनियम:
इस संशोधन के माध्यम से अलौकिक राज संस्था को संवैधानिक बनाया गया।
👉इस अधिनियम में भारत के संविधान का एक नया भाग-IX जोड़ा गया है तथा इसमें 243 से 243O तक के जुलूस शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त अधिनियम में संविधान द्वारा एक नई 11वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया है और इसमें परियोजना के 29 संरचनात्मक विषयों को शामिल किया गया है।
👉74वाँ संशोधन अधिनियम:
👉शहरी स्थानीय संस्था 1992 में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान 74वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से इसे संवैधानिक बनाया गया था। यह 1 जून, 1993 को लागू हुआ।
इसमें भाग IX-A को जोड़ा गया है और इसमें 243-पी से 243-जेडजी तक के प्रॉजेक्ट को शामिल किया गया है।
👉इसके अलावा इस अधिनियम द्वारा संविधान में 12वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया । नगर पालिकाओं के 18 कार्यात्मक मद शामिल हैं।
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👉102वां संशोधन अधिनियम, 2018-
।
103वां संशोधन अधिनियम, 2019-
104वां संशोधन अधिनियम, 2020-
106वां संशोधन अधिनियम, 2020-
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राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
इस अधिनियम ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को पिछड़े वर्गों से संबंधित कार्यों से मुक्त कर दिया।
इसने राष्ट्रपति को किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को निर्दिष्ट करने का अधिकार भी दिया
।
103वां संशोधन अधिनियम, 2019-
राज्य को नागरिकों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने का अधिकार दिया गया।
ईडब्ल्यूएस श्रेणी का लाभ प्राप्त करने के लिए ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है।
राज्य को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए कुछ वर्गों के लिए 10% तक सीटें आरक्षित करने की अनुमति दी गई थी, जिसमें अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को छोड़कर निजी शैक्षणिक संस्थान भी शामिल थे, जिन्हें राज्य द्वारा सहायता प्राप्त या गैर-सहायता प्राप्त थी। 10% तक का यह अतिरिक्त आरक्षण पहले से किए गए आरक्षण के अतिरिक्त होगा।
104वां संशोधन अधिनियम, 2020-
लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों की समाप्ति की समय-सीमा को 70 वर्ष से बढ़ाकर 80 वर्ष करना।
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित सीटों को हटाना।
105वां संशोधन अधिनियम, 2020-
इसने सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) की पहचान करने और उन्हें मान्यता देने की राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की शक्ति को बहाल कर दिया।
यह संशोधन 15 अगस्त, 2021 से प्रभावी हो गया।
106वां संशोधन अधिनियम, 2020-
इसे महिला आरक्षण अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है।
यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करता है।
यह संशोधन सितंबर 2023 में पारित किया गया तथा 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई।
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👉42वां संशोधन अधिनियम, 1976 (लघु संविधान)-
👉42वें संशोधन अधिनियम में तीन नए शब्द जोड़े गए, अर्थात् समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता, जिन्हें प्रस्तावना में जोड़ा गया।
नागरिकों द्वारा मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया (नया भाग IV A)।
👉राष्ट्रपति अनुच्छेद 74 के अधीन अपने कार्यों के निर्वहन में मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करेगा।
👉प्रशासनिक न्यायाधिकरणों और अन्य मामलों के लिए न्यायाधिकरणों का प्रावधान किया गया (भाग XIV A जोड़ा गया)।
👉1971 की जनगणना के आधार पर 2001 तक लोक सभा और राज्य विधान सभाओं में सीटों का रखरखाव।
👉संवैधानिक संशोधन न्यायिक जांच से परे किये गये।
👉लोक सभा और राज्य विधान सभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया।
👉जब तक कुछ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जाता, तब तक निदेशक सिद्धांतों को लागू करने के लिए बनाए गए कानूनों को अदालतों द्वारा अवैध नहीं माना जा सकता।
👉राज्य नीति के तीन नए निर्देशक सिद्धांत जोड़े गए, अर्थात समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता, उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी, तथा पर्यावरण, वन और वन्य जीवन का संरक्षण।
👉भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा को सुगम बनाना।
👉किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की एक बार की अवधि को 6 महीने से बढ़ाकर एक वर्ष करना।
👉शिक्षा, वन, वन्य पशु और पक्षी संरक्षण, माप-तौल और न्याय प्रशासन, संविधान, तथा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अलावा सभी न्यायालयों के संगठन सहित पांच विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया।
👉अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना।
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📔 संविधान की अनुसूचियां
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◽️पहली अनुसूची – राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची
◽️दूसरी अनुसूची –वेतन, भत्ते और पेंशन।
◽️तीसरी अनुसूची– शपथ संबंधित उल्लेख।
◽️चौथी अनुसूची –राज्यसभा की सीटों का उल्लेख।
◽️पांचवी अनुसूची –अनुसूचित जाति और जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन का उल्लेख।
◽️छठी अनुसूची –असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम का जनजातीय प्रशासन।
◽️सातवीं अनुसूची –केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का बंटवारा।
◽️आठवीं अनुसूची– भाषाएं
◽️नौवीं अनुसूची –भूमि सुधार संबंधित।
◽️दसवीं अनुसूची –दल बदल संबंधित प्रावधान।(52वां संशोधन–1985)
◽️ग्यारहवीं अनुसूची – पंचायतों का प्रावधान।(73वां संशोधन–1992)
◽️बारहवीं अनुसूची – नगर निकायों का प्रावधान।(74वां संशोधन–1992)
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📕 नवीं अनुसूची से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
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👉भारतीय संविधान (प्रथम) संशोधन अधिनियम, 1951 के जरिए संविधान में नौवीं अनुसूची तथा अनुच्छेद 31-क और 31-ख जोड़े गए।
👉संसद द्वारा विधि विशेष (यथा- भूमि सुधार विधियां) को नौवीं अनुसूची में रखा जा सकता है, जिन्हें न्यायिक समीक्षा से बचाव दिया जाना आशयित हो।
👉वर्तमान में (मई, 2022 की स्थिति अनुसार) नौवीं अनुसूची में ऐसी 282 विधियां शामिल हैं।
👉अनुच्छेद 31-ख यह कहता है कि नौवीं अनुसूची में उल्लिखित नियमों और विनियमों को इस आधार पर शून्य नहीं
समझा जाएगा कि वे भाग 3 के किन्हीं उपबंधों और प्रदत्त अधिकारों में से किसी से असंगत हैं या उनको छीन लेते हैं या न्यून करते हैं।
👉किंतु वर्ष 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु के मामले में निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया कि संसद को नौवीं अनुसूची में विधि विशेष को प्रविष्टि करने की शक्ति प्रदान की गई है, किंतु यह न्यायिक संवीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है।
👉न्यायालय ने निर्धारित किया कि 24 अप्रैल, 1973 (केशवानंद भारती वाद निर्णय की तिथि) के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए विधायनों की न्यायिक समीक्षा इस आधार पर की जा सकेगी कि वे अनुच्छेद 21, 14 एवं 19 में प्रतिबिम्बित संविधान के मूल ढांचे की अवधारणा का उल्लंघन करते हैं।
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संविधान सभा की समितियां एवं उनके अध्यक्ष इस प्रकार हैं-
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समिति. अध्यक्ष
संघ संविधान समिति. जवाहरलाल नेहरू
नियम समिति. डॉ. राजेंद्र प्रसाद
संचालन समिति. डॉ.राजेंद्रप्रसाद
प्रारूप समिति. डॉ. भीम राव अम्बेडकर
मौलिक अधिकारों
एवं अल्पसंख्यकों हेतु. सरदार वल्लभभाई पटेल
सलाहकार समिति
(i) मूल अधिकार उपसमिति. जेबी कृपा से
(ii) अल्पसंख्यक उपसमिति. एच.सी. मुखर्जी
संघ शक्ति समिति. जवाहरलाल नेहरू
प्रांतीय संविधान समिति. सरदार वल्लभभाई पटेल
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📕44वां संशोधन अधिनियम, 1978-
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👉44वें संशोधन अधिनियम द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कुछ शक्तियाँ बहाल कर दी गईं।
👉राष्ट्रीय आपातकाल के संबंध में "आंतरिक अशांति" शब्द के स्थान पर "सशस्त्र विद्रोह" शब्द का प्रयोग किया जाना।
👉राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर ही राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने का अधिकार दिया गया।
👉संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर उसे कानूनी अधिकार बनाया गया।
👉बशर्ते कि अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान निलंबित नहीं किया जा सकता।
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📕86वां संशोधन अधिनियम, 2002
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👉प्रारंभिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।
👉नव-जोड़ा गया अनुच्छेद 21-ए घोषित करता है कि "राज्य छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों को राज्य द्वारा निर्धारित तरीके से मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा।"
📕निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 45 की विषय-वस्तु में परिवर्तन किया गया।
👉अनुच्छेद 51-ए के तहत एक नया मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया है, जिसमें कहा गया है - भारत के प्रत्येक नागरिक का, जो माता-पिता या संरक्षक है, यह कर्तव्य होगा कि वह अपने बच्चे या प्रतिपाल्य को छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच शिक्षा के अवसर प्रदान करे।
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📕अध्याय 2: संविधान की प्रस्तावना (Preamble of the Constitution)
📕प्रस्तावना का परिचय
प्रस्तावना संविधान के परिचय या आमुख (Foreword) को दर्शाती है। यह पूरे संविधान का सार (Essence) प्रस्तुत करती है।
A. प्रस्तावना की पृष्ठभूमि एवं परिचय
आधार: प्रस्तावना जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत किए गए और 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा द्वारा अपनाए गए 'उद्देश्य संकल्प' (Objectives Resolution) पर आधारित है।
पहचान पत्र: एन.ए. पालकीवाला ने प्रस्तावना को "संविधान का पहचान पत्र (Identity Card of the Constitution)" कहा है।
संविधान का भाग: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग है।
सर्वप्रथम: प्रस्तावना को अमेरिकी संविधान में शामिल किया गया था। भारत ने इस पद्धति को अपनाया है।
B. प्रस्तावना के मुख्य तत्व (Components of the Preamble)
प्रस्तावना चार मुख्य घटकों को प्रकट करती है:
1. संविधान का स्रोत – “हम, भारत के लोग…” (We, the people of India) : यह दर्शाता है कि संविधान भारत के लोगों से शक्ति प्राप्त करता है।
2. भारतीय राज्य की प्रकृति – संप्रभु (Sovereign), समाजवादी (Socialist), धर्मनिरपेक्ष (Secular), लोकतांत्रिक (Democratic), गणराज्य (Republic)।
3. संविधान के उद्देश्य – न्याय (Justice), स्वतंत्रता (Liberty), समानता (Equality), बंधुत्व (Fraternity)।
4. अपनाने की तिथि – 26 नवंबर 1949।
C. प्रस्तावना के मुख्य शब्द एवं उनका अर्थ (Key Terms and Meanings)
1. संप्रभु (Sovereign) –
2. समाजवादी (Socialist) –
3. धर्मनिरपेक्ष (Secular) –
4. लोकतांत्रिक (Democratic) –
5. गणराज्य (Republic) –
6. न्याय (Justice) –
7. स्वतंत्रता (Liberty) –
8. समानता (Equality) –
9. बंधुत्व (Fraternity) –
D. संविधान में संशोधन (Amendment to the Preamble)
इस संशोधन द्वारा तीन नए शब्द जोड़े गए:
E. प्रस्तावना से संबंधित महत्वपूर्ण वाद (Important Cases)
1. बेरुबरी यूनियन केस (1960)
2. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
बेरुबरी निर्णय को पलट दिया।
प्रस्तावना को संशोधित किया जा सकता है, लेकिन संशोधन संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकता।
3. एलआईसी ऑफ इंडिया केस (1995)
F. प्रस्तावना की प्रकृति (Nature of the Preamble)
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📕प्रस्तावना का परिचय
प्रस्तावना संविधान के परिचय या आमुख (Foreword) को दर्शाती है। यह पूरे संविधान का सार (Essence) प्रस्तुत करती है।
A. प्रस्तावना की पृष्ठभूमि एवं परिचय
आधार: प्रस्तावना जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत किए गए और 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा द्वारा अपनाए गए 'उद्देश्य संकल्प' (Objectives Resolution) पर आधारित है।
पहचान पत्र: एन.ए. पालकीवाला ने प्रस्तावना को "संविधान का पहचान पत्र (Identity Card of the Constitution)" कहा है।
संविधान का भाग: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग है।
सर्वप्रथम: प्रस्तावना को अमेरिकी संविधान में शामिल किया गया था। भारत ने इस पद्धति को अपनाया है।
B. प्रस्तावना के मुख्य तत्व (Components of the Preamble)
प्रस्तावना चार मुख्य घटकों को प्रकट करती है:
1. संविधान का स्रोत – “हम, भारत के लोग…” (We, the people of India) : यह दर्शाता है कि संविधान भारत के लोगों से शक्ति प्राप्त करता है।
2. भारतीय राज्य की प्रकृति – संप्रभु (Sovereign), समाजवादी (Socialist), धर्मनिरपेक्ष (Secular), लोकतांत्रिक (Democratic), गणराज्य (Republic)।
3. संविधान के उद्देश्य – न्याय (Justice), स्वतंत्रता (Liberty), समानता (Equality), बंधुत्व (Fraternity)।
4. अपनाने की तिथि – 26 नवंबर 1949।
C. प्रस्तावना के मुख्य शब्द एवं उनका अर्थ (Key Terms and Meanings)
1. संप्रभु (Sovereign) –
भारत किसी भी विदेशी शक्ति के नियंत्रण से मुक्त है। यह अपने आंतरिक और बाहरी मामलों पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।
2. समाजवादी (Socialist) –
यह शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया। भारत का समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद है (मिश्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास)।
3. धर्मनिरपेक्ष (Secular) –
यह शब्द भी 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया। इसका अर्थ है कि भारत में सभी धर्मों को समान सम्मान और राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है। (अनुच्छेद 25–28 में निहित)।
4. लोकतांत्रिक (Democratic) –
सरकार जनता की इच्छा पर शक्ति प्राप्त करती है। लोकतंत्र दो प्रकार का होता है: प्रत्यक्ष (जैसे स्विट्जरलैंड में) और अप्रत्यक्ष (प्रतिनिधिमूलक), जिसे भारत ने अपनाया है।
5. गणराज्य (Republic) –
राज्य का मुखिया (राष्ट्रपति) निर्वाचित होता है, न कि वंशानुगत (जैसा कि ब्रिटेन में होता है)। भारत का राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।
6. न्याय (Justice) –
तीन प्रकार के न्याय का आदर्श: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक। यह आदर्श रूसी क्रांति (1917) से लिया गया है।
7. स्वतंत्रता (Liberty) –
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता (मौलिक अधिकारों में गारंटीकृत)।
8. समानता (Equality) –
प्रतिष्ठा और अवसर की समानता (भेदभाव के बिना समान व्यवहार)।
9. बंधुत्व (Fraternity) –
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करना। 'अखंडता' शब्द 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया।
D. संविधान में संशोधन (Amendment to the Preamble)
प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार संशोधन किया गया है — 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976।
इस संशोधन द्वारा तीन नए शब्द जोड़े गए:
1. समाजवादी
2. धर्मनिरपेक्ष
3. अखंडता (Integrity)
E. प्रस्तावना से संबंधित महत्वपूर्ण वाद (Important Cases)
1. बेरुबरी यूनियन केस (1960)
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है, इसलिए इसे संशोधित नहीं किया जा सकता है।
2. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
बेरुबरी निर्णय को पलट दिया।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है।
प्रस्तावना को संशोधित किया जा सकता है, लेकिन संशोधन संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकता।
3. एलआईसी ऑफ इंडिया केस (1995)
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर पुष्टि की कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है।
F. प्रस्तावना की प्रकृति (Nature of the Preamble)
प्रस्तावना गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) है: इसके प्रावधानों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
यह न तो विधायिका को कोई शक्ति प्रदान करती है और न ही उसकी शक्तियों पर रोक लगाती है।
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📕अध्याय 3: संघ और उसका क्षेत्र (Part I – अनुच्छेद 1-4)
1. भाग I का दायरा (Scope of Part I)
संविधान का Part I (अनुच्छेद 1-4) राज्यों और भारत के क्षेत्रों का ढाँचा तय करता है: यह निर्धारित करता है कि भारत एक “Union of States” कैसे है, राज्यों की सीमाओं का निर्धारण कैसे किया जाए और आवश्यकतानुसार सीमाएं/नाम कैसे बदले जाएँ।
यह भाग यह भी तय करता है कि ऐसे परिवर्तनों के लिए संसद को क्या शक्तियाँ हैं और संशोधन की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
2. अनुच्छेद 1 — “भारत = Union of States” का अर्थ
संविधान कहते हैं: “India, that is Bharat, shall be a Union of States” — यानी भारत और भारत (Bharat) दोनों नाम संवैधानिक रूप से स्वीकार्य हैं।
“Union of States” का मतलब यह है कि भारत का संघ राज्यों का एक संगठन है, पर यह राज्यों के बीच सिर्फ समझौता नहीं है — यह भारत के लोगों द्वारा स्थापित राजनीतिक इकाई है।
संविधान निर्माता (जैसे Dr. B. R. अम्बेडकर) का तर्क था कि राज्यों का अलग होना कठिन या असंभव बनाया जाए ताकि संघ की अखंडता बनी रहे।
संघीय स्वरूप होने के बावजूद, भारत में केन्द्रीय झुकाव (unitary bias) है: केंद्र को बहुत शक्तियाँ दी गई हैं और संसद के पास राज्य सीमाओं को बदलने का अंतिम अधिकार है।
“Union of States” और “Territory of India” अलग हैं: पहला राजनीतिक संघ बताता है, और दूसरा क्षेत्रीय सीमाओं को — जिसका विवरण पहली अनुसूची (First Schedule) में है
3. अनुच्छेद 2 — नए राज्यों का गठन / सम्मिलन (Admission & Establishment)
अनुच्छेद 2 संसद को यह अधिकार देता है कि वह नए राज्य को भारत में शामिल करे या नया राज्य बनाए।
इसके लिए संसद को सिर्फ साधारण कानून (Simple Act) पास करना होता है; यह कोई संवैधानिक संशोधन (Amendment) नहीं है।
इस प्रावधान का प्रयोग बाद में कई राज्यों के निर्माण में हुआ है।
4. अनुच्छेद 3 — राज्य सीमाओं, नाम, विभाजन, एकीकरण
अनुच्छेद 3 संसद को अधिकार देता है कि वह:
1. किसी राज्य को विभाजित (बांटना) करे,
2. दो या अधिक राज्यों को एकीकृत (मिलाए),
3. नया राज्य बनाए,
4. किसी राज्य की सीमा बढ़ा या घटा सके,
5. राज्य का नाम बदल सके।
प्रक्रिया इस प्रकार होती है: राष्ट्रपति उस बिल को पारित करने की सिफारिश करता है → राष्ट्रपति संबंधित राज्य की विधायिका से राय मांगते हैं → राज्य अपनी राय देता है (लेकिन सहमति देना अनिवार्य नहीं है) → संसद इसे साधारण बहुमत से पास करती है।
चूंकि यह संशोधन नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 368 की विशेष संशोधन प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती; ये परिवर्तन साधारण विधेयक (Law) द्वारा होते हैं।
इस व्यवस्था से राज्यों की सीमाओं और नामों में लचीलापन और व्यवस्था सुनिश्चित होती है।
5. अनुच्छेद 4 — सूचियों (Schedules) में बदलाव
अनुच्छेद 4 कहता है कि यदि अनुच्छेद 2 या 3 के अंतर्गत कोई अधिनियम (Act) बना है, तो वह प्रथम अनुसूची (First Schedule — राज्यों / UTs की सूची) और चौथी अनुसूची (Fourth Schedule — राज्यसभा में सीटों का आवंटन) को बदल सकता है।
ऐसे संशोधन को संविधान संशोधन (Amendment) नहीं माना जाएगा; यह साधारण अधिनियम माना जाता है।
इसलिए, पुनर्गठन करते समय संसद को कठिन संशोधन प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता।
6. राज्य पुनर्गठन — आयोग, रिपोर्ट और सिफारिशें
State Reorganisation Commission (SRC) की स्थापना दिसंबर 1953 में हुई थी। इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति Fazl Ali ने की, अन्य सदस्य K. M. Panikkar और H. N. Kunzru थे।
SRC ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
SRC की प्रमुख सिफारिशें थीं:
1. भाषा-आधार पर राज्यों का पुनर्गठन, लेकिन “एक भाषा = एक राज्य” का सख्त सिद्धांत न अपनाना;
2. राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा, प्रशासनिक और आर्थिक दक्षता को प्राथमिकता देना।
3. चार-प्रकार की (Part A, B, C, D) राज्यों की श्रेणीकरण को खत्म करना।
4. सीमाओं के निर्धारण में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं पर ध्यान देना।
5. कुछ क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक उपबंध देने की सिफारिश।
इन सिफारिशों के आधार पर संसद ने States Reorganisation Act, 1956 पारित किया, जो 1 नवंबर 1956 से लागू हुआ।
साथ ही, संविधान में Seventh Amendment Act, 1956 लाई गई, जिससे पुनर्गठन अधिनियम और अनुसूचियों (Schedules) में बदलाव संभव हो पाया।
7. राज्यों का गठन-वर्ष (State Formation Years) — कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण
यहाँ प्रमुख राज्यों के गठन या पुनर्गठन के वर्ष दिए गए हैं ताकि UPSI-लेवल तैयारी में मदद हो:
आंध्र प्रदेश: 1 नवम्बर 1956, States Reorganisation Act, 1956 के तहत (SRC की रिपोर्ट के बाद)
मिसोर (अब कर्नाटक): 1 नवम्बर 1956, SRC पुनर्गठन के बाद
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1. भाग I का दायरा (Scope of Part I)
संविधान का Part I (अनुच्छेद 1-4) राज्यों और भारत के क्षेत्रों का ढाँचा तय करता है: यह निर्धारित करता है कि भारत एक “Union of States” कैसे है, राज्यों की सीमाओं का निर्धारण कैसे किया जाए और आवश्यकतानुसार सीमाएं/नाम कैसे बदले जाएँ।
यह भाग यह भी तय करता है कि ऐसे परिवर्तनों के लिए संसद को क्या शक्तियाँ हैं और संशोधन की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
2. अनुच्छेद 1 — “भारत = Union of States” का अर्थ
संविधान कहते हैं: “India, that is Bharat, shall be a Union of States” — यानी भारत और भारत (Bharat) दोनों नाम संवैधानिक रूप से स्वीकार्य हैं।
“Union of States” का मतलब यह है कि भारत का संघ राज्यों का एक संगठन है, पर यह राज्यों के बीच सिर्फ समझौता नहीं है — यह भारत के लोगों द्वारा स्थापित राजनीतिक इकाई है।
संविधान निर्माता (जैसे Dr. B. R. अम्बेडकर) का तर्क था कि राज्यों का अलग होना कठिन या असंभव बनाया जाए ताकि संघ की अखंडता बनी रहे।
संघीय स्वरूप होने के बावजूद, भारत में केन्द्रीय झुकाव (unitary bias) है: केंद्र को बहुत शक्तियाँ दी गई हैं और संसद के पास राज्य सीमाओं को बदलने का अंतिम अधिकार है।
“Union of States” और “Territory of India” अलग हैं: पहला राजनीतिक संघ बताता है, और दूसरा क्षेत्रीय सीमाओं को — जिसका विवरण पहली अनुसूची (First Schedule) में है
3. अनुच्छेद 2 — नए राज्यों का गठन / सम्मिलन (Admission & Establishment)
अनुच्छेद 2 संसद को यह अधिकार देता है कि वह नए राज्य को भारत में शामिल करे या नया राज्य बनाए।
इसके लिए संसद को सिर्फ साधारण कानून (Simple Act) पास करना होता है; यह कोई संवैधानिक संशोधन (Amendment) नहीं है।
इस प्रावधान का प्रयोग बाद में कई राज्यों के निर्माण में हुआ है।
4. अनुच्छेद 3 — राज्य सीमाओं, नाम, विभाजन, एकीकरण
अनुच्छेद 3 संसद को अधिकार देता है कि वह:
1. किसी राज्य को विभाजित (बांटना) करे,
2. दो या अधिक राज्यों को एकीकृत (मिलाए),
3. नया राज्य बनाए,
4. किसी राज्य की सीमा बढ़ा या घटा सके,
5. राज्य का नाम बदल सके।
प्रक्रिया इस प्रकार होती है: राष्ट्रपति उस बिल को पारित करने की सिफारिश करता है → राष्ट्रपति संबंधित राज्य की विधायिका से राय मांगते हैं → राज्य अपनी राय देता है (लेकिन सहमति देना अनिवार्य नहीं है) → संसद इसे साधारण बहुमत से पास करती है।
चूंकि यह संशोधन नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 368 की विशेष संशोधन प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती; ये परिवर्तन साधारण विधेयक (Law) द्वारा होते हैं।
इस व्यवस्था से राज्यों की सीमाओं और नामों में लचीलापन और व्यवस्था सुनिश्चित होती है।
5. अनुच्छेद 4 — सूचियों (Schedules) में बदलाव
अनुच्छेद 4 कहता है कि यदि अनुच्छेद 2 या 3 के अंतर्गत कोई अधिनियम (Act) बना है, तो वह प्रथम अनुसूची (First Schedule — राज्यों / UTs की सूची) और चौथी अनुसूची (Fourth Schedule — राज्यसभा में सीटों का आवंटन) को बदल सकता है।
ऐसे संशोधन को संविधान संशोधन (Amendment) नहीं माना जाएगा; यह साधारण अधिनियम माना जाता है।
इसलिए, पुनर्गठन करते समय संसद को कठिन संशोधन प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता।
6. राज्य पुनर्गठन — आयोग, रिपोर्ट और सिफारिशें
State Reorganisation Commission (SRC) की स्थापना दिसंबर 1953 में हुई थी। इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति Fazl Ali ने की, अन्य सदस्य K. M. Panikkar और H. N. Kunzru थे।
SRC ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
SRC की प्रमुख सिफारिशें थीं:
1. भाषा-आधार पर राज्यों का पुनर्गठन, लेकिन “एक भाषा = एक राज्य” का सख्त सिद्धांत न अपनाना;
2. राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा, प्रशासनिक और आर्थिक दक्षता को प्राथमिकता देना।
3. चार-प्रकार की (Part A, B, C, D) राज्यों की श्रेणीकरण को खत्म करना।
4. सीमाओं के निर्धारण में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं पर ध्यान देना।
5. कुछ क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक उपबंध देने की सिफारिश।
इन सिफारिशों के आधार पर संसद ने States Reorganisation Act, 1956 पारित किया, जो 1 नवंबर 1956 से लागू हुआ।
साथ ही, संविधान में Seventh Amendment Act, 1956 लाई गई, जिससे पुनर्गठन अधिनियम और अनुसूचियों (Schedules) में बदलाव संभव हो पाया।
7. राज्यों का गठन-वर्ष (State Formation Years) — कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण
यहाँ प्रमुख राज्यों के गठन या पुनर्गठन के वर्ष दिए गए हैं ताकि UPSI-लेवल तैयारी में मदद हो:
आंध्र प्रदेश: 1 नवम्बर 1956, States Reorganisation Act, 1956 के तहत (SRC की रिपोर्ट के बाद)
मिसोर (अब कर्नाटक): 1 नवम्बर 1956, SRC पुनर्गठन के बाद
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