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• अंग्रेजी शिक्षा - विलियम बैंटिंक

• सामाजिक सुधार - विलियम बैंटिंक

• ठगों का दमन - कैप्टन स्लीमन

• प्रेस पर प्रतिबंध हटाना - चार्ल्स मेटकॉफ

• सिन्ध का विलय - लॉर्ड एलनबरो

• दास प्रथा का अंत - लॉर्ड एनलबरो

• राज्य अपहरण की नीति - लॉर्ड डलहौजी

• व्यपगत का सिद्धान्त - लॉर्ड डलहौजी

• राज्य हड़प नीति - लॉर्ड डलहौजी

• ड्राक्सिन ऑफ लैप्स - लॉर्ड डलहौजी

• अवध का विलय - लॉर्ड डलहौजी

• चतुराईपूर्ण निष्क्रियता की नीति - जान लॉरेंस

• वर्नाकुलर प्रेस एक्ट - लॉर्ड लिटन

• अग्रफारवर्ड नीति - लॉर्ड रिपन

• स्थानीय स्वशासन - लॉर्ड रिपन


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राष्ट्रपति शासन लगाने की प्रक्रिया

🔰 कारण:-
▪️संवैधानिक तंत्र विफल होना
▪️बहुमत साबित न कर पाना
▪️चुनाव ना हो पाना(युद्ध आपदा आदि)

🔰 राज्यपाल केंद्र को स्थित की रिपोर्ट भेजता है

🔰 प्रधानमंत्री और कैबिनेट, राष्ट्रपति को अनुच्छेद 356 लागू करने का सुझाव देते है

🔰 राष्ट्रपति की घोषणा:-
▪️राष्ट्रपति शासन लागू होता है
▪️राज्य सरकार भंग, विधानसभा निलंबित/भंग

🔰 संसदीय अनुमोदन:-
▪️2 महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों से मंजूरी जरूरी
▪️लोकसभा और राज्यसभा में साधारण बहुमत से पास होना चाहिए

🔰 अवधि और विस्तार:-
▪️पहले 6 महीने - बिना संसदीय मंजूरी के
▪️6 महीने के बाद - हर 6 महीने पर संसद की मंजूरी जरूरी (अधिकतम 3 वर्ष तक)

🔰 न्यायिक समीक्षा:- सुप्रीम कोर्ट में फैसले को चुनौती (जैसे 1994 का बोम्मई केस)

🔰 परिणाम:-
▪️प्रशासन राज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार चलती है
▪️विधानसभा भंग होने पर 6 माह के भीतर चुनाव अनिवार्य

44वां संशोधन 1978 - 1 साल से ज्यादा विस्तार के लिए संसद के दोनों सदनों का बहुमत जरूरी

🔰 सरकारिया आयोग:- राजनीतिक दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश

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🔰संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

👉संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 में संसद को संविधान एवं इसकी व्यवस्था में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है।

यह प्रावधान करता है कि संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के किसी उपबंध कापरिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन कर सकती है।

👉हलाकि संसद उन व्यवस्थाओ को संशोधित नही कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे की संरचना से सम्बद्ध हो यह व्यवस्था उच्चतम न्यायलय द्वारा केशवानंद भारती मामले (1973) में की।

👉अनुछेद 368 के अंतर्गत यह निम्नलिखित तरीके से हो सकती है-

👉 संविधान के संशोधन का आरम्भ संसद के किसी भी सदन में किया जा सकता है किन्तु राज्य विधान मंडल में नही।

👉 विधेयक को मंत्री या गैर सरकारी सदस्यों द्वारा पुर्स्थापित किया जा सकता है।

👉विधेयक को दोनो सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है।

👉दोनों ही सदनों में विधेयक अलग अलग पारित होना चाहिए और असहमति या गतिरोध की की स्थिति में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नही है।

👉 विधेयक के संघीय व्यवस्था से सम्बंधित होने पर उसे आधे राज्यों के विधानमंडल से भी सामान्य बहुमत से पारित होना चाहिए।

👉 राष्ट्रपति विधेयक को सहमती देंगे क्यूंकि वे विधेयक को न तो अपने पास रख सकते है और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिये भेज सकते है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद विधेयक अधिनियम बन जाता है।

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52वाँ संशोधन (1985):

संसद और विधान मंडलों के सदस्यों को दल-बदल के आधार पर वर्गीकरण की व्यवस्था दी गई और इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए एक नई अनुसूची (दसवीं अनुसूची) को जोड़ा गया।

👉61वाँ संशोधन (1988)

विपक्ष और राज्य विधान सभा के चुनाव में मतदान की आयु 21 वर्ष से 18 वर्ष कर दी गई।

👉73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992):

73वाँ संशोधन अधिनियम:
इस संशोधन के माध्यम से अलौकिक राज संस्था को संवैधानिक बनाया गया।

👉इस अधिनियम में भारत के संविधान का एक नया भाग-IX जोड़ा गया है तथा इसमें 243 से 243O तक के जुलूस शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त अधिनियम में संविधान द्वारा एक नई 11वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया है और इसमें परियोजना के 29 संरचनात्मक विषयों को शामिल किया गया है।

👉74वाँ संशोधन अधिनियम:

👉शहरी स्थानीय संस्था 1992 में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान 74वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से इसे संवैधानिक बनाया गया था। यह 1 जून, 1993 को लागू हुआ।
इसमें भाग IX-A को जोड़ा गया है और इसमें 243-पी से 243-जेडजी तक के प्रॉजेक्ट को शामिल किया गया है।

👉इसके अलावा इस अधिनियम द्वारा संविधान में 12वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया । नगर पालिकाओं के 18 कार्यात्मक मद शामिल हैं।


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👉102वां संशोधन अधिनियम, 2018-

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।

इस अधिनियम ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को पिछड़े वर्गों से संबंधित कार्यों से मुक्त कर दिया।

इसने राष्ट्रपति को किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को निर्दिष्ट करने का अधिकार भी दिया

।

103वां संशोधन अधिनियम, 2019-

राज्य को नागरिकों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने का अधिकार दिया गया।

ईडब्ल्यूएस श्रेणी का लाभ प्राप्त करने के लिए ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है।

राज्य को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए कुछ वर्गों के लिए 10% तक सीटें आरक्षित करने की अनुमति दी गई थी, जिसमें अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को छोड़कर निजी शैक्षणिक संस्थान भी शामिल थे, जिन्हें राज्य द्वारा सहायता प्राप्त या गैर-सहायता प्राप्त थी। 10% तक का यह अतिरिक्त आरक्षण पहले से किए गए आरक्षण के अतिरिक्त होगा।

104वां संशोधन अधिनियम, 2020-

लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों की समाप्ति की समय-सीमा को 70 वर्ष से बढ़ाकर 80 वर्ष करना।

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित सीटों को हटाना।

105वां संशोधन अधिनियम, 2020-
इसने सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) की पहचान करने और उन्हें मान्यता देने की राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की शक्ति को बहाल कर दिया।

यह संशोधन 15 अगस्त, 2021 से प्रभावी हो गया।


106वां संशोधन अधिनियम, 2020-

इसे महिला आरक्षण अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है।

यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करता है।

यह संशोधन सितंबर 2023 में पारित किया गया तथा 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई।

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👉42वां संशोधन अधिनियम, 1976 (लघु संविधान)-

👉42वें संशोधन अधिनियम में तीन नए शब्द जोड़े गए, अर्थात् समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता, जिन्हें प्रस्तावना में जोड़ा गया।

नागरिकों द्वारा मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया (नया भाग IV A)।

👉राष्ट्रपति अनुच्छेद 74 के अधीन अपने कार्यों के निर्वहन में मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करेगा।

👉प्रशासनिक न्यायाधिकरणों और अन्य मामलों के लिए न्यायाधिकरणों का प्रावधान किया गया (भाग XIV A जोड़ा गया)।

👉1971 की जनगणना के आधार पर 2001 तक लोक सभा और राज्य विधान सभाओं में सीटों का रखरखाव।

👉संवैधानिक संशोधन न्यायिक जांच से परे किये गये।

👉लोक सभा और राज्य विधान सभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया।

👉जब तक कुछ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जाता, तब तक निदेशक सिद्धांतों को लागू करने के लिए बनाए गए कानूनों को अदालतों द्वारा अवैध नहीं माना जा सकता।

👉राज्य नीति के तीन नए निर्देशक सिद्धांत जोड़े गए, अर्थात समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता, उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी, तथा पर्यावरण, वन और वन्य जीवन का संरक्षण।

👉भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा को सुगम बनाना।

👉किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की एक बार की अवधि को 6 महीने से बढ़ाकर एक वर्ष करना।

👉शिक्षा, वन, वन्य पशु और पक्षी संरक्षण, माप-तौल और न्याय प्रशासन, संविधान, तथा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अलावा सभी न्यायालयों के संगठन सहित पांच विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया।

👉अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना।

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Polity का इतना रिवीजन करते रहिए बाकी भेजता हूं 👆👆👆
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Upsssc 02-Exam/2026 उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (संयुक्त संवर्ग) mains exam revised answer key notice
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📔 संविधान की अनुसूचियां

◽️पहली अनुसूची – राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची
  ◽️दूसरी अनुसूची –वेतन, भत्ते और पेंशन।
  ◽️तीसरी अनुसूची– शपथ संबंधित उल्लेख।
  ◽️चौथी अनुसूची –राज्यसभा की सीटों का उल्लेख।
  ◽️पांचवी अनुसूची –अनुसूचित जाति और जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन का उल्लेख।
  ◽️छठी अनुसूची –असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम का जनजातीय प्रशासन।
  ◽️सातवीं अनुसूची –केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का बंटवारा।
  ◽️आठवीं अनुसूची– भाषाएं
  ◽️नौवीं अनुसूची –भूमि सुधार संबंधित।
  ◽️दसवीं अनुसूची –दल बदल संबंधित प्रावधान।(52वां संशोधन–1985)
  ◽️ग्यारहवीं अनुसूची – पंचायतों का प्रावधान।(73वां संशोधन–1992)
  ◽️बारहवीं अनुसूची – नगर निकायों का प्रावधान।(74वां संशोधन–1992)


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📕 राज्य के नीति निदेशक तत्वों में गाँधीवादी सिद्धान्त को प्रतिबिम्बित करने वाले प्रावधान

👉
अनुच्छेद 40: राज्य ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाइयों के रूप में संगठित करने के लिये कदम उठाएगा।

👉अनुच्छेद 43: राज्य ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।

👉अनुच्छेद 43B: सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देना।

👉अनुच्छेद 46: राज्य समाज के कमज़ोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य कमज़ोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देगा।

👉अनुच्छेद 47: राज्य सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के लिये कदम उठाएगा और नशीले पेय तथा स्वास्थ्य के लिये हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन पर रोक लगाएगा।

👉अनुच्छेद 48: गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध पर रोक लगाने तथा मवेशियों को पालने एवं उनकी नस्लों में सुधार करने के

लिए

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📕ऑस्ट्रेलिया से लिए गए संविधान के स्रोत / तत्व

👉सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची का प्रावधान

👉प्रस्तावना की भाषा

👉केंद्र एवं राज्यों के बीच संबंध तथा शक्तियों का विभाजन

👉व्यापार-वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता.

👉संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक


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📕स्वर्ण सिंह समिति

👉 स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर भारतीय संविधान में 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए।

👉अनुच्छेद 51A भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों से संबंधित है।

👉भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों को 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा जोड़ा गया था।


👉11 वा मौलिक कर्त्तव्य 2002 में G S वर्मा समिति की सिफारिश पर ,84 वा संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया

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📕आठवीं अनुसूची में किया गया संशोधन

👉कुल 22 भाषा

👉 मूल रूप से 14 भाषा शामिल

👉92वां संविधान (संशोधन) अधिनियम (2003):
आंठवीं अनुसूची में बोडो, डोगरी, मैथली और संथाली (BDMS) भाषाओं का समावेश।

👉71वां संविधान (संशोधन) अधिनियम (1992):
कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली(KMN )भाषा को सम्मिलित किया गया।

👉21वां संविधान (संशोधन) अधिनियम (1967):

सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची के अंतर्गत पंद्रहवीं भाषा के रूप में शामिल किया गया

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📕सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की कार्य एवं शक्तियां

अनुच्छेद 129 - अभिलेख/रिकार्डड न्यायलय/अवमानना का दण्ड देने की शक्ति ।

👉अनुच्छेद 131 - प्रराम्भिक क्षेत्राधिकरण की शक्ति।

एक या एक से अधिक राज्यों या एक राज्य व राज्यों व भारत सरकार के मध्य कोई विवाद पर फैसला एस. सी. करेगी

👉अनुच्छेद 132 - अपीलय क्षेत्राधिकार।

👉अनुच्छेद 133 - दीवानी मामलों में अपील का अधिकार।

👉अनुच्छेद 134 - फौजदारी मामलों में अपील का अधिकार

👉अनुच्छेद 135 - सैन्य मामलों में अपील का अधिकार।

👉अनुच्छेद 136 - विशेष अपीळेल का अधिकार।

👉अनुच्छेद 137 - न्यायिक पूनावलोकन की शक्ति।

👉अनुच्छेद 141 - सुप्रिम कोट के सभी निर्णय सम्पुर्ण भारत में मान्य होंगे।

👉अनुच्छेद - 143 राष्ट्रपति का सुप्रिम कोट से परामर्श लेने का अधिकार।

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📕प्रस्तावनाः संविधान का हिस्सा है या नहीं

बेरुबारी मामले में (1960):

प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं है।

गोलकनाथ बनाम पंजाब 1967
वाद में उद्देशिका संविधान की मूल आत्मा है

केशवानंद भारती मामले (1973) में:

सुप्रीम कोर्ट ने पहले की राय को खारिज कर दिया और कहा कि प्रस्तावना संविधान का एक हिस्सा है और इसमें संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते कि बुनियादी सुविधाओं में कोई संशोधन नहीं किया गया हो।

यह संविधान की सच्ची भावना की व्याख्या करने के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है
।

एलआईसी ऑफ इंडिया केस (1995)

ने प्रस्तावना को बरकरार रखा और कहा कि यह संविधान का एक अभिन्न अंग है।

प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्ति का स्रोत है और न ही विधायिका की शक्ति पर रोक है। यह न्यायोचित नहीं है, अर्थात इसके प्रावधान कानून की अदालत में लागू करने योग्य नहीं हैं।

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📕संसद का संविधान में संशोधन करने की शक्ति

शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार, 1951

संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की शक्ति है।


सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार, 1965

. संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की शक्ति है।


गोलक नाथ बनाम पंजाब सरकार, 1967

संसद को संविधान के भाग III (मौलिक अधिकारों) में संशोधन करने का अधिकार नहीं है।

केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार, 1973

संसद के किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन 'बुनियादी संरचना' को कमजोर नहीं कर सकती है।


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