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Ancient history भारतीय इतिहास स्रोत l LECTURE 5 l RO-ARO | UPPSC | BEO |...
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Note 👉 ऐसे ही सभी सब्जेक्ट का रिवीजन करा देंगे

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52वाँ संशोधन (1985):

संसद और विधान मंडलों के सदस्यों को दल-बदल के आधार पर वर्गीकरण की व्यवस्था दी गई और इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए एक नई अनुसूची (दसवीं अनुसूची) को जोड़ा गया।

👉61वाँ संशोधन (1988)

विपक्ष और राज्य विधान सभा के चुनाव में मतदान की आयु 21 वर्ष से 18 वर्ष कर दी गई।

👉73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992):

73वाँ संशोधन अधिनियम:
इस संशोधन के माध्यम से अलौकिक राज संस्था को संवैधानिक बनाया गया।

👉इस अधिनियम में भारत के संविधान का एक नया भाग-IX जोड़ा गया है तथा इसमें 243 से 243O तक के जुलूस शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त अधिनियम में संविधान द्वारा एक नई 11वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया है और इसमें परियोजना के 29 संरचनात्मक विषयों को शामिल किया गया है।

👉74वाँ संशोधन अधिनियम:

👉शहरी स्थानीय संस्था 1992 में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान 74वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से इसे संवैधानिक बनाया गया था। यह 1 जून, 1993 को लागू हुआ।
इसमें भाग IX-A को जोड़ा गया है और इसमें 243-पी से 243-जेडजी तक के प्रॉजेक्ट को शामिल किया गया है।

👉इसके अलावा इस अधिनियम द्वारा संविधान में 12वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया । नगर पालिकाओं के 18 कार्यात्मक मद शामिल हैं।


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👉102वां संशोधन अधिनियम, 2018-

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।

इस अधिनियम ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को पिछड़े वर्गों से संबंधित कार्यों से मुक्त कर दिया।

इसने राष्ट्रपति को किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को निर्दिष्ट करने का अधिकार भी दिया

।

103वां संशोधन अधिनियम, 2019-

राज्य को नागरिकों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने का अधिकार दिया गया।

ईडब्ल्यूएस श्रेणी का लाभ प्राप्त करने के लिए ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है।

राज्य को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए कुछ वर्गों के लिए 10% तक सीटें आरक्षित करने की अनुमति दी गई थी, जिसमें अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को छोड़कर निजी शैक्षणिक संस्थान भी शामिल थे, जिन्हें राज्य द्वारा सहायता प्राप्त या गैर-सहायता प्राप्त थी। 10% तक का यह अतिरिक्त आरक्षण पहले से किए गए आरक्षण के अतिरिक्त होगा।

104वां संशोधन अधिनियम, 2020-

लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों की समाप्ति की समय-सीमा को 70 वर्ष से बढ़ाकर 80 वर्ष करना।

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित सीटों को हटाना।

105वां संशोधन अधिनियम, 2020-
इसने सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) की पहचान करने और उन्हें मान्यता देने की राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की शक्ति को बहाल कर दिया।

यह संशोधन 15 अगस्त, 2021 से प्रभावी हो गया।


106वां संशोधन अधिनियम, 2020-

इसे महिला आरक्षण अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है।

यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करता है।

यह संशोधन सितंबर 2023 में पारित किया गया तथा 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई।

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👉42वां संशोधन अधिनियम, 1976 (लघु संविधान)-

👉42वें संशोधन अधिनियम में तीन नए शब्द जोड़े गए, अर्थात् समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता, जिन्हें प्रस्तावना में जोड़ा गया।

नागरिकों द्वारा मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया (नया भाग IV A)।

👉राष्ट्रपति अनुच्छेद 74 के अधीन अपने कार्यों के निर्वहन में मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करेगा।

👉प्रशासनिक न्यायाधिकरणों और अन्य मामलों के लिए न्यायाधिकरणों का प्रावधान किया गया (भाग XIV A जोड़ा गया)।

👉1971 की जनगणना के आधार पर 2001 तक लोक सभा और राज्य विधान सभाओं में सीटों का रखरखाव।

👉संवैधानिक संशोधन न्यायिक जांच से परे किये गये।

👉लोक सभा और राज्य विधान सभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया।

👉जब तक कुछ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जाता, तब तक निदेशक सिद्धांतों को लागू करने के लिए बनाए गए कानूनों को अदालतों द्वारा अवैध नहीं माना जा सकता।

👉राज्य नीति के तीन नए निर्देशक सिद्धांत जोड़े गए, अर्थात समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता, उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी, तथा पर्यावरण, वन और वन्य जीवन का संरक्षण।

👉भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा को सुगम बनाना।

👉किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की एक बार की अवधि को 6 महीने से बढ़ाकर एक वर्ष करना।

👉शिक्षा, वन, वन्य पशु और पक्षी संरक्षण, माप-तौल और न्याय प्रशासन, संविधान, तथा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अलावा सभी न्यायालयों के संगठन सहित पांच विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया।

👉अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना।

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📔 संविधान की अनुसूचियां

◽️पहली अनुसूची – राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची
  ◽️दूसरी अनुसूची –वेतन, भत्ते और पेंशन।
  ◽️तीसरी अनुसूची– शपथ संबंधित उल्लेख।
  ◽️चौथी अनुसूची –राज्यसभा की सीटों का उल्लेख।
  ◽️पांचवी अनुसूची –अनुसूचित जाति और जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन का उल्लेख।
  ◽️छठी अनुसूची –असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम का जनजातीय प्रशासन।
  ◽️सातवीं अनुसूची –केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का बंटवारा।
  ◽️आठवीं अनुसूची– भाषाएं
  ◽️नौवीं अनुसूची –भूमि सुधार संबंधित।
  ◽️दसवीं अनुसूची –दल बदल संबंधित प्रावधान।(52वां संशोधन–1985)
  ◽️ग्यारहवीं अनुसूची – पंचायतों का प्रावधान।(73वां संशोधन–1992)
  ◽️बारहवीं अनुसूची – नगर निकायों का प्रावधान।(74वां संशोधन–1992)


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📕 नवीं अनुसूची से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य


👉भारतीय संविधान (प्रथम) संशोधन अधिनियम, 1951 के जरिए संविधान में नौवीं अनुसूची तथा अनुच्छेद 31-क और 31-ख जोड़े गए।

👉संसद द्वारा विधि विशेष (यथा- भूमि सुधार विधियां) को नौवीं अनुसूची में रखा जा सकता है, जिन्हें न्यायिक समीक्षा से बचाव दिया जाना आशयित हो।

👉वर्तमान में (मई, 2022 की स्थिति अनुसार) नौवीं अनुसूची में ऐसी 282 विधियां शामिल हैं।

👉अनुच्छेद 31-ख यह कहता है कि नौवीं अनुसूची में उल्लिखित नियमों और विनियमों को इस आधार पर शून्य नहीं
समझा जाएगा कि वे भाग 3 के किन्हीं उपबंधों और प्रदत्त अधिकारों में से किसी से असंगत हैं या उनको छीन लेते हैं या न्यून करते हैं।

👉किंतु वर्ष 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु के मामले में निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया कि संसद को नौवीं अनुसूची में विधि विशेष को प्रविष्टि करने की शक्ति प्रदान की गई है, किंतु यह न्यायिक संवीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है।
👉न्यायालय ने निर्धारित किया कि 24 अप्रैल, 1973 (केशवानंद भारती वाद निर्णय की तिथि) के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए विधायनों की न्यायिक समीक्षा इस आधार पर की जा सकेगी कि वे अनुच्छेद 21, 14 एवं 19 में प्रतिबिम्बित संविधान के मूल ढांचे की अवधारणा का उल्लंघन करते हैं।

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संविधान सभा की समितियां एवं उनके अध्यक्ष इस प्रकार हैं-

समिति. अध्यक्ष

संघ संविधान समिति. जवाहरलाल नेहरू

नियम समिति. डॉ. राजेंद्र प्रसाद

संचालन समिति. डॉ.राजेंद्रप्रसाद

प्रारूप समिति. डॉ. भीम राव अम्बेडकर

मौलिक अधिकारों
एवं अल्पसंख्यकों हेतु. सरदार वल्लभभाई पटेल

सलाहकार समिति

(i) मूल अधिकार उपसमिति. जेबी कृपा से

(ii) अल्पसंख्यक उपसमिति. एच.सी. मुखर्जी

संघ शक्ति समिति. जवाहरलाल नेहरू

प्रांतीय संविधान समिति. सरदार वल्लभभाई पटेल


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📕44वां संशोधन अधिनियम, 1978-

👉44वें संशोधन अधिनियम द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कुछ शक्तियाँ बहाल कर दी गईं।

👉राष्ट्रीय आपातकाल के संबंध में "आंतरिक अशांति" शब्द के स्थान पर "सशस्त्र विद्रोह" शब्द का प्रयोग किया जाना।

👉राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर ही राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने का अधिकार दिया गया।

👉संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर उसे कानूनी अधिकार बनाया गया।

👉बशर्ते कि अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान निलंबित नहीं किया जा सकता।


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📕86वां संशोधन अधिनियम, 2002

👉प्रारंभिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।

👉नव-जोड़ा गया अनुच्छेद 21-ए घोषित करता है कि "राज्य छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों को राज्य द्वारा निर्धारित तरीके से मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा।"

📕निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 45 की विषय-वस्तु में परिवर्तन किया गया।

👉अनुच्छेद 51-ए के तहत एक नया मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया है, जिसमें कहा गया है - भारत के प्रत्येक नागरिक का, जो माता-पिता या संरक्षक है, यह कर्तव्य होगा कि वह अपने बच्चे या प्रतिपाल्य को छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच शिक्षा के अवसर प्रदान करे।


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📕अध्याय 2: संविधान की प्रस्तावना (Preamble of the Constitution)

📕प्रस्तावना का परिचय

प्रस्तावना संविधान के परिचय या आमुख (Foreword) को दर्शाती है। यह पूरे संविधान का सार (Essence) प्रस्तुत करती है।

A. प्रस्तावना की पृष्ठभूमि एवं परिचय

आधार: प्रस्तावना जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत किए गए और 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा द्वारा अपनाए गए 'उद्देश्य संकल्प' (Objectives Resolution) पर आधारित है।

पहचान पत्र: एन.ए. पालकीवाला ने प्रस्तावना को "संविधान का पहचान पत्र (Identity Card of the Constitution)" कहा है।

संविधान का भाग: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग है।

सर्वप्रथम: प्रस्तावना को अमेरिकी संविधान में शामिल किया गया था। भारत ने इस पद्धति को अपनाया है।

B. प्रस्तावना के मुख्य तत्व (Components of the Preamble)

प्रस्तावना चार मुख्य घटकों को प्रकट करती है:

1. संविधान का स्रोत – “हम, भारत के लोग…” (We, the people of India) : यह दर्शाता है कि संविधान भारत के लोगों से शक्ति प्राप्त करता है।


2. भारतीय राज्य की प्रकृति – संप्रभु (Sovereign), समाजवादी (Socialist), धर्मनिरपेक्ष (Secular), लोकतांत्रिक (Democratic), गणराज्य (Republic)।

3. संविधान के उद्देश्य – न्याय (Justice), स्वतंत्रता (Liberty), समानता (Equality), बंधुत्व (Fraternity)।

4. अपनाने की तिथि – 26 नवंबर 1949।

C. प्रस्तावना के मुख्य शब्द एवं उनका अर्थ (Key Terms and Meanings)

1. संप्रभु (Sovereign) –
भारत किसी भी विदेशी शक्ति के नियंत्रण से मुक्त है। यह अपने आंतरिक और बाहरी मामलों पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।



2. समाजवादी (Socialist) –
यह शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया। भारत का समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद है (मिश्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास)।

3. धर्मनिरपेक्ष (Secular) –
यह शब्द भी 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया। इसका अर्थ है कि भारत में सभी धर्मों को समान सम्मान और राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है। (अनुच्छेद 25–28 में निहित)।

4. लोकतांत्रिक (Democratic) –
सरकार जनता की इच्छा पर शक्ति प्राप्त करती है। लोकतंत्र दो प्रकार का होता है: प्रत्यक्ष (जैसे स्विट्जरलैंड में) और अप्रत्यक्ष (प्रतिनिधिमूलक), जिसे भारत ने अपनाया है।



5. गणराज्य (Republic) –
राज्य का मुखिया (राष्ट्रपति) निर्वाचित होता है, न कि वंशानुगत (जैसा कि ब्रिटेन में होता है)। भारत का राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।



6. न्याय (Justice) –
तीन प्रकार के न्याय का आदर्श: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक। यह आदर्श रूसी क्रांति (1917) से लिया गया है।


7. स्वतंत्रता (Liberty) –
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता (मौलिक अधिकारों में गारंटीकृत)।

8. समानता (Equality) –
प्रतिष्ठा और अवसर की समानता (भेदभाव के बिना समान व्यवहार)।

9. बंधुत्व (Fraternity) –
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करना। 'अखंडता' शब्द 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया।


D. संविधान में संशोधन (Amendment to the Preamble)

प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार संशोधन किया गया है — 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976।


इस संशोधन द्वारा तीन नए शब्द जोड़े गए:

1. समाजवादी

2. धर्मनिरपेक्ष

3. अखंडता (Integrity)

E. प्रस्तावना से संबंधित महत्वपूर्ण वाद (Important Cases)

1. बेरुबरी यूनियन केस (1960)

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है, इसलिए इसे संशोधित नहीं किया जा सकता है।


2. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)

बेरुबरी निर्णय को पलट दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है।

प्रस्तावना को संशोधित किया जा सकता है, लेकिन संशोधन संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकता।

3. एलआईसी ऑफ इंडिया केस (1995)

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर पुष्टि की कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है।

F. प्रस्तावना की प्रकृति (Nature of the Preamble)

प्रस्तावना गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) है: इसके प्रावधानों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

यह न तो विधायिका को कोई शक्ति प्रदान करती है और न ही उसकी शक्तियों पर रोक लगाती है।


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📕अध्याय 3: संघ और उसका क्षेत्र (Part I – अनुच्छेद 1-4)

1. भाग I का दायरा (Scope of Part I)

संविधान का Part I (अनुच्छेद 1-4) राज्यों और भारत के क्षेत्रों का ढाँचा तय करता है: यह निर्धारित करता है कि भारत एक “Union of States” कैसे है, राज्यों की सीमाओं का निर्धारण कैसे किया जाए और आवश्यकतानुसार सीमाएं/नाम कैसे बदले जाएँ।

यह भाग यह भी तय करता है कि ऐसे परिवर्तनों के लिए संसद को क्या शक्तियाँ हैं और संशोधन की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।

2. अनुच्छेद 1 — “भारत = Union of States” का अर्थ

संविधान कहते हैं: “India, that is Bharat, shall be a Union of States” — यानी भारत और भारत (Bharat) दोनों नाम संवैधानिक रूप से स्वीकार्य हैं।

“Union of States” का मतलब यह है कि भारत का संघ राज्यों का एक संगठन है, पर यह राज्यों के बीच सिर्फ समझौता नहीं है — यह भारत के लोगों द्वारा स्थापित राजनीतिक इकाई है।

संविधान निर्माता (जैसे Dr. B. R. अम्बेडकर) का तर्क था कि राज्यों का अलग होना कठिन या असंभव बनाया जाए ताकि संघ की अखंडता बनी रहे।

संघीय स्वरूप होने के बावजूद, भारत में केन्द्रीय झुकाव (unitary bias) है: केंद्र को बहुत शक्तियाँ दी गई हैं और संसद के पास राज्य सीमाओं को बदलने का अंतिम अधिकार है।

“Union of States” और “Territory of India” अलग हैं: पहला राजनीतिक संघ बताता है, और दूसरा क्षेत्रीय सीमाओं को — जिसका विवरण पहली अनुसूची (First Schedule) में है

3. अनुच्छेद 2 — नए राज्यों का गठन / सम्मिलन (Admission & Establishment)

अनुच्छेद 2 संसद को यह अधिकार देता है कि वह नए राज्य को भारत में शामिल करे या नया राज्य बनाए।

इसके लिए संसद को सिर्फ साधारण कानून (Simple Act) पास करना होता है; यह कोई संवैधानिक संशोधन (Amendment) नहीं है।

इस प्रावधान का प्रयोग बाद में कई राज्यों के निर्माण में हुआ है।

4. अनुच्छेद 3 — राज्य सीमाओं, नाम, विभाजन, एकीकरण

अनुच्छेद 3 संसद को अधिकार देता है कि
वह:

1. किसी राज्य को विभाजित (बांटना) करे,

2. दो या अधिक राज्यों को एकीकृत (मिलाए),
3. नया राज्य बनाए,

4. किसी राज्य की सीमा बढ़ा या घटा सके,

5. राज्य का नाम बदल सके।

प्रक्रिया इस प्रकार होती है: राष्ट्रपति उस बिल को पारित करने की सिफारिश करता है → राष्ट्रपति संबंधित राज्य की विधायिका से राय मांगते हैं → राज्य अपनी राय देता है (लेकिन सहमति देना अनिवार्य नहीं है) → संसद इसे साधारण बहुमत से पास करती है।

चूंकि यह संशोधन नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 368 की विशेष संशोधन प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती; ये परिवर्तन साधारण विधेयक (Law) द्वारा होते हैं।

इस व्यवस्था से राज्यों की सीमाओं और नामों में लचीलापन और व्यवस्था सुनिश्चित होती है।

5. अनुच्छेद 4 — सूचियों (Schedules) में बदलाव

अनुच्छेद 4 कहता है कि यदि अनुच्छेद 2 या 3 के अंतर्गत कोई अधिनियम (Act) बना है, तो वह प्रथम अनुसूची (First Schedule — राज्यों / UTs की सूची) और चौथी अनुसूची (Fourth Schedule — राज्यसभा में सीटों का आवंटन) को बदल सकता है।

ऐसे संशोधन को संविधान संशोधन (Amendment) नहीं माना जाएगा; यह साधारण अधिनियम माना जाता है।

इसलिए, पुनर्गठन करते समय संसद को कठिन संशोधन प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता।

6. राज्य पुनर्गठन — आयोग, रिपोर्ट और सिफारिशें

State Reorganisation Commission (SRC) की स्थापना दिसंबर 1953 में हुई थी। इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति Fazl Ali ने की, अन्य सदस्य K. M. Panikkar और H. N
. Kunzru थे।

SRC ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

SRC की प्रमुख सिफारिशें थीं:

1. भाषा-आधार पर राज्यों का पुनर्गठन, लेकिन “एक भाषा = एक राज्य” का सख्त सिद्धांत न अपनाना;


2. राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा, प्रशासनिक और आर्थिक दक्षता को प्राथमिकता देना।


3. चार-प्रकार की (Part A, B, C, D) राज्यों की श्रेणीकरण को खत्म करना।


4. सीमाओं के निर्धारण में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं पर ध्यान देना।

5. कुछ क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक उपबंध देने की सिफारिश।

इन सिफारिशों के आधार पर संसद ने States Reorganisation Act, 1956 पारित किया, जो 1 नवंबर 1956 से लागू हुआ।

साथ ही, संविधान में Seventh
Amendment Act, 1956 लाई गई, जिससे पुनर्गठन अधिनियम और अनुसूचियों (Schedules) में बदलाव संभव हो पाया।

7. राज्यों का गठन-वर्ष (State Formation Years) — कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण

यहाँ प्रमुख राज्यों के गठन या पुनर्गठन के वर्ष दिए गए हैं ताकि UPSI-लेवल तैयारी में मदद हो:

आंध्र प्रदेश: 1 नवम्बर 1956, States Reorganisation Act, 1956 के तहत (SRC की रिपोर्ट के बाद)

मिसोर (अब कर्नाटक): 1 नवम्बर 1956, SRC पुनर्गठन के बाद


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अध्याय–4 : नागरिकता (Citizenship)

(भाग II — अनुच्छेद 5 से 11)

नागरिकता किसी व्यक्ति और राज्य के बीच का पूर्ण कानूनी संबंध (Full Legal Relationship) है। यह अधिकार, कर्तव्य और राजनीतिक सहभागिता का आधार है। भारत में नागरिकता की संपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था भाग II (अनुच्छेद 5–11) में दी गई है

A. संवैधानिक प्रावधान (Articles 5–11)

भारतीय संविधान नागरिकता से जुड़ी दो ही चीजें निर्धारित करता है—

1. 26 जनवरी 1950 को कौन भारतीय नागरिक बना (Articles 5–8
2. नागरिकता पर कानून बनाने की शक्ति किसके पास है (Article 11)

संविधान ने यह नहीं बताया कि 26 जनवरी 1950 के बाद नागरिकता कैसे मिलेगी—यह कार्य संसद को सौंपा गया है।

अनुच्छेद 5 — संविधान प्रारम्भ पर नागरिकता

26 जनवरी 1950 को वह व्यक्ति भारत का नागरिक माना गया जो—
• भारत के राज्यक्षेत्र में अधिवासित (Domicile) था, और
• या तो भारत में जन्मा था,
• या उसके माता-पिता में से कोई भारत में जन्मा था,
• या वह व्यक्ति संविधान लागू होने के ठीक पहले कम से कम 5 वर्ष से भारत में सामान्य रूप से रह रहा हो।


यह एकमात्र अनुच्छेद है जिसमें “Domicile + Birth/Parentage/Residence” का संयुक्त आधार मिलता है।

अनुच्छेद 6 — पाकिस्तान से भारत आए व्यक्तियों की नागरिकता (Refugees/Migrants)

जो व्यक्ति पाकिस्तान से भारत आए (Migrated) थे—
• यदि वे 19 जुलाई 1948 से पहले आए, तो स्वतः नागरिक।
• अगर 19 जुलाई 1948 के बाद आए, तो भारत सरकार के पास पंजीकरण कराकर नागरिकता प्राप्त करनी होगी।

यह प्रावधान विभाजन (Partition) के समय आए हिंदू, सिख आदि शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए बनाया गया था।

अनुच्छेद 7 — भारत से पाकिस्तान गए, फिर लौटे व्यक्तियों की नागरिकता

जो व्यक्ति 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान चले गए थे और बाद में वापस भारत लौटे—
• उन्हें “Evacuee Property Law” के अधीन माना गया।
• ऐसे व्यक्तियों को नागरिकता पाने हेतु भारतीय सरकार के सामने कम से कम 6 माह का निवास + पंजीकरण आवश्यक था।

यह प्रावधान उन लोगों के लिए था जो विभाजन के बाद दोनों तरफ जाते रहे।

अनुच्छेद 8 — विदेश में रह रहे भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO)

भारत में जन्मे माता/पिता/दादा/दादी के वंशज, जो विदेश में रहते थे, भारतीय नागरिकता ले सकते थे—
• भारत के दूतावास या कौंसुलर (Consular) कार्यालय में पंजीकरण कराकर।

यह प्रावधान भारतीय वंश के विदेशियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम है।

अनुच्छेद 9 — विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता समाप्त

यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है—
• उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
• भारत दोहरी नागरिकता नहीं देता।

यह अनुच्छेद Citizenship Act, 1955 के साथ मिलकर लागू होता है।

अनुच्छेद 10 — नागरिकता जारी रहने का अधिकार

जब तक संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून का उल्लंघन न किया जाए—
• सभी भारतीय नागरिक अपने नागरिकता अधिकार बनाए रखते हैं।

अनुच्छेद 11 — संसद की पूर्ण शक्ति

संसद को अधिकार है कि वह नागरिकता से संबंधित—
• अधिग्रहण (Acquisition),
• समाप्ति (Termination),
• विनियमन (Regulation)

पर कोई भी कानून बनाए।

इसी शक्ति के अंतर्गत नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act 1955) बनाया गया।
B. भारत में नागरिकता की प्रकृति (Nature of Citizenship)

भारत में—
• एकल नागरिकता (Single Citizenship) होती है, जैसे ब्रिटेन में।
• व्यक्ति केवल “भारत” का नागरिक होता है, किसी “राज्य” का नहीं।
• भारत संघीय होते हुए भी USA की तरह “Dual Citizenship” (Union + State) नहीं देता।

यह व्यवस्था राष्ट्रीय एकता के लिए उपयुक्त मानी गई।

C. नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955)

यह नागरिकता से जुड़े सभी नियमों का मुख्य कानून है। इसमें बार–बार संशोधन हुए—विशेष रूप से वर्ष 1986, 1992, 2003, 2005 और 2019 में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।

I. नागरिकता प्राप्त करने के 5 तरीके (Acquisition of Citizenship)

1. जन्म से (By Birth)

1950–1987 :
•
भारत में जन्मा हर व्यक्ति नागरिक — माता-पिता कौन हैं इससे फर्क नहीं।

1987 संशोधन के बाद :
• माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक होना चाहिए।2004 संशोधन के बाद :

• दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों,
या एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा “अवैध प्रवासी” (Illegal Migrant) न हो।

➤ विदेशी राजनयिक (Diplomat) के बच्चों को नागरिकता नहीं मिलती।
➤ शरणार्थियों के जन्में बच्चों को स्वतः नागरिकता नहीं।

2. वंश के आधार पर (By Descent)
1950–1992 :

• विदेश में जन्मा व्यक्ति नागरिक तभी, जब पिता भारतीय नागरिक हो।

1992 के बाद :
•
माता या पिता में से कोई भी भारतीय नागरिक हो।


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📕अध्याय 6 : राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (Directive Principles of State Policy – DPSP)

भाग IV — अनुच्छेद 36 से 51

DPSP वे सिद्धांत हैं जो भारत में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र (Social & Economic Democracy) स्थापित करने के लिए सरकार को दिशा प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य भारत को एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाना है।

A. DPSP की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएँ

• DPSP का स्रोत आयरलैंड का संविधान है, और आयरलैंड ने इन्हें स्पेन से लिया था।
• इनका मुख्य उद्देश्य भारत में सामाजिक व आर्थिक न्याय की स्थापना कर एक कल्याणकारी राज्य बनाना है।
• ये सिद्धांत गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) हैं — अर्थात् अदालत इनके उल्लंघन पर इन्हें लागू नहीं करवा सकती।
• डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने इन्हें भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता (Novel Features) कहा है।
• के. टी. शाह ने DPSP को “ऐसा चेक बताया जो बैंक अपने मन से भुना सके”, अर्थात् सरकार जब चाहे, तब इन्हें लागू करे।
• DPSP केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए नैतिक एवं संवैधानिक दिशा-निर्देश हैं।

B. निदेशक सिद्धांतों का वर्गीकरण

हालाँकि संविधान में कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं है, परंतु इनमें सम्मिलित विषय-वस्तु के आधार पर इन्हें तीन समूहों में बांटा गया है:

1. समाजवादी सिद्धांत

2. गांधीवादी सिद्धांत

3. उदार-बौद्धिक (Liberal-Intellectual) सिद्धांत
1. समाजवादी सिद्धांत (Socialistic Principles)

यह सिद्धांत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना पर जोर देते हैं।

अनुच्छेद 38

▪️ राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था स्थापित करेगा।
• यह राज्य के दायित्व है कि वह आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को कम करे।
• 44वें संशोधन द्वारा इसके दायरे को बढ़ाया गया (38(2))।

अनुच्छेद 39
राज्य निम्नलिखित नीतियों को लागू करने का प्रयास करेगा—
• प्रत्येक नागरिक को आजीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध हों।
• समुदाय के संसाधनों का समान वितरण हो।
• धन एवं उत्पादन के साधनों का संकेन्द्रण रोकना।
• पुरुषों व महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना।
• श्रमिकों का स्वास्थ्य, शक्ति और बच्चों के विकास की सुरक्षा सुनिश्चित करना।

अनुच्छेद 39A (42वाँ संशोधन, 1976)
• गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता (Free Legal Aid) प्रदान करना।

अनुच्छेद 41
• बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी आदि की दशाओं में कार्य करने, शिक्षा पाने तथा सार्वजनिक सहायता का अधिकार देना।

अनुच्छेद 42
• मानवीय कार्य दशाएँ एवं मातृत्व राहत (Maternity Relief) प्रदान करना।

अनुच्छेद 43
• सभी श्रमिकों को निर्वाह मजदूरी (Living Wage), सभ्य जीवन स्तर और सामाजिक-सांस्कृतिक अवसर देना।

अनुच्छेद 43A (42वाँ संशोधन)
• उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

2. गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles)

ये सिद्धांत महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज, स्वावलंबन और सामाजिक सद्भाव पर आधारित हैं।

अनुच्छेद 40
• ग्राम पंचायतों का संगठन करना और उन्हें स्वशासन की इकाई बनाना।

▪️अनुच्छेद 43B (97वाँ संशोधन, 2011)
सहकारी समितियों (Co-operative Societies) को बढ़ावा देना तथा लोकतांत्रिक प्रबंधन सुनिश्चित करना।


▪️अनुच्छेद 46
SC, ST और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक व आर्थिक हितों का संवर्धन।
• विशेष ध्यान: सामाजिक अन्याय तथा शोषण से इनकी सुरक्षा।


▪️अनुच्छेद 47
पोषण सुधारना, जीवन स्तर ऊँचा करना और जन स्वास्थ्य में सुधार करना।
• शराब और नशीले पदार्थों के सेवन पर रोक लगाने का प्रयास



▪️अनुच्छेद 48

गाय, बछड़ों एवं अन्य दुधारू-पाशवों के वध पर रोक तथा उनके संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाना।

3. उदार-बौद्धिक सिद्धांत (Liberal–Intellectual Principles)

ये सिद्धांत आधुनिक, प्रगतिशील, वैज्ञानिक और मानवतावादी विचारधारा को प्रोत्साहित करते हैं।

▪️अनुच्छेद 44 — समान नागरिक संहिता (UCC)
• पूरे भारत के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास।
• तथ्य: वर्तमान में केवल गोवा में UCC लागू है।

▪️अनुच्छेद 45 (86वाँ संशोधन द्वारा संशोधित)
• 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्य देखभाल और शिक्षा (ECCE) का प्रावधान।

पहले 14 वर्ष तक शिक्षा का प्रावधान था, जिसे अनुच्छेद 21A में स्थानांतरित किया गया।

▪️अनुच्छेद 48A (42वाँ संशोधन)
पर्यावरण की सुरक्षा एवं सुधार, वन और वन्यजीव संरक्षण।

▪️अनुच्छेद 49
राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, वस्तुओं और ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा।

▪️अनुच्छेद 50
न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना — Separation of Judiciary from Executive।
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📕नीति निर्देशक सिद्धांत के संदर्भ में विद्वानों/ संविधान निर्माताओं के विचार।

1. डॉ० बी.आर. अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar)
"निदेशक तत्व विधायिका और कार्यपालिका के लिए अनुदेश हैं।"
→ ये तत्व सरकार को समाज के कल्याण हेतु मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

2. के.टी. शाह (K.T. Shah)
"राज्य का नीति निर्देशक तत्व एक ऐसा चेक है जो बैंक की सुविधानुसार अदा की जाएगी।"
→ उनका मत था कि ये केवल सिफारिशें हैं, जिनका पालन सरकार की आर्थिक और व्यावहारिक स्थिति पर निर्भर करता है।
3. टी.टी. कृष्णमचारी (T.T. Krishnamachari)
"भावनाओं का स्थाई कूड़ाघर"
→ उन्होंने इसे केवल आदर्शवादी भावनाओं और आकांक्षाओं का संग्रह कहा, जो व्यवहार में पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सकते।

4. के. संथानम (K. Santhanam)
"इन तत्त्वों से केंद्र और राज्य के मध्य संवैधानिक टकराव होगा।"
→ नीति निर्देशक तत्त्वों के कारण संघीय ढांचे में विवाद की संभावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं।

5. के.सी. व्हेयर (K.C. Wheare)
"लक्ष्य एवं आकांक्षाओं का घोषणपत्र"
→ ये तत्त्व राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों का प्रतिपादन करते हैं।

6. सर आइवर जेनिंग्स (Sir Ivor Jennings)
"इन तत्वों का कोई नियमित प्रतिमान दर्शन नहीं है", "ये तत्व समाजवाद के बिना फेबियन समाजवाद हैं"
→ उन्होंने इसे एक आदर्शवादी लेकिन लचीला मार्गदर्शन माना, जो समाजवादी विचारों को बिना कठोर रूप से लागू किए प्रकट करता है।

7. ग्रनविल ऑस्टिन (Granville Austin)
"सविधान की आत्मा, निदेशक तत्व और अधिकार संविधान की मूल आत्मा हैं"
→ उनके अनुसार ये तत्त्व संविधान की मूल भावना और उद्देश्य को प्रकट करते हैं।

8. बी.एन. राव (B.N. Rao)
"निदेशक तत्व राज्य प्राधिकारियों के लिए आवश्यकता, नैतिक आवश्यकता और शैक्षिक मूल्य हैं"
→ वे इसे प्रशासनिक, नैतिक और शैक्षिक दृष्टि से आवश्यक मानते हैं।


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✅स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित आंदोलन एवं वर्ष

♜ बंग-भंग आंदोलन(स्वदेशी आंदोलन)
➜ 1905 ई.

♜ मुस्लिम लीग की स्थापना
➜ 1906 ई.

♜ कांग्रेस का बंटवारा
➜ 1907 ई.

♜ होमरूल आंदोलन
➜ 1916 ई.

♜ लखनऊ पैक्ट
➜ दिसंबर 1916 ई.

♜ मांटेग्यू घोषणा
➜ 20 अगस्त 1917 ई.

♜ रौलेट एक्ट
➜ 19 मार्च 1919 ई.

♜ जालियांवाला बाग हत्याकांड
➜ 13 अप्रैल 1919 ई.

♜ खिलाफत आंदोलन
➜ 1919 ई.

♜ हंटर कमिटी की रिपोर्ट प्रकाशित
➜ 18 मई 1920 ई.

♜ कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन
➜ दिसंबर 1920 ई.

♜ असहयोग आंदोलन की शुरुआत
➜ 1 अगस्त 1920 ई.

♜ चौरी-चौरा कांड
➜ 5 फरवरी 1922 ई.

♜ स्वराज्य पार्टी की स्थापना
➜ 1 जनवरी 1923 ई.

♜ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
➜ अक्टूबर 1924 ई.

♜ साइमन कमीशन की नियुक्ति
➜ 8 नवंबर 1927 ई.

♜ साइमन कमीशन का भारत आगमन
➜ 3 फरवरी 1928 ई.

♜ नेहरू रिपोर्ट
➜ अगस्त 1928 ई.

♜ बारदौली सत्याग्रह
➜ अक्टूबर 1928 ई.

♜ लाहौर पड्यंत्र केस
➜ 8 अप्रैल 1929 ई.

♜ कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन
➜ दिसंबर 1929 ई.

♜ स्वाधीनता दिवस की घोषणा
➜ 2 जनवरी 1930 ई.

♜ नमक सत्याग्रह
➜ 12 मार्च 1930 ई. से 5 अप्रैल 1930 ई. तक

♜ सविनय अवज्ञा आंदोलन
➜ 6 अप्रैल 1930 ई.

♜ प्रथम गोलमेज आंदोलन
➜ 12 नवंबर 1930 ई.

♜ गांधी-इरविन समझौता
➜ 8 मार्च 1931 ई.

♜ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
➜ 7 सितंबर 1931 ई.

♜ कम्युनल अवार्ड (साम्प्रदायिक पंचाट)
➜ 16 अगस्त 1932 ई.

♜ पूना पैक्ट
➜ सितंबर 1932 ई.

♜ तृतीय गोलमेज सम्मेलन
➜ 17 नवंबर 1932 ई.

♜ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन
➜ मई 1934 ई.

♜ फॉरवर्ड ब्लाक का गठन
➜ 1 मई 1939 ई.

♜ मुक्ति दिवस
➜ 22 दिसंबर 1939 ई.

♜ पाकिस्तान की मांग
➜ 24 मार्च 1940 ई.

♜ अगस्त प्रस्ताव
➜ 8 अगस्त 1940 ई.

♜ क्रिप्स मिशन का प्रस्ताव
➜ मार्च 1942 ई.

♜ भारत छोड़ो प्रस्ताव
➜ 8 अगस्त 1942 ई.

♜ शिमला सम्मेलन
➜ 25 जून 1945 ई.

♜ नौसेना का विद्रोह
➜ 19 फरवरी 1946 ई.

♜ प्रधानमंत्री एटली की घोषण
➜ 15 मार्च 1946 ई.

♜ कैबिनेट मिशन का आगमन
➜ 24 मार्च 1946 ई.

♜ प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस
➜ 16 अगस्त 1946 ई.

♜ अंतरिम सरकार की स्थापना
➜ 2 सितंबर 1946 ई.

♜ माउंटबेटन योजना
➜ 3 जून 1947 ई.

♜ स्वतंत्रता मिली➜ 15 अगस्त 1947 ई.

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📕पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा

संवैधानिक दर्जा क्या है?

जब किसी संस्था को संविधान में स्थायी दर्जा, अधिकार व दायित्व मिलते हैं, तो उसे संवैधानिक दर्जा कहा जाता है।

महत्वपूर्ण तिथियाँ:

👉लोकसभा में पारित: 22 दिसंबर 1992

👉राज्यसभा में पारित: 23 दिसंबर 1992

👉राष्ट्रपति की स्वीकृति: 20 अप्रैल 1993

👉प्रभावी तिथि: 24 अप्रैल 1993 (संवैधानिक दर्जा प्रभावी)

👉संविधान के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला l

👉प्रधानमंत्री (उस समय): पी. वी. नरसिम्हा राव

👉संविधान संशोधन:


✍73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

✍भाग-9 (अनु. 243-क से 243-ण) जोड़ा गया

✍ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषयों का उल्लेख

✍उत्तर प्रदेश में इनमें से 16 विषय पंचायतों को हस्तांतरित l

🍁नीति निदेशक तत्व:
अनुच्छेद 40 – ग्राम पंचायतों की स्थापना हेतु राज्यों को निर्देश
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राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस:


🔴पहली बार 2010 में मनाया गया
हर वर्ष 24 अप्रैल को मनाया जाता है

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📕 पंचायतों से संबंधित अनुच्छेद एक दृष्टि में

अनुच्छेद विषय - वस्तु

◾️243 परिभाषाएँ
◾️243 (A) ग्राम सभा
◾️243 (B) पंचायतों का गठन
◾️243 (C) पंचायतों की संरचना
◾️243 (D) स्थानों का आरक्षण
◾️243 (E) पंचायतों की अवधि आदि
◾️243 (F) सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
◾️243 (G) पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व
◾️243 (H) पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ
◾️243 (I) वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन
◾️243 (J) पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा
◾️243 (K) पंचायतों के लिए निर्वाचन
◾️243 (L) संघ-राज्य क्षेत्रोंं में लागू होना
◾️243 (M) इस भाग का कतिपय क्षेत्रोंं पर लागू न होना
◾️243 (N) विद्यमान विधियों और पंचायतों का बने रहना
◾️243 (O) निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्ज़न


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