No Document No History
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🏛️NO DOCUMENT NO HISTORY🏛️
जहाँ इतिहास किताबों से आगे, दस्तावेज़ों से जुड़ता है।
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No Document No History
Mamta Kalia- Daud.pdf
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वे पंद्रह दिन .pdf
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No Document No History
वे पंद्रह दिन .pdf
विभाजन पर लिखी एक शानदार किताब ....
"वे पंद्रह दिन "
1 अगस्त से 15 अगस्त तक देश के विभिन्न इलाकों में क्या हुआ ,
तथाकथित नेताओं ने कैसे सत्ता की मलाई स्वीकार करने की जल्दबाजी में लाखों लोगों को उनके हाथ पर छोड़ दिया था

और सबसे महत्वपूर्ण यह कि
महात्मा गांधी ...'.एक ऐसे गुब्बारे के रूप में सामने आते दिखते हैं जो पहले तो खूब फूलता है लेकिन जब फूटता है तो सिर्फ आवाज और धमाके के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं होता ' ।

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यह बलुआ पत्थर से बनी एक मूर्ति है जिसमें उमा-महेश्वर, यानी शिव और उनकी पत्नी पार्वती को दर्शाया गया है। यह हिंदू कला का एक महत्वपूर्ण नमूना है, जो संभवतः 8वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी के बीच का है।
इस मूर्ति में शिव और पार्वती एक साथ बैठे हुए दिखाए गए हैं, जिसमें शिव अपनी पत्नी को स्नेहपूर्वक गले लगा रहे हैं।
इस मूर्ति में भगवान विष्णु को शेषाशयी विष्णु के कुंडलियों पर विश्राम करते हुए लेटी हुई मुद्रा में दर्शाया गया है।
उनकी पत्नी लक्ष्मी को अक्सर उनके चरणों में बैठे हुए दिखाया जाता है, जैसा कि इस चित्र में देखा जा सकता है।
यह मूर्ति 10वीं शताब्दी ईस्वी की एक पत्थर की नक्काशी है जो हिंदू पौराणिक कथा लिंगोद्भवको दर्शाती है , और वर्तमान में राजस्थान के अजमेर स्थित सरकारी संग्रहालय में रखी हुई है।
यह कलाकृति उस कहानी को दर्शाती है जिसमें देवता ब्रह्मा और विष्णु अग्नि के एक ब्रह्मांडीय स्तंभ (लिंगम) की शुरुआत या अंत का पता लगाने में असफल रहते हैं, जिससे भगवान शिव अपनी सर्वोच्च स्थिति को साबित करने के लिए प्रकट होते हैं।
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वराह विष्णु के दस अवतारों में से तीसरा अवतार है, जिसे दशावतार के नाम से जाना जाता है।
यह मूर्ति उस कहानी को दर्शाती है जिसमें विष्णु, एक सूअर के रूप में, पृथ्वी देवी भूदेवी को ब्रह्मांडीय सागर से बचाते हैं, जब एक राक्षस ने उन्हें वहां छिपा दिया था।
यह विशिष्ट विशालकाय, अखंड बलुआ पत्थर की मूर्ति 10वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी की है और यह भारत के अजमेर में स्थित राजस्थान राज्य संग्रहालय में है।
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वे पंद्रह दिन .pdf
विशेष सूचना-किसी भी सदस्य की भावनाओं को आहत करना हमारा बिल्कुल उद्देश्य नहीं है ✅
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🔰 GIC प्रवक्ता (Lecturer) भर्ती

👉 कुल आवेदन: 3,83,302

◾Competition (विषयवार)

♦️ इतिहास – 35,864 | 1 सीट = 478 अभ्यर्थी (सबसे कठिन)

♦️समाजशास्त्र – 31,119 | 1 सीट = 464

♦️ भूगोल – 23,953 | 1 सीट = 374

♦️हिंदी – 53,926 | 1 सीट = 332

♦️जीव विज्ञान – 23,431 | 1 सीट = 295

♦️अंग्रेजी – 42,869 | 1 सीट = 233

♦️नागरिक शास्त्र – 27,366 | 1 सीट = 206

♦️ उर्दू – 4,315 | 1 सीट = 107

♦️भौतिक विज्ञान – 19,137 | 1 सीट = 100 (सबसे कम प्रतिस्पर्धा)

संभावित तिथि 3 मई 2026

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◾BPSC शिक्षक भर्ती TRE-4 में बड़ा बदलाव !

👉बिहार सरकार BPSC शिक्षक भर्ती के TRE 4 में बड़ा बदलाव करने जा रही है। अब एक कैंडिडेट-एक रिजल्ट की नीति लागू होगी। पहले की भर्तियों में एक ही कैंडिडेट का रिजल्ट प्राथमिक, मध्य और माध्यमिक तीनों के लिए हो जाता था। इससे कई सीटें खाली रह जाती थीं। नए नियम से अब एक सीट पर एक ही कैंडिडेट का रिजल्ट होगा, जिससे अब सीट खाली नहीं बचेगा। बता दें कि TRE-4 के तहत लगभग 44000 शिक्षकों की भर्ती होनी है.......!!
गुलबदन बानो बेगम कौन थी
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Anonymous Quiz
33%
हुमायूं की पुत्री
67%
बाबर की पुत्री
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🚨1857 के क्रांति में शहीद होने वाली देश की प्रथम महिला वीरांगना

पूरा नाम: रानी अवंतिबाई लोधी
जन्म: लगभग 1831
क्षेत्र: रामगढ़ (वर्तमान डिंडौरी–मंडला, मध्य प्रदेश)
पति: राजा विक्रमादित्य सिंह लोधी (रामगढ़ रियासत के शासक)

⚔️ संघर्ष की शुरुआत–

अंग्रेजों से टकराव राजा विक्रमादित्य सिंह के बीमार पड़ने के बाद अंग्रेजों ने “कुप्रशासन” का बहाना बनाकर रामगढ़ रियासत अपने नियंत्रण में ले ली।

रानी अवंतिबाई ने इसे सीधी गुलामी माना और अंग्रेजी हुकूमत मानने से इनकार कर दिया।

✊ यहीं से उनके विद्रोह की चिंगारी भड़की।

🔥 1857 का विद्रोह और रानी की भूमिक 1857 की क्रांति में अवंतिबाई लोधी ने आदिवासियों, किसानों और स्थानीय राजाओं को संगठित किया।

मंडला, डिंडौरी और आसपास के जंगलों में उन्होंने गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) किया।

अंग्रेजी छावनियों पर हमले किए, सिपाहियों को खदेड़ा।

उनका उद्देश्य था:
👉 रामगढ़ रियासत की स्वतंत्रता और स्वशासन।
🗡️ अंतिम युद्ध और बलिदान
अंग्रेजों ने बड़ी सेना भेजकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया।

20 मार्च 1858 के आसपास रामगढ़ के जंगलों में निर्णायक युद्ध हुआ।

जब पराजय निश्चित दिखी और पकड़े जाने का खतरा हुआ, तो रानी अवंतिबाई लोधी ने तलवार से स्वयं को बलिदान कर दिया।

🕊️ उन्होंने गुलामी स्वीकार करने की बजाय वीरगति चुनी।

आज भी मंडला–डिंडौरी क्षेत्र में लोग उन्हें
“रामगढ़ की शेरनी” कहकर याद करते हैं।

#AcharyaPrashant #History #WomenEmpowerment #GetInspired

Posted by Nitish Kumar Roll 3 on Acharya Prashant's Gita Mission App.

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छत्रपति शिवाजी महाराज ने सेना में मुसलमानों को महत्वपूर्ण पद दिए–
लेकिन उनका हिंदू राज्य हिंदुओं और ग़ैर हिंदुओं दोनों के लिए था. वैभव पुरंदरे लिखते हैं, "उनकी सोच समावेषी थी. वो हिंदू और मुसलमानों को एक जैसा समझते थे और वो धर्म के आधार पर भेदभाव को घिनौना, अनैतिक और अस्वीकार्य मानते थे. उनकी सेना में मराठों और दूसरे हिंदुओं की तरह मुसलमानों को भी शामिल किया जाता था. उनकी नौसेना के दो आला अधिकारी दार्या सारंग वेंतजी और दौलत ख़ाँ मुसलमान थे."
उनके एक और आला सैनिक अफ़सर नूर बेग़ थे जो मुसलमान थे. सुरेंद्रनाथ सेन ने अपनी क़िताब में लिखा है, "शिवाजी ने अपने सलाहकारों के विरोध के बावजूद 700 पठानों को अपनी सेना में शामिल किया था. उनके सिर्फ़ एक सहयोगी गोमाजी नायक पंसाम्बल ने उनके इस फ़ैसले का समर्थन किया था."
शिवाजी महाराज के गौरव में ये पंक्तियां प्रसिद्ध हैं-
शिवरायांचे आठवावे स्वरुप। शिवरायांचा आठवावा साक्षेप।
शिवरायांचा आठवावा प्रताप। भूमंडळी


"शिवाजी महाराज का संक्षिप्त जीवन-चरित्र स्मरण करने योग्य है
शिवाजी महाराज का पराक्रम संपूर्ण पृथ्वी पर स्मरणीय है”📖✍️👏
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