📚 झारखंड असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती 2026 : बड़ी अपडेट
सूत्रों के अनुसार झारखंड JET 2026 का परिणाम 31 मई 2026 तक घोषित होने की संभावना है। परिणाम जारी होते ही अनुमानित 2200+ पदों पर असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती प्रक्रिया तेज हो सकती है।
विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में लंबे समय से रिक्त पदों को देखते हुए यह भर्ती उच्च शिक्षा क्षेत्र की महत्वपूर्ण भर्तियों में मानी जा रही है। इतिहास, हिंदी, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, अंग्रेज़ी, भूगोल, मनोविज्ञान, शिक्षा शास्त्र सहित अनेक विषयों में अवसर देखने को मिल सकते हैं।
📝 संभावित चयन प्रक्रिया
▪️ JET योग्यता
▪️ लिखित परीक्षा / स्क्रीनिंग
▪️ अकादमिक मूल्यांकन
▪️ साक्षात्कार
📌 तैयारी के लिए महत्वपूर्ण वर्कशीट
✅ यूनिट वाइज नोट्स
✅ PYQ आधारित अभ्यास
✅ शोध पद्धति एवं शिक्षण अभिरुचि
✅ विषय आधारित अवधारणात्मक अध्ययन
✅ उत्तर लेखन अभ्यास
✅ समसामयिक शैक्षणिक मुद्दे
⏳ जो अभ्यर्थी अभी से निरंतर तैयारी में जुटेंगे, वही आगामी भर्ती में मजबूत दावेदारी प्रस्तुत कर पाएंगे।
#JharkhandJET #AssistantProfessor #JPSC #HigherEducation #History #NETJRF #JET2026 #AssistantProfessorRecruitment
सूत्रों के अनुसार झारखंड JET 2026 का परिणाम 31 मई 2026 तक घोषित होने की संभावना है। परिणाम जारी होते ही अनुमानित 2200+ पदों पर असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती प्रक्रिया तेज हो सकती है।
विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में लंबे समय से रिक्त पदों को देखते हुए यह भर्ती उच्च शिक्षा क्षेत्र की महत्वपूर्ण भर्तियों में मानी जा रही है। इतिहास, हिंदी, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, अंग्रेज़ी, भूगोल, मनोविज्ञान, शिक्षा शास्त्र सहित अनेक विषयों में अवसर देखने को मिल सकते हैं।
📝 संभावित चयन प्रक्रिया
▪️ JET योग्यता
▪️ लिखित परीक्षा / स्क्रीनिंग
▪️ अकादमिक मूल्यांकन
▪️ साक्षात्कार
📌 तैयारी के लिए महत्वपूर्ण वर्कशीट
✅ यूनिट वाइज नोट्स
✅ PYQ आधारित अभ्यास
✅ शोध पद्धति एवं शिक्षण अभिरुचि
✅ विषय आधारित अवधारणात्मक अध्ययन
✅ उत्तर लेखन अभ्यास
✅ समसामयिक शैक्षणिक मुद्दे
⏳ जो अभ्यर्थी अभी से निरंतर तैयारी में जुटेंगे, वही आगामी भर्ती में मजबूत दावेदारी प्रस्तुत कर पाएंगे।
#JharkhandJET #AssistantProfessor #JPSC #HigherEducation #History #NETJRF #JET2026 #AssistantProfessorRecruitment
❤2
✍🏻 Post 21 | 16 MAY’26
💭Topic — History
________
💂बंगाल विभाजन 1905 : क्या विभाजन सिर्फ जमीन का था?
👉1905 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल को दो हिस्सों में बाँट दिया। पूर्वी बंगाल और असम को अलग प्रांत बनाया गया, जबकि पश्चिमी बंगाल अलग रहा।
सरकारी कारण क्या बताया गया? कि बंगाल इतना बड़ा हो चुका था कि प्रशासन चलाना कठिन हो रहा था।
🕵️लेकिन मामला सिर्फ प्रशासन का नहीं था।
उस समय बंगाल ब्रिटिश शासन के खिलाफ राजनीतिक जागरूकता का बड़ा केंद्र बन चुका था। कलकत्ता में छात्र, पत्रकार, लेखक, वकील और शिक्षित मध्यमवर्ग लगातार अंग्रेज़ी शासन की आलोचना कर रहे थे। स्वदेशी विचार फैल रहे थे। राष्ट्रीय चेतना बढ़ रही थी।
👉इसी दौरान भारत के वायसराय Lord Curzon ने विभाजन का निर्णय लिया।
नए पूर्वी बंगाल में मुसलमानों की आबादी अधिक थी, जबकि पश्चिमी हिस्से में हिंदू आबादी अधिक थी। यहीं से लोगों को यह समझ आने लगा कि यह केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं है। ब्रिटिश शासन धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश भी कर रहा था।
यह सिर्फ पहले से मौजूद दरारों का उपयोग भर नहीं था।
औपनिवेशिक शासन ने अलग प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक ढाँचे और राजनीतिक हितों के माध्यम से उन पहचानों को और मजबूत भी किया।
📜आम इतिहास की किताबें कहती हैं कि बंगाल विभाजन ने भारतीय राष्ट्रवाद को नई ऊर्जा दी।
स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार हुआ। राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान बने।
Rabindranath Tagore ने रक्षाबंधन अभियान चलाया जहाँ हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे को राखी बाँधकर एकता दिखा रहे थे।
आख़िरकार 1911 में ब्रिटिश सरकार ने विभाजन रद्द कर दिया। इसके पीछे राष्ट्रवादी विरोध, प्रशासनिक कठिनाइयाँ और ब्रिटिश साम्राज्य की राजनीतिक पुनर्गणना जैसे कई कारण थे।
_लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। धार्मिक आधार पर राजनीतिक पहचानें अब और अधिक संगठित हो चुकी थीं। आगे चलकर यही प्रवृत्तियाँ भारतीय राजनीति में गहरी होती गईं।_
⭐AP Framework's Take
जो 1905 में हुआ, वह बाहर से एक राजनीतिक घटना लगती है। लेकिन भीतर देखो तो यह पहचान और अहंकार की वही पुरानी प्रक्रिया है जो बार-बार नए रूप में सामने आती है।
कर्जन अपनी सत्ता और साम्राज्य को सुरक्षित रखना चाहता था।उसके लिए धर्म एक सहारा बना।
हिंदू और मुसलमान, दोनों को अलग राजनीतिक पहचान के रूप में देखने और दिखाने की प्रक्रिया तेज़ हुई।
👉धीरे-धीरे लोग अपनी धार्मिक पहचान को ही “मैं” मानने लगे।
जब कोई कहता है, “मैं हिंदू हूँ इसलिए यह विभाजन गलत है” या “मैं मुसलमान हूँ इसलिए यह विभाजन हमारे हित में है” तो दोनों ही उधार ली हुई पहचान से बोल रहे हैं।
यहीं धर्म भीतर की खोज का माध्यम रहने के बजाय समूह-आधारित पहचान का आधार बनने लगता है।
1911 में विभाजन रद्द हुआ, लेकिन पहचान-आधारित राजनीति समाप्त नहीं हुई।
👉औपनिवेशिक नीतियों और सामाजिक असुरक्षाओं ने मिलकर ऐसी मानसिकता को और गहरा किया जिसमें व्यक्ति स्वयं को पहले किसी समूह का सदस्य मानता है, मनुष्य बाद में।
इसीलिए आगे आने वाले दशकों में सांप्रदायिक राजनीति और अधिक मजबूत होती गई।
1947 का विभाजन केवल 1905 का सीधा परिणाम नहीं था, लेकिन 1905 ने यह दिखा दिया था कि धार्मिक पहचान को राजनीतिक शक्ति में बदला जा सकता है।
और यह केवल नेताओं या साम्राज्य की कहानी नहीं है।
लोग भी अपनी-अपनी पहचानों से चिपके रहे, क्योंकि पहचान उन्हें सुरक्षा और महत्व का एहसास देती है।
👉 बंगाल विभाजन केवल नक्शे का विभाजन नहीं था। यह उस मानसिक संरचना का भी संकेत था जहाँ इंसान अपनी पहचान को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानने लगता है।
औपनिवेशिक सत्ता ने इस प्रवृत्ति का उपयोग भी किया और उसे संस्थागत रूप भी दिया। लेकिन सवाल केवल इतिहास का नहीं है।
आज भी व्यक्ति किसी विचार, धर्म, समूह या पहचान की रक्षा करते-करते यह देख ही नहीं पाता कि भीतर डर और असुरक्षा काम कर रही है। आप जो कुछ भी कर रहे होते हैं, उसके पीछे एक कहानी होती है। एक अपनी बनाई हुई छवि होती है, जिस पर शायद ही कभी सवाल उठाया जाता है।
*इतिहास की घटनाएँ हमें दिखाती हैं कि आज जो हो रहा है, वह कल से अलग नहीं है। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन भीतर जो स्वयं को अधूरा मानता है, उस पर सवाल आज भी नहीं उठाया जाता है। केंद्र वही है, पर उम्मीद नए की है।**
📌Sources:
https://www.britannica.com/event/Partition-of-Bengal
https://en.wikipedia.org/wiki/Partition_of_Bengal_(1905)
⭐*Ask AP Framework* https://acharyaprashant.org/en/ap-framework
#AcharyaPrashant #History #APF
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💭Topic — History
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💂बंगाल विभाजन 1905 : क्या विभाजन सिर्फ जमीन का था?
👉1905 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल को दो हिस्सों में बाँट दिया। पूर्वी बंगाल और असम को अलग प्रांत बनाया गया, जबकि पश्चिमी बंगाल अलग रहा।
सरकारी कारण क्या बताया गया? कि बंगाल इतना बड़ा हो चुका था कि प्रशासन चलाना कठिन हो रहा था।
🕵️लेकिन मामला सिर्फ प्रशासन का नहीं था।
उस समय बंगाल ब्रिटिश शासन के खिलाफ राजनीतिक जागरूकता का बड़ा केंद्र बन चुका था। कलकत्ता में छात्र, पत्रकार, लेखक, वकील और शिक्षित मध्यमवर्ग लगातार अंग्रेज़ी शासन की आलोचना कर रहे थे। स्वदेशी विचार फैल रहे थे। राष्ट्रीय चेतना बढ़ रही थी।
👉इसी दौरान भारत के वायसराय Lord Curzon ने विभाजन का निर्णय लिया।
नए पूर्वी बंगाल में मुसलमानों की आबादी अधिक थी, जबकि पश्चिमी हिस्से में हिंदू आबादी अधिक थी। यहीं से लोगों को यह समझ आने लगा कि यह केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं है। ब्रिटिश शासन धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश भी कर रहा था।
यह सिर्फ पहले से मौजूद दरारों का उपयोग भर नहीं था।
औपनिवेशिक शासन ने अलग प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक ढाँचे और राजनीतिक हितों के माध्यम से उन पहचानों को और मजबूत भी किया।
📜आम इतिहास की किताबें कहती हैं कि बंगाल विभाजन ने भारतीय राष्ट्रवाद को नई ऊर्जा दी।
स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार हुआ। राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान बने।
Rabindranath Tagore ने रक्षाबंधन अभियान चलाया जहाँ हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे को राखी बाँधकर एकता दिखा रहे थे।
आख़िरकार 1911 में ब्रिटिश सरकार ने विभाजन रद्द कर दिया। इसके पीछे राष्ट्रवादी विरोध, प्रशासनिक कठिनाइयाँ और ब्रिटिश साम्राज्य की राजनीतिक पुनर्गणना जैसे कई कारण थे।
_लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। धार्मिक आधार पर राजनीतिक पहचानें अब और अधिक संगठित हो चुकी थीं। आगे चलकर यही प्रवृत्तियाँ भारतीय राजनीति में गहरी होती गईं।_
⭐AP Framework's Take
जो 1905 में हुआ, वह बाहर से एक राजनीतिक घटना लगती है। लेकिन भीतर देखो तो यह पहचान और अहंकार की वही पुरानी प्रक्रिया है जो बार-बार नए रूप में सामने आती है।
कर्जन अपनी सत्ता और साम्राज्य को सुरक्षित रखना चाहता था।उसके लिए धर्म एक सहारा बना।
हिंदू और मुसलमान, दोनों को अलग राजनीतिक पहचान के रूप में देखने और दिखाने की प्रक्रिया तेज़ हुई।
👉धीरे-धीरे लोग अपनी धार्मिक पहचान को ही “मैं” मानने लगे।
जब कोई कहता है, “मैं हिंदू हूँ इसलिए यह विभाजन गलत है” या “मैं मुसलमान हूँ इसलिए यह विभाजन हमारे हित में है” तो दोनों ही उधार ली हुई पहचान से बोल रहे हैं।
यहीं धर्म भीतर की खोज का माध्यम रहने के बजाय समूह-आधारित पहचान का आधार बनने लगता है।
1911 में विभाजन रद्द हुआ, लेकिन पहचान-आधारित राजनीति समाप्त नहीं हुई।
👉औपनिवेशिक नीतियों और सामाजिक असुरक्षाओं ने मिलकर ऐसी मानसिकता को और गहरा किया जिसमें व्यक्ति स्वयं को पहले किसी समूह का सदस्य मानता है, मनुष्य बाद में।
इसीलिए आगे आने वाले दशकों में सांप्रदायिक राजनीति और अधिक मजबूत होती गई।
1947 का विभाजन केवल 1905 का सीधा परिणाम नहीं था, लेकिन 1905 ने यह दिखा दिया था कि धार्मिक पहचान को राजनीतिक शक्ति में बदला जा सकता है।
और यह केवल नेताओं या साम्राज्य की कहानी नहीं है।
लोग भी अपनी-अपनी पहचानों से चिपके रहे, क्योंकि पहचान उन्हें सुरक्षा और महत्व का एहसास देती है।
👉 बंगाल विभाजन केवल नक्शे का विभाजन नहीं था। यह उस मानसिक संरचना का भी संकेत था जहाँ इंसान अपनी पहचान को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानने लगता है।
औपनिवेशिक सत्ता ने इस प्रवृत्ति का उपयोग भी किया और उसे संस्थागत रूप भी दिया। लेकिन सवाल केवल इतिहास का नहीं है।
आज भी व्यक्ति किसी विचार, धर्म, समूह या पहचान की रक्षा करते-करते यह देख ही नहीं पाता कि भीतर डर और असुरक्षा काम कर रही है। आप जो कुछ भी कर रहे होते हैं, उसके पीछे एक कहानी होती है। एक अपनी बनाई हुई छवि होती है, जिस पर शायद ही कभी सवाल उठाया जाता है।
*इतिहास की घटनाएँ हमें दिखाती हैं कि आज जो हो रहा है, वह कल से अलग नहीं है। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन भीतर जो स्वयं को अधूरा मानता है, उस पर सवाल आज भी नहीं उठाया जाता है। केंद्र वही है, पर उम्मीद नए की है।**
📌Sources:
https://www.britannica.com/event/Partition-of-Bengal
https://en.wikipedia.org/wiki/Partition_of_Bengal_(1905)
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Encyclopedia Britannica
partition of Bengal
The partition of Bengal was a division of the British-Indian province of Bengal, carried out in 1905 by Viceroy Lord Curzon. It triggered protests and was annulled in 1911. It was a key event in the Indian Independence Movement.
❤4
✍🏻 पोस्ट 6 | 2 जुलाई '26
✨ विषय — मानव उत्कृष्टता
──────────
🗽 मादाम रोलां: आज़ादी के लिए जान देने वाली महिला
📖 स्त्रियों की जिंदगी का क्रम सामान्यतः एक निर्धारित श्रृंखला में ही बँधा हुआ चलता रहता है। लाड़-प्यार में बचपन बीतना, अपने घर एक छोटी सी दुनिया बसा लेना, और शरीर थक जाने पर मौत के दिन गिनने लगना।
लेकिन एक लड़की इस श्रृंखला को तोड़ने के लिए ही जैसे पैदा हुई थी।
👶 17 मार्च 1754, फ्रांस। एक धनाढ्य परिवार की इकलौती संतान। पर जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, उस उम्र में रोलां किताबों में डूबी रहती।
📚 यौवन आते-आते वह धर्म, संगीत, इतिहास, दर्शन, चित्रकला, नृत्य और विज्ञान की गहरी जानकार बन गई थी।
⚖️ उस दौर का फ्रांस भीतर से सड़ रहा था। कुलीन वर्ग और पादरी ऐश्वर्य में डूबे थे, और आम आदमी टैक्स और गरीबी के बोझ तले दबा हुआ था। रोलां यह सब देख रही थी, पर अब तक सिर्फ देख ही रही थी। फिर एक रात सब बदल गया।
🍷🩸 एक शाही पार्टी में एक नौकर के हाथ से एक महँगी शराब की बोतल छूट कर टूट गई। काँच के टुकड़े उसके पैर में धँस गए, खून बहने लगा। पर कमरे में हर कोई बोतल का दुख मना रहा था, "कितनी कीमती शराब थी। " किसी को नौकर के बहते खून की परवाह नहीं थी।
सिर्फ एक को थी। रोलां की।
उस पल उसके दिल में एक सवाल जल उठा, "यह कैसी दुनिया है, जहाँ एक बोतल की कीमत एक इंसान के खून से ज्यादा है?"
🔥 यही सवाल उसकी आग बन गया। उसने ठान लिया कि इस असमानता को बदलना है, और इसके लिए वह बाहर निकल पड़ी, सीधे क्रांतिकारी दलों के बीच।
🏛️ अपने विचारों, अपनी सभाओं और अपने पति के राजनीतिक प्रभाव से उसने फ्रांस की क्रांति को जन्म देने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वह सिर्फ देखने वाली नहीं रही, अब वह बदलने वालों में से एक थी।
❗ पर यहीं एक बात छूट गई, जो शायद आज भी हम सब से छूट जाती है।
🪞 क्रांति ने व्यवस्था बदल दी। राजा गया, नई सरकार आई, नए कानून बने। पर जिस आदमी के दिल में डर था, घमंड था, सत्ता की लालच थी, वह आदमी वैसा ही रहा। बस उसने कुर्सी बदली, अपना स्वभाव नहीं।
🔄 इसीलिए हुआ यह कि क्रांति ने अपने ही उन लोगों को निगल लिया, जिन्होंने उसे जन्म दिया था।
⚰️ रोलां, जो इस क्रांति की नींव में खड़ी थी, अब उसी क्रांति की निगाह में एक खतरा बन गई। बिना ठीक से मुकदमा चले, बिना सफाई का मौका दिए, उसे मौत की सजा सुना दी गई।
🪓 8 नवंबर 1793, वह शांत क़दमों से गिलोटिन की तरफ बढ़ी, जिसकी बुनियाद उसने खुद रखी थी।
_💭 अब ज़रा सोचिए, क्या यह सिर्फ 1793 के फ्रांस की कहानी है?_
जब भी हम कहते हैं "व्यवस्था बदलनी चाहिए", "सिस्टम खराब है", "ऊपर वाले गलत हैं", तब क्या हम कभी अपने आप से यह पूछते हैं कि अगर कुर्सी मुझे मिल जाए, तो क्या मैं वाकई अलग होऊंगा? या मैं भी वही करूँगा, बस अलग नाम से?
रोलां की कहानी हमें यही पूछने पर मजबूर करती है, अ सली क्रांति बाहर की कुर्सी बदलने से नहीं आती, वह वहाँ से शुरू होती है जहाँ हम अपने भीतर के उस डर, उस घमंड, उस लालच को पहचानते और बदलते हैं। जब तक भीतर का आदमी वही रहेगा, बाहर सिर्फ सत्ता बदलेगी, शोषण नहीं रुकेगा।
📌 स्रोत:
Encyclopedia
https://www.encyclopedia.com/history/encyclopedias-almanacs-transcripts-and-maps/madame-roland
#AcharyaPrashant #History #WomenEmpowerment #HumanExcellence
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✨ विषय — मानव उत्कृष्टता
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🗽 मादाम रोलां: आज़ादी के लिए जान देने वाली महिला
📖 स्त्रियों की जिंदगी का क्रम सामान्यतः एक निर्धारित श्रृंखला में ही बँधा हुआ चलता रहता है। लाड़-प्यार में बचपन बीतना, अपने घर एक छोटी सी दुनिया बसा लेना, और शरीर थक जाने पर मौत के दिन गिनने लगना।
लेकिन एक लड़की इस श्रृंखला को तोड़ने के लिए ही जैसे पैदा हुई थी।
👶 17 मार्च 1754, फ्रांस। एक धनाढ्य परिवार की इकलौती संतान। पर जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, उस उम्र में रोलां किताबों में डूबी रहती।
📚 यौवन आते-आते वह धर्म, संगीत, इतिहास, दर्शन, चित्रकला, नृत्य और विज्ञान की गहरी जानकार बन गई थी।
⚖️ उस दौर का फ्रांस भीतर से सड़ रहा था। कुलीन वर्ग और पादरी ऐश्वर्य में डूबे थे, और आम आदमी टैक्स और गरीबी के बोझ तले दबा हुआ था। रोलां यह सब देख रही थी, पर अब तक सिर्फ देख ही रही थी। फिर एक रात सब बदल गया।
🍷🩸 एक शाही पार्टी में एक नौकर के हाथ से एक महँगी शराब की बोतल छूट कर टूट गई। काँच के टुकड़े उसके पैर में धँस गए, खून बहने लगा। पर कमरे में हर कोई बोतल का दुख मना रहा था, "कितनी कीमती शराब थी। " किसी को नौकर के बहते खून की परवाह नहीं थी।
सिर्फ एक को थी। रोलां की।
उस पल उसके दिल में एक सवाल जल उठा, "यह कैसी दुनिया है, जहाँ एक बोतल की कीमत एक इंसान के खून से ज्यादा है?"
🔥 यही सवाल उसकी आग बन गया। उसने ठान लिया कि इस असमानता को बदलना है, और इसके लिए वह बाहर निकल पड़ी, सीधे क्रांतिकारी दलों के बीच।
🏛️ अपने विचारों, अपनी सभाओं और अपने पति के राजनीतिक प्रभाव से उसने फ्रांस की क्रांति को जन्म देने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वह सिर्फ देखने वाली नहीं रही, अब वह बदलने वालों में से एक थी।
❗ पर यहीं एक बात छूट गई, जो शायद आज भी हम सब से छूट जाती है।
🪞 क्रांति ने व्यवस्था बदल दी। राजा गया, नई सरकार आई, नए कानून बने। पर जिस आदमी के दिल में डर था, घमंड था, सत्ता की लालच थी, वह आदमी वैसा ही रहा। बस उसने कुर्सी बदली, अपना स्वभाव नहीं।
🔄 इसीलिए हुआ यह कि क्रांति ने अपने ही उन लोगों को निगल लिया, जिन्होंने उसे जन्म दिया था।
⚰️ रोलां, जो इस क्रांति की नींव में खड़ी थी, अब उसी क्रांति की निगाह में एक खतरा बन गई। बिना ठीक से मुकदमा चले, बिना सफाई का मौका दिए, उसे मौत की सजा सुना दी गई।
🪓 8 नवंबर 1793, वह शांत क़दमों से गिलोटिन की तरफ बढ़ी, जिसकी बुनियाद उसने खुद रखी थी।
_💭 अब ज़रा सोचिए, क्या यह सिर्फ 1793 के फ्रांस की कहानी है?_
जब भी हम कहते हैं "व्यवस्था बदलनी चाहिए", "सिस्टम खराब है", "ऊपर वाले गलत हैं", तब क्या हम कभी अपने आप से यह पूछते हैं कि अगर कुर्सी मुझे मिल जाए, तो क्या मैं वाकई अलग होऊंगा? या मैं भी वही करूँगा, बस अलग नाम से?
रोलां की कहानी हमें यही पूछने पर मजबूर करती है, अ सली क्रांति बाहर की कुर्सी बदलने से नहीं आती, वह वहाँ से शुरू होती है जहाँ हम अपने भीतर के उस डर, उस घमंड, उस लालच को पहचानते और बदलते हैं। जब तक भीतर का आदमी वही रहेगा, बाहर सिर्फ सत्ता बदलेगी, शोषण नहीं रुकेगा।
📌 स्रोत:
Encyclopedia
https://www.encyclopedia.com/history/encyclopedias-almanacs-transcripts-and-maps/madame-roland
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🔥3❤1
✍🏻 पोस्ट 18 | 2 जुलाई ’26
💭 विषय — इतिहास
────────
⚔️ चमकौर: क्या किसी साम्राज्य को तलवार हराती है, या किसी मनुष्य की चेतना?
📊 दिसंबर 1704, आनंदपुर साहिब छोड़ने के बाद गुरु गोबिंद सिंह, चमकौर की एक छोटी-सी गढ़ी में पहुँचे। उनके साथ थे लगभग 40 सिख और दो बड़े साहिबज़ादे, बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह, सामने थी मुगल साम्राज्य की विशाल सेना।
📖 एक-एक कर सिख बाहर निकले और लड़ते हुए शहीद हुए। फिर बाबा अजीत सिंह ने युद्ध की आज्ञा माँगी। गुरु ने दी। वे शहीद हुए। कुछ देर बाद बाबा जुझार सिंह ने भी वही आज्ञा माँगी। उन्हें भी विदा किया गया।
रात तक गढ़ी में बहुत कम सिख बचे। पंज प्यारों ने गुरु को आदेश दिया कि वे निकल जाएँ ताकि खालसा जीवित रहे। गुरु ने अपने ही बनाए पंथ का आदेश स्वीकार किया।
गढ़ी छोड़ते समय वे अपने दोनों शहीद पुत्रों के पास से गुज़रे। एक सिख ने उनके शरीरों पर कफ़न डालना चाहा। तो गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा,- “यदि यहाँ पड़े सभी के लिए कफ़न है, तो ढको। केवल मेरे बेटों के लिए नहीं, ये सब मेरे बेटे हैं।”
❓ इतिहास इस घटना को वीरता के रूप में याद करता है।
लेकिन शायद इससे भी बड़ा प्रश्न यह है, किसी पिता के लिए ऐसा कहना संभव कैसे हुआ?
🪞 अधिकांश युद्ध केवल तलवारों से नहीं हारे जाते।
वे वहाँ हार जाते हैं जहाँ “मेरा” और “तेरा” का विभाजन इतना गहरा हो जाए कि व्यापक हित दिखाई देना बंद हो जाए और अधिकांश विजय भी केवल हथियारों से नहीं मिलती।
✨फ़्रेमवर्क कहता है कि अहंकार का सबसे गहरा रूप है, “यह मेरा है।”
यहीं से भय पैदा होता है। यहीं से पक्षपात पैदा होता है और यहीं से इतिहास में समाज बिखरते भी हैं।
चमकौर की घटना इसलिए असाधारण नहीं है कि वहाँ लोग शहीद हुए।
इतिहास ऐसे युद्धों से भरा पड़ा है।
चमकौर इसलिए असाधारण है क्योंकि वहाँ एक मनुष्य ने अपने निजी संबंधों से ऊपर उठकर सच के पक्ष में खड़े रहने की क्षमता दिखाई।
💥 इतिहास का प्रश्न आज भी वही है।
जब तुम्हारे सामने “मेरा” और “सत्य” एक-दूसरे के सामने खड़े हों, तुम किसे चुनोगे?
📚 स्रोत
Britannica
https://www.britannica.com/topic/Khalsa
*AP Framework*
https://acharyaprashant.org/en/ap-framework
#AcharyaPrashant #History
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💭 विषय — इतिहास
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⚔️ चमकौर: क्या किसी साम्राज्य को तलवार हराती है, या किसी मनुष्य की चेतना?
📊 दिसंबर 1704, आनंदपुर साहिब छोड़ने के बाद गुरु गोबिंद सिंह, चमकौर की एक छोटी-सी गढ़ी में पहुँचे। उनके साथ थे लगभग 40 सिख और दो बड़े साहिबज़ादे, बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह, सामने थी मुगल साम्राज्य की विशाल सेना।
📖 एक-एक कर सिख बाहर निकले और लड़ते हुए शहीद हुए। फिर बाबा अजीत सिंह ने युद्ध की आज्ञा माँगी। गुरु ने दी। वे शहीद हुए। कुछ देर बाद बाबा जुझार सिंह ने भी वही आज्ञा माँगी। उन्हें भी विदा किया गया।
रात तक गढ़ी में बहुत कम सिख बचे। पंज प्यारों ने गुरु को आदेश दिया कि वे निकल जाएँ ताकि खालसा जीवित रहे। गुरु ने अपने ही बनाए पंथ का आदेश स्वीकार किया।
गढ़ी छोड़ते समय वे अपने दोनों शहीद पुत्रों के पास से गुज़रे। एक सिख ने उनके शरीरों पर कफ़न डालना चाहा। तो गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा,- “यदि यहाँ पड़े सभी के लिए कफ़न है, तो ढको। केवल मेरे बेटों के लिए नहीं, ये सब मेरे बेटे हैं।”
❓ इतिहास इस घटना को वीरता के रूप में याद करता है।
लेकिन शायद इससे भी बड़ा प्रश्न यह है, किसी पिता के लिए ऐसा कहना संभव कैसे हुआ?
🪞 अधिकांश युद्ध केवल तलवारों से नहीं हारे जाते।
वे वहाँ हार जाते हैं जहाँ “मेरा” और “तेरा” का विभाजन इतना गहरा हो जाए कि व्यापक हित दिखाई देना बंद हो जाए और अधिकांश विजय भी केवल हथियारों से नहीं मिलती।
✨फ़्रेमवर्क कहता है कि अहंकार का सबसे गहरा रूप है, “यह मेरा है।”
यहीं से भय पैदा होता है। यहीं से पक्षपात पैदा होता है और यहीं से इतिहास में समाज बिखरते भी हैं।
चमकौर की घटना इसलिए असाधारण नहीं है कि वहाँ लोग शहीद हुए।
इतिहास ऐसे युद्धों से भरा पड़ा है।
चमकौर इसलिए असाधारण है क्योंकि वहाँ एक मनुष्य ने अपने निजी संबंधों से ऊपर उठकर सच के पक्ष में खड़े रहने की क्षमता दिखाई।
💥 इतिहास का प्रश्न आज भी वही है।
जब तुम्हारे सामने “मेरा” और “सत्य” एक-दूसरे के सामने खड़े हों, तुम किसे चुनोगे?
📚 स्रोत
Britannica
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Encyclopedia Britannica
Khalsa
Khalsa is the purified and reconstituted Sikh community instituted by Guru Gobind Singh on March 30, 1699 (Baisakhi Day; Khalsa Sikhs celebrate the birth of the order on April 13 or 14 each year).
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Forwarded from HISTORY WITH ROHIT SIR
🚨 आज से शुरुआत! 🚨
📚 UGC NET December 2026 | History + Paper 1
🎯 Topic Wise Daily Quiz Series
अब हर दिन एक नए टॉपिक पर UGC NET Level MCQs कराए जाएंगे, जिससे आपकी Concept Clarity और Revision दोनों मजबूत होंगे।
⏰ समय: रात 9:00 PM
📅 शुरुआत: आज से
✅ Topic Wise Quiz
✅ Previous Year Pattern
✅ Detailed Explanation
✅ JRF Target Preparation
कोई भी Quiz मिस मत करना!
आज रात 9:00 PM से अपनी तैयारी को अगले स्तर पर ले चलते हैं। 💪🔥
#UGCNET #UGCNETHistory #History #Paper1 #JRF #AssistantProfessor #DailyQuiz #NET2026 #HistoryWithRohitSir https://t.me/HistoryWithRohitSirJaipur
📚 UGC NET December 2026 | History + Paper 1
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❤3
✍🏻 पोस्ट 20 | 21 जुलाई '26
💭 विषय — इतिहास
─────────
🛕 बृहदेश्वर मंदिर : 1000 साल पहले बना इंजीनियरिंग का चमत्कार
🏛️ तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण चोल सम्राट राजराज प्रथम ने लगभग 1010 ईस्वी में करवाया था। एक हज़ार वर्ष बाद भी यह मंदिर अपनी भव्यता और अद्भुत इंजीनियरिंग के कारण दुनिया भर के शोधकर्ताओं को आकर्षित करता है।
🪨 मंदिर का 66 मीटर ऊँचा विमाना (शिखर) पूरी तरह ग्रेनाइट पत्थरों से बना है। आश्चर्य की बात यह है कि तंजावुर के आसपास कई किलोमीटर तक ग्रेनाइट प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इतिहासकारों का मानना है कि इन विशाल पत्थरों को दूर-दराज़ से लाकर बिना आधुनिक मशीनों के यहाँ स्थापित किया गया।
⚖️ मंदिर के शीर्ष पर रखा लगभग 80 टन वज़नी पत्थर आज भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय है। माना जाता है कि इसे कई किलोमीटर लंबा ढलानदार मार्ग बनाकर ऊपर पहुँचाया गया होगा। हालाँकि इसकी सटीक निर्माण-प्रक्रिया आज भी पूरी तरह ज्ञात नहीं है।
🎨 यह केवल एक मंदिर नहीं था। यह स्थापत्य, गणित, शिल्पकला, धातुकर्म, जल निकासी और प्रशासनिक दक्षता का भी अद्भुत उदाहरण है। यूनेस्को ने इसे Great Living Chola Temples के अंतर्गत विश्व धरोहर का दर्जा दिया है।
🪞लेकिन प्रश्न केवल इतना नहीं कि हमारे पूर्वज इतने कुशल कैसे थे।
प्रश्न यह है कि हम इतिहास के सामने खड़े होकर खोज क्या रहे हैं?
अहंकार को इतिहास से भी अपना पोषण चाहिए। इसलिए वह या तो अतीत को अपना गौरव बनाकर स्वयं को बड़ा महसूस करना चाहता है, या उसे पूरी तरह नकारकर अपनी आधुनिकता का प्रदर्शन करता है। दोनों ही स्थितियों में इतिहास सीखने का माध्यम नहीं, अहंकार को सजाने का साधन बन जाता है।
बृहदेश्वर मंदिर का मूल्य केवल इस बात में नहीं कि यह एक हज़ार वर्ष पुराना है। उसका मूल्य उस मानवीय चेतना में है, जिसने अपनी सीमित व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर उठकर ऐसा सृजन संभव किया, जो एक सहस्राब्दी बाद भी जीवित है।
❓इतिहास को देखकर हमारे भीतर क्या उठता है - जिज्ञासा, जिससे हम सीख सकें... या अहंकार, जो हर विरासत को अपने गर्व का प्रमाण बना लेना चाहता है?
Sources:
https://share.google/TZkF092K6kiTERDVc
#AcharyaPrashant #History
Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant App.
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💭 विषय — इतिहास
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🛕 बृहदेश्वर मंदिर : 1000 साल पहले बना इंजीनियरिंग का चमत्कार
🏛️ तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण चोल सम्राट राजराज प्रथम ने लगभग 1010 ईस्वी में करवाया था। एक हज़ार वर्ष बाद भी यह मंदिर अपनी भव्यता और अद्भुत इंजीनियरिंग के कारण दुनिया भर के शोधकर्ताओं को आकर्षित करता है।
🪨 मंदिर का 66 मीटर ऊँचा विमाना (शिखर) पूरी तरह ग्रेनाइट पत्थरों से बना है। आश्चर्य की बात यह है कि तंजावुर के आसपास कई किलोमीटर तक ग्रेनाइट प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इतिहासकारों का मानना है कि इन विशाल पत्थरों को दूर-दराज़ से लाकर बिना आधुनिक मशीनों के यहाँ स्थापित किया गया।
⚖️ मंदिर के शीर्ष पर रखा लगभग 80 टन वज़नी पत्थर आज भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय है। माना जाता है कि इसे कई किलोमीटर लंबा ढलानदार मार्ग बनाकर ऊपर पहुँचाया गया होगा। हालाँकि इसकी सटीक निर्माण-प्रक्रिया आज भी पूरी तरह ज्ञात नहीं है।
🎨 यह केवल एक मंदिर नहीं था। यह स्थापत्य, गणित, शिल्पकला, धातुकर्म, जल निकासी और प्रशासनिक दक्षता का भी अद्भुत उदाहरण है। यूनेस्को ने इसे Great Living Chola Temples के अंतर्गत विश्व धरोहर का दर्जा दिया है।
🪞लेकिन प्रश्न केवल इतना नहीं कि हमारे पूर्वज इतने कुशल कैसे थे।
प्रश्न यह है कि हम इतिहास के सामने खड़े होकर खोज क्या रहे हैं?
अहंकार को इतिहास से भी अपना पोषण चाहिए। इसलिए वह या तो अतीत को अपना गौरव बनाकर स्वयं को बड़ा महसूस करना चाहता है, या उसे पूरी तरह नकारकर अपनी आधुनिकता का प्रदर्शन करता है। दोनों ही स्थितियों में इतिहास सीखने का माध्यम नहीं, अहंकार को सजाने का साधन बन जाता है।
बृहदेश्वर मंदिर का मूल्य केवल इस बात में नहीं कि यह एक हज़ार वर्ष पुराना है। उसका मूल्य उस मानवीय चेतना में है, जिसने अपनी सीमित व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर उठकर ऐसा सृजन संभव किया, जो एक सहस्राब्दी बाद भी जीवित है।
❓इतिहास को देखकर हमारे भीतर क्या उठता है - जिज्ञासा, जिससे हम सीख सकें... या अहंकार, जो हर विरासत को अपने गर्व का प्रमाण बना लेना चाहता है?
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Wikipedia
Brihadisvara Temple
11th century Tamil Chola Dynasty Temple and UNESCO World Heritage Site
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भारत की पहली दलित महिला सेनापति - कुयिली
कुयिली का जन्म तमिलनाडु के शिवगंगा के एक गांव में हुआ था। उसके पिता पेरियमुदन और मां रकू किसान थे और ‘अरुंधतियार’ जाति से तालुक्क रखते थे। जो तमिलनाडु की एक अनुसूचित जाति है। कुयिली की मां रकू अपने साहस और ताकत के लिए पूरे गांव में मशहूर थी। कुयिली के पैदा होने के कुछ ही समय बाद खेतों मे घुस आए एक पागल सांड से लड़ते हुए रकू की मृत्यु हो गई।
पत्नी के चले जाने के बाद पेरियमुदन बहुत आहत हुए और बेटी के साथ अपना घर छोड़कर शिवगंगा की राजधानी में आ गए, जहां रानी वेलु नचियार का शासन था। यहां वे मोची का काम करके अपना गुज़ारा करने लगे और छोटी कुयिली को उसकी मां की वीरता की कहानियां सुनाकर बड़ा करने लगे। और शिवगंगा की रानी के यहां मोची का काम करने लगे।
एक और बार कुयिली को पता चला कि उसके अपने गुरु रानी को मारने का षड्यंत्र कर रहे हैं तो इस बात की खबर लगते ही उसने खुद अपने गुरु की हत्या कर दी। यह देखकर रानी वेलु नचियार अत्यंत प्रभावित हो गई और उन्होंने कुयिली को अपना खास अंगरक्षक घोषित कर दिया।
लालच और धमकियां देकर उन्होंने कुयिली को अपने साथ मिलाने की बहुत कोशिश की पर वह अपनी बात पर अड़ी रही। जब सारी कोशिशें नाकाम हुईं, ब्रिटिश सेना ने शिवगंगा के दलित समुदाय पर हल्ला बोल दिया। निहत्थे दलितों को दिनदहाड़े बेरहमी से काटा जाने लगा ताकि अपने समुदाय के लोगों की हालत देखकर कुयिली अंग्रेज़ों से हाथ मिला ले।
अपने साहस और शौर्य के लिए उसकी सेना में उसे ‘वीरतलपति’ (वीर नेता) और ‘वीरमंगई’ (वीरांगना) जैसे नामों से जाना जाने लगा।
1780 साल में विजयादशमी के दिन कुयिली अपनी पूरी पलटन के साथ शिवगंगा किले में घुस गई। पलटन की सारी महिलाएं भक्तों के भेष में थी और अपनी टोकरियों में उन्होंने फूल और प्रसाद के साथ अपने शस्त्र छिपाए थे। अंदर जाते ही कुयिली किले के उस कमरे में चली गई जहां अंग्रेज़ों के सारे हथियार रखे हुए थे। इसके बाद उसने वह किया जिसे आज की भाषा में ‘सुसाईड बॉम्बिंग’ कहते हैं।
कुयिली ने पहले ही अपनी सैनिकों से कहकर अपने शरीर पर बहुत सारा तेल और घी डलवा लिया था। कमरे में पहुंचते ही उसने अपने हाथ में लिए दीपक से खुद को आग के हवाले कर दिया।आग से जलती हुई कुयिली ने हथियारों पर छलांग लगाई और सारे हथियारों के साथ उसका शरीर भी एक पल में भस्म हो गया। भारतीय इतिहास में पहली बार किसी ने हमले का यह तरीका अपनाया था।
अंग्रेज़ सैनिक वैसे भी युद्ध के लिए तैयार नहीं थे और सारे हथियार ध्वंस हो जाने के बाद उनके पास आत्मरक्षा का कोई विकल्प नहीं था। रानी वेलु नचियार की सेना ने उन्हें आसानी से हरा दिया और शिवगंगा किले पर जीत हासिल कर ली। अपने असाधारण साहस और बलिदान के लिए कुयिली भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण नाम है।
साल 2013 में तमिलनाडु की सरकार ने उसकी स्मृति को समर्पित एक स्मारक बनवाया था। दुर्भाग्य से तमिलनाडु के बाहर बहुत कम लोग कुयिली के बारे में जानते हैं।
लोकपंक्ति
ओ कुयिली अम्मा! तूने अपनी देह को दीया बनाया,घी और तेल छिड़ककर, खुद को बारूद में मिलाया।गोरा राजा का घमंड पल में खाक कर डाला,मिट गई स्वयं, पर शिवगंगा में आजादी का दीप जला डाला।
#AcharyaPrashant #History #HumanExcellence #WomenEmpowerment
Posted by Ambikesh Mishra on Acharya Prashant App.
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कुयिली का जन्म तमिलनाडु के शिवगंगा के एक गांव में हुआ था। उसके पिता पेरियमुदन और मां रकू किसान थे और ‘अरुंधतियार’ जाति से तालुक्क रखते थे। जो तमिलनाडु की एक अनुसूचित जाति है। कुयिली की मां रकू अपने साहस और ताकत के लिए पूरे गांव में मशहूर थी। कुयिली के पैदा होने के कुछ ही समय बाद खेतों मे घुस आए एक पागल सांड से लड़ते हुए रकू की मृत्यु हो गई।
पत्नी के चले जाने के बाद पेरियमुदन बहुत आहत हुए और बेटी के साथ अपना घर छोड़कर शिवगंगा की राजधानी में आ गए, जहां रानी वेलु नचियार का शासन था। यहां वे मोची का काम करके अपना गुज़ारा करने लगे और छोटी कुयिली को उसकी मां की वीरता की कहानियां सुनाकर बड़ा करने लगे। और शिवगंगा की रानी के यहां मोची का काम करने लगे।
एक और बार कुयिली को पता चला कि उसके अपने गुरु रानी को मारने का षड्यंत्र कर रहे हैं तो इस बात की खबर लगते ही उसने खुद अपने गुरु की हत्या कर दी। यह देखकर रानी वेलु नचियार अत्यंत प्रभावित हो गई और उन्होंने कुयिली को अपना खास अंगरक्षक घोषित कर दिया।
लालच और धमकियां देकर उन्होंने कुयिली को अपने साथ मिलाने की बहुत कोशिश की पर वह अपनी बात पर अड़ी रही। जब सारी कोशिशें नाकाम हुईं, ब्रिटिश सेना ने शिवगंगा के दलित समुदाय पर हल्ला बोल दिया। निहत्थे दलितों को दिनदहाड़े बेरहमी से काटा जाने लगा ताकि अपने समुदाय के लोगों की हालत देखकर कुयिली अंग्रेज़ों से हाथ मिला ले।
अपने साहस और शौर्य के लिए उसकी सेना में उसे ‘वीरतलपति’ (वीर नेता) और ‘वीरमंगई’ (वीरांगना) जैसे नामों से जाना जाने लगा।
1780 साल में विजयादशमी के दिन कुयिली अपनी पूरी पलटन के साथ शिवगंगा किले में घुस गई। पलटन की सारी महिलाएं भक्तों के भेष में थी और अपनी टोकरियों में उन्होंने फूल और प्रसाद के साथ अपने शस्त्र छिपाए थे। अंदर जाते ही कुयिली किले के उस कमरे में चली गई जहां अंग्रेज़ों के सारे हथियार रखे हुए थे। इसके बाद उसने वह किया जिसे आज की भाषा में ‘सुसाईड बॉम्बिंग’ कहते हैं।
कुयिली ने पहले ही अपनी सैनिकों से कहकर अपने शरीर पर बहुत सारा तेल और घी डलवा लिया था। कमरे में पहुंचते ही उसने अपने हाथ में लिए दीपक से खुद को आग के हवाले कर दिया।आग से जलती हुई कुयिली ने हथियारों पर छलांग लगाई और सारे हथियारों के साथ उसका शरीर भी एक पल में भस्म हो गया। भारतीय इतिहास में पहली बार किसी ने हमले का यह तरीका अपनाया था।
अंग्रेज़ सैनिक वैसे भी युद्ध के लिए तैयार नहीं थे और सारे हथियार ध्वंस हो जाने के बाद उनके पास आत्मरक्षा का कोई विकल्प नहीं था। रानी वेलु नचियार की सेना ने उन्हें आसानी से हरा दिया और शिवगंगा किले पर जीत हासिल कर ली। अपने असाधारण साहस और बलिदान के लिए कुयिली भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण नाम है।
साल 2013 में तमिलनाडु की सरकार ने उसकी स्मृति को समर्पित एक स्मारक बनवाया था। दुर्भाग्य से तमिलनाडु के बाहर बहुत कम लोग कुयिली के बारे में जानते हैं।
लोकपंक्ति
ओ कुयिली अम्मा! तूने अपनी देह को दीया बनाया,घी और तेल छिड़ककर, खुद को बारूद में मिलाया।गोरा राजा का घमंड पल में खाक कर डाला,मिट गई स्वयं, पर शिवगंगा में आजादी का दीप जला डाला।
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Acharya Prashant
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✍🏻 पोस्ट 5 | 20 जुलाई ‘26’
💭 विषय — इतिहास
──────────
📜 पुरंदर की संधि: कभी-कभी सबसे बड़ा निर्णय कुछ न करना होता है
📜1773, पूना में पेशवा नारायणराव की हत्या उनके ही अंगरक्षकों ने कर दी। उन्होंने मदद के लिए पुकारा। उनके चाचा रघुनाथराव पास ही थे।
कहीं इतिहासकार बताते हैं की उन्होंने कुछ नहीं किया।
इतिहास आज तक यह साबित नहीं कर पाया कि हत्या का आदेश उन्होंने दिया था। लेकिन यह भी दर्ज है कि उन्होंने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।
📖 इसके बाद घटनाएँ तेजी से बदलने लगीं।
रघुनाथराव पेशवा बनना चाहते थे। उन्होंने बॉम्बे की अंग्रेज़ सरकार से मदद माँगी। 1775 की ट्रीटी ऑफ़ सूरत में उन्होंने साल्सेट और बसीन अंग्रेज़ों को देने का वादा किया। बदले में अंग्रेज़ों ने 2,500 सैनिक देने की बात मानी।
📊 लेकिन कलकत्ता की सुप्रीम काउंसिल ने इस संधि को मानने से इनकार कर दिया। वॉरेन हेस्टिंग्स के नेतृत्व में कहा गया कि बॉम्बे सरकार को ऐसा अधिकार ही नहीं था।
📊 फिर 1 मार्च 1776 को ट्रीटी ऑफ़ पुरन्धर हुई। नाना फडणवीस की रीजेंसी को स्वीकार किया गया। रघुनाथराव को केवल पेंशन मिली, गद्दी नहीं। लेकिन बॉम्बे सरकार फिर भी उन्हें अपने संरक्षण में रखती रही।
एक ही कंपनी।
दो सरकारें।
दोनों कह रही थीं, “हम सही हैं।”
⚡ लेकिन सबसे कठिन प्रश्न अभी भी वही है। रघुनाथराव ने क्या किया?
या उन्होंने क्या नहीं किया?
हम अक्सर मान लेते हैं कि केवल कर्म ही ज़िम्मेदारी लाता है। लेकिन जीवन केवल किए हुए से नहीं चलता। जो नहीं किया गया, उसके भी परिणाम होते हैं।
अहंकार केवल गलत काम ही नहीं करता, वह सही काम से भी बचता है। जहाँ सच उसके स्वार्थ के विरुद्ध खड़ा होता है, वहाँ वह अक्सर कुछ नहीं करता। क्योंकि कई बार निष्क्रिय रहना भी उसके लिए एक रणनीति होती है।
इसलिए कुछ न करना हमेशा तटस्थता नहीं होता। जब हमारे सामने अन्याय हो और हम उसे रोक सकते हों, तब चुप रहना भी उसी दिशा में एक चुनाव बन जाता है।
🌱 रघुनाथराव अंततः न पेशवा बन सके, न सही जीवन जी सके। एक गद्दी के पीछे भागते-भागते उनका जीवन बीत गया। इतिहास इसलिए केवल यह नहीं पूछता कि तलवार किसने उठाई। वह यह भी पूछता है कि जिसे सच का साथ देना चाहिए था, वह चुप क्यों रहा। क्योंकि अहंकार कई बार अपने अपराध कर्म से नहीं, बल्कि अपनी सुविधाजनक निष्क्रियता से करता है।
📚 *स्रोत*
https://www.britannica.com/event/Treaty-of-Purandhar
#AcharyaPrashant #History
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💭 विषय — इतिहास
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📜 पुरंदर की संधि: कभी-कभी सबसे बड़ा निर्णय कुछ न करना होता है
📜1773, पूना में पेशवा नारायणराव की हत्या उनके ही अंगरक्षकों ने कर दी। उन्होंने मदद के लिए पुकारा। उनके चाचा रघुनाथराव पास ही थे।
कहीं इतिहासकार बताते हैं की उन्होंने कुछ नहीं किया।
इतिहास आज तक यह साबित नहीं कर पाया कि हत्या का आदेश उन्होंने दिया था। लेकिन यह भी दर्ज है कि उन्होंने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।
📖 इसके बाद घटनाएँ तेजी से बदलने लगीं।
रघुनाथराव पेशवा बनना चाहते थे। उन्होंने बॉम्बे की अंग्रेज़ सरकार से मदद माँगी। 1775 की ट्रीटी ऑफ़ सूरत में उन्होंने साल्सेट और बसीन अंग्रेज़ों को देने का वादा किया। बदले में अंग्रेज़ों ने 2,500 सैनिक देने की बात मानी।
📊 लेकिन कलकत्ता की सुप्रीम काउंसिल ने इस संधि को मानने से इनकार कर दिया। वॉरेन हेस्टिंग्स के नेतृत्व में कहा गया कि बॉम्बे सरकार को ऐसा अधिकार ही नहीं था।
📊 फिर 1 मार्च 1776 को ट्रीटी ऑफ़ पुरन्धर हुई। नाना फडणवीस की रीजेंसी को स्वीकार किया गया। रघुनाथराव को केवल पेंशन मिली, गद्दी नहीं। लेकिन बॉम्बे सरकार फिर भी उन्हें अपने संरक्षण में रखती रही।
एक ही कंपनी।
दो सरकारें।
दोनों कह रही थीं, “हम सही हैं।”
⚡ लेकिन सबसे कठिन प्रश्न अभी भी वही है। रघुनाथराव ने क्या किया?
या उन्होंने क्या नहीं किया?
हम अक्सर मान लेते हैं कि केवल कर्म ही ज़िम्मेदारी लाता है। लेकिन जीवन केवल किए हुए से नहीं चलता। जो नहीं किया गया, उसके भी परिणाम होते हैं।
अहंकार केवल गलत काम ही नहीं करता, वह सही काम से भी बचता है। जहाँ सच उसके स्वार्थ के विरुद्ध खड़ा होता है, वहाँ वह अक्सर कुछ नहीं करता। क्योंकि कई बार निष्क्रिय रहना भी उसके लिए एक रणनीति होती है।
इसलिए कुछ न करना हमेशा तटस्थता नहीं होता। जब हमारे सामने अन्याय हो और हम उसे रोक सकते हों, तब चुप रहना भी उसी दिशा में एक चुनाव बन जाता है।
🌱 रघुनाथराव अंततः न पेशवा बन सके, न सही जीवन जी सके। एक गद्दी के पीछे भागते-भागते उनका जीवन बीत गया। इतिहास इसलिए केवल यह नहीं पूछता कि तलवार किसने उठाई। वह यह भी पूछता है कि जिसे सच का साथ देना चाहिए था, वह चुप क्यों रहा। क्योंकि अहंकार कई बार अपने अपराध कर्म से नहीं, बल्कि अपनी सुविधाजनक निष्क्रियता से करता है।
📚 *स्रोत*
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Encyclopedia Britannica
Treaty of Purandhar
Treaty of Purandhar, (March 1, 1776), pact between the peshwa (chief minister) of the Marāthā people and the supreme government of the British East India Company in Calcutta. It was an example of the tangled relations between the British and the Marāthās.…
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✍🏻 पोस्ट 13 | 10 अगस्त '26
💭 विषय — मानव उत्कृष्टता
─────────
📖 बीना दास: डर के साथ जीना या खड़ा होना?
📚 6 फरवरी 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में 20 वर्षीय छात्रा बीना दास ने बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर गोलियाँ चलाईं। उनकी गोलियाँ जैक्सन को नहीं लगीं और बीना दास को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।
📜 अपने बयान और बाद के लेखन में उन्होंने इस कृत्य को ब्रिटिश शासन के दमन के विरुद्ध अपना राजनीतिक विरोध दर्ज कराने के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने सवाल उठाया कि पराधीनता और अपमान में केवल शरीर को बचाए रखना क्या सचमुच सार्थक जीवन है।
📖 उन्हें 9 वर्षों की कठोर कैद की सजा हुई। 1939 में रिहा होने के बाद वे पुनः स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय हुईं और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में फिर जेल गईं।
🏛️ स्वतंत्रता के बाद वे पश्चिम बंगाल विधानसभा (1947–1951) की सदस्य रहीं और जनसेवा में जुटी रहीं। उनकी कहानी का महत्व केवल गोली चलाने की घटना में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक उद्देश्य में भी है जिसे उन्होंने अपने बयान में इस कृत्य के पीछे रखा।
💡 यहीं यह ऐतिहासिक घटना एक व्यक्तिगत प्रश्न में बदल जाती है जब अपनी सुरक्षा और किसी बड़े उद्देश्य के बीच टकराव हो, तो हम वास्तव में किसे बचा रहे होते हैं?
🪞 अहंकार ‘मैं यह हूँ’ की पहचान है; और उसी पहचान को बनाए रखने की उसकी मूल प्रेरणा स्व-संरक्षण है। अहंकार ही अधूरापन है, और उसी से ‘मैं’ को बचाए रखने की दौड़ चलती है। पद, प्रतिष्ठा, सुविधा या परिवार का सहारा लेकर व्यक्ति अपनी बनाई हुई पहचान को बचाए रखने में ही अपनी पूरी ऊर्जा खर्च कर देता है।
🧭 केवल यह देख लेना कि जीवन डर और सुरक्षा के ढर्रे में चल रहा है, पर्याप्त नहीं है। इस देखने के साथ उस सुरक्षा और पहचान पर टिकी अपनी इच्छाओं से चल रही दिशा को बदलने का इरादा भी चाहिए, जिसके बिना जीवन में वास्तविक परिवर्तन नहीं आता।
❓ यह देखना ज़रूरी है कि क्या मैं सच में जीवन जी रहा हूँ, या केवल अपनी बनाई हुई पहचान और सुविधाओं को सुरक्षित रखने में लगा हुआ हूँ?
❓ मेरी कितनी इच्छाएँ मेरी वास्तविक ज़रूरत हैं, और कितनी केवल मेरे गढ़े हुए 'मैं' को बचाने का प्रयास हैं?
🔍 "अगर मेरी सुविधा, सुरक्षा और प्रतिष्ठा थोड़ी देर के लिए हट जाएँ, तो मेरे 'मैं' की पहचान किस चीज़ पर टिकी मिलेगी?"
📚 स्रोत:
https://en.wikipedia.org/wiki/Bina_Das
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💭 विषय — मानव उत्कृष्टता
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📖 बीना दास: डर के साथ जीना या खड़ा होना?
📚 6 फरवरी 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में 20 वर्षीय छात्रा बीना दास ने बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर गोलियाँ चलाईं। उनकी गोलियाँ जैक्सन को नहीं लगीं और बीना दास को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।
📜 अपने बयान और बाद के लेखन में उन्होंने इस कृत्य को ब्रिटिश शासन के दमन के विरुद्ध अपना राजनीतिक विरोध दर्ज कराने के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने सवाल उठाया कि पराधीनता और अपमान में केवल शरीर को बचाए रखना क्या सचमुच सार्थक जीवन है।
📖 उन्हें 9 वर्षों की कठोर कैद की सजा हुई। 1939 में रिहा होने के बाद वे पुनः स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय हुईं और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में फिर जेल गईं।
🏛️ स्वतंत्रता के बाद वे पश्चिम बंगाल विधानसभा (1947–1951) की सदस्य रहीं और जनसेवा में जुटी रहीं। उनकी कहानी का महत्व केवल गोली चलाने की घटना में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक उद्देश्य में भी है जिसे उन्होंने अपने बयान में इस कृत्य के पीछे रखा।
💡 यहीं यह ऐतिहासिक घटना एक व्यक्तिगत प्रश्न में बदल जाती है जब अपनी सुरक्षा और किसी बड़े उद्देश्य के बीच टकराव हो, तो हम वास्तव में किसे बचा रहे होते हैं?
🪞 अहंकार ‘मैं यह हूँ’ की पहचान है; और उसी पहचान को बनाए रखने की उसकी मूल प्रेरणा स्व-संरक्षण है। अहंकार ही अधूरापन है, और उसी से ‘मैं’ को बचाए रखने की दौड़ चलती है। पद, प्रतिष्ठा, सुविधा या परिवार का सहारा लेकर व्यक्ति अपनी बनाई हुई पहचान को बचाए रखने में ही अपनी पूरी ऊर्जा खर्च कर देता है।
🧭 केवल यह देख लेना कि जीवन डर और सुरक्षा के ढर्रे में चल रहा है, पर्याप्त नहीं है। इस देखने के साथ उस सुरक्षा और पहचान पर टिकी अपनी इच्छाओं से चल रही दिशा को बदलने का इरादा भी चाहिए, जिसके बिना जीवन में वास्तविक परिवर्तन नहीं आता।
❓ यह देखना ज़रूरी है कि क्या मैं सच में जीवन जी रहा हूँ, या केवल अपनी बनाई हुई पहचान और सुविधाओं को सुरक्षित रखने में लगा हुआ हूँ?
❓ मेरी कितनी इच्छाएँ मेरी वास्तविक ज़रूरत हैं, और कितनी केवल मेरे गढ़े हुए 'मैं' को बचाने का प्रयास हैं?
🔍 "अगर मेरी सुविधा, सुरक्षा और प्रतिष्ठा थोड़ी देर के लिए हट जाएँ, तो मेरे 'मैं' की पहचान किस चीज़ पर टिकी मिलेगी?"
📚 स्रोत:
https://en.wikipedia.org/wiki/Bina_Das
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✍🏻 पोस्ट 1 | 10 अगस्त '26
💭 विषय — इंडियन करंट अफेयर्स
──────────
📚 भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े कुछ बड़े सवाल
🏫 हजारों सरकारी स्कूल बंद होना: संकट या बदलती शिक्षा व्यवस्था का संकेत?
🇮🇳 भारत में पिछले एक दशक में हजारों सरकारी स्कूलों के बंद या विलय होने की खबर ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
📚 आंकड़े क्या कहते हैं?
UDISE+ के अनुसार 2014-15 से 2024-25 के बीच देश में कुल स्कूलों की संख्या करीब 15.16 लाख से घटकर 14.71 लाख रह गई। सरकारी स्कूलों की संख्या भी 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख हो गई, जबकि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या बढ़ी।
💰 **शिक्षा का खर्च कितना बढ़ रहा है?
2025 के NSS सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण भारत के करीब 66% और शहरी क्षेत्रों के 30.1% विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। सरकारी स्कूल में एक विद्यार्थी पर परिवार का औसत वार्षिक खर्च लगभग ₹2,863 है, जबकि गैर-सरकारी स्कूलों में यह करीब ₹25,002 पहुंच जाता है।**
📖 खर्च सिर्फ स्कूल फीस तक सीमित नहीं है। करीब 27% विद्यार्थी निजी कोचिंग लेते हैं, जिस पर शहरी परिवार औसतन ₹9,950 और ग्रामीण परिवार करीब ₹4,548 सालाना खर्च करते हैं।
⚖️ इसलिए सरकारी स्कूलों का बंद होना केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का मुद्दा नहीं है। यह शिक्षा की पहुंच, समान अवसर और परिवारों पर बढ़ते आर्थिक बोझ से जुड़ा सवाल भी है।
📜 🌸✍1835 में ब्रिटिश अधिकारी थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने अपने Minute on Indian Education में भारतीय और यूरोपीय ज्ञान की बेहद कठोर तुलना की थी। उसने दावा किया था कि एक अच्छी यूरोपीय लाइब्रेरी की एक शेल्फ का ज्ञान भारत और अरब के पूरे देशी साहित्य से अधिक मूल्यवान है✨✅✅
🪞 इन आंकड़ों से एक निष्कर्ष निकलता है। सालाना खर्च नौ गुना ज़्यादा होने के बावजूद परिवार निजी स्कूल चुन रहे हैं, सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं। बच्चे का स्कूल अक्सर परिवार की अपनी पहचान का हिस्सा बन जाता है, यह दिखाना कि हम कहाँ खड़े हैं।
मैकॉले वाला नज़रिया आज एक नए रूप में जिंदा है, "जो जितना महंगा और अंग्रेज़ी माध्यम का है, वही असली शिक्षा है।" यह धारणा अब सरकार से ज़्यादा खुद परिवारों के भीतर बैठी है।
💰 यह पूरी कोशिश क्षैतिज अक्ष पर चल रही है, ज़्यादा फीस, ज़्यादा कोचिंग, इस उम्मीद में कि आगे कहीं सुरक्षा मिल जाएगी। पर खर्च बढ़ाते जाना वह भीतर की स्थिरता कभी नहीं देता जो माता-पिता असल में खोज रहे होते हैं।
पीछे असली डर यह है, अगर निजी स्कूल न चुना तो अच्छे माता-पिता नहीं कहलाएंगे। यह डर बच्चे की जरूरत से ज़्यादा माता-पिता के अपने भीतर के सवाल से जुड़ा है।
❓ अगली बार स्कूल चुनने की बात आए, तो क्या यह देखा जा सकता है, यह फैसला बच्चे के लिए है, या अपनी उस पहचान के लिए है जो दूसरों के सामने बनानी है?
📌 स्रोत:
https://indianexpress.com/article/explained/government-schools-closures-india-explained-10817596/
#AcharyaPrashant #IndianCurrentAffairs #VidyaAvidya #History
Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant App.
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✍🏻 पोस्ट 1 | 10 अगस्त '26
💭 विषय — इंडियन करंट अफेयर्स
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📚 भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े कुछ बड़े सवाल
🏫 हजारों सरकारी स्कूल बंद होना: संकट या बदलती शिक्षा व्यवस्था का संकेत?
🇮🇳 भारत में पिछले एक दशक में हजारों सरकारी स्कूलों के बंद या विलय होने की खबर ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
📚 आंकड़े क्या कहते हैं?
UDISE+ के अनुसार 2014-15 से 2024-25 के बीच देश में कुल स्कूलों की संख्या करीब 15.16 लाख से घटकर 14.71 लाख रह गई। सरकारी स्कूलों की संख्या भी 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख हो गई, जबकि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या बढ़ी।
💰 **शिक्षा का खर्च कितना बढ़ रहा है?
2025 के NSS सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण भारत के करीब 66% और शहरी क्षेत्रों के 30.1% विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। सरकारी स्कूल में एक विद्यार्थी पर परिवार का औसत वार्षिक खर्च लगभग ₹2,863 है, जबकि गैर-सरकारी स्कूलों में यह करीब ₹25,002 पहुंच जाता है।**
📖 खर्च सिर्फ स्कूल फीस तक सीमित नहीं है। करीब 27% विद्यार्थी निजी कोचिंग लेते हैं, जिस पर शहरी परिवार औसतन ₹9,950 और ग्रामीण परिवार करीब ₹4,548 सालाना खर्च करते हैं।
⚖️ इसलिए सरकारी स्कूलों का बंद होना केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का मुद्दा नहीं है। यह शिक्षा की पहुंच, समान अवसर और परिवारों पर बढ़ते आर्थिक बोझ से जुड़ा सवाल भी है।
📜 🌸✍1835 में ब्रिटिश अधिकारी थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने अपने Minute on Indian Education में भारतीय और यूरोपीय ज्ञान की बेहद कठोर तुलना की थी। उसने दावा किया था कि एक अच्छी यूरोपीय लाइब्रेरी की एक शेल्फ का ज्ञान भारत और अरब के पूरे देशी साहित्य से अधिक मूल्यवान है✨✅✅
🪞 इन आंकड़ों से एक निष्कर्ष निकलता है। सालाना खर्च नौ गुना ज़्यादा होने के बावजूद परिवार निजी स्कूल चुन रहे हैं, सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं। बच्चे का स्कूल अक्सर परिवार की अपनी पहचान का हिस्सा बन जाता है, यह दिखाना कि हम कहाँ खड़े हैं।
मैकॉले वाला नज़रिया आज एक नए रूप में जिंदा है, "जो जितना महंगा और अंग्रेज़ी माध्यम का है, वही असली शिक्षा है।" यह धारणा अब सरकार से ज़्यादा खुद परिवारों के भीतर बैठी है।
💰 यह पूरी कोशिश क्षैतिज अक्ष पर चल रही है, ज़्यादा फीस, ज़्यादा कोचिंग, इस उम्मीद में कि आगे कहीं सुरक्षा मिल जाएगी। पर खर्च बढ़ाते जाना वह भीतर की स्थिरता कभी नहीं देता जो माता-पिता असल में खोज रहे होते हैं।
पीछे असली डर यह है, अगर निजी स्कूल न चुना तो अच्छे माता-पिता नहीं कहलाएंगे। यह डर बच्चे की जरूरत से ज़्यादा माता-पिता के अपने भीतर के सवाल से जुड़ा है।
❓ अगली बार स्कूल चुनने की बात आए, तो क्या यह देखा जा सकता है, यह फैसला बच्चे के लिए है, या अपनी उस पहचान के लिए है जो दूसरों के सामने बनानी है?
📌 स्रोत:
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The Indian Express
Thousands of government schools shut: The one scenario where this could be a good thing
The Congress has flagged a NITI Aayog report showing 94,000 government schools were shut over the last decade. Why, and what are the potential consequences?
❤3
✍🏻 पोस्ट 4 | 16 अगस्त '26
💭 विषय — मानव उत्कृष्टता
──────────
🪞 कित्तूर की रानी चेन्नम्मा: क्या हम सही के साथ हैं या अपनी सुरक्षा के साथ?
🔥 1824 में कित्तूर की रानी चेन्नम्मा के सामने एक कठिन चुनाव था। उनके पति और बेटे की मृत्यु के बाद उन्होंने शिवलिंगप्पा को गोद लेकर उसे उत्तराधिकारी बनाया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने उसे उत्तराधिकारी मानने से इनकार किया और कित्तूर पर अधिकार करने की कोशिश की।
👉 चेन्नम्मा ने इसका विरोध किया। 23 अक्टूबर 1824 को हुए पहले युद्ध में कित्तूर की सेना ने ब्रिटिश सेना को पीछे हटाया और ब्रिटिश अधिकारी सेंट जॉन थैकरे मारे गए। बाद में ब्रिटिश सेना ने फिर हमला किया। चेन्नम्मा को बंदी बना लिया गया और 21 फरवरी 1829 को बैलहोंगल में उनकी मृत्यु हुई।
❓ यह हमें वीरता की कहानी लग सकती है। लेकिन ज़रा रुककर देखें। जब सामने बड़ी ताकत हो और अपनी सुरक्षा पर खतरा हो, तब लिया गया चुनाव यह भी दिखाता है कि किसी व्यक्ति के लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है।
🌱 यहीं से इतिहास हमारे जीवन तक आता है। हमारे सामने तलवारों वाले युद्ध नहीं होते, लेकिन चुनाव तो होते हैं।
🔺कभी अपनी गलती मानने का सवाल आता है।
🔺कभी गलत बात का विरोध करने पर अपनी छवि खराब होने का डर होता है।
🪞 ऐसे समय में अहंकार चुपचाप काम करता है।
वह कहता है, “मेरी बात गलत कैसे हो सकती है?”, “लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?”, “मुझे नुकसान क्यों उठाना चाहिए?”
फिर हम अपने चुनाव को देखने के बजाय उसे सही साबित करने लगते हैं। नीयत पीछे छूट जाती है और अपनी छवि आगे आ जाती है।
❓ तब सवाल यह नहीं कि हम कितने बहादुर हैं। सवाल है:
“जब मेरे लाभ और सही बात आमने सामने हों, तब मैं किसे चुनता हूँ?”
🌿 चेन्नम्मा की कहानी को केवल वीरता की कहानी मान लेना आसान है। उससे अपने जीवन पर सवाल करना कठिन है। क्योंकि तब हमें किसी और का साहस देखने के बजाय अपना डर और अपनी सुविधा देखनी पड़ सकती है।
🎯 यहीं अहंकार का खेल दिखाई देता है।
हम किसी चीज़ को अपना मान लेते हैं और फिर उसकी रक्षा को अपनी रक्षा समझने लगते हैं। अपनी बात, अपनी छवि, अपना लाभ। धीरे-धीरे यह भी देखना मुश्किल हो जाता है कि हम सही के लिए खड़े हैं या सिर्फ़ अपने “मैं” को बचा रहे हैं।
👁️ सही को देखना केवल पर्याप्त नहीं है। उसके अनुसार बदलने की नीयत भी चाहिए।
❓ आज मेरे जीवन में कौन-सा फैसला ऐसा है जहाँ मैं सही बात नहीं, बल्कि अपनी सुविधा, लाभ या अपनी बनाई हुई छवि बचा रहा हूँ?
📚 स्रोत:
https://www.pib.gov.in/newsite/printrelease.aspx?lang=2®=48&relid=148944
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2067654&lang=2®
#AcharyaPrashant #History #VidyaAvidya #HumanExcellence
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💭 विषय — मानव उत्कृष्टता
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🪞 कित्तूर की रानी चेन्नम्मा: क्या हम सही के साथ हैं या अपनी सुरक्षा के साथ?
🔥 1824 में कित्तूर की रानी चेन्नम्मा के सामने एक कठिन चुनाव था। उनके पति और बेटे की मृत्यु के बाद उन्होंने शिवलिंगप्पा को गोद लेकर उसे उत्तराधिकारी बनाया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने उसे उत्तराधिकारी मानने से इनकार किया और कित्तूर पर अधिकार करने की कोशिश की।
👉 चेन्नम्मा ने इसका विरोध किया। 23 अक्टूबर 1824 को हुए पहले युद्ध में कित्तूर की सेना ने ब्रिटिश सेना को पीछे हटाया और ब्रिटिश अधिकारी सेंट जॉन थैकरे मारे गए। बाद में ब्रिटिश सेना ने फिर हमला किया। चेन्नम्मा को बंदी बना लिया गया और 21 फरवरी 1829 को बैलहोंगल में उनकी मृत्यु हुई।
❓ यह हमें वीरता की कहानी लग सकती है। लेकिन ज़रा रुककर देखें। जब सामने बड़ी ताकत हो और अपनी सुरक्षा पर खतरा हो, तब लिया गया चुनाव यह भी दिखाता है कि किसी व्यक्ति के लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है।
🌱 यहीं से इतिहास हमारे जीवन तक आता है। हमारे सामने तलवारों वाले युद्ध नहीं होते, लेकिन चुनाव तो होते हैं।
🔺कभी अपनी गलती मानने का सवाल आता है।
🔺कभी गलत बात का विरोध करने पर अपनी छवि खराब होने का डर होता है।
🪞 ऐसे समय में अहंकार चुपचाप काम करता है।
वह कहता है, “मेरी बात गलत कैसे हो सकती है?”, “लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?”, “मुझे नुकसान क्यों उठाना चाहिए?”
फिर हम अपने चुनाव को देखने के बजाय उसे सही साबित करने लगते हैं। नीयत पीछे छूट जाती है और अपनी छवि आगे आ जाती है।
❓ तब सवाल यह नहीं कि हम कितने बहादुर हैं। सवाल है:
“जब मेरे लाभ और सही बात आमने सामने हों, तब मैं किसे चुनता हूँ?”
🌿 चेन्नम्मा की कहानी को केवल वीरता की कहानी मान लेना आसान है। उससे अपने जीवन पर सवाल करना कठिन है। क्योंकि तब हमें किसी और का साहस देखने के बजाय अपना डर और अपनी सुविधा देखनी पड़ सकती है।
🎯 यहीं अहंकार का खेल दिखाई देता है।
हम किसी चीज़ को अपना मान लेते हैं और फिर उसकी रक्षा को अपनी रक्षा समझने लगते हैं। अपनी बात, अपनी छवि, अपना लाभ। धीरे-धीरे यह भी देखना मुश्किल हो जाता है कि हम सही के लिए खड़े हैं या सिर्फ़ अपने “मैं” को बचा रहे हैं।
👁️ सही को देखना केवल पर्याप्त नहीं है। उसके अनुसार बदलने की नीयत भी चाहिए।
❓ आज मेरे जीवन में कौन-सा फैसला ऐसा है जहाँ मैं सही बात नहीं, बल्कि अपनी सुविधा, लाभ या अपनी बनाई हुई छवि बचा रहा हूँ?
📚 स्रोत:
https://www.pib.gov.in/newsite/printrelease.aspx?lang=2®=48&relid=148944
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2067654&lang=2®
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Government of India
Department of Posts issues a Commemorative Stamp to mark 200 Years of Kittur Vijayotsava
On the 200th anniversary of Kittur Vijayotsava a commemorative Postage stamp was released at the his
❤3👍2
✍🏻 पोस्ट 21 | 1 सितंबर '26
💭 विषय — मानव उत्कृष्टता
───────────
✍️ एक ऐसे नेता की कहानी, जो सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं था
🔍 जिस व्यक्ति को अंग्रेज़ों ने जेल भेजा, उसी पर आज़ाद भारत ने सत्ता का भरोसा किया।
जिसने राजनीति में ऊँचे पद पाए, उसने भारतीय दर्शन को भी सरल शब्दों में लोगों तक पहुँचाया।
कौन था वह?
एक ऐसा व्यक्ति जिसने आरामदायक वकालत छोड़ी और स्वतंत्रता आंदोलन में उतर गया।
⛓️ आज़ादी की लड़ाई में उतरने के बाद अंग्रेज़ी शासन ने उन्हें जेल भी भेजा।
🧂 नमक कानून के खिलाफ वेदारण्याम सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
🇮🇳 आज़ादी के बाद देश ने उन्हें इतना भरोसा दिया कि वह स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल बने।
लेकिन कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा सत्ता मिलने के बाद शुरू होता है।
🏛️ मद्रास के प्रीमियर रहे।
🇮🇳 पश्चिम बंगा के का राज्यपाल बने।
🏛️ केंद्रीय गृह मंत्री रहे।
फिर मद्रास के मुख्यमंत्री भी बने।
इतने पदों के बाद कोई भी व्यक्ति सोच सकता था
“अब मेरी बात कौन काट सकता है?”
लेकिन यहीं से सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं रह जाता।
उनका नाम था
📖 चक्रवर्ती राजगोपालाचारी।
लोग उन्हें प्यार और सम्मान से “राजाजी” कहते थे।
राजाजी ने सिर्फ राजनीति नहीं की। उन्होंने लिखा भी Ramayana, Mahabharata, Hinduism: Doctrine and Way of Life जैसी किताबों के जरिए भारतीय परंपरा और दर्शन को सरल रूप में लोगों तक पहुँचाया।
🏅 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
लेकिन अब ज़रा रुकिए…
इतना संघर्ष।
इतनी उपलब्धियाँ।
इतना ज्ञान।
इतना सम्मान।
तो क्या अहंकार खत्म हो जाना चाहिए था?
यही तो असली पहेली है। 🧩
क्योंकि अहंकार हमेशा घमंड के रूप में सामने नहीं आता।
कभी वह बहुत सामान्य-सी आवाज़ में कहता है
🗣️ “मैंने बहुत संघर्ष किया है।”
🗣️ “मैं इतना जानता हूँ।”
🗣️ “मेरा अनुभव ज्यादा है।”
🗣️ “मेरी बात सही है।”
और धीरे-धीरे…
“मेरी बात” “मेरी पहचान” बन जाती है।
फिर विचार पर सवाल उठता है तो लगता है
“मुझ पर सवाल उठ रहा है।”
यहीं से उत्कृष्टता और अहंकार अलग होने लगते हैं।
⚖️ राजाजी का जीवन हमें कम-से-कम यह सोचने का अवसर देता है कि अपने विचारों के लिए खड़ा होना जरूरी है, लेकिन क्या अपने विचारों को भी कटघरे में खड़ा करना उतना ही जरूरी नहीं?
क्योंकि
खुद सच के तरफ जाना अलग बात है,
और अपनी तरफ को सच मान लेना अलग।
🌱 शायद मानव उत्कृष्टता की असली परीक्षा तब नहीं होती जब हमें कोई चुनौती दे रहा हो।
वह तब होती है जब हमारी अपनी पहचान हमें चुनौती देने लगे।
💬 अब सबसे कठिन सवाल आपसे
अगर कल आपको पता चले कि जिस विचार के कारण आपको सबसे ज्यादा गर्व है, वही गलत है… तो आप क्या बचाएँगे सच या अपना “मैं”?
👇 आपके लिए ज्यादा खतरनाक क्या है: “मैं सबसे बड़ा हूँ” या “मैं गलत हो ही नहीं सकता”?
🔗 स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/C._Rajagopalachari
https://www.nytimes.com/1972/12/26/archives/chakravarti-rajagopalachari-noted-indian-statesman-dies.html
#AcharyaPrashant #HumanExcellence #History #VidyaAvidya
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💭 विषय — मानव उत्कृष्टता
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✍️ एक ऐसे नेता की कहानी, जो सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं था
🔍 जिस व्यक्ति को अंग्रेज़ों ने जेल भेजा, उसी पर आज़ाद भारत ने सत्ता का भरोसा किया।
जिसने राजनीति में ऊँचे पद पाए, उसने भारतीय दर्शन को भी सरल शब्दों में लोगों तक पहुँचाया।
कौन था वह?
एक ऐसा व्यक्ति जिसने आरामदायक वकालत छोड़ी और स्वतंत्रता आंदोलन में उतर गया।
⛓️ आज़ादी की लड़ाई में उतरने के बाद अंग्रेज़ी शासन ने उन्हें जेल भी भेजा।
🧂 नमक कानून के खिलाफ वेदारण्याम सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
🇮🇳 आज़ादी के बाद देश ने उन्हें इतना भरोसा दिया कि वह स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल बने।
लेकिन कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा सत्ता मिलने के बाद शुरू होता है।
🏛️ मद्रास के प्रीमियर रहे।
🇮🇳 पश्चिम बंगा के का राज्यपाल बने।
🏛️ केंद्रीय गृह मंत्री रहे।
फिर मद्रास के मुख्यमंत्री भी बने।
इतने पदों के बाद कोई भी व्यक्ति सोच सकता था
“अब मेरी बात कौन काट सकता है?”
लेकिन यहीं से सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं रह जाता।
उनका नाम था
📖 चक्रवर्ती राजगोपालाचारी।
लोग उन्हें प्यार और सम्मान से “राजाजी” कहते थे।
राजाजी ने सिर्फ राजनीति नहीं की। उन्होंने लिखा भी Ramayana, Mahabharata, Hinduism: Doctrine and Way of Life जैसी किताबों के जरिए भारतीय परंपरा और दर्शन को सरल रूप में लोगों तक पहुँचाया।
🏅 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
लेकिन अब ज़रा रुकिए…
इतना संघर्ष।
इतनी उपलब्धियाँ।
इतना ज्ञान।
इतना सम्मान।
तो क्या अहंकार खत्म हो जाना चाहिए था?
यही तो असली पहेली है। 🧩
क्योंकि अहंकार हमेशा घमंड के रूप में सामने नहीं आता।
कभी वह बहुत सामान्य-सी आवाज़ में कहता है
🗣️ “मैंने बहुत संघर्ष किया है।”
🗣️ “मैं इतना जानता हूँ।”
🗣️ “मेरा अनुभव ज्यादा है।”
🗣️ “मेरी बात सही है।”
और धीरे-धीरे…
“मेरी बात” “मेरी पहचान” बन जाती है।
फिर विचार पर सवाल उठता है तो लगता है
“मुझ पर सवाल उठ रहा है।”
यहीं से उत्कृष्टता और अहंकार अलग होने लगते हैं।
⚖️ राजाजी का जीवन हमें कम-से-कम यह सोचने का अवसर देता है कि अपने विचारों के लिए खड़ा होना जरूरी है, लेकिन क्या अपने विचारों को भी कटघरे में खड़ा करना उतना ही जरूरी नहीं?
क्योंकि
खुद सच के तरफ जाना अलग बात है,
और अपनी तरफ को सच मान लेना अलग।
🌱 शायद मानव उत्कृष्टता की असली परीक्षा तब नहीं होती जब हमें कोई चुनौती दे रहा हो।
वह तब होती है जब हमारी अपनी पहचान हमें चुनौती देने लगे।
💬 अब सबसे कठिन सवाल आपसे
अगर कल आपको पता चले कि जिस विचार के कारण आपको सबसे ज्यादा गर्व है, वही गलत है… तो आप क्या बचाएँगे सच या अपना “मैं”?
👇 आपके लिए ज्यादा खतरनाक क्या है: “मैं सबसे बड़ा हूँ” या “मैं गलत हो ही नहीं सकता”?
🔗 स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/C._Rajagopalachari
https://www.nytimes.com/1972/12/26/archives/chakravarti-rajagopalachari-noted-indian-statesman-dies.html
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Wikipedia
C. Rajagopalachari
Indian politician and activist (1878–1972)
❤1
✍🏻 पोस्ट 12 | 3 सितंबर '26
💭 विषय — इतिहास
─────────
🛕 कोणार्क सूर्य मंदिर: पत्थरों में दर्ज एक सवाल
🌅 ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम के शासनकाल में बनाया गया। सूर्य देव के रथ की कल्पना पर बने इस मंदिर में 24 विशाल पहिए और घोड़ों की आकृतियाँ हैं। इसकी स्थापत्य कला कलिंग शैली की उत्कृष्ट उपलब्धियों में गिनी जाती है। 1984 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
🏛️ कोणार्क की दीवारों पर केवल देवताओं की आकृतियाँ नहीं हैं। यहाँ नर्तक, संगीतकार, सैनिक, पशु और तत्कालीन जीवन से जुड़े अनेक दृश्य भी मिलते हैं। इसलिए ये मूर्तियाँ केवल सजावट नहीं हैं। इन्हें देखकर उस समय की कला, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक गतिविधियों की भी झलक मिलती है।
⚙️ अब सवाल आता है, इतना विशाल निर्माण हुआ कैसे होगा?
इतने बड़े मंदिर के लिए पत्थरों का चयन और प्रबंध, उनकी कटाई, नक्काशी, ढुलाई, सही स्थान पर स्थापना और पूरे निर्माण का तालमेल आवश्यक रहा होगा। लेकिन आज हमारे पास उस समय की पूरी निर्माण योजना या काम की क्रमवार लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
🧱 भारी पत्थरों को ऊँचाई तक पहुँचाने के लिए ढलान या अन्य साधनों के इस्तेमाल की संभावनाएँ बताई जाती हैं। लकड़ी के लट्ठों से पत्थर खिसकाने जैसी विधियों की कल्पना भी की जाती है। लेकिन किसी एक विधि को निश्चित ऐतिहासिक तथ्य बताने के लिए हमारे पास पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।
📐 यही सावधानी मंदिर के पहियों को समझने में भी जरूरी है। लगभग तीन मीटर व्यास वाले ये पहिए सूर्य के रथ की कल्पना का हिस्सा हैं। उनकी बनावट को समय की गणना से भी जोड़ा जाता है। लेकिन उन्हें आधुनिक घड़ी की तरह सटीक समय बताने वाला उपकरण कहना उचित नहीं होगा।
🔍 इतिहास पढ़ने की खूबसूरती यहीं है। किसी चीज़ को देखकर तुरंत कहानी बना लेना आसान है। कठिन है यह पूछना, “हम जो कह रहे हैं, उसके पीछे प्रमाण कितना है?”
🧠 यहीं अहंकार भी पकड़ में आता है। कभी वह हर पुरानी उपलब्धि को चमत्कार बना देता है, तो कभी बिना समझे उसे खारिज कर देता है। दोनों ही स्थितियों में हम उपलब्ध प्रमाण से ज्यादा अपनी मान्यता को महत्व दे रहे होते हैं।
👷 कोणार्क को किसी रहस्यमय शक्ति की देन कह देना आसान है। लेकिन क्या उससे उन वास्तुकारों, शिल्पियों और श्रमिकों की बुद्धि और मेहनत कम नहीं हो जाती, जिनके नाम इतिहास में दर्ज भी नहीं हैं?
📚 इसलिए इतिहास में एक ईमानदार वाक्य बहुत महत्वपूर्ण है: “पता नहीं।”
_जहाँ प्रमाण है, वहाँ तथ्य।_
_जहाँ संभावना है, वहाँ संभावना।_
_और जहाँ प्रमाण नहीं है, वहाँ अपनी कल्पना को इतिहास का नाम न देना।_
🎯 कोणार्क को देखकर सवाल केवल यह नहीं है कि “इसे कैसे बनाया गया?”
👉 सवाल यह भी है:
“मैं अपने जीवन में किन बातों को प्रमाण के कारण मानता हूँ, और किन बातों को केवल इसलिए पकड़े रहता हूँ क्योंकि वे अहंकार के लिए सुविधाजनक हैं?”
👇 आज का प्रश्न 👇
🧩 कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण किस शासक के शासनकाल में हुआ था?
A. नरसिंहदेव प्रथम
B. अशोक महान
C. राजराज चोल
📌 स्रोत:
https://whc.unesco.org/en/list/246?
#AcharyaPrashant #History #VidyaAvidya
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https://app.acharyaprashant.org/?id=8-d5
💭 विषय — इतिहास
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🛕 कोणार्क सूर्य मंदिर: पत्थरों में दर्ज एक सवाल
🌅 ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम के शासनकाल में बनाया गया। सूर्य देव के रथ की कल्पना पर बने इस मंदिर में 24 विशाल पहिए और घोड़ों की आकृतियाँ हैं। इसकी स्थापत्य कला कलिंग शैली की उत्कृष्ट उपलब्धियों में गिनी जाती है। 1984 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
🏛️ कोणार्क की दीवारों पर केवल देवताओं की आकृतियाँ नहीं हैं। यहाँ नर्तक, संगीतकार, सैनिक, पशु और तत्कालीन जीवन से जुड़े अनेक दृश्य भी मिलते हैं। इसलिए ये मूर्तियाँ केवल सजावट नहीं हैं। इन्हें देखकर उस समय की कला, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक गतिविधियों की भी झलक मिलती है।
⚙️ अब सवाल आता है, इतना विशाल निर्माण हुआ कैसे होगा?
इतने बड़े मंदिर के लिए पत्थरों का चयन और प्रबंध, उनकी कटाई, नक्काशी, ढुलाई, सही स्थान पर स्थापना और पूरे निर्माण का तालमेल आवश्यक रहा होगा। लेकिन आज हमारे पास उस समय की पूरी निर्माण योजना या काम की क्रमवार लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
🧱 भारी पत्थरों को ऊँचाई तक पहुँचाने के लिए ढलान या अन्य साधनों के इस्तेमाल की संभावनाएँ बताई जाती हैं। लकड़ी के लट्ठों से पत्थर खिसकाने जैसी विधियों की कल्पना भी की जाती है। लेकिन किसी एक विधि को निश्चित ऐतिहासिक तथ्य बताने के लिए हमारे पास पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।
📐 यही सावधानी मंदिर के पहियों को समझने में भी जरूरी है। लगभग तीन मीटर व्यास वाले ये पहिए सूर्य के रथ की कल्पना का हिस्सा हैं। उनकी बनावट को समय की गणना से भी जोड़ा जाता है। लेकिन उन्हें आधुनिक घड़ी की तरह सटीक समय बताने वाला उपकरण कहना उचित नहीं होगा।
🔍 इतिहास पढ़ने की खूबसूरती यहीं है। किसी चीज़ को देखकर तुरंत कहानी बना लेना आसान है। कठिन है यह पूछना, “हम जो कह रहे हैं, उसके पीछे प्रमाण कितना है?”
🧠 यहीं अहंकार भी पकड़ में आता है। कभी वह हर पुरानी उपलब्धि को चमत्कार बना देता है, तो कभी बिना समझे उसे खारिज कर देता है। दोनों ही स्थितियों में हम उपलब्ध प्रमाण से ज्यादा अपनी मान्यता को महत्व दे रहे होते हैं।
👷 कोणार्क को किसी रहस्यमय शक्ति की देन कह देना आसान है। लेकिन क्या उससे उन वास्तुकारों, शिल्पियों और श्रमिकों की बुद्धि और मेहनत कम नहीं हो जाती, जिनके नाम इतिहास में दर्ज भी नहीं हैं?
📚 इसलिए इतिहास में एक ईमानदार वाक्य बहुत महत्वपूर्ण है: “पता नहीं।”
_जहाँ प्रमाण है, वहाँ तथ्य।_
_जहाँ संभावना है, वहाँ संभावना।_
_और जहाँ प्रमाण नहीं है, वहाँ अपनी कल्पना को इतिहास का नाम न देना।_
🎯 कोणार्क को देखकर सवाल केवल यह नहीं है कि “इसे कैसे बनाया गया?”
👉 सवाल यह भी है:
“मैं अपने जीवन में किन बातों को प्रमाण के कारण मानता हूँ, और किन बातों को केवल इसलिए पकड़े रहता हूँ क्योंकि वे अहंकार के लिए सुविधाजनक हैं?”
👇 आज का प्रश्न 👇
🧩 कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण किस शासक के शासनकाल में हुआ था?
A. नरसिंहदेव प्रथम
B. अशोक महान
C. राजराज चोल
📌 स्रोत:
https://whc.unesco.org/en/list/246?
#AcharyaPrashant #History #VidyaAvidya
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UNESCO World Heritage Centre
Sun Temple, Konârak
On the shores of the Bay of Bengal, bathed in the rays of the rising sun, the temple at Konarak is a monumental representation of the sun god Surya's chariot; its 24 wheels are decorated with symbolic designs and it ...
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Forwarded from History By Devpal Charan
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सम्पूर्ण जानकारी..मुख्य विषय वीडियो का
1:- पुस्तक किस भर्ती परीक्षा हेतु उपयोगी होगी
2:- पुस्तक निर्माण और व्याख्या में किन सोर्स का प्रयोग किया गया
3:- कितने पेज क्या पढ़ना क्या ज़रूरी कैसे तैयार करना है पाठ्यक्रम संबंधित जानकारी
4:- किन किन भर्ती परीक्षाओं के PYQ ( पुराने भर्ती परीक्षा पेपर) को शामिल किया है..
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मध्यकालीन भारत वस्तुनिष्ठ ( रवि कुलरिया)
पुस्तक
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