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✍🏻 Post 21 | 16 MAY’26
💭Topic — History
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💂बंगाल विभाजन 1905 : क्या विभाजन सिर्फ जमीन का था?


👉1905 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल को दो हिस्सों में बाँट दिया। पूर्वी बंगाल और असम को अलग प्रांत बनाया गया, जबकि पश्चिमी बंगाल अलग रहा।

सरकारी कारण क्या बताया गया? कि बंगाल इतना बड़ा हो चुका था कि प्रशासन चलाना कठिन हो रहा था।

🕵️लेकिन मामला सिर्फ प्रशासन का नहीं था।

उस समय बंगाल ब्रिटिश शासन के खिलाफ राजनीतिक जागरूकता का बड़ा केंद्र बन चुका था। कलकत्ता में छात्र, पत्रकार, लेखक, वकील और शिक्षित मध्यमवर्ग लगातार अंग्रेज़ी शासन की आलोचना कर रहे थे। स्वदेशी विचार फैल रहे थे। राष्ट्रीय चेतना बढ़ रही थी।

👉इसी दौरान भारत के वायसराय Lord Curzon ने विभाजन का निर्णय लिया।

नए पूर्वी बंगाल में मुसलमानों की आबादी अधिक थी, जबकि पश्चिमी हिस्से में हिंदू आबादी अधिक थी। यहीं से लोगों को यह समझ आने लगा कि यह केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं है। ब्रिटिश शासन धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश भी कर रहा था।

यह सिर्फ पहले से मौजूद दरारों का उपयोग भर नहीं था।
औपनिवेशिक शासन ने अलग प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक ढाँचे और राजनीतिक हितों के माध्यम से उन पहचानों को और मजबूत भी किया।

📜आम इतिहास की किताबें कहती हैं कि बंगाल विभाजन ने भारतीय राष्ट्रवाद को नई ऊर्जा दी।

स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार हुआ। राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान बने।

Rabindranath Tagore ने रक्षाबंधन अभियान चलाया जहाँ हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे को राखी बाँधकर एकता दिखा रहे थे।

आख़िरकार 1911 में ब्रिटिश सरकार ने विभाजन रद्द कर दिया। इसके पीछे राष्ट्रवादी विरोध, प्रशासनिक कठिनाइयाँ और ब्रिटिश साम्राज्य की राजनीतिक पुनर्गणना जैसे कई कारण थे।

_लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। धार्मिक आधार पर राजनीतिक पहचानें अब और अधिक संगठित हो चुकी थीं। आगे चलकर यही प्रवृत्तियाँ भारतीय राजनीति में गहरी होती गईं।_

⭐AP Framework's Take

जो 1905 में हुआ, वह बाहर से एक राजनीतिक घटना लगती है। लेकिन भीतर देखो तो यह पहचान और अहंकार की वही पुरानी प्रक्रिया है जो बार-बार नए रूप में सामने आती है।

कर्जन अपनी सत्ता और साम्राज्य को सुरक्षित रखना चाहता था।उसके लिए धर्म एक सहारा बना।

हिंदू और मुसलमान, दोनों को अलग राजनीतिक पहचान के रूप में देखने और दिखाने की प्रक्रिया तेज़ हुई।

👉धीरे-धीरे लोग अपनी धार्मिक पहचान को ही “मैं” मानने लगे।

जब कोई कहता है, “मैं हिंदू हूँ इसलिए यह विभाजन गलत है” या “मैं मुसलमान हूँ इसलिए यह विभाजन हमारे हित में है” तो दोनों ही उधार ली हुई पहचान से बोल रहे हैं।

यहीं धर्म भीतर की खोज का माध्यम रहने के बजाय समूह-आधारित पहचान का आधार बनने लगता है।

1911 में विभाजन रद्द हुआ, लेकिन पहचान-आधारित राजनीति समाप्त नहीं हुई।

👉औपनिवेशिक नीतियों और सामाजिक असुरक्षाओं ने मिलकर ऐसी मानसिकता को और गहरा किया जिसमें व्यक्ति स्वयं को पहले किसी समूह का सदस्य मानता है, मनुष्य बाद में।

इसीलिए आगे आने वाले दशकों में सांप्रदायिक राजनीति और अधिक मजबूत होती गई।

1947 का विभाजन केवल 1905 का सीधा परिणाम नहीं था, लेकिन 1905 ने यह दिखा दिया था कि धार्मिक पहचान को राजनीतिक शक्ति में बदला जा सकता है।

और यह केवल नेताओं या साम्राज्य की कहानी नहीं है।
लोग भी अपनी-अपनी पहचानों से चिपके रहे, क्योंकि पहचान उन्हें सुरक्षा और महत्व का एहसास देती है।

👉 बंगाल विभाजन केवल नक्शे का विभाजन नहीं था। यह उस मानसिक संरचना का भी संकेत था जहाँ इंसान अपनी पहचान को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानने लगता है।

औपनिवेशिक सत्ता ने इस प्रवृत्ति का उपयोग भी किया और उसे संस्थागत रूप भी दिया। लेकिन सवाल केवल इतिहास का नहीं है।

आज भी व्यक्ति किसी विचार, धर्म, समूह या पहचान की रक्षा करते-करते यह देख ही नहीं पाता कि भीतर डर और असुरक्षा काम कर रही है। आप जो कुछ भी कर रहे होते हैं, उसके पीछे एक कहानी होती है। एक अपनी बनाई हुई छवि होती है, जिस पर शायद ही कभी सवाल उठाया जाता है।

*इतिहास की घटनाएँ हमें दिखाती हैं कि आज जो हो रहा है, वह कल से अलग नहीं है। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन भीतर जो स्वयं को अधूरा मानता है, उस पर सवाल आज भी नहीं उठाया जाता है। केंद्र वही है, पर उम्मीद नए की है।**

📌Sources:
https://www.britannica.com/event/Partition-of-Bengal
https://en.wikipedia.org/wiki/Partition_of_Bengal_(1905)

⭐*Ask AP Framework* https://acharyaprashant.org/en/ap-framework

#AcharyaPrashant #History #APF

Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant's Gita Mission App.

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✍🏻 पोस्ट 1 | 14 जून '26
💭 विषय — ग्लोबल करंट अफेयर्स
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🌍 दुनिया भर के युवा सड़कों पर क्यों हैं?

📊 जून'26 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, 1 नवंबर 2025 को दुनिया में एक साथ 35 सरकार-विरोधी आंदोलन चल रहे थे। उससे पहले के 12 महीनों में 70 देशों में 128 सरकार-विरोधी आंदोलन हुए।

📱 मोरक्को, मेडागास्कर, नेपाल, पेरू, इंडोनेशिया, फिलीपींस, सर्बिया, टोगो, केन्या, हर जगह एक जैसी तस्वीर। युवा सड़कों पर। बिना किसी नेता के। सोशल मीडिया से ऑर्गनाइज़ होते हुए।

📍 कार्नेगी एंडोमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस के ग्लोबल प्रोटेस्ट ट्रैकर के अनुसार, इनमें से 27 प्रदर्शन उन देशों में हुए जहाँ लोगों की राजनीतिक स्वतंत्रता पहले से ही सीमित थी।

👥 यह Gen Z आंदोलन है। वे जो 1990s के अंत और 2000s की शुरुआत में पैदा हुए। दुनिया में इस समय 10 से 29 साल के 2.4 अरब युवा हैं।

❓ वे क्यों सड़कों पर हैं?

🌡️ डाउन टू अर्थ और सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने अक्टूबर-नवंबर 2025 में 16 से 25 वर्ष के 300 युवाओं पर सर्वे किया। 88% प्रतिभागियों ने कहा कि जलवायु बदल रही है, जबकि 67% ने माना कि इसका असर उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ रहा है।

📈 संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड सोशल रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, गैलप वर्ल्ड पोल में 60% लोग "संघर्षरत" (Struggling) और 12% लोग "कष्ट झेल रहे" (Suffering) की श्रेणी में पाए गए।

💰 वहीं, इप्सोस पॉपुलिज़्म रिपोर्ट 2025 में 68% वैश्विक उत्तरदाताओं ने कहा कि अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से अमीरों के हित में बनाई गई है।

📉 1990 के बाद से आय और संपत्ति की असमानता बढ़ी है, खासकर चीन और भारत जैसे विकासशील देशों में।

🚩 प्रदर्शन किसी एक नेता के पीछे नहीं हैं। मोरक्को के आयोजक खुद को "Gen Z 212" कहते हैं, जबकि मेडागास्कर में "Gen Z मेडागास्कर" नाम से आंदोलन चल रहा है। नेपाल में छात्रों ने संसद तक मार्च किया, पेरू में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन हुए, और सर्बिया में विरोध के दौरान विश्वविद्यालय बंद रहे। केन्या में 2024 में शुरू हुई यह लहर 2025 तक अफ्रीका के कई देशों में फैल गई।

🗳️ EU-वित्तपोषित (EU-funded) 2025 ग्लोबल यूथ पार्टिसिपेशन इंडेक्स के अनुसार, 30 वर्ष से कम आयु के लोग चुनावों में अपेक्षाकृत कम मतदान करते हैं, लेकिन ऑनलाइन और प्रत्यक्ष नागरिक आंदोलनों (civic movements) में अधिक सक्रिय रहते हैं।

📣 यह पीढ़ी केवल मतदान केंद्र से नहीं, बल्कि सड़कों पर उतरकर भी अपनी बात कहती है।

🔥 यह क्रोध असली है। यह माँगें असली हैं।

❓ लेकिन एक सवाल जो इन आंदोलनों के बीच शायद ही पूछा जाता है:

जो व्यवस्था इन युवाओं को गुस्सा दिला रही है, उसे किसने बनाया?

और उसे कौन चला रहा है?

🕳️ वह व्यवस्था वेक्यूम (किसी शून्य स्थान) में नहीं बनी। वह उसी रिक्तता से बनी जो हर इंसान के भीतर है। वह रिक्तता जो "और चाहिए" से चलती है। जो अधिकतम मुनाफे, विकास और अधिकतम शक्ति को ही सफलता मानती है।

👤 जिन नेताओं के खिलाफ ये युवा लड़ रहे हैं, वे भी उसी रिक्तता से संचालित हैं। और जो युवा लड़ रहे हैं, वे भी उसी रिक्तता को भीतर लिए हुए हैं। और उस रिक्तता का नाम है अहंकार।

🏛️ यहाँ ढाँचागत स्तर पर बात ज़रूरी है। असमानता, भ्रष्टाचार, जलवायु संकट — ये सब स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम हैं। इनके खिलाफ लड़ाई ज़रूरी है। जवाबदेही ज़रूरी है। नीतियाँ बदलनी ज़रूरी हैं। इन्हें टाला नहीं जा सकता।

🔄 लेकिन जब एक आंदोलन खत्म होता है और नया नेता आ जाता है, तो क्या होता है?

🌏 वही जो केन्या, बांग्लादेश और नेपाल में हुआ। नया नेता अगर आ भी गया, तो भी वह वही रिक्तता लेकर आता है जो पुराने नेता के पास थी। बस नाम बदलता है।

⚠️ यह Generation Z की विफलता नहीं है। यह उस समस्या की गहराई है जिसे बाहरी बदलाव से नहीं छुआ जा सकता।

⚙️ जो IC इंजन यह असमानता बनाता है, वह किसी एक नेता में नहीं है। वह अहंकार के उस ढर्रे में है जो "अधिक" को ही सफलता मानता है। और जब तक वह ढर्रा भीतर से नहीं टूटता, आंदोलन ज़रूरी हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। यह क्षैतिज स्तर की बात है।

🤔 Gen Z गुस्से में है। यह गलत नहीं है।

❓ लेकिन सवाल यह है कि वह क्रोध किस दिशा में जाता है?

🔍 बाहरी परिस्थितियों को दोष देने में या भीतर की ओर बदलने की नीयत से झाँकने (देखने) में?

📌 Sources:

🪞 AP Framework:
https://acharyaprashant.org/hi/ap-framework

🗞️ Down to earth https://www.downtoearth.org.in/economy/gen-angry-why-do-the-youth-protest-so-much-and-so-often

#AcharyaPrashant #APF #GlobalCurrentAffairs

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✍🏻 पोस्ट 2 | 14 जून'26
💭 विषय – इंडियन करंट अफेयर्स
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📰 क्या अब नहीं होगा पेपर लीक?


📝 जब कोई बड़ी परीक्षा होती है, तो चर्चा अक्सर छात्रों की मेहनत और परिणामों तक ही सीमित रहती है। लेकिन किसी परीक्षा की विश्वसनीयता सिर्फ प्रश्नपत्र से नहीं, बल्कि उसे कराने वाली पूरी व्यवस्था से तय होती है।

परीक्षा केंद्र पर मौजूद निरीक्षक और अन्य कर्मचारी लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए NTA ने **'परीक्षा कर्मयोगी'* नामक एक नया प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया है। इसका उद्देश्य परीक्षा कराने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को बेहतर प्रशिक्षण देना है, ताकि NEET जैसी बड़ी परीक्षाएँ अधिक निष्पक्ष, सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से आयोजित की जा सकें।

🎯 यह कार्यक्रम मुख्य रूप से परीक्षा केंद्रों पर जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों और निरीक्षकों के लिए बनाया गया है। इसमें उन्हें परीक्षा से पहले की तैयारी, सुरक्षा व्यवस्था और परीक्षा के दौरान अपनाई जाने वाली जरूरी प्रक्रियाओं की जानकारी दी जाएगी।

साथ ही महत्वपूर्ण निर्देशों को आसान तरीके से समझाया जाएगा, ताकि सभी परीक्षा केंद्रों पर नियमों का बेहतर पालन हो सके। इसका उद्देश्य परीक्षा व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित, जिम्मेदार और भरोसेमंद बनाना है।

🔍 हाल के वर्षों में पेपर लीक, फर्जीवाड़े और परीक्षा प्रबंधन को लेकर उठे सवालों के बाद ऐसा कदम आवश्यक लगता है। NTA का मानना है कि बड़ी परीक्षाओं के निष्पक्ष संचालन के लिए प्रशिक्षित परीक्षा कर्मी बेहद महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या केवल प्रशिक्षण, नए नियम और अधिक निगरानी से समस्या का स्थायी समाधान हो जाएगा? कई बार समस्या नियमों की कमी में नहीं, बल्कि उन्हें बनाने और लागू करने वालों में छिपी होती है।

🌱 अहंकार का स्वभाव है - अपने को बचाना। निरीक्षक को ईमानदारी का प्रशिक्षण दिया जा सकता है, लेकिन जब उसका अहंकार खतरे में आए, तो वह नियम तोड़ देगा।

इसलिए प्रश्न यह नहीं कि नियम कितने अच्छे हैं - प्रश्न यह है कि क्या प्रशिक्षण किसी निरीक्षक को अपने आपको देखने की क्षमता भी देता है? यदि नहीं, तो पुरानी समस्या किसी नए रूप में फिर सामने आ जाएगी।

📌 आखिरकार, छात्र केवल एक परीक्षा नहीं देता, बल्कि पूरे सिस्टम पर भरोसा करता है। और किसी भी सिस्टम की गुणवत्ता उसके नियमों से कम, उसे चलाने वाले मनुष्यों की गुणवत्ता से अधिक तय होती है।

'परीक्षा कर्मयोगी' जैसे कार्यक्रम आवश्यक हैं - लेकिन वास्तविक परिवर्तन तब शुरू होगा जब ईमानदारी केवल एक मॉड्यूल नहीं, बल्कि निरीक्षक की अपनी समझ का हिस्सा बन जाए। परीक्षा सुधार की सबसे गहरी चर्चा परीक्षा केंद्रों से पहले मनुष्य के भीतर शुरू होनी चाहिए।

🔗 स्त्रोत: https://www.ndtv.com/education/neet-ug-2026-re-exam-nta-launches-pariksha-karmayogi-programme-to-train-examination-officials-strengthen-exam-conduct-11631405?pfrom=home-ndtv_mainnavigation

🪞 AP Framework: https://acharyaprashant.org/en/ap-framework

#AcharyaPrashant #IndianCurrentAffairs #APF

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