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✍🏻 पोस्ट 2 | 14 जून'26
💭 विषय – इंडियन करंट अफेयर्स
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📰 क्या अब नहीं होगा पेपर लीक?


📝 जब कोई बड़ी परीक्षा होती है, तो चर्चा अक्सर छात्रों की मेहनत और परिणामों तक ही सीमित रहती है। लेकिन किसी परीक्षा की विश्वसनीयता सिर्फ प्रश्नपत्र से नहीं, बल्कि उसे कराने वाली पूरी व्यवस्था से तय होती है।

परीक्षा केंद्र पर मौजूद निरीक्षक और अन्य कर्मचारी लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए NTA ने **'परीक्षा कर्मयोगी'* नामक एक नया प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया है। इसका उद्देश्य परीक्षा कराने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को बेहतर प्रशिक्षण देना है, ताकि NEET जैसी बड़ी परीक्षाएँ अधिक निष्पक्ष, सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से आयोजित की जा सकें।

🎯 यह कार्यक्रम मुख्य रूप से परीक्षा केंद्रों पर जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों और निरीक्षकों के लिए बनाया गया है। इसमें उन्हें परीक्षा से पहले की तैयारी, सुरक्षा व्यवस्था और परीक्षा के दौरान अपनाई जाने वाली जरूरी प्रक्रियाओं की जानकारी दी जाएगी।

साथ ही महत्वपूर्ण निर्देशों को आसान तरीके से समझाया जाएगा, ताकि सभी परीक्षा केंद्रों पर नियमों का बेहतर पालन हो सके। इसका उद्देश्य परीक्षा व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित, जिम्मेदार और भरोसेमंद बनाना है।

🔍 हाल के वर्षों में पेपर लीक, फर्जीवाड़े और परीक्षा प्रबंधन को लेकर उठे सवालों के बाद ऐसा कदम आवश्यक लगता है। NTA का मानना है कि बड़ी परीक्षाओं के निष्पक्ष संचालन के लिए प्रशिक्षित परीक्षा कर्मी बेहद महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या केवल प्रशिक्षण, नए नियम और अधिक निगरानी से समस्या का स्थायी समाधान हो जाएगा? कई बार समस्या नियमों की कमी में नहीं, बल्कि उन्हें बनाने और लागू करने वालों में छिपी होती है।

🌱 अहंकार का स्वभाव है - अपने को बचाना। निरीक्षक को ईमानदारी का प्रशिक्षण दिया जा सकता है, लेकिन जब उसका अहंकार खतरे में आए, तो वह नियम तोड़ देगा।

इसलिए प्रश्न यह नहीं कि नियम कितने अच्छे हैं - प्रश्न यह है कि क्या प्रशिक्षण किसी निरीक्षक को अपने आपको देखने की क्षमता भी देता है? यदि नहीं, तो पुरानी समस्या किसी नए रूप में फिर सामने आ जाएगी।

📌 आखिरकार, छात्र केवल एक परीक्षा नहीं देता, बल्कि पूरे सिस्टम पर भरोसा करता है। और किसी भी सिस्टम की गुणवत्ता उसके नियमों से कम, उसे चलाने वाले मनुष्यों की गुणवत्ता से अधिक तय होती है।

'परीक्षा कर्मयोगी' जैसे कार्यक्रम आवश्यक हैं - लेकिन वास्तविक परिवर्तन तब शुरू होगा जब ईमानदारी केवल एक मॉड्यूल नहीं, बल्कि निरीक्षक की अपनी समझ का हिस्सा बन जाए। परीक्षा सुधार की सबसे गहरी चर्चा परीक्षा केंद्रों से पहले मनुष्य के भीतर शुरू होनी चाहिए।

🔗 स्त्रोत: https://www.ndtv.com/education/neet-ug-2026-re-exam-nta-launches-pariksha-karmayogi-programme-to-train-examination-officials-strengthen-exam-conduct-11631405?pfrom=home-ndtv_mainnavigation

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✍🏻 पोस्ट 1 | 10 अगस्त '26
💭 विषय — इंडियन करंट अफेयर्स
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📚 भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े कुछ बड़े सवाल

🏫 हजारों सरकारी स्कूल बंद होना: संकट या बदलती शिक्षा व्यवस्था का संकेत?

🇮🇳 भारत में पिछले एक दशक में हजारों सरकारी स्कूलों के बंद या विलय होने की खबर ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

📚 आंकड़े क्या कहते हैं?

UDISE+ के अनुसार 2014-15 से 2024-25 के बीच देश में कुल स्कूलों की संख्या करीब 15.16 लाख से घटकर 14.71 लाख रह गई। सरकारी स्कूलों की संख्या भी 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख हो गई, जबकि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या बढ़ी।

💰 **शिक्षा का खर्च कितना बढ़ रहा है?
2025 के NSS सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण भारत के करीब 66% और शहरी क्षेत्रों के 30.1% विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। सरकारी स्कूल में एक विद्यार्थी पर परिवार का औसत वार्षिक खर्च लगभग ₹2,863 है, जबकि गैर-सरकारी स्कूलों में यह करीब ₹25,002 पहुंच जाता है।**

📖 खर्च सिर्फ स्कूल फीस तक सीमित नहीं है। करीब 27% विद्यार्थी निजी कोचिंग लेते हैं, जिस पर शहरी परिवार औसतन ₹9,950 और ग्रामीण परिवार करीब ₹4,548 सालाना खर्च करते हैं।

⚖️ इसलिए सरकारी स्कूलों का बंद होना केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का मुद्दा नहीं है। यह शिक्षा की पहुंच, समान अवसर और परिवारों पर बढ़ते आर्थिक बोझ से जुड़ा सवाल भी है।

📜 🌸✍1835 में ब्रिटिश अधिकारी थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने अपने Minute on Indian Education में भारतीय और यूरोपीय ज्ञान की बेहद कठोर तुलना की थी। उसने दावा किया था कि एक अच्छी यूरोपीय लाइब्रेरी की एक शेल्फ का ज्ञान भारत और अरब के पूरे देशी साहित्य से अधिक मूल्यवान है✨✅✅

🪞 इन आंकड़ों से एक निष्कर्ष निकलता है। सालाना खर्च नौ गुना ज़्यादा होने के बावजूद परिवार निजी स्कूल चुन रहे हैं, सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं। बच्चे का स्कूल अक्सर परिवार की अपनी पहचान का हिस्सा बन जाता है, यह दिखाना कि हम कहाँ खड़े हैं।

मैकॉले वाला नज़रिया आज एक नए रूप में जिंदा है, "जो जितना महंगा और अंग्रेज़ी माध्यम का है, वही असली शिक्षा है।" यह धारणा अब सरकार से ज़्यादा खुद परिवारों के भीतर बैठी है।

💰 यह पूरी कोशिश क्षैतिज अक्ष पर चल रही है, ज़्यादा फीस, ज़्यादा कोचिंग, इस उम्मीद में कि आगे कहीं सुरक्षा मिल जाएगी। पर खर्च बढ़ाते जाना वह भीतर की स्थिरता कभी नहीं देता जो माता-पिता असल में खोज रहे होते हैं।

पीछे असली डर यह है, अगर निजी स्कूल न चुना तो अच्छे माता-पिता नहीं कहलाएंगे। यह डर बच्चे की जरूरत से ज़्यादा माता-पिता के अपने भीतर के सवाल से जुड़ा है।

❓ अगली बार स्कूल चुनने की बात आए, तो क्या यह देखा जा सकता है, यह फैसला बच्चे के लिए है, या अपनी उस पहचान के लिए है जो दूसरों के सामने बनानी है?

📌 स्रोत:
https://indianexpress.com/article/explained/government-schools-closures-india-explained-10817596/

#AcharyaPrashant #IndianCurrentAffairs #VidyaAvidya #History

Posted by Vidya-Avidya on Acharya Prashant App.

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