No Document No History
6.46K subscribers
24.3K photos
1.46K videos
21.7K files
10.7K links
🏛️NO DOCUMENT NO HISTORY🏛️
जहाँ इतिहास किताबों से आगे, दस्तावेज़ों से जुड़ता है।
📚 History PDFs | Notes | PYQs | Research Material
🎓 NET/JRF • SET • Assistant Professor • Competitive Exam
@RamsingRajput786 https://t.me/HistoryChatAdda
Download Telegram
🙏 प्रमुख भारतीय समाज सुधारक, विद्वान और 19सदी के अन्त और 20सदी कि शुरुआत में महिलाओं के अधिकारों की चैंपियन थी।   (पंडिता रमाबाई)

🍁 इन्होने अपना जीवन महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा और सामाजिक कल्याण की वकालत के लिए समर्पित कर दिया।

🍁 आर्य महिला समाज की स्थापना की जो महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण को बढ़ावा देने पर केंद्रित था।
इन्होने विधवाओं और अन्य वंचित महिलाओं के लिए आश्रय स्थल,सारदा सदन की भी स्थापना की जो इन्हें शिक्षा और व्यवसायिक प्रशिक्षण प्रदान करता था
रमाबाई का सबसे बड़ा योगदान हिन्दू समाज के भीतर दमनकारी प्रथाओं की आलोचना थी।
रमाबाई ने महिलाओं के उत्थान और भेदभावपूर्ण प्रथाओं को खत्म करने के लिए सामाजिक और धार्मिक सुधार का तर्क दिया।

🍁 इसके अलावा पंडिता रमाबाई की वकालत जाति उत्पीड़न और सामाजिक न्याय के मुद्दों तक फैली हुई थी। इन्होने कठोर जाति व्यवस्था की निंदा की और सामाजिक समानता और समावेशन को बढ़ावा देने की दिशा में काम किया।
🍁 अपने लेखन और सक्रियता के माध्यम से, रमाबाई ने पारम्परिक पितृसत्तात्मक मानदंडों को चुनौती दी और एक अधिक न्यायसंगत और न्यायपूर्ण समाज की वकालत की।

🍁भारत के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में पंडिता रमाबाई का योगदान महत्वपूर्ण था। 
➡️ महाराष्ट्र में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी,वह छोटी उम्र से ही भारतीय समाज में जड़े जमा चुकी जाति और लैंगिक पदानुक्रम से परिचित हो गई थी हालांकि उनके पिता अन्नत शास्त्री डोंगरे ने उन्हें संस्कृत और धार्मिक ग्रंथों में शिक्षित करके परम्परा को खारिज कर दिया और रमाबाई के बौद्धिक विकास और आध्यात्मिक जांच की नींव रखी रमाबाई ने कम उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया बाद में उन्होंने खुद को धार्मिक ग्रंथों और दार्शनिक ग्रन्थों में डुबो दिया,आत्म खोज की यात्रा पर निकल पड़ी जो उनके विश्वदृष्टिकोण और सक्रियता को आकार देती है।
🍁प्रतिकुल परिस्थितियों के कारण उन्हें विवाह करना पड़ा और कुछ ही साल बाद चौबीस वर्ष की आयु में रमाबाई विधवा हो गई सामाजिक हाशिए पर होने के प्रत्यक्ष अनुभव ने विधवाओं और हाशिए पर पड़ी महिलाओं के अधिकारों कि वकालत करने की उसकी प्रतिबद्धता को और अधिक बढ़ावा दिया।

➡️ रमाबाई की सबसे स्थायी विरासतों में से एक 1889 में पुणे, महाराष्ट्र में लड़कियों के लिए एक स्कूल शारदा सदन की स्थापना हैं पारम्परिक स्कूलों के विपरित,जो घरेलू कर्तव्यों पर केंद्रित लड़कियों कों सीमित शिक्षा प्रदान करते थे, शारदा सदन ने साहित्य और विज्ञान से लेकर व्यावसायिक कौशल तक अन्य विषयों में व्यापक शिक्षा प्रदान की।
➡️ सामाजिक मानदंडों कों चुनौती देने और महिलाओं को सशक्त बनाने के उनके अथक प्रयास भारत और उसके बाहर सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता के लिए समकालीन आन्दोलनों को प्रेरित करते रहे हैं।
रमाबाई की विरासत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सशक्तिकरण के एक उपकरण के रूप में शिक्षा पर उनका जोर है।  
🍁 इन्होने असहाय और अज्ञानी को परामर्श देने के उद्देश्य से मराठी में "स्त्री धर्म नीति"नामक पुस्तक निकाली। 
🍁इस प्रकार रमाबाई की शैक्षिक और मिशनरी गतिविधियों में प्रमुख प्रतियोगिता पितृसत्ता की थी।

🍁एक ईसाई धर्मांतरित और प्रसिद्ध समाज सुधारक,पंडिता रमाबाई हिन्दू धर्म की एक विद्वान थीं जिनकी इसके दार्शनिक परिसरों, विशेष रूप से महिलाओं के सम्बन्ध में गहरी असहमति थी, और बाद में ईसाई धर्मांतरित के रूप में जिन्होंने ईसाई हठधर्मिता के खिलाफ विद्रोह किया था पुरुष वर्चस्व के खिलाफ एक महिला के जटिल संघर्ष, ब्रिटिश एंग्लिकन बिशप और ननों के खिलाफ एक भारतीय धर्मांतरित भारतीय का, हिन्दू महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ एक भारतीय ईसाई मिशनरी का आख्यान था। 🙏🙏

#AcharyaPrashant #WomenEmpowerment #GetInspired #History

Posted by   ✨Aꪔꪶꪱkꫀsh Mishra on Acharya Prashant's Gita Mission App.
❤2
इस प्रकार, एनी बेसेंट का जीवन और कार्य न केवल भारत में बल्कि विश्व स्तर पर सामाजिक सुधार, धर्म, और स्वतंत्रता के क्षेत्र में अद्भुत योगदान है।
उनकी निरंतर सक्रियता और सामाजिक न्याय की लड़ाई को आज भी सम्मान मिलता है, और उनके विचार आज भी वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक क्षेत्रों में प्रेरणा के स्रोत हैं।

महात्मा गांधी ने एनी बेसेंट की देशभक्ति और कर्तव्य के प्रति समर्पण की सराहना करते हुए कहा था:

"एनी बेसेंट ने जिस तरह इस देश की सेवा की है, उसका ज़िक्र भारत के इतिहास में तब तक रहेगा जब तक ये मुल्क रहेगा। उनकी यादें लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेंगी। उन्होंने इस देश को स्वीकार करके खुद को इसके प्रति समर्पित कर दिया।"

महात्मा गांधी ने कहा था कि वे एनी बेसेंट जैसे प्रखर और समर्पित नेताओं से प्रेरित थे और उन्होंने अपनी राजनीतिक सोच विकसित करने में उनके अनुभव का सम्मान किया।

और ‌उनके सम्बन्ध में भूतपूर्व प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने कहा था-

"आज की पीढ़ी के लिए वह नाममात्र हो सकती हैं लेकिन मेरी और मेरे से पहले की पीढ़ी के लिए उनका बहुत बड़ा व्यक्तित्व था जिसने हम लोगों को बहुत प्रभावित किया। इसमें कोई शक नहीं हो सकता कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान बहुत अधिक था। इसके अतिरिक्त वह उन लोगों में से थीं जिन्होंने हमारा ध्यान हमारी अपनी सांस्कृतिक धरोहर की ओर आकर्षित किया और हममें उसके प्रति गर्व पैदा किया।"

#AcharyaPrashant #GetInspired #History #WomenEmpowerment

Posted by Aꪔꪶꪱkꫀsh Mishra on Acharya Prashant's Gita Mission App.

Download Now -

https://app.acharyaprashant.org/?id=8-d241f961-0a57-4ce5-9555-0f3893d708a1&cmId=m00076
👏3❤1
वू ज़ेतियान का जीवन यह दर्शाता है कि साहस, रणनीति और दूरदृष्टि के बल पर कोई भी ऐतिहासिक असंभव को संभव कर सकता है। उनका शासन महिलाओं की शक्ति, बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान और प्रशासनिक सुधारों का अनूठा उदाहरण है। वहीं ह्वेनसांग ने बौद्ध धर्म को नया दार्शनिक और सांस्कृतिक आयाम देकर चीन की आध्यात्मिक धारा को समृद्ध किया।

सीख यह है – सत्ता और धर्म दोनों का सार तभी सफल होता है जब वे जनकल्याण, ज्ञान और न्याय के साथ जुड़े हों। वू ज़ेतियान और ह्वेनसांग की साझी विरासत हमें यह सिखाती है कि किसी भी युग में ज्ञान, संकल्प और दूरदृष्टि ही परिवर्तन का आधार बनते हैं।

#AcharyaPrashant #History #WomenEmpowerment #GetInspired

Posted by Aditi Gautam on Acharya Prashant's Gita Mission App.

Download Now -

https://app.acharyaprashant.org/?id=8-58c96126-1fa5-4500-a9c6-16680ace68d5&cmId=m00076
❤4
इस प्रकार, एनी बेसेंट का जीवन और कार्य न केवल भारत में बल्कि विश्व स्तर पर सामाजिक सुधार, धर्म, और स्वतंत्रता के क्षेत्र में अद्भुत योगदान है।
उनकी निरंतर सक्रियता और सामाजिक न्याय की लड़ाई को आज भी सम्मान मिलता है, और उनके विचार आज भी वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक क्षेत्रों में प्रेरणा के स्रोत हैं।

महात्मा गांधी ने एनी बेसेंट की देशभक्ति और कर्तव्य के प्रति समर्पण की सराहना करते हुए कहा था:

"एनी बेसेंट ने जिस तरह इस देश की सेवा की है, उसका ज़िक्र भारत के इतिहास में तब तक रहेगा जब तक ये मुल्क रहेगा। उनकी यादें लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेंगी। उन्होंने इस देश को स्वीकार करके खुद को इसके प्रति समर्पित कर दिया।"

महात्मा गांधी ने कहा था कि वे एनी बेसेंट जैसे प्रखर और समर्पित नेताओं से प्रेरित थे और उन्होंने अपनी राजनीतिक सोच विकसित करने में उनके अनुभव का सम्मान किया।

और ‌उनके सम्बन्ध में भूतपूर्व प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने कहा था-

"आज की पीढ़ी के लिए वह नाममात्र हो सकती हैं लेकिन मेरी और मेरे से पहले की पीढ़ी के लिए उनका बहुत बड़ा व्यक्तित्व था जिसने हम लोगों को बहुत प्रभावित किया। इसमें कोई शक नहीं हो सकता कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान बहुत अधिक था। इसके अतिरिक्त वह उन लोगों में से थीं जिन्होंने हमारा ध्यान हमारी अपनी सांस्कृतिक धरोहर की ओर आकर्षित किया और हममें उसके प्रति गर्व पैदा किया।"

#AcharyaPrashant #GetInspired #History #WomenEmpowerment

Posted by✨ Aꪔꪶꪱkꫀsh mishra ✨ on Acharya Prashant's Gita Mission App.
❤5🤔1
💥*ये कहानी है एक असाधारण महिला की*⛓️‍💥

_जिसने परंपरा, समाज और क़ानून तीनों से टकराकर इतिहास रच दिया।_

रुख्माबाई राउत की शादी 11 साल की उम्र में दादाजी भिकाजी से कर दी गई थी। लेकिन जब वह बड़ी हुईं, तो उन्होंने अपने “पति” के साथ रहने से साफ़ इनकार कर दिया। यही कदम उस दौर में विद्रोह माना गया। 1884 में दादाजी भिकाजी बनाम रुख्माबाई केस ने पूरे ब्रिटिश भारत में हलचल मचा दी क्या एक लड़की, जिसने बचपन में शादी की हो, उसे बड़े होने पर उसे अस्वीकार करने का हक़ है?

रुख्माबाई ने कहा हाँ। और अदालत में डटकर लड़ीं।

उनका केस “स्त्री की स्वतंत्र इच्छा” का प्रतीक बन गया। ब्रिटिश जज रॉबर्ट पिन्हे ने भी कहा कि किसी महिला को उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ पति के पास भेजना “क्रूर और बर्बर” होगा। यह फैसला समाज के लिए झटका था। बाल गंगाधर तिलक जैसे राष्ट्रवादी नेताओं ने भी रुख्माबाई की आलोचना की, यह कहते हुए कि “पढ़ाई ने उसे बिगाड़ दिया है।”

आख़िरकार, लंबी कानूनी लड़ाई के बाद केस समझौते में खत्म हुआ — लेकिन उसने इतिहास बदल दिया। इसी संघर्ष के कुछ साल बाद “Age of Consent Act, 1891” बना, जिसने बाल विवाह की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 साल कर दी।

रुख्माबाई ने समाज के विरोध के बावजूद इंग्लैंड जाकर डॉक्टरी पढ़ी और भारत की पहली महिला चिकित्सक बनीं।

लेखक सुदीर चंद्रा लिखते हैं कि रुख्माबाई “सत्याग्रह की भावना को तब जी चुकी थीं, जब सत्याग्रह का नाम तक नहीं था।”

उनकी कहानी यह दिखाती है कि बदलाव अक्सर वहीं से शुरू होता है l जहाँ से किसी को उम्मीद नहीं होती।

*आचार्य प्रशांत आज के समय में महिलाओं को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। आचार्य जी की स्त्री पुस्तक भी महिलाओं के आंतरिक बल को बढ़ाने की दिशा में उठाया हुआ एक शसक्त कदम है।*

हमने आचार्य जी से समझा है - “अध्यात्म कहता है, जीवन का एक ही लक्ष्य है — बोध, मुक्ति। और दोनों एक ही चीज़ के दो नाम हैं। जीवन का लक्ष्य है मुक्ति। स्त्री हो या पुरुष, दोनों के जीवन का एक ही लक्ष्य है — मुक्ति तक पहुँचना। तो संस्कृति, सही संस्कृति, सत्संस्कृति वो होगी जो महिला और पुरुष दोनों को मुक्ति की ओर भेजेगी।”

“हमारी संस्कृति उत्थान माँग रही है। और संस्कृति के उत्थान की माँग सबसे ज़्यादा महिलाओं को करनी चाहिए। महिलाएँ सबसे आगे होनी चाहिए विरोध करने में कि यह पुरानी, सड़ी-गली संस्कृति अब नहीं चलेगी बाबा! हमें एक नई, सुधरी हुई, आध्यात्मिक संस्कृति चाहिए। हमें वेदांत आधारित संस्कृति चाहिए, हमें उच्चतर मूल्यों पर आधारित संस्कृति चाहिए। यह पुरानी, पिछड़ी हुई बातें, जिनका संबंध अशिक्षा से है, अज्ञान से है, मन की संकीर्णता से है, गरीबी से है, मानसिक दिवालियापन और राजनैतिक गुलामी से है, हमें यह संस्कृति नहीं चाहिए।”

Source - https://article-14.com/post/rukhmabai-the-life-and-times-of-a-child-bride-turned-rebel-doctor-by-sudhir-chandra--65efb696ca556

#AcharyaPrashant #WomenEmpowerment #History #GetInspired

Posted by Avinashi🍃 on Acharya Prashant's Gita Mission App.
*जगदीश चंद्र बोस— वह भारतीय वैज्ञानिक जो दो नोबेल पुरस्कार के अधिकारी थे*

1️⃣ जगदीश चंद्र बोस जिन्होंने रेडियो वेव्स, वायरलेस संचार और पौधों के व्यवहार पर अनोखा शोध किया। उन्होंने Crescograph नाम की मशीन बनाई, जो पौधों की बेहद धीमी वृद्धि को भी माप सकती थी। बोस ने यह दिखाया कि पौधे भी रोशनी, तापमान और रसायनों जैसी बाहरी चीज़ों पर प्रतिक्रिया देते हैं, यानी उनमें भी संवेदनाएँ होती हैं।

2️⃣ बोस का जन्म बंगाल में हुआ और बचपन से ही उन्हें प्रकृति और भारतीय संस्कृति की सीख मिली। उन्होंने कोलकाता में पढ़ाई की और फिर इंग्लैंड जाकर विज्ञान की पढ़ाई जारी रखी। भारत लौटकर वे Presidency College में प्रोफेसर बने, जहाँ उन्हें अंग्रेज़ अधिकारियों से भेदभाव झेलना पड़ा। फिर भी उन्होंने 3 साल तक बिना वेतन पढ़ाया।

3️⃣ बोस ने 1917 में Bose Institute की स्थापना की, जिसे उन्होंने “विज्ञान का मंदिर” कहा। उनकी सोच में विवेकानंद, टैगोर और सिस्टर निवेदिता जैसी महान हस्तियों का बड़ा योगदान था।बोस को उनके काम के लिए नाइट की उपाधि भी मिली और वे विज्ञान के क्षेत्र में रॉयल सोसाइटी के पहले भारतीय फेलो बने।

4️⃣ रेडियो विज्ञान के क्षेत्र में बोस का योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि माना जाता है कि उन्होंने आधुनिक वायरलेस कम्युनिकेशन की असली नींव रखी। लेकिन बोस अपने शोध का पेटेंट कराने में रुचि नहीं रखते थे और सब कुछ मानवता के लिए खुला छोड़ देते थे। कई इतिहासकार मानते हैं कि अगर बोस ने पेटेंट कराया होता, तो नोबेल असल में उन्हें मिलना चाहिए था।

*आचार्य जी कहते है* - विज्ञान की इज़्ज़त करना सीखो। चिकित्सा-शास्त्र की इज़्ज़त करना सीखो। वो बेवकूफ़ नहीं हैं जो प्रयोगशालाओं में दिन रात लगे हुए हैं अनुसंधान कर रहे हैं। उन्होंने बहुत मेहनत करके कुछ बातें पता करी हैं। और यूं हीं नहीं पता कर ली हैं अंधविश्वास द्वारा, दस बार प्रयोग करते हैं और उसके बाद भी बड़ी विनम्रता के साथ कहते हैं कि अभी हमको ऐसा पता लगा हैं, हमें जो पता लगा है वो आगे के प्रयोगों से गलत भी सिद्ध हो सकता है।

सोर्स: https://www.britannica.com/biography/Jagadish-Chandra-Bose

#AcharyaPrashant #Science #GetInspired #History

Posted by Alok on Acharya Prashant's Gita Mission App.

Download Now -

https://app.acharyaprashant.org/?id=8-1b00284c-8a45-4c5b-9e5a-75b747bc8bba&cmId=m00076
❤3🥰1
*150 वर्ष बाद भी प्रश्न वही: गीत की पंक्तियाँ या राष्ट्र की चेतना?*

2025 में वंदे मातरम् अपने 150वें वर्ष में है, इसी अवसर पर हाल-ही में यह विवाद फिर उभरा है कि इसके कुछ “मिसिंग स्टैंज़ा” (छंद / पंक्तियाँ) हटाए गए थे।

मूल रूप से लिखा गया गीत बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने 1870–80 के दशक में लिखी थी, और यह गीत स्वतंत्रता संग्राम में विशेष भूमिका निभा चुका है।

विवाद यह है कि 1937 में Indian National Congress (INC) की एक बैठक में, कथित सांप्रदायिक विरोध और “धार्मिक संवेदनशीलता” के कारण कुछ पंक्तियाँ, जिनमें देवी-स्तुति थी, गीत से हटा दी गई थीं।

अब सरकार इस omission (छंटाई) को इतिहास की “दोहरी भूल” बता रही है, उनका कहना है कि इससे वन्दे मातरम् के मूल भाव और उसकी सांस्कृतिक–ऐतिहासिक महत्ता कम हो गई।

इस बहस के बीच, संसद में 8–9 दिसंबर 2025 के लिए एक विशेष चर्चा निर्धारित है, जहाँ वन्दे मातरम् की पुरानी पंक्तियों, उसकी प्रासंगिकता व राष्ट्र-चेतना पर बहस होगी।

👉 कुल मिलाकर यही देखा जा रहा है, वन्दे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं; यह Indian freedom struggle की भावना, हमारा सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहर, और राष्ट्रीय-चेतना का प्रतीक रहा है। इसलिए इसके “मिसिंग स्टैंज़ा” को लेकर विवाद, सिर्फ साहित्यात्मक नहीं, बल्कि पहचान, इतिहास और मनोभाव का संघर्ष है।


✨ हम गीत, शब्द, प्रतीक तक सीमित हो जाते हैं; पर प्रश्न यह है: क्या हमारी चेतना ही गायब नहीं हो गयी है? जब हम हम खुद को, अपने कर्मों के स्रोत को नहीं जानते हैं, तब बाहरी गीत-संवाद, प्रतीक-वाद किसी काम नहीं आता। वन्दे मातरम् को फिर से सुनने, चर्चा करने, बहस करने की ज़रूरत इसलिए नहीं कि यह एक गीत है, बल्कि इसलिए कि वह उस जागृति का प्रतीक है जिसे हमें जीना है।

आचार्य जी समझाते हैं कि असली गौरव, वह नहीं जो तख़्त-ताज, शिखर-सम्मान या भाषायी प्रदर्शन से बनता हो, बल्कि वह है जो मनुष्य के सार्थक संघर्ष का परिणाम हो। यदि हम गीत-छंदों में सच्चाई तलाशेंगे, पर अपने भीतर सच्चाई से विमुख रहेंगे, तो वह गीत सिर्फ़ काग़ज़ या माइक तक सीमित रहेगा। और यदि हम अपने जीवन में सहिष्णुता, समझ, करुणा, और एकता जगाएँ, तब गीत नहीं, जीवन संकल्प बनेगा। इस बहस का असली केंद्र वही है, कि हम कितना जागरूक, कितना सचेत और कितना मानव हैं।

Source
https://timesofindia.indiatimes.com/india/150-years-of-vande-mataram-why-bjp-and-congress-are-fighting-over-its-missing-stanzasexplained-parliament-lok-sabha-debate/articleshow/125813886.cms

#AcharyaPrashant #History #CurrentAffairs #GetInspired
❤3👏1
🚨1857 के क्रांति में शहीद होने वाली देश की प्रथम महिला वीरांगना

पूरा नाम: रानी अवंतिबाई लोधी
जन्म: लगभग 1831
क्षेत्र: रामगढ़ (वर्तमान डिंडौरी–मंडला, मध्य प्रदेश)
पति: राजा विक्रमादित्य सिंह लोधी (रामगढ़ रियासत के शासक)

⚔️ संघर्ष की शुरुआत–

अंग्रेजों से टकराव राजा विक्रमादित्य सिंह के बीमार पड़ने के बाद अंग्रेजों ने “कुप्रशासन” का बहाना बनाकर रामगढ़ रियासत अपने नियंत्रण में ले ली।

रानी अवंतिबाई ने इसे सीधी गुलामी माना और अंग्रेजी हुकूमत मानने से इनकार कर दिया।

✊ यहीं से उनके विद्रोह की चिंगारी भड़की।

🔥 1857 का विद्रोह और रानी की भूमिक 1857 की क्रांति में अवंतिबाई लोधी ने आदिवासियों, किसानों और स्थानीय राजाओं को संगठित किया।

मंडला, डिंडौरी और आसपास के जंगलों में उन्होंने गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) किया।

अंग्रेजी छावनियों पर हमले किए, सिपाहियों को खदेड़ा।

उनका उद्देश्य था:
👉 रामगढ़ रियासत की स्वतंत्रता और स्वशासन।
🗡️ अंतिम युद्ध और बलिदान
अंग्रेजों ने बड़ी सेना भेजकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया।

20 मार्च 1858 के आसपास रामगढ़ के जंगलों में निर्णायक युद्ध हुआ।

जब पराजय निश्चित दिखी और पकड़े जाने का खतरा हुआ, तो रानी अवंतिबाई लोधी ने तलवार से स्वयं को बलिदान कर दिया।

🕊️ उन्होंने गुलामी स्वीकार करने की बजाय वीरगति चुनी।

आज भी मंडला–डिंडौरी क्षेत्र में लोग उन्हें
“रामगढ़ की शेरनी” कहकर याद करते हैं।

#AcharyaPrashant #History #WomenEmpowerment #GetInspired

Posted by Nitish Kumar Roll 3 on Acharya Prashant's Gita Mission App.

Download Now -

https://app.acharyaprashant.org/?id=8-f1132401-d8f5-411e-82d6-2d3ec6352c13&cmId=m00076
❤5
केरल की वकील थान्या नाथन सी, देश की पहली दृष्टिबाधित महिला जज बनने जा रही हैं। उनका न्यायाधीश बनना केरल ही नहीं, भारत के न्यायिक इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

हाल ही में आयोजित सिविल जज (जूनियर डिवीजन) परीक्षा में, उन्होंने Benchmark disabilities वाले उम्मीदवारों में प्रथम स्थान हासिल किया।
पूर्ण रूप से दृष्टिबाधित होने के बावजूद, अपने दृढ़ संकल्प और बुद्धिमत्ता से सभी बाधाओं को पार किया है।

24 वर्षीय थान्या ने Kannur University से LLB की पढ़ाई की, जहाँ उन्होंने प्रथम रैंक हासिल की थी। न्यायाधीश बनने से पहले, उन्होंने कन्नूर के तालीपरंबा में वकील के.जी. सुनीलकुमार के अधीन एक जूनियर वकील के रूप में अभ्यास शुरू किया था।

अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने Braille script और आधुनिक तकनीक जैसे स्क्रीन-रीडिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया।

वकालत के दौरान वह अपनी दलीलें और नोट्स ब्रेल लिपि में तैयार करती थीं। हालांकि उन्हें लगता है कि पुराने हस्तलिखित दस्तावेजों को पढ़ना एक चुनौती हो सकती है, लेकिन वह इसे तकनीक और अनुभव से सुलझाने के लिए आश्वस्त हैं।

उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने सीनियर्स के प्रोत्साहन और सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को दिया जिसने दिव्यांगों के लिए न्यायपालिका के दरवाजे पूरी तरह से खोल दिए।

थान्या नाथन की यह नियुक्ति केरल की न्यायपालिका के लिए भी एक नई शुरुआत है, क्योंकि अब अदालतों के Infrastructure को दिव्यांगजनों के अनुकूल और सुलभ बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया जाएगा।

यह उपलब्धि केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है।

#AcharyaPrashant #WomenEmpowerment #GetInspired #History #CurrentAffairs

Posted by Hina on Acharya Prashant's Gita Mission App.

Download Now -

https://app.acharyaprashant.org/?id=8-1e439eaa-960d-435d-b726-942b985b9c59&cmId=m00076
❤6🔥1
आनंदी गोपाल जोशी: वह साहसी दिल जिसने शोक को एक क्रांति में बदल दिया 🩺*

_अगर आपको लगता है कि दुनिया आपको “एक बॉक्स में बंद” करने की कोशिश कर रही है, तो आनंदी से मिलिए। _
उस समय जब भारतीय महिलाओं को महज़ संपत्ति समझा जाता था, उसने तय किया कि उसका जीवन किसी उच्च उद्देश्य के लिए है। 🌟📖

वह हृदय-विदारक घटना जिसने आग जला दी ❤️‍🔥🩹
कठपुतली दुल्हन: 9 साल की उम्र में, अपने से 20 साल बड़े आदमी से उसकी शादी कर दी गई।
उसका नाम, उसके कपड़े, उसका जीवन—सब कुछ दूसरों ने तय किया। 🏠👰

माँ का शोक: 14 की उम्र में उसने अपने नवजात बेटे को बाहों में लिया। लेकिन भारत में उसकी मदद के लिए कोई महिला डॉक्टर नहीं थी, इसलिए उसका बच्चा सिर्फ 10 दिनों में ही मर गया। 🤱💔

अधिकांश लोग टूट जाते। लेकिन आनंदी उठ खड़ी हुई। उसने कसम खाई कि वह खुद डॉक्टर बनेगी। 🛡️🌱

18 की उम्र में वह बिल्कुल अकेली अमेरिका चली गई। न परिवार, न जाना-पहचाना खाना, बस पेंसिल्वेनिया की जमा देने वाली बर्फ और उसकी किताबें। ❄️📚
ठंड ने उसके फेफड़ों को नष्ट कर दिया। उसे तपेदिक हो गया। लेकिन खून की खाँसी के बावजूद वह पढ़ती रही। 1886 में वह भारत की पहली महिला चिकित्सक के रूप में स्नातक हुई। 📜

👑आचार्य जी की शिक्षाएँ: महिलाओं की वास्तविक मुक्ति 🧘‍♂️**

अधिकांश लोग व्यक्तिगत त्रासदी (जैसे बच्चे की मृत्यु) को और ज्यादा “सुरक्षा” या और ज्यादा “आसक्ति” में सिमट जाने का कारण बना लेते हैं। 🕸️

आनंदी अपना जीवन शोक में बिता सकती थी या अपने खोए हुए बच्चे को “बदलने” की कोशिश कर सकती थी। यह यांत्रिक, जैविक प्रतिक्रिया है। 🔄
इसके बजाय, उसने अपने दर्द को बुद्धि के लिए ईंधन बनाया। 🚀 उसने समझा कि उसका बच्चा अज्ञानता के कारण मरा।

आचार्य जी की अंतर्दृष्टि:
उन्हें रचनात्मकता सिखाइए। उन्हें प्रेम सिखाइए। उन्हें ऐसा ज्ञान दीजिए जो उन्हें सत्यपूर्ण ढंग से जीने में मदद करे।🛡️

✨ आनंदी के लिए “प्रेम” कोई आरामदेह भावना नहीं था; वह पूरे राष्ट्र को चंगा करने के लिए एक कठोर, त्यागपूर्ण प्रतिबद्धता थी।

एक जीवन जो ‘अवधि’ से नहीं, ‘गहराई’ से मापा जाए ⏳

⚖️समाज आनंदी पर तरस खाता है क्योंकि वह 21 की उम्र में मर गई। वे इसे *“त्रासदी”* कहते हैं। आचार्य जी सोचने की इस “मशीनरी” को चुनौती देते हैं। 🦁

सोने के पिंजरे में बिताए गए सौ साल एक व्यर्थ जीवन हैं। लेकिन संपूर्ण स्वतंत्रता में जिया हुआ एक क्षण ही अनंतता है। 🦅✨
आनंदी ने ‘समझौता’ *नहीं किया। उसने अनुमति का इंतज़ार नहीं किया। उसने देखा कि उसका शरीर जवाब दे रहा है, लेकिन उसकी आत्मा उठ रही है। 🌡️↗️
अमेरिका में अपने चार वर्षों में उसने घरेलूपन के चार दशकों की तुलना में अधिक ‘जीवन’ जिया।

_हर सत्र में, महिलाओं और उनके माता-पिता के लिए हमेशा एक संदेश होता है:-_
अपनी बेटियों को ‘सिर्फ़ जीना’ या ‘समझौता करना’ मत सिखाइए। उन्हें सिखाइए कि वे एक तारे की तरह ‘जलें’—उज्ज्वल, प्रखर, और ऐसे उद्देश्य के लिए जो उनकी अपनी देह-सीमा से बड़ा हो।🙏🔥

स्रोत:-
https://acharyaprashant.org/en/articles/teach-this-to-girls-neem-candies-1_e470544

https://en.wikipedia.org/wiki/Anandi_Gopal_Joshi

#AcharyaPrashant #WomenEmpowerment #GetInspired #History

Posted by Drishti on Acharya Prashant's Gita Mission App.

Download Now -

https://app.acharyaprashant.org/?id=8-c64ce922-9e70-4fcd-bae4-441e2f074d33&cmId=m00076 पीएल
❤5🔥1👌1🕊1
◾ क्या धर्म का अर्थ केवल रीति-रिवाज है, या सत्य और न्याय भी है?

◾अगर धर्म में स्त्री को बराबरी नहीं, तो वह धर्म नहीं—*व्यवस्था है, जो डर पर टिकी है।*

👉डॉ. आंबेडकर की लड़ाई बाहरी कानून से ज्यादा
*अंदर की जड़ सोच* के खिलाफ थी।

_तो आज अगर होंगे डॉक्टर अंबेडकर तो पहली चीज यह पूछेंगे कि कहीं ऐसी ताकतों को प्रोत्साहन तो नहीं मिल रहा जो धर्म का बड़ा रूढ़िवादी स्वरूप प्रमोट कर रही हो। _   

~आचार्य जी                                         
*डॉ. आंबेडकर: एक विराट व्यक्तित्व |आचार्य जी*
https://acharyaprashant.org/en/articles/agar-aaj-hote-ambedkar-1_fce5b68

*बाबा साहेब और हिंदू कोड बिल: महिलाओं की दशा सुधारने में मील का पत्थर बना एक कदम*
https://www.amarujala.com/columns/blog/hindu-code-bill-dr-babasaheb-ambedkar-significance-importance-nehru-and-the-hindu-code-bill?client=android&client_new=au_revamp

#AcharyaPrashant #WomenEmpowerment #History #GetInspired

Posted by Ankit Rawat on Acharya Prashant's Gita Mission App.

Download Now -

https://app.acharyaprashant.org/?id=8-7226d825-23b3-4afa-a98a-92bf59bc51f1&cmId=m00076
❤3👀1