COP30 स्थल के पास विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे हैं क्योंकि एक नया राजमार्ग अमेज़न वर्षावन के माध्यम से बनाया जा रहा है, जबकि विश्व नेता जलवायु की “रक्षा” के लिए एकत्र हो रहे हैं। लोगों को लगता है कि यह एक स्पष्ट विरोधाभास है... ग्रह को बचाने की बात करते हुए उसी जंगल को काटा जा रहा है जो ग्रह को जीवित रखता है।
अमेज़न को दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन सिंक कहा जाता है क्योंकि इसके पेड़ हर साल लगभग 2 अरब टन CO₂ अवशोषित करते हैं, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि धीमी होती है।
यह पृथ्वी की लगभग 20% ऑक्सीजन भी उत्पन्न करता है और ग्रह की सबसे समृद्ध जैव विविधता को समेटे हुए है। यही कारण है कि एक छोटी सी सड़क भी अधिक वनों की कटाई, खनन और भूमि हथियाने के लिए दरवाजा खोल सकती है।
ये विरोध केवल पर्यावरण के बारे में नहीं हैं... वे एक गहरी सच्चाई को दर्शाते हैं। जब कार्य शब्दों से मेल नहीं खाते, तो विनाश शुरू होता है।
जब मन लाभ या अधीरता से प्रेरित होता है, तो प्रकृति केवल उपयोग की जाने वाली भूमि के रूप में दिखाई देती है। लेकिन जब जागरूकता होती है, तो हम देखते हैं कि वर्षावन की रक्षा करना केवल पेड़ों को बचाना नहीं है, बल्कि यह हमारे अपने भविष्य को बचाना है। COP30 के पास लोग ईमानदारी, जिम्मेदारी और वास्तविक प्रतिबद्धता की मांग कर रहे हैं, न कि केवल भाषणों की।
वे दुनिया को याद दिला रहे हैं कि सच्चा परिवर्तन पहले आंतरिक स्पष्टता से आता है, और तभी वैश्विक मंचों पर बड़े वादों से।
#AcharyaPrashant #ClimateChange #Operation2030 #CurrentAffairs
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अमेज़न को दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन सिंक कहा जाता है क्योंकि इसके पेड़ हर साल लगभग 2 अरब टन CO₂ अवशोषित करते हैं, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि धीमी होती है।
यह पृथ्वी की लगभग 20% ऑक्सीजन भी उत्पन्न करता है और ग्रह की सबसे समृद्ध जैव विविधता को समेटे हुए है। यही कारण है कि एक छोटी सी सड़क भी अधिक वनों की कटाई, खनन और भूमि हथियाने के लिए दरवाजा खोल सकती है।
ये विरोध केवल पर्यावरण के बारे में नहीं हैं... वे एक गहरी सच्चाई को दर्शाते हैं। जब कार्य शब्दों से मेल नहीं खाते, तो विनाश शुरू होता है।
जब मन लाभ या अधीरता से प्रेरित होता है, तो प्रकृति केवल उपयोग की जाने वाली भूमि के रूप में दिखाई देती है। लेकिन जब जागरूकता होती है, तो हम देखते हैं कि वर्षावन की रक्षा करना केवल पेड़ों को बचाना नहीं है, बल्कि यह हमारे अपने भविष्य को बचाना है। COP30 के पास लोग ईमानदारी, जिम्मेदारी और वास्तविक प्रतिबद्धता की मांग कर रहे हैं, न कि केवल भाषणों की।
वे दुनिया को याद दिला रहे हैं कि सच्चा परिवर्तन पहले आंतरिक स्पष्टता से आता है, और तभी वैश्विक मंचों पर बड़े वादों से।
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✅जहाँ किताबें हारती हैं, वहाँ बंदूकें जीतती हैं
गिनी-बिसाऊ में 26 नवंबर को फिर सेना ने सत्ता अपने हाथ में ले ली। राजधानी में लगभग एक घंटे तक गोलियाँ चलीं और उसके बाद सेना के अधिकारियों ने टीवी पर आकर बताया कि उन्होंने राष्ट्रपति को हटा दिया है, देश की सीमाएँ बंद कर दी हैं, मीडिया पर रोक लगा दी है और चुनाव को रोक दिया गया है। सेना ने कहा कि कुछ नेता और विदेशी ड्रग माफिया चुनाव नतीजों में गड़बड़ी करने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए यह कदम उठाना पड़ा।
राष्ट्रपति इस समय कहाँ हैं, यह साफ नहीं है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि उन्हें सेना ने हिरासत में लिया है और वे सुरक्षित हैं।
यह घटना ऐसे समय हुई जब 23 नवंबर को हुए चुनाव के नतीजे अगले दिन आने वाले थे। लेकिन नतीजे आने से पहले ही सत्ता पक्ष और मुख्य विपक्ष दोनों ने अपनी जीत का दावा कर दिया था, जिससे तनाव और बढ़ गया।
गिनी-बिसाऊ में सत्ता बदलने का ऐसा तरीका नया नहीं है। 1974 में आज़ादी के बाद से यहाँ नौ से ज़्यादा तख्तापलट या तख्तापलट की कोशिशें हो चुकी हैं। इस बार की घटना ने फिर दिखा दिया कि देश में लोकतंत्र अभी भी बहुत अस्थिर है।
इतिहास को देखो तो एक बात बार-बार सामने आती है कि जहाँ जनता पढ़ी-लिखी नहीं होती वहाँ लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।
वोट देने का अधिकार तभी सुरक्षित होता है जब वोटर में सच और झूठ में फर्क करने की क्षमता हो। वरना चुनाव सिर्फ एक अवसर बन जाते हैं जिनमें सत्ता चाहने वाले लोग जनता को भ्रम में रखकर अपनी ताकत बढ़ा लेते हैं।
इस पर आचार्य जी समझाते हैं,
जब लोकतंत्र के पास जनता हो लेकिन जनता के पास शिक्षा न हो, तब वह व्यवस्था लोकतंत्र नहीं रह जाती, वह धीरे-धीरे विनाश का साधन बन जाती है। अशिक्षित लोकतंत्र सबसे खतरनाक होता है क्योंकि वहाँ फैसले तो जनता के नाम पर होते हैं, पर परिणाम जनता के ही खिलाफ जाते हैं।
गिनी-बिसाऊ इसका ताज़ा उदाहरण है।
जहाँ किताबों की आवाज़ धीमी कर दी जाए, वहाँ गोलियों की आवाज़ तेज़ होना तय है।
Source :
1. https://www.livemint.com/news/world/what-is-happening-in-guinea-bissau-soldiers-seize-power-ahead-of-election-results-11764178059713.html
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गिनी-बिसाऊ में 26 नवंबर को फिर सेना ने सत्ता अपने हाथ में ले ली। राजधानी में लगभग एक घंटे तक गोलियाँ चलीं और उसके बाद सेना के अधिकारियों ने टीवी पर आकर बताया कि उन्होंने राष्ट्रपति को हटा दिया है, देश की सीमाएँ बंद कर दी हैं, मीडिया पर रोक लगा दी है और चुनाव को रोक दिया गया है। सेना ने कहा कि कुछ नेता और विदेशी ड्रग माफिया चुनाव नतीजों में गड़बड़ी करने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए यह कदम उठाना पड़ा।
राष्ट्रपति इस समय कहाँ हैं, यह साफ नहीं है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि उन्हें सेना ने हिरासत में लिया है और वे सुरक्षित हैं।
यह घटना ऐसे समय हुई जब 23 नवंबर को हुए चुनाव के नतीजे अगले दिन आने वाले थे। लेकिन नतीजे आने से पहले ही सत्ता पक्ष और मुख्य विपक्ष दोनों ने अपनी जीत का दावा कर दिया था, जिससे तनाव और बढ़ गया।
गिनी-बिसाऊ में सत्ता बदलने का ऐसा तरीका नया नहीं है। 1974 में आज़ादी के बाद से यहाँ नौ से ज़्यादा तख्तापलट या तख्तापलट की कोशिशें हो चुकी हैं। इस बार की घटना ने फिर दिखा दिया कि देश में लोकतंत्र अभी भी बहुत अस्थिर है।
इतिहास को देखो तो एक बात बार-बार सामने आती है कि जहाँ जनता पढ़ी-लिखी नहीं होती वहाँ लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।
वोट देने का अधिकार तभी सुरक्षित होता है जब वोटर में सच और झूठ में फर्क करने की क्षमता हो। वरना चुनाव सिर्फ एक अवसर बन जाते हैं जिनमें सत्ता चाहने वाले लोग जनता को भ्रम में रखकर अपनी ताकत बढ़ा लेते हैं।
इस पर आचार्य जी समझाते हैं,
जब लोकतंत्र के पास जनता हो लेकिन जनता के पास शिक्षा न हो, तब वह व्यवस्था लोकतंत्र नहीं रह जाती, वह धीरे-धीरे विनाश का साधन बन जाती है। अशिक्षित लोकतंत्र सबसे खतरनाक होता है क्योंकि वहाँ फैसले तो जनता के नाम पर होते हैं, पर परिणाम जनता के ही खिलाफ जाते हैं।
गिनी-बिसाऊ इसका ताज़ा उदाहरण है।
जहाँ किताबों की आवाज़ धीमी कर दी जाए, वहाँ गोलियों की आवाज़ तेज़ होना तय है।
Source :
1. https://www.livemint.com/news/world/what-is-happening-in-guinea-bissau-soldiers-seize-power-ahead-of-election-results-11764178059713.html
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mint
What is happening in Guinea-Bissau? Soldiers seize power ahead of election results | Today News
Soldiers in Guinea-Bissau announced on state TV that they had seized power, suspended all institutions and halted the electoral process, claiming the move was triggered by an alleged plot by politicians and drug traffickers to manipulate the election results.
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हाल ही में आए *एशिया पावर इंडेक्स 2025* में भारत ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। ऑस्ट्रेलिया के लोई इंस्टीट्यूट की इस रिपोर्ट में भारत को *‘मेजर पावर’* का दर्जा मिला है। रैंकिंग में भारत *तीसरे स्थान* पर रहा। अमेरिका पहले और चीन दूसरे नंबर पर हैं। भारत का स्कोर *40* है, जो दिखाता है कि भारत अब *मिलिट्री सुपरपावर बनने के बहुत करीब* है।
भारत की ताकत बढ़ने का सबसे बड़ा कारण रहा *ऑपरेशन सिंदूर*, जो मई 2025 में हुआ। इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान और PoK में मौजूद *9 आतंकी ठिकानों पर मिसाइल हमले* किए। यह कार्रवाई बहुत सफल मानी गई, और इसी से भारत की सैन्य क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा पहचान मिली।
आर्थिक क्षेत्र में भी 2025 भारत के लिए बहुत अच्छा रहा। इस साल भारत *एशिया का दूसरा सबसे बड़ा निवेश वाला देश**
बन गया और चीन को पीछे छोड़ दिया। बढ़ती अर्थव्यवस्था, विदेशी कंपनियों का भारत में आना और सप्लाई चेन का भारत की तरफ झुकना—इन सबने भारत की स्थिति को और मजबूत किया।
कूटनीति और संस्कृति के क्षेत्र में भी भारत का प्रभाव थोड़ा बढ़ा। ज्यादा देशों के साथ मीटिंग, बढ़ता पर्यटन और एयर कनेक्टिविटी में सुधार से भारत की पहचान और मजबूत हुई।
हालाँकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत के बढ़ते असर के बावजूद *भारत और चीन की शक्ति का फर्क और बढ़ गया है*, क्योंकि चीन सैन्य और कूटनीतिक ताकत में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
जब भी ऐसा कुछ होता है तो पहली फीलिंग थोड़ी महानता की आती है कि हमारे देश ने ये उपलब्धि ली लेकिन साथ में ही आचार्य जी की कही कुछ बातें याद आती है कि
"भारत महान है अगर जो अपने आप को भारतवासी कहता हो, वो सच की ही तरफ़ खड़ा होता है चाहे जो कीमत देनी पड़े, झूठ की तरफ़ नहीं।"
"धर्म का पालना रहा है भारत, और विज्ञान का और गणित का और संगीत का भी पालना रहा है भारत, इसीलिए भारत महान था, उन लोगों की बदौलत महान था।' आज भी वैसे लोग चाहिए, वैसे लोग होगें तो भारत महान होगा, नहीं तो नहीं होगा। फिर ये तो कह लोगे कि इतिहास में पहले भारत महान था, लेकिन ये नहीं कह पाओगे कि भारत आज भी महान है। आज भारत को महान बनाना है तो अपने भीतर लोहा पैदा करो और सच की तरफ़ निष्ठा पैदा करो।"
मिल्ट्री सुपरपावर तो हम बन जाएंगे, लेकिन अध्यात्म क्षेत्र की सुपरपावर बनना उससे भी ज़्यादा जरूरी है आज भारत को।
Source:
https://www.indiatoday.in/diu/story/india-surpasses-japan-3rd-spot-asia-power-index-potential-superpower-2605694-2024-09-24
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भारत की ताकत बढ़ने का सबसे बड़ा कारण रहा *ऑपरेशन सिंदूर*, जो मई 2025 में हुआ। इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान और PoK में मौजूद *9 आतंकी ठिकानों पर मिसाइल हमले* किए। यह कार्रवाई बहुत सफल मानी गई, और इसी से भारत की सैन्य क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा पहचान मिली।
आर्थिक क्षेत्र में भी 2025 भारत के लिए बहुत अच्छा रहा। इस साल भारत *एशिया का दूसरा सबसे बड़ा निवेश वाला देश**
बन गया और चीन को पीछे छोड़ दिया। बढ़ती अर्थव्यवस्था, विदेशी कंपनियों का भारत में आना और सप्लाई चेन का भारत की तरफ झुकना—इन सबने भारत की स्थिति को और मजबूत किया।
कूटनीति और संस्कृति के क्षेत्र में भी भारत का प्रभाव थोड़ा बढ़ा। ज्यादा देशों के साथ मीटिंग, बढ़ता पर्यटन और एयर कनेक्टिविटी में सुधार से भारत की पहचान और मजबूत हुई।
हालाँकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत के बढ़ते असर के बावजूद *भारत और चीन की शक्ति का फर्क और बढ़ गया है*, क्योंकि चीन सैन्य और कूटनीतिक ताकत में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
जब भी ऐसा कुछ होता है तो पहली फीलिंग थोड़ी महानता की आती है कि हमारे देश ने ये उपलब्धि ली लेकिन साथ में ही आचार्य जी की कही कुछ बातें याद आती है कि
"भारत महान है अगर जो अपने आप को भारतवासी कहता हो, वो सच की ही तरफ़ खड़ा होता है चाहे जो कीमत देनी पड़े, झूठ की तरफ़ नहीं।"
"धर्म का पालना रहा है भारत, और विज्ञान का और गणित का और संगीत का भी पालना रहा है भारत, इसीलिए भारत महान था, उन लोगों की बदौलत महान था।' आज भी वैसे लोग चाहिए, वैसे लोग होगें तो भारत महान होगा, नहीं तो नहीं होगा। फिर ये तो कह लोगे कि इतिहास में पहले भारत महान था, लेकिन ये नहीं कह पाओगे कि भारत आज भी महान है। आज भारत को महान बनाना है तो अपने भीतर लोहा पैदा करो और सच की तरफ़ निष्ठा पैदा करो।"
मिल्ट्री सुपरपावर तो हम बन जाएंगे, लेकिन अध्यात्म क्षेत्र की सुपरपावर बनना उससे भी ज़्यादा जरूरी है आज भारत को।
Source:
https://www.indiatoday.in/diu/story/india-surpasses-japan-3rd-spot-asia-power-index-potential-superpower-2605694-2024-09-24
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India Today
India surpasses Japan to get 3rd spot in Asia Power Index, ample potential to become superpower
The Asia Power Index measures resources and influence to rank the “relative power of states in Asia”.
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📰UNICEF की State of the World’s Children 2025 रिपोर्ट के अनुसार भारत के 20.6 करोड़ बच्चे आज भी शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, पानी, स्वच्छता या सुरक्षित आवास जैसी किसी न किसी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं।
इनमें से 6.2 करोड़ बच्चे दो या उससे अधिक गंभीर अभाव झेल रहे हैं। NFHS-5 बताता है कि 35.5% बच्चे स्टंटेड और 19.3% अंडरवेट हैं।
ASER 2023 के अनुसार ग्रामीण इलाकों में 3–6 वर्ष के लगभग 40% बच्चे प्री-स्कूल/आंगनवाड़ी से बाहर हैं।
शहरी झुग्गियों में कुपोषण, प्रदूषण, असुरक्षित आवास और टूटी शिक्षा एक साथ मौजूद है। 2025–26 के बजट में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का हिस्सा घटकर 0.5% रह गया है।
👉 सवाल फिर वही है: जब अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, तो बच्चों की ज़िंदगी क्यों नहीं सुधर रही?
आचार्य जी इस विरोधाभास पर सीधा प्रश्न उठाते हैं कि
एक ही देश में कुछ बच्चे ज़रूरत से ज़्यादा खाकर बीमार हों और कुछ को दिन में एक बार खाना भी न मिले- यह कैसी तरक्की है?
क्योंकि हमें “तरक्की” का एक झूठा नैरेटिव थमा दिया गया है- औसत आय बढ़ रही है, स्टॉक मार्केट ऊपर जा रहा है, इसलिए हम मान लेते हैं कि सब ठीक है।
आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि औसत एक भ्रामक आंकड़ा है:
अगर 100 लोगों में से सिर्फ 3 बहुत अमीर हो जाएँ और 97 वहीं के वहीं रहें, तो भी औसत बढ़ जाएगा- लेकिन देश की हालत नहीं सुधरेगी।
आज हम गर्व से कहते हैं कि 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है, लेकिन यह नहीं पूछते कि
आख़िर 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? यह तरक्की का नहीं, व्यवस्था के गहरे असंतुलन का संकेत है।
आचार्य जी बार-बार कहते हैं कि तीन चीज़ें कभी कुछ हाथों में केंद्रित नहीं होनी चाहिए:
▪️धन
▪️सत्ता
▪️धर्म
जब धन चंद हाथों में चला जाता है, तो प्लूटोक्रेसी (अमीरों का शासन) बनती है।
जब सत्ता सिमटती है, तो समाज का संतुलन टूटता है। और जब धर्म कुछ लोगों के कब्ज़े में चला जाता है, तो वह सवाल करना नहीं, बस सिर झुकाना सिखाता है। आज हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह हो गई है कि हमने जिज्ञासा छोड़ दी है। हम सवाल नहीं पूछते, बस मान लेते हैं। और जहाँ सवाल मर जाते हैं, वहाँ बच्चों की भूख भी हमें विचलित नहीं करती।
अगर सबसे नीचे खड़ा बच्चा ऊपर नहीं उठ रहा, तो सारी ऊँची इमारतें और तेज़ होते बाज़ार खोखले हैं।
🌾बाल-गरीबी सिर्फ पेट की नहीं, चेतना की समस्या है।
जब तक हम विकास को सिर्फ आँकड़ों में मापते रहेंगे, तब तक बच्चों की थाली खाली ही रहेगी।
और जब हम भीतर से प्रश्न करना सीख लेंगे- तभी समाज सच में बदलना शुरू करेगा।
“आपकी असली ताक़त आपकी जिज्ञासा है।” – Acharya Prashant
source link: https://www.nextias.com/ca/editorial-analysis/01-12-2025/india-children-deprivation-problem#:~:text=India's%20Child%20Poverty%20Challenge,nutrition%2C%20sanitation%2C%20and%20water
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इनमें से 6.2 करोड़ बच्चे दो या उससे अधिक गंभीर अभाव झेल रहे हैं। NFHS-5 बताता है कि 35.5% बच्चे स्टंटेड और 19.3% अंडरवेट हैं।
ASER 2023 के अनुसार ग्रामीण इलाकों में 3–6 वर्ष के लगभग 40% बच्चे प्री-स्कूल/आंगनवाड़ी से बाहर हैं।
शहरी झुग्गियों में कुपोषण, प्रदूषण, असुरक्षित आवास और टूटी शिक्षा एक साथ मौजूद है। 2025–26 के बजट में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का हिस्सा घटकर 0.5% रह गया है।
👉 सवाल फिर वही है: जब अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, तो बच्चों की ज़िंदगी क्यों नहीं सुधर रही?
आचार्य जी इस विरोधाभास पर सीधा प्रश्न उठाते हैं कि
एक ही देश में कुछ बच्चे ज़रूरत से ज़्यादा खाकर बीमार हों और कुछ को दिन में एक बार खाना भी न मिले- यह कैसी तरक्की है?
क्योंकि हमें “तरक्की” का एक झूठा नैरेटिव थमा दिया गया है- औसत आय बढ़ रही है, स्टॉक मार्केट ऊपर जा रहा है, इसलिए हम मान लेते हैं कि सब ठीक है।
आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि औसत एक भ्रामक आंकड़ा है:
अगर 100 लोगों में से सिर्फ 3 बहुत अमीर हो जाएँ और 97 वहीं के वहीं रहें, तो भी औसत बढ़ जाएगा- लेकिन देश की हालत नहीं सुधरेगी।
आज हम गर्व से कहते हैं कि 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है, लेकिन यह नहीं पूछते कि
आख़िर 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? यह तरक्की का नहीं, व्यवस्था के गहरे असंतुलन का संकेत है।
आचार्य जी बार-बार कहते हैं कि तीन चीज़ें कभी कुछ हाथों में केंद्रित नहीं होनी चाहिए:
▪️धन
▪️सत्ता
▪️धर्म
जब धन चंद हाथों में चला जाता है, तो प्लूटोक्रेसी (अमीरों का शासन) बनती है।
जब सत्ता सिमटती है, तो समाज का संतुलन टूटता है। और जब धर्म कुछ लोगों के कब्ज़े में चला जाता है, तो वह सवाल करना नहीं, बस सिर झुकाना सिखाता है। आज हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह हो गई है कि हमने जिज्ञासा छोड़ दी है। हम सवाल नहीं पूछते, बस मान लेते हैं। और जहाँ सवाल मर जाते हैं, वहाँ बच्चों की भूख भी हमें विचलित नहीं करती।
अगर सबसे नीचे खड़ा बच्चा ऊपर नहीं उठ रहा, तो सारी ऊँची इमारतें और तेज़ होते बाज़ार खोखले हैं।
🌾बाल-गरीबी सिर्फ पेट की नहीं, चेतना की समस्या है।
जब तक हम विकास को सिर्फ आँकड़ों में मापते रहेंगे, तब तक बच्चों की थाली खाली ही रहेगी।
और जब हम भीतर से प्रश्न करना सीख लेंगे- तभी समाज सच में बदलना शुरू करेगा।
“आपकी असली ताक़त आपकी जिज्ञासा है।” – Acharya Prashant
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Current Affairs - NEXT IAS
Deprivation Problem of India’s Children: Urgent & Systematic Reforms - Current Affairs
According to the ‘State of the World’s Children (SWOC) 2025’ report by UNICEF, developing nations such as India face extreme child poverty and multidimensional child deprivation.
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✨ अंतरराष्ट्रीय दासता उन्मूलन दिवस ✨
2 दिसंबर को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय दासता उन्मूलन दिवस मनाती है।
यह दिन याद दिलाता है कि दासता सिर्फ इतिहास की एक घटना नहीं,
बल्कि आज भी दुनिया के करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में
‘आधुनिक गुलामी (Modern Slavery)’ का सामना कर रहे हैं
जैसे मानव तस्करी, जबरन मज़दूरी, घरेलू दासता, बाल श्रम, जबरन विवाह, यौन शोषण, ऋण-बांधक दासता आदि।
यह दिन संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा 2 दिसंबर 1949 को स्वीकृत
“ट्रैफ़िकिंग इन पर्सन्स एंड एक्सप्लॉइटेशन ऑफ़ अदर्स कन्वेंशन”
की याद में मनाया जाता है।
🌍 वैश्विक स्तर पर चौंकाने वाले तथ्य
📌 5 करोड़ (50 million+) लोग आधुनिक दासता में फंसे हुए हैं।
📌 इनमें से 2.7 करोड़ (27 million) ज़बरन मज़दूरी कर रहे हैं।
📌 2.2 करोड़ (22 million+) महिलाएँ–बच्चियाँ जबरन विवाह का शिकार हैं।
📌 हर 4 में से 1 पीड़ित बच्चा है।
📌 सबसे ज्यादा मामले एशिया और अफ्रीका में दर्ज होते हैं।
🇮🇳 भारत के प्रमुख आंकड़े
📍 भारत में करीब 80–90 लाख लोग किसी न किसी रूप में आधुनिक दासता का सामना करते हैं।
📍 लगभग 10–12 लाख बच्चे बाल श्रम में लगे हुए पाए जाते हैं।
📍 हर साल 2–3 लाख लोग तस्करी के मामलों में फँसते हैं (बहुत से केस रिपोर्ट नहीं होते)।
🧠 आंतरिक गुलामी
यह सब गुलामी है ही इसलिए क्योंकि हम सब अपनी वृतियों के ग़ुलाम हैं,
क्योंकि भीतरी अज्ञान की इतनी गहरी गुलामी है कि नहीं जानते कि बाहर भी क्यों करनी है ग़ुलामी।
हमारी सारी दौड़-धूप है ही इसलिए कि उस अंतिम गुलामी से आज़ाद हो जाए।
अन्दरूनी फ़ितरत कुछ ऐसी है हमारी कि हम बर्दाश्त नहीं कर सकते बन्धनों में रहना।
उस बन्धन को लाख जायज़ ठहरा लें, बुद्धि से उसको सार्थक प्रमाणित कर दें,
लेकिन बुद्धि से भी गहरा जो आपमें है, वो कभी राज़ी नहीं होने वाला।
🔗 गुलामी की राह
गुलामी की राह पर चलकर कोई आज़ादी तक नहीं पहुँचता।
गुलामी की राह कभी खत्म नहीं होती,
उस पर एक के बाद एक मुकाम आते रहते हैं और
वो सारे मुकाम गुलामी के ही होते हैं।
हमारा निर्णय है गुलामी,
और वो निर्णय हमें बार-बार करना पड़ता है,
क्योंकि वास्तव में वो निर्णय है स्वभाव विरुद्ध।
💡 ज़िन्दगी लगातार आपको सन्देश दे रही होती है
अपने निर्णय को पलट दो।
लेकिन हम पूरे दम के साथ बार-बार वो निर्णय लेते हैं।
💫 आचार्य जी कहते हैं :
" जिस दिन आपने मान लिया कि आप गुलाम हो, जिस दिन आप अपनी गुलामी की तह तक पहुँच गए बिल्कुल, जिस दिन आपने अपने गुलामी के तल को भी बिलकुल खरोंच-खरोंचकर देख लिया, उस दिन आज़ादी है।"
हम उम्मीद में हैं, आज़ादी की उम्मीद ही गुलामी है।
जो कुछ भी हम प्रयत्न करके बढ़ा रहे हैं, बना रहे हैं, संजो रहे हैं
वो हम जिसकी उम्मीद में कर रहे हैं,
हम निरन्तर उसको गवाएँ जा रहे हैं।
Source- https://www.un.org/en/observances/slavery-abolition-day#:~:text=The%20International%20Day%20for%20the%20Abolition%20of,of%20children%20for%20use%20in%20armed%20conflict
#AcharyaPrashant #CurrentAffairs #History #WomenEmpowerment
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2 दिसंबर को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय दासता उन्मूलन दिवस मनाती है।
यह दिन याद दिलाता है कि दासता सिर्फ इतिहास की एक घटना नहीं,
बल्कि आज भी दुनिया के करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में
‘आधुनिक गुलामी (Modern Slavery)’ का सामना कर रहे हैं
जैसे मानव तस्करी, जबरन मज़दूरी, घरेलू दासता, बाल श्रम, जबरन विवाह, यौन शोषण, ऋण-बांधक दासता आदि।
यह दिन संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा 2 दिसंबर 1949 को स्वीकृत
“ट्रैफ़िकिंग इन पर्सन्स एंड एक्सप्लॉइटेशन ऑफ़ अदर्स कन्वेंशन”
की याद में मनाया जाता है।
🌍 वैश्विक स्तर पर चौंकाने वाले तथ्य
📌 5 करोड़ (50 million+) लोग आधुनिक दासता में फंसे हुए हैं।
📌 इनमें से 2.7 करोड़ (27 million) ज़बरन मज़दूरी कर रहे हैं।
📌 2.2 करोड़ (22 million+) महिलाएँ–बच्चियाँ जबरन विवाह का शिकार हैं।
📌 हर 4 में से 1 पीड़ित बच्चा है।
📌 सबसे ज्यादा मामले एशिया और अफ्रीका में दर्ज होते हैं।
🇮🇳 भारत के प्रमुख आंकड़े
📍 भारत में करीब 80–90 लाख लोग किसी न किसी रूप में आधुनिक दासता का सामना करते हैं।
📍 लगभग 10–12 लाख बच्चे बाल श्रम में लगे हुए पाए जाते हैं।
📍 हर साल 2–3 लाख लोग तस्करी के मामलों में फँसते हैं (बहुत से केस रिपोर्ट नहीं होते)।
🧠 आंतरिक गुलामी
यह सब गुलामी है ही इसलिए क्योंकि हम सब अपनी वृतियों के ग़ुलाम हैं,
क्योंकि भीतरी अज्ञान की इतनी गहरी गुलामी है कि नहीं जानते कि बाहर भी क्यों करनी है ग़ुलामी।
हमारी सारी दौड़-धूप है ही इसलिए कि उस अंतिम गुलामी से आज़ाद हो जाए।
अन्दरूनी फ़ितरत कुछ ऐसी है हमारी कि हम बर्दाश्त नहीं कर सकते बन्धनों में रहना।
उस बन्धन को लाख जायज़ ठहरा लें, बुद्धि से उसको सार्थक प्रमाणित कर दें,
लेकिन बुद्धि से भी गहरा जो आपमें है, वो कभी राज़ी नहीं होने वाला।
🔗 गुलामी की राह
गुलामी की राह पर चलकर कोई आज़ादी तक नहीं पहुँचता।
गुलामी की राह कभी खत्म नहीं होती,
उस पर एक के बाद एक मुकाम आते रहते हैं और
वो सारे मुकाम गुलामी के ही होते हैं।
हमारा निर्णय है गुलामी,
और वो निर्णय हमें बार-बार करना पड़ता है,
क्योंकि वास्तव में वो निर्णय है स्वभाव विरुद्ध।
💡 ज़िन्दगी लगातार आपको सन्देश दे रही होती है
अपने निर्णय को पलट दो।
लेकिन हम पूरे दम के साथ बार-बार वो निर्णय लेते हैं।
💫 आचार्य जी कहते हैं :
" जिस दिन आपने मान लिया कि आप गुलाम हो, जिस दिन आप अपनी गुलामी की तह तक पहुँच गए बिल्कुल, जिस दिन आपने अपने गुलामी के तल को भी बिलकुल खरोंच-खरोंचकर देख लिया, उस दिन आज़ादी है।"
हम उम्मीद में हैं, आज़ादी की उम्मीद ही गुलामी है।
जो कुछ भी हम प्रयत्न करके बढ़ा रहे हैं, बना रहे हैं, संजो रहे हैं
वो हम जिसकी उम्मीद में कर रहे हैं,
हम निरन्तर उसको गवाएँ जा रहे हैं।
Source- https://www.un.org/en/observances/slavery-abolition-day#:~:text=The%20International%20Day%20for%20the%20Abolition%20of,of%20children%20for%20use%20in%20armed%20conflict
#AcharyaPrashant #CurrentAffairs #History #WomenEmpowerment
Posted by Akash Pawar on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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United Nations
International Day for the Abolition of Slavery | United Nations
The International Day for the Abolition of Slavery focuses on eradicating contemporary forms of slavery, such as trafficking in persons, sexual exploitation, the worst forms of child labour, forced marriage, and the forced recruitment of children for use…
❤4
*150 वर्ष बाद भी प्रश्न वही: गीत की पंक्तियाँ या राष्ट्र की चेतना?*
2025 में वंदे मातरम् अपने 150वें वर्ष में है, इसी अवसर पर हाल-ही में यह विवाद फिर उभरा है कि इसके कुछ “मिसिंग स्टैंज़ा” (छंद / पंक्तियाँ) हटाए गए थे।
मूल रूप से लिखा गया गीत बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने 1870–80 के दशक में लिखी थी, और यह गीत स्वतंत्रता संग्राम में विशेष भूमिका निभा चुका है।
विवाद यह है कि 1937 में Indian National Congress (INC) की एक बैठक में, कथित सांप्रदायिक विरोध और “धार्मिक संवेदनशीलता” के कारण कुछ पंक्तियाँ, जिनमें देवी-स्तुति थी, गीत से हटा दी गई थीं।
अब सरकार इस omission (छंटाई) को इतिहास की “दोहरी भूल” बता रही है, उनका कहना है कि इससे वन्दे मातरम् के मूल भाव और उसकी सांस्कृतिक–ऐतिहासिक महत्ता कम हो गई।
इस बहस के बीच, संसद में 8–9 दिसंबर 2025 के लिए एक विशेष चर्चा निर्धारित है, जहाँ वन्दे मातरम् की पुरानी पंक्तियों, उसकी प्रासंगिकता व राष्ट्र-चेतना पर बहस होगी।
👉 कुल मिलाकर यही देखा जा रहा है, वन्दे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं; यह Indian freedom struggle की भावना, हमारा सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहर, और राष्ट्रीय-चेतना का प्रतीक रहा है। इसलिए इसके “मिसिंग स्टैंज़ा” को लेकर विवाद, सिर्फ साहित्यात्मक नहीं, बल्कि पहचान, इतिहास और मनोभाव का संघर्ष है।
✨ हम गीत, शब्द, प्रतीक तक सीमित हो जाते हैं; पर प्रश्न यह है: क्या हमारी चेतना ही गायब नहीं हो गयी है? जब हम हम खुद को, अपने कर्मों के स्रोत को नहीं जानते हैं, तब बाहरी गीत-संवाद, प्रतीक-वाद किसी काम नहीं आता। वन्दे मातरम् को फिर से सुनने, चर्चा करने, बहस करने की ज़रूरत इसलिए नहीं कि यह एक गीत है, बल्कि इसलिए कि वह उस जागृति का प्रतीक है जिसे हमें जीना है।
आचार्य जी समझाते हैं कि असली गौरव, वह नहीं जो तख़्त-ताज, शिखर-सम्मान या भाषायी प्रदर्शन से बनता हो, बल्कि वह है जो मनुष्य के सार्थक संघर्ष का परिणाम हो। यदि हम गीत-छंदों में सच्चाई तलाशेंगे, पर अपने भीतर सच्चाई से विमुख रहेंगे, तो वह गीत सिर्फ़ काग़ज़ या माइक तक सीमित रहेगा। और यदि हम अपने जीवन में सहिष्णुता, समझ, करुणा, और एकता जगाएँ, तब गीत नहीं, जीवन संकल्प बनेगा। इस बहस का असली केंद्र वही है, कि हम कितना जागरूक, कितना सचेत और कितना मानव हैं।
Source
https://timesofindia.indiatimes.com/india/150-years-of-vande-mataram-why-bjp-and-congress-are-fighting-over-its-missing-stanzasexplained-parliament-lok-sabha-debate/articleshow/125813886.cms
#AcharyaPrashant #History #CurrentAffairs #GetInspired
2025 में वंदे मातरम् अपने 150वें वर्ष में है, इसी अवसर पर हाल-ही में यह विवाद फिर उभरा है कि इसके कुछ “मिसिंग स्टैंज़ा” (छंद / पंक्तियाँ) हटाए गए थे।
मूल रूप से लिखा गया गीत बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने 1870–80 के दशक में लिखी थी, और यह गीत स्वतंत्रता संग्राम में विशेष भूमिका निभा चुका है।
विवाद यह है कि 1937 में Indian National Congress (INC) की एक बैठक में, कथित सांप्रदायिक विरोध और “धार्मिक संवेदनशीलता” के कारण कुछ पंक्तियाँ, जिनमें देवी-स्तुति थी, गीत से हटा दी गई थीं।
अब सरकार इस omission (छंटाई) को इतिहास की “दोहरी भूल” बता रही है, उनका कहना है कि इससे वन्दे मातरम् के मूल भाव और उसकी सांस्कृतिक–ऐतिहासिक महत्ता कम हो गई।
इस बहस के बीच, संसद में 8–9 दिसंबर 2025 के लिए एक विशेष चर्चा निर्धारित है, जहाँ वन्दे मातरम् की पुरानी पंक्तियों, उसकी प्रासंगिकता व राष्ट्र-चेतना पर बहस होगी।
👉 कुल मिलाकर यही देखा जा रहा है, वन्दे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं; यह Indian freedom struggle की भावना, हमारा सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहर, और राष्ट्रीय-चेतना का प्रतीक रहा है। इसलिए इसके “मिसिंग स्टैंज़ा” को लेकर विवाद, सिर्फ साहित्यात्मक नहीं, बल्कि पहचान, इतिहास और मनोभाव का संघर्ष है।
✨ हम गीत, शब्द, प्रतीक तक सीमित हो जाते हैं; पर प्रश्न यह है: क्या हमारी चेतना ही गायब नहीं हो गयी है? जब हम हम खुद को, अपने कर्मों के स्रोत को नहीं जानते हैं, तब बाहरी गीत-संवाद, प्रतीक-वाद किसी काम नहीं आता। वन्दे मातरम् को फिर से सुनने, चर्चा करने, बहस करने की ज़रूरत इसलिए नहीं कि यह एक गीत है, बल्कि इसलिए कि वह उस जागृति का प्रतीक है जिसे हमें जीना है।
आचार्य जी समझाते हैं कि असली गौरव, वह नहीं जो तख़्त-ताज, शिखर-सम्मान या भाषायी प्रदर्शन से बनता हो, बल्कि वह है जो मनुष्य के सार्थक संघर्ष का परिणाम हो। यदि हम गीत-छंदों में सच्चाई तलाशेंगे, पर अपने भीतर सच्चाई से विमुख रहेंगे, तो वह गीत सिर्फ़ काग़ज़ या माइक तक सीमित रहेगा। और यदि हम अपने जीवन में सहिष्णुता, समझ, करुणा, और एकता जगाएँ, तब गीत नहीं, जीवन संकल्प बनेगा। इस बहस का असली केंद्र वही है, कि हम कितना जागरूक, कितना सचेत और कितना मानव हैं।
Source
https://timesofindia.indiatimes.com/india/150-years-of-vande-mataram-why-bjp-and-congress-are-fighting-over-its-missing-stanzasexplained-parliament-lok-sabha-debate/articleshow/125813886.cms
#AcharyaPrashant #History #CurrentAffairs #GetInspired
The Times of India
150 years of Vande Mataram: Why BJP and Congress are fighting over its ‘missing stanzas’ — explained | India News - The Times of…
India News: Parliament will begin a special discussion in the Lok Sabha on Monday to commemorate 150 years of Vande Mataram, a song that remains one of the most d.
❤3👏1
📊 *विश्व असमानता रिपोर्ट 2026*
(World Inequality Report 2026)
🌍 दुनिया अमीर हो रही है, लेकिन सबके लिए नहीं।
विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 एक कड़वी सच्चाई सामने लाती है
> दुनिया की आधी आबादी जितना भी नहीं, उससे तीन गुना ज़्यादा संपत्ति सिर्फ 0.001% लोगों के पास है।
🔴 रिपोर्ट के चौंकाने वाले तथ्य
🔹 दुनिया के शीर्ष 10% लोगों के पास
➡️ लगभग 75% वैश्विक संपत्ति
🔹 नीचे के 50% लोगों के पास
➡️ केवल 2% संपत्ति
🔹 सबसे अमीर 0.001% लोग (करीब 60 हजार लोग)
➡️ दुनिया की आधी आबादी से 3 गुना अधिक अमीर
🇮🇳 भारत की स्थिति (रिपोर्ट के अनुसार)
🔸 भारत में शीर्ष 1% लोगों के पास
➡️ लगभग 40% राष्ट्रीय संपत्ति
🔸 शीर्ष 10% लोग
➡️ 58% राष्ट्रीय आय पर कब्ज़ा
🔸 नीचे के 50% लोग
➡️ सिर्फ 15% आय पर निर्भर
📉 मध्यम वर्ग सिकुड़ रहा है,
📈 अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ रही है
♀️ लैंगिक असमानता
👩 महिलाओं की औसत आय
➡️ पुरुषों की तुलना में काफी कम
⏳ अवैतनिक घरेलू काम जोड़ने पर
➡️ महिलाओं की वास्तविक कमाई और घट जाती है
🌱 पर्यावरणीय असमानता
🌍 सबसे अमीर 10% लोग
➡️ 77% कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार
👥 गरीब 50% लोग
➡️ सिर्फ 3% उत्सर्जन
➡️ प्रदूषण अमीर फैलाते हैं,
➡️ नुकसान गरीब झेलते हैं।
❗ यह रिपोर्ट क्यों ज़रूरी है?
✔️ यह बताती है कि असमानता सिर्फ पैसा नहीं है
✔️ यह अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण से भी जुड़ी है
✔️ यह सवाल खड़ा करती है —
क्या विकास सिर्फ अमीरों के लिए है?
🛑 समाधान क्या हो सकते हैं? (रिपोर्ट के सुझाव)
✔️ अमीरों पर प्रगतिशील कर (Wealth Tax)
✔️ शिक्षा और स्वास्थ्य में सार्वजनिक निवेश
✔️ महिलाओं के लिए समान वेतन और अवसर
✔️ पर्यावरणीय जिम्मेदारी
✊ निष्कर्ष
> असमानता कोई प्राकृतिक व्यवस्था नहीं,
यह नीतियों का परिणाम है।
और नीतियाँ बदली जा सकती हैं।
आज की दुनिया प्रगति की बात करती है,
पर विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 हमें आईना दिखाती है —
जहाँ कुछ हाथों में अपार धन है
और बहुसंख्यक के जीवन में अभाव।
श्रीमद्भगवद्गीता हमें सिखाती है —
> “यावदर्थ उपयुञ्जीत तावत्स्वं देहपोषणम्”
(गीता 3.12 का भावार्थ)
मनुष्य उतना ही ग्रहण करे जितना आवश्यक हो।
आज की समस्या यह नहीं कि संसाधन कम हैं,
समस्या यह है कि लालसा असीम हो गई है।
🌍 असमानता और अहंकार
गीता कहती है —
> “त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं”
काम, क्रोध और लोभ — ये विनाश के द्वार हैं।
जब समाज में
लोभ नीति बन जाए,
और संग्रह शक्ति का प्रतीक बन जाए,
तो असमानता जन्म लेती है।
#AcharyaPrashant #CurrentAffairs #WomenEmpowerment #ClimateChange #Operation2030 #IndianPhilosophy
(World Inequality Report 2026)
🌍 दुनिया अमीर हो रही है, लेकिन सबके लिए नहीं।
विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 एक कड़वी सच्चाई सामने लाती है
> दुनिया की आधी आबादी जितना भी नहीं, उससे तीन गुना ज़्यादा संपत्ति सिर्फ 0.001% लोगों के पास है।
🔴 रिपोर्ट के चौंकाने वाले तथ्य
🔹 दुनिया के शीर्ष 10% लोगों के पास
➡️ लगभग 75% वैश्विक संपत्ति
🔹 नीचे के 50% लोगों के पास
➡️ केवल 2% संपत्ति
🔹 सबसे अमीर 0.001% लोग (करीब 60 हजार लोग)
➡️ दुनिया की आधी आबादी से 3 गुना अधिक अमीर
🇮🇳 भारत की स्थिति (रिपोर्ट के अनुसार)
🔸 भारत में शीर्ष 1% लोगों के पास
➡️ लगभग 40% राष्ट्रीय संपत्ति
🔸 शीर्ष 10% लोग
➡️ 58% राष्ट्रीय आय पर कब्ज़ा
🔸 नीचे के 50% लोग
➡️ सिर्फ 15% आय पर निर्भर
📉 मध्यम वर्ग सिकुड़ रहा है,
📈 अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ रही है
♀️ लैंगिक असमानता
👩 महिलाओं की औसत आय
➡️ पुरुषों की तुलना में काफी कम
⏳ अवैतनिक घरेलू काम जोड़ने पर
➡️ महिलाओं की वास्तविक कमाई और घट जाती है
🌱 पर्यावरणीय असमानता
🌍 सबसे अमीर 10% लोग
➡️ 77% कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार
👥 गरीब 50% लोग
➡️ सिर्फ 3% उत्सर्जन
➡️ प्रदूषण अमीर फैलाते हैं,
➡️ नुकसान गरीब झेलते हैं।
❗ यह रिपोर्ट क्यों ज़रूरी है?
✔️ यह बताती है कि असमानता सिर्फ पैसा नहीं है
✔️ यह अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण से भी जुड़ी है
✔️ यह सवाल खड़ा करती है —
क्या विकास सिर्फ अमीरों के लिए है?
🛑 समाधान क्या हो सकते हैं? (रिपोर्ट के सुझाव)
✔️ अमीरों पर प्रगतिशील कर (Wealth Tax)
✔️ शिक्षा और स्वास्थ्य में सार्वजनिक निवेश
✔️ महिलाओं के लिए समान वेतन और अवसर
✔️ पर्यावरणीय जिम्मेदारी
✊ निष्कर्ष
> असमानता कोई प्राकृतिक व्यवस्था नहीं,
यह नीतियों का परिणाम है।
और नीतियाँ बदली जा सकती हैं।
आज की दुनिया प्रगति की बात करती है,
पर विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 हमें आईना दिखाती है —
जहाँ कुछ हाथों में अपार धन है
और बहुसंख्यक के जीवन में अभाव।
श्रीमद्भगवद्गीता हमें सिखाती है —
> “यावदर्थ उपयुञ्जीत तावत्स्वं देहपोषणम्”
(गीता 3.12 का भावार्थ)
मनुष्य उतना ही ग्रहण करे जितना आवश्यक हो।
आज की समस्या यह नहीं कि संसाधन कम हैं,
समस्या यह है कि लालसा असीम हो गई है।
🌍 असमानता और अहंकार
गीता कहती है —
> “त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं”
काम, क्रोध और लोभ — ये विनाश के द्वार हैं।
जब समाज में
लोभ नीति बन जाए,
और संग्रह शक्ति का प्रतीक बन जाए,
तो असमानता जन्म लेती है।
#AcharyaPrashant #CurrentAffairs #WomenEmpowerment #ClimateChange #Operation2030 #IndianPhilosophy
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💯2
🔔 न्यू स्टार्ट संधि समाप्त: दुनिया को बड़ा खतरा! 🌍🚨
📌 New START (Strategic Arms Reduction Treaty) — अमेरिका और रूस के बीच आख़िरी परमाणु हथियार नियंत्रण समझौता — 5 फ़रवरी 2026 को समाप्त हो गया। अब इन दोनों देशों के बीच कोई बाध्यकारी परमाणु सीमाएँ नहीं बचीं।
📌 संक्षिप्त में क्या था न्यू स्टार्ट?
📍 यह संधि 2010 में हस्ताक्षरित हुई थी और 1,550 रणनीतिक परमाणु वारहेड तथा 700 मिसाइल/डिलीवरी सिस्टम तक सीमाएँ तय करती थी।
📍 साथ ही डेटा साझा करना, सूचना देना और साइट निरीक्षण जैसी पारदर्शिता व्यवस्था भी थी।
⚠️ अब क्या बदल गया?
🔻 5 फ़रवरी 2026 से यह संधि अधिकारिक रूप से समाप्त हो गई और अब अमेरिका-रूस के बीच कोई बाध्यकारी परमाणु नियंत्रण नहीं बचा।
🔻 इससे जुड़े पारदर्शिता और भरोसे के तंत्र भी अब खत्म हो चुके हैं।
🌍 विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
💥 संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इसे “गंभीर और खतरनाक क्षण” बताया, क्योंकि अब विश्व के सबसे बड़े परमाणु हथियार रखने वाले देशों पर कोई कानूनी सीमा नहीं है।
📈 कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे एक नई परमाणु हथियार दौड़ तेज़ हो सकती है, क्योंकि अब दोनों देश बिना सीमा के अपने हथियार बढ़ा सकते हैं।
💡 क्यों यह खबर हमारी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है?
⭐ यह इतिहास में पहली बार है जब अमेरिका-रूस में कोई परमाणु नियंत्रण संधि लागू नहीं है।
⭐ इससे वैश्विक तनाव, अनिश्चितता और युद्ध की सम्भावनाएँ बढ़ सकती हैं।
⭐ इसके बावजूद नेतागण नई संधि या बातचीत की जरूरत पर जोर दे रहे हैं, ताकि शांति और विश्वास बनाए रखा जा सके।
📣 सारांश:
🔹 न्यू स्टार्ट संधि अब खत्म हो गई है।
🔹 अब अमेरिका-रूस के बीच किसी भी तरह की परमाणु सीमा या निगरानी नहीं है।
🔹 इससे वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ सकता है।
🔹 दुनिया भर के नेताओं को नई शांति संधियों की आवश्यकता है।
source = https://www.icanw.org/new_start_expiration
#AcharyaPrashant #CurrentAffairs #History
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📌 New START (Strategic Arms Reduction Treaty) — अमेरिका और रूस के बीच आख़िरी परमाणु हथियार नियंत्रण समझौता — 5 फ़रवरी 2026 को समाप्त हो गया। अब इन दोनों देशों के बीच कोई बाध्यकारी परमाणु सीमाएँ नहीं बचीं।
📌 संक्षिप्त में क्या था न्यू स्टार्ट?
📍 यह संधि 2010 में हस्ताक्षरित हुई थी और 1,550 रणनीतिक परमाणु वारहेड तथा 700 मिसाइल/डिलीवरी सिस्टम तक सीमाएँ तय करती थी।
📍 साथ ही डेटा साझा करना, सूचना देना और साइट निरीक्षण जैसी पारदर्शिता व्यवस्था भी थी।
⚠️ अब क्या बदल गया?
🔻 5 फ़रवरी 2026 से यह संधि अधिकारिक रूप से समाप्त हो गई और अब अमेरिका-रूस के बीच कोई बाध्यकारी परमाणु नियंत्रण नहीं बचा।
🔻 इससे जुड़े पारदर्शिता और भरोसे के तंत्र भी अब खत्म हो चुके हैं।
🌍 विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
💥 संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इसे “गंभीर और खतरनाक क्षण” बताया, क्योंकि अब विश्व के सबसे बड़े परमाणु हथियार रखने वाले देशों पर कोई कानूनी सीमा नहीं है।
📈 कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे एक नई परमाणु हथियार दौड़ तेज़ हो सकती है, क्योंकि अब दोनों देश बिना सीमा के अपने हथियार बढ़ा सकते हैं।
💡 क्यों यह खबर हमारी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है?
⭐ यह इतिहास में पहली बार है जब अमेरिका-रूस में कोई परमाणु नियंत्रण संधि लागू नहीं है।
⭐ इससे वैश्विक तनाव, अनिश्चितता और युद्ध की सम्भावनाएँ बढ़ सकती हैं।
⭐ इसके बावजूद नेतागण नई संधि या बातचीत की जरूरत पर जोर दे रहे हैं, ताकि शांति और विश्वास बनाए रखा जा सके।
📣 सारांश:
🔹 न्यू स्टार्ट संधि अब खत्म हो गई है।
🔹 अब अमेरिका-रूस के बीच किसी भी तरह की परमाणु सीमा या निगरानी नहीं है।
🔹 इससे वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ सकता है।
🔹 दुनिया भर के नेताओं को नई शांति संधियों की आवश्यकता है।
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ICAN
The expiration of New START: what it means and what’s next
❤1
🔥 बच्चों के हाथ से फोन छीनने जा रही है सरकार! 🔥
भारत में अब 16 साल से कम उम्र वालों के लिए Facebook, Instagram पर बैन लगने वाला है!
_Economic Times की ताजा खबर के मुताबिक, भारत सरकार जल्द ही कानून ला रही है जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाना या इस्तेमाल करना पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगा।_ अगर बच्चा अकाउंट बनाना भी चाहे, तो माता-पिता की लिखित सहमति और पहचान पत्र जरूरी होंगे।
🌎 🔞 दुनिया के कई देश (ऑस्ट्रेलिया, फ्लोरिडा, यूरोपीय यूनियन) पहले ही ऐसा कर चुके हैं।*भारत यह कदम इसलिए उठा रहा है क्योंकि बच्चों में डिप्रेशन, एंग्जायटी, नींद की कमी, साइबर बुलिंग और अडिक्शन की समस्या बहुत तेजी से बढ़ रही है।_एक स्टडी कहती है कि 13-15 साल की उम्र में रोज 3 घंटे से ज्यादा स्क्रॉल करने वाले बच्चों में सुसाइड के विचार 60% तक बढ़ जाते हैं।_
लेकिन सवाल यह है – क्या सिर्फ कानून से फोन छीन लेने से बच्चे का मन बच जाएगा❓
आचार्य जी बिल्कुल साफ कहते हैं: सोशल मीडिया के मामले में कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार नहीं है। शरारत करने वाला चेहराविहीन है, अनाम है। इतने सारे लोग हैं कि आप किसी एक को पकड़ नहीं सकते। इतने सारे लोगों को रेगुलेट नहीं कर सकते, और नीयत के लिए कानून नहीं बना सकते।
तो फिर एकमात्र उपाय है – *व्यक्तिगत जिम्मेदारी।* 💪✅
_वेदांत को मुख्यधारा की शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा। आज इससे बड़ी कोई जरूरत नहीं है कि व्यक्ति को जगाया जाए। यानी कानून बाहर से फोन छीन सकता है, लेकिन भीतर की भूख, भीतर की खालीपन की लत कौन मिटाएगा?_
⚠️🤔🙆 बच्चे को इंस्टाग्राम बंद कर दो,
वो टिकटॉक, यूट्यूब शॉर्ट्स, गेमिंग पर चला जाएगा।
फोन छीन लो, तो वो दोस्त के फोन पर रील्स देखेगा।
बाहरी प्रतिबंध अस्थायी हैं।
जब तक बच्चे के भीतर यह समझ न आए कि
“मुझे लाइक्स से खुशी नहीं चाहिए,
मुझे सच चाहिए, शांति चाहिए, स्वयं को जानना चाहिए”
तब तक कोई भी बैन पूरा नहीं होगा।
इसलिए सरकार का कदम स्वागत योग्य है,
लेकिन असली क्रांति तो घर में, स्कूल में, हमारे भीतर होनी है।
*तुम वो नहीं हो जो स्क्रॉल करते समय लगते हो। तुम उससे कहीं बड़े हो।” तभी सच में फोन उनके हाथ में होगा, और मन उनके हाथ में होगा।* 🪔🔥
#AcharyaPrashant #CurrentAffairs #Parenting #IndianPhilosophy
Posted by Dhuri on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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भारत में अब 16 साल से कम उम्र वालों के लिए Facebook, Instagram पर बैन लगने वाला है!
_Economic Times की ताजा खबर के मुताबिक, भारत सरकार जल्द ही कानून ला रही है जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाना या इस्तेमाल करना पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगा।_ अगर बच्चा अकाउंट बनाना भी चाहे, तो माता-पिता की लिखित सहमति और पहचान पत्र जरूरी होंगे।
🌎 🔞 दुनिया के कई देश (ऑस्ट्रेलिया, फ्लोरिडा, यूरोपीय यूनियन) पहले ही ऐसा कर चुके हैं।*भारत यह कदम इसलिए उठा रहा है क्योंकि बच्चों में डिप्रेशन, एंग्जायटी, नींद की कमी, साइबर बुलिंग और अडिक्शन की समस्या बहुत तेजी से बढ़ रही है।_एक स्टडी कहती है कि 13-15 साल की उम्र में रोज 3 घंटे से ज्यादा स्क्रॉल करने वाले बच्चों में सुसाइड के विचार 60% तक बढ़ जाते हैं।_
लेकिन सवाल यह है – क्या सिर्फ कानून से फोन छीन लेने से बच्चे का मन बच जाएगा❓
आचार्य जी बिल्कुल साफ कहते हैं: सोशल मीडिया के मामले में कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार नहीं है। शरारत करने वाला चेहराविहीन है, अनाम है। इतने सारे लोग हैं कि आप किसी एक को पकड़ नहीं सकते। इतने सारे लोगों को रेगुलेट नहीं कर सकते, और नीयत के लिए कानून नहीं बना सकते।
तो फिर एकमात्र उपाय है – *व्यक्तिगत जिम्मेदारी।* 💪✅
_वेदांत को मुख्यधारा की शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा। आज इससे बड़ी कोई जरूरत नहीं है कि व्यक्ति को जगाया जाए। यानी कानून बाहर से फोन छीन सकता है, लेकिन भीतर की भूख, भीतर की खालीपन की लत कौन मिटाएगा?_
⚠️🤔🙆 बच्चे को इंस्टाग्राम बंद कर दो,
वो टिकटॉक, यूट्यूब शॉर्ट्स, गेमिंग पर चला जाएगा।
फोन छीन लो, तो वो दोस्त के फोन पर रील्स देखेगा।
बाहरी प्रतिबंध अस्थायी हैं।
जब तक बच्चे के भीतर यह समझ न आए कि
“मुझे लाइक्स से खुशी नहीं चाहिए,
मुझे सच चाहिए, शांति चाहिए, स्वयं को जानना चाहिए”
तब तक कोई भी बैन पूरा नहीं होगा।
इसलिए सरकार का कदम स्वागत योग्य है,
लेकिन असली क्रांति तो घर में, स्कूल में, हमारे भीतर होनी है।
*तुम वो नहीं हो जो स्क्रॉल करते समय लगते हो। तुम उससे कहीं बड़े हो।” तभी सच में फोन उनके हाथ में होगा, और मन उनके हाथ में होगा।* 🪔🔥
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केरल की वकील थान्या नाथन सी, देश की पहली दृष्टिबाधित महिला जज बनने जा रही हैं। उनका न्यायाधीश बनना केरल ही नहीं, भारत के न्यायिक इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
हाल ही में आयोजित सिविल जज (जूनियर डिवीजन) परीक्षा में, उन्होंने Benchmark disabilities वाले उम्मीदवारों में प्रथम स्थान हासिल किया।
पूर्ण रूप से दृष्टिबाधित होने के बावजूद, अपने दृढ़ संकल्प और बुद्धिमत्ता से सभी बाधाओं को पार किया है।
24 वर्षीय थान्या ने Kannur University से LLB की पढ़ाई की, जहाँ उन्होंने प्रथम रैंक हासिल की थी। न्यायाधीश बनने से पहले, उन्होंने कन्नूर के तालीपरंबा में वकील के.जी. सुनीलकुमार के अधीन एक जूनियर वकील के रूप में अभ्यास शुरू किया था।
अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने Braille script और आधुनिक तकनीक जैसे स्क्रीन-रीडिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया।
वकालत के दौरान वह अपनी दलीलें और नोट्स ब्रेल लिपि में तैयार करती थीं। हालांकि उन्हें लगता है कि पुराने हस्तलिखित दस्तावेजों को पढ़ना एक चुनौती हो सकती है, लेकिन वह इसे तकनीक और अनुभव से सुलझाने के लिए आश्वस्त हैं।
उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने सीनियर्स के प्रोत्साहन और सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को दिया जिसने दिव्यांगों के लिए न्यायपालिका के दरवाजे पूरी तरह से खोल दिए।
थान्या नाथन की यह नियुक्ति केरल की न्यायपालिका के लिए भी एक नई शुरुआत है, क्योंकि अब अदालतों के Infrastructure को दिव्यांगजनों के अनुकूल और सुलभ बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया जाएगा।
यह उपलब्धि केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है।
#AcharyaPrashant #WomenEmpowerment #GetInspired #History #CurrentAffairs
Posted by Hina on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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हाल ही में आयोजित सिविल जज (जूनियर डिवीजन) परीक्षा में, उन्होंने Benchmark disabilities वाले उम्मीदवारों में प्रथम स्थान हासिल किया।
पूर्ण रूप से दृष्टिबाधित होने के बावजूद, अपने दृढ़ संकल्प और बुद्धिमत्ता से सभी बाधाओं को पार किया है।
24 वर्षीय थान्या ने Kannur University से LLB की पढ़ाई की, जहाँ उन्होंने प्रथम रैंक हासिल की थी। न्यायाधीश बनने से पहले, उन्होंने कन्नूर के तालीपरंबा में वकील के.जी. सुनीलकुमार के अधीन एक जूनियर वकील के रूप में अभ्यास शुरू किया था।
अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने Braille script और आधुनिक तकनीक जैसे स्क्रीन-रीडिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया।
वकालत के दौरान वह अपनी दलीलें और नोट्स ब्रेल लिपि में तैयार करती थीं। हालांकि उन्हें लगता है कि पुराने हस्तलिखित दस्तावेजों को पढ़ना एक चुनौती हो सकती है, लेकिन वह इसे तकनीक और अनुभव से सुलझाने के लिए आश्वस्त हैं।
उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने सीनियर्स के प्रोत्साहन और सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को दिया जिसने दिव्यांगों के लिए न्यायपालिका के दरवाजे पूरी तरह से खोल दिए।
थान्या नाथन की यह नियुक्ति केरल की न्यायपालिका के लिए भी एक नई शुरुआत है, क्योंकि अब अदालतों के Infrastructure को दिव्यांगजनों के अनुकूल और सुलभ बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया जाएगा।
यह उपलब्धि केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है।
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Acharya Prashant
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- रिपोर्टों के अनुसार ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की मृत्यु हुई।
- इसके बाद ईरान ने क्षेत्रीय स्तर पर जवाबी हमले किए, जिनमें मिसाइल और ड्रोन हमले विभिन्न देशों में हुए, जैसे:
इज़राइल, इराक, सीरिया, लेबनान, UAE, बहरीन, कुवैत और ओमान।
- अमेरिका और इज़राइल का तर्क रहा है कि ईरान की मिसाइल और परमाणु क्षमताएँ क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा हैं, जबकि ईरान इसे अपनी सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा का उपाय बताता है।
🤔 गौर करने वाली बात यह है कि यह सब शुरू हुआ ईरान में तेल की खोज से, और तेल के ही इर्द-गिर्द कई संघर्ष चलते रहे। जब जड़ से देखें तो पता चलता है कि मामला स्पष्ट रूप से संसाधनों का है और प्रश्न यह है कि उनका अधिपति कौन होगा।
आचार्य जी ने मानव मन और प्रकृति के रिश्ते को समझाते हुए सैकड़ों बार हमें संबोधित किया है। हम समझ पाए हैं कि भले ही मानव को जंगल से निकले लगभग 10,000 वर्ष हो गए हों और उसने औद्योगिक और तकनीकी प्रगति से अपार शक्ति हासिल कर ली हो, पर मानव की गति आज भी पुराने पाशविक कारकों से संचालित होती है, संसाधन संचय, क्षेत्रीय विस्तार और संसाधनों के लिए आपसी संघर्ष।
आज तकनीक और औद्योगिकी के चलते प्रतीत होता है कि यह कोई आधुनिक समस्या है, पर यदि इस समस्या को इतिहास की जड़ तक देखा जाए तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह मूलतः उसी प्रकार का संघर्ष है जहाँ एक पशु जंगल में दूसरे से लड़ता है अपने क्षेत्र के लिए, संसाधन के लिए, प्रजनन के लिए।
इन समस्याओं को देखकर हमें आचार्य जी द्वारा परिचित कराए गए और समझाए गए तमाम वैश्विक दर्शनों की कीमत समझ में आती है कि मानव को वास्तव में दर्शन ही मानव बनाता है। केवल बाहरी वृद्धि यदि दर्शन के बिना हो, तो वह एक सीमा के बाद उपयोगी नहीं, बल्कि घातक अवश्य बनेगी।
स्रोत:
Discovery of oil in Persia (1908) https://www.ebsco.com/research-starters/history/oil-discovered-persia
Sykes-Picot Agreement https://en.wikipedia.org/wiki/Sykes%E2%80%93Picot_Agreement
1953 Iranian coup https://en.wikipedia.org/wiki/1953_Iranian_coup_d%27%C3%A9tat
Iranian Revolution https://en.wikipedia.org/wiki/Iranian_Revolution
Iran-Iraq War https://en.wikipedia.org/wiki/Iran%E2%80%93Iraq_War
Israel vs Iran shadow war https://en.wikipedia.org/wiki/Iran%E2%80%93Israel_proxy_conflict
US withdrawal from nuclear deal (2018) https://en.wikipedia.org/wiki/United_States_withdrawal_from_the_Joint_Comprehensive_Plan_of_Action
Assassination of Qasem Soleimani https://en.wikipedia.org/wiki/Assassination_of_Qasem_Soleimani
Gaza war https://en.wikipedia.org/wiki/Gaza_war
US Attack and Iran's Retaliation https://www.washingtonpost.com/investigations/2026/03/01/where-iran-strikes-middle-east-images-video/?utm_source=chatgpt.com
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Posted by Ambikesh Mishra on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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- इसके बाद ईरान ने क्षेत्रीय स्तर पर जवाबी हमले किए, जिनमें मिसाइल और ड्रोन हमले विभिन्न देशों में हुए, जैसे:
इज़राइल, इराक, सीरिया, लेबनान, UAE, बहरीन, कुवैत और ओमान।
- अमेरिका और इज़राइल का तर्क रहा है कि ईरान की मिसाइल और परमाणु क्षमताएँ क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा हैं, जबकि ईरान इसे अपनी सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा का उपाय बताता है।
🤔 गौर करने वाली बात यह है कि यह सब शुरू हुआ ईरान में तेल की खोज से, और तेल के ही इर्द-गिर्द कई संघर्ष चलते रहे। जब जड़ से देखें तो पता चलता है कि मामला स्पष्ट रूप से संसाधनों का है और प्रश्न यह है कि उनका अधिपति कौन होगा।
आचार्य जी ने मानव मन और प्रकृति के रिश्ते को समझाते हुए सैकड़ों बार हमें संबोधित किया है। हम समझ पाए हैं कि भले ही मानव को जंगल से निकले लगभग 10,000 वर्ष हो गए हों और उसने औद्योगिक और तकनीकी प्रगति से अपार शक्ति हासिल कर ली हो, पर मानव की गति आज भी पुराने पाशविक कारकों से संचालित होती है, संसाधन संचय, क्षेत्रीय विस्तार और संसाधनों के लिए आपसी संघर्ष।
आज तकनीक और औद्योगिकी के चलते प्रतीत होता है कि यह कोई आधुनिक समस्या है, पर यदि इस समस्या को इतिहास की जड़ तक देखा जाए तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह मूलतः उसी प्रकार का संघर्ष है जहाँ एक पशु जंगल में दूसरे से लड़ता है अपने क्षेत्र के लिए, संसाधन के लिए, प्रजनन के लिए।
इन समस्याओं को देखकर हमें आचार्य जी द्वारा परिचित कराए गए और समझाए गए तमाम वैश्विक दर्शनों की कीमत समझ में आती है कि मानव को वास्तव में दर्शन ही मानव बनाता है। केवल बाहरी वृद्धि यदि दर्शन के बिना हो, तो वह एक सीमा के बाद उपयोगी नहीं, बल्कि घातक अवश्य बनेगी।
स्रोत:
Discovery of oil in Persia (1908) https://www.ebsco.com/research-starters/history/oil-discovered-persia
Sykes-Picot Agreement https://en.wikipedia.org/wiki/Sykes%E2%80%93Picot_Agreement
1953 Iranian coup https://en.wikipedia.org/wiki/1953_Iranian_coup_d%27%C3%A9tat
Iranian Revolution https://en.wikipedia.org/wiki/Iranian_Revolution
Iran-Iraq War https://en.wikipedia.org/wiki/Iran%E2%80%93Iraq_War
Israel vs Iran shadow war https://en.wikipedia.org/wiki/Iran%E2%80%93Israel_proxy_conflict
US withdrawal from nuclear deal (2018) https://en.wikipedia.org/wiki/United_States_withdrawal_from_the_Joint_Comprehensive_Plan_of_Action
Assassination of Qasem Soleimani https://en.wikipedia.org/wiki/Assassination_of_Qasem_Soleimani
Gaza war https://en.wikipedia.org/wiki/Gaza_war
US Attack and Iran's Retaliation https://www.washingtonpost.com/investigations/2026/03/01/where-iran-strikes-middle-east-images-video/?utm_source=chatgpt.com
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Oil Is Discovered in Persia | History | Research Starters | EBSCO Research
<p>The discovery of oil in Persia (modern-day Iran) in 1908 marked a significant turning point in the region's economic and political landscape. The process began when Moẓaffar od-Dīn Shāh, the Qājār Dynasty's ruler, sold exploration rights to William Knox…
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Forwarded from All history hub 📖📖📖 (Narayan)
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